My Disable Wife Ch. 2

My Disable Wife - Chapter 2

Posted by Akanksha Rajput • Jun 18, 2026 11:56 PM

उसकी इस बेझिझक और खुली हुई हरकत को देखकर कुछ लोग उसे अजीब तरह से देख रहे थे, लेकिन एलिना को इसकी कोई परवाह नहीं थी। वह पूरी तरह से उस माहौल को enjoy कर रही थी।

शिवांश ने एलिना की हरकतों को कुछ पल शांत नजरों से देखा।  फिर थोड़ा सा झुककर, उसकी आँखों में देखते हुए धीमे लेकिन सख्त लहजे में बोला, " Elena… control yourself. " उसकी आवाज में हल्की सी चेतावनी थी।

शिवांश और एलिना आखिरकार लिविंग एरिया में आकर बैठ गए। सफर की थकान उनके चेहरों पर साफ दिखाई दे रही थी। शिवांश आराम से सोफे पर बैठ गया, जबकि एलिना अब भी आसपास की चीजों को उत्सुकता से देख रही थी।

तभी भावना जी मुस्कुराते हुए एलिना के पास आईं और प्यार से बोलीं, " बेटा, चलिए... आप पहले फ्रेश हो जाइए। उसके बाद मैं आपके लिए खाना लगवाती हूँ। "

एलिना ने उनकी तरफ थोड़ा उलझन भरी नजरों से देखा। उसे कुछ शब्द समझ आए थे, लेकिन पूरी बात उसकी समझ में नहीं आई।

उसकी परेशानी समझकर शिवांश ने तुरंत अंग्रेजी में कहा,

" Elena, Mom is saying that you should freshen up first. After that, she'll get lunch served for you."

शिवांश की बात सुनते ही एलिना के चेहरे पर समझ आने वाली मुस्कान आ गई। " Ohh... okay ! Thank you, Shinu baby, " उसने मुस्कुराते हुए कहा।

भावना जी भी हल्का सा मुस्कुरा दीं और फिर एलिना को अपने साथ लेकर गेस्ट रूम की तरफ चली गईं।

उधर अंबिका जी और बृजेश प्रताप सिंह भी वापस सोफे पर आकर बैठ गए।

शिवांश ने इधर - उधर नजर दौड़ाई और फिर पूछा, " दादी, Dad कहाँ हैं ? "

अंबिका जी ने शांत स्वर में जवाब दिया, " बेटा, वो ऑफिस में ही हैं। तुम्हारे आने की खबर तो है उन्हें, लेकिन कुछ जरूरी काम की वजह से अभी तक लौट नहीं पाए। "

शिवांश ने समझते हुए हल्के से सिर हिलाया। " ठीक है दादी... मैं भी फ्रेश होकर आता हूँ। " उसकी बात सुनकर अंबिका जी प्यार से मुस्कुरा दीं।

शिवांश वहाँ से निकलकर ऊपर की तरफ जाने वाले लंबे कॉरिडोर में आ गया। इतने सालों बाद अपने घर में लौटना उसके लिए किसी एहसास से कम नहीं था। चलते - चलते उसकी नजरें हर तरफ घूम रही थीं।

कई चीजें बदल चुकी थीं।

कुछ नई पेंटिंग्स लगी थीं, कुछ दीवारों की सजावट पहले से अलग थी। लेकिन फिर भी उस हवेली की शान और अपनापन बिल्कुल वैसा ही था, जैसा वह छोड़कर गया था।

इन्हीं खयालों में खोया हुआ वह आगे बढ़ रहा था कि अचानक उसका ध्यान नहीं था और सामने से आती एक लड़की से टकरा गया। टकराते ही लड़की का संतुलन बिगड़ गया और वह आगे की तरफ गिरने लगी।

लेकिन अगले ही पल शिवांश ने तेजी से उसे अपनी बाहों में थाम लिया। एक पल के लिए समय जैसे थम गया।

दोनों की नजरें आपस में मिलीं।

शिवांश की आँखों में पहचान की चमक उभरी और उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई।

" केसर..." उसने धीमे से कहा।

लेकिन दूसरी तरफ, केसर की आँखों में अचानक डर उतर आया। उसकी साँसें तेज हो गईं। चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई देने लगी। अगले ही पल उसने खुद को संभाला और जल्दी से शिवांश से दूर हट गई।

वह मुड़कर तेजी से आगे बढ़ने लगी, लेकिन तभी उसका पैर लड़खड़ा गया। वह दोबारा गिरती, उससे पहले ही किसी ने उसे संभाल लिया।

वो उसकी माँ थीं। उन्होंने तुरंत केसर को अपने सहारे से थाम लिया और अगले ही पल केसर लगभग घबराकर अपनी माँ के पीछे छिप गई।

वह अपनी माँ के कंधे के पीछे से आधा चेहरा बाहर निकालकर शिवांश को अपनी डरी हुई आँखों से देखने लगी।

शिवांश वहीं खड़ा रह गया। उसके चेहरे की मुस्कान धीरे - धीरे गायब हो चुकी थी। वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिर केसर उसे देखकर इतनी डर क्यों गई थी।

तभी केसर की माँ, राधिका, जो अभी तक अपनी बेटी को संभालने में लगी हुई थीं, सामने खड़े शिवांश को गौर से देखते हुए बोलीं, " अरे... छोटे साहब ! आप ? "

राधिका जी की आवाज सुनकर शिवांश का ध्यान केसर से हटकर उनकी तरफ गया। अगले ही पल उसके चेहरे पर पहचान हल्की मुस्कान आ गई। " कैसी हैं आप, काकी ? " उसने अपनापन भरे स्वर में पूछा।

शिवांश के मुँह से अपने लिए वही पुराना सम्मान सुनकर राधिका जी की आँखों में भी हल्की सी चमक आ गई।

" हम ठीक हैं, छोटे साहब, " उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा।

लेकिन तभी शिवांश की नजर एक बार फिर केसर पर चली गई। वह अब भी अपनी माँ के पीछे खड़ी थी। उसका आधा चेहरा ही दिखाई दे रहा था और उसकी डरी हुई आँखें लगातार शिवांश पर टिकी हुई थीं।

उसी समय शिवांश की नजर उसके पैर पर गई।

अभी कुछ देर पहले जब राधिका जी ने उसे संभाला था, तब केसर हल्का सा लंगड़ाते हुए चलकर अपनी माँ के पीछे जाकर छिपी थी। यह बात शिवांश के ध्यान में आई।

उसकी भौंहें हल्की सी सिकुड़ गईं। " इसके पैर को क्या हुआ ? " उसने उसकी माँ की तेरे देख शांत स्वर में पूछा। " ये ऐसे लंगड़ाकर क्यों चल रही है ? "

शिवांश का सवाल सुनते ही राधिका जी के चेहरे की मुस्कान पल भर में गायब हो गई। उन्होंने एक नजर अपनी बेटी पर डाली और फिर धीरे से बोलीं, " कुछ साल पहले एक दुर्घटना में इसके पैर में बहुत गहरी चोट आ गई थी, उनकी आवाज धीमी पड़ गई। कहते।- कहते उनकी आँखों में दर्द उतर आया, " तब से ये पहले की तरह चल नहीं पाती। "

इतना कहते हुए राधिका जी के चेहरे पर एक ऐसा दर्द उभर आया, जिसकी टीस शायद आज भी उनके दिल और यादों में कहीं जिंदा थी।

उधर शिवांश के चेहरे का रंग बदल चुका था। उसकी नजरें धीरे - धीरे केसर की तरफ उठीं और केसर वह अब भी अपनी माँ के पीछे सिमटी खड़ी थी।

अगले ही पल उसने धीरे - धीरे अपनी माँ की साड़ी का पल्लू खींचना शुरू कर दिया, जैसे बिना कुछ कहे ही उनसे वहाँ से चलने की जिद कर रही हो।

------

Hey Lovies ❤️

तो बताइए... आपको शिवांश और केसर की पहली मुलाकात कैसी लगी?

एक तरफ शिवांश के चेहरे पर पुराने दिनों की झलक, तो दूसरी तरफ केसर की आँखों में साफ डर दिखाई दे रहा था। आखिर ऐसा क्या हुआ था कि बचपन में हर वक्त शिवांश के पीछे घूमने वाली केसर आज उसे देखकर घबरा गई?

और सबसे बड़ा सवाल... केसर के साथ ऐसा कौन सा हादसा हुआ, जिसकी वजह से उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई?

अपने thoughts और reviews ज़रूर शेयर करना। आपके comments पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता है। ❤️

Lots of Love 💕

100%