अग्नि साक्षी और विदाई का दर्द- Chapter 3
“Ready hai kya dulhan?” उसने ठंडे स्वर में पूछा।
तिथि ने आंसू भरी आँखों से उसकी तरफ देखा। उसकी आवाज कांप रही थी लेकिन वो बोली,
“हाँ... तैयार हूँ।”
जैसे ही तिथि कमरे से बाहर आई, पूरा कोरिडोर एक पल के लिए सन्नाटे में डूब गया। रेड कलर का भारी लहंगा उसके चॉकलेटी ब्राउन स्किन टोन पर बेहद खूबसूरत लग रहा था। गले में हरियाली वाली जड़ाऊ नेकलेस चमक रही थी, नाक में नथ नथ मे लताकता मोती क्यों उस के रेड लगी लिपस्टिक से सने होठो को छू रहा था, मांग में टिका, कलाईयों में चूड़ियां और सर को घूंघट वाले दुपट्टे में व्यवस्थित किया गया था। उस की बड़ी-बड़ी चॉकलेटी ब्राउन आँखें काजल से सजी हुई थीं, लेकिन उनमें अभी भी आंसुओं की नमी थी। चुलबुली चेहरे वाली तिथि इस वक्त एक दुल्हन की तरह बेहद नाजुक और उदास दिख रही थी। उस के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी
हर्षवर्धन रॉय उसे देखते ही एक पल के लिए जड़ हो गया। उसकी आँखें तिथि के चेहरे पर टिक गईं। उसके गुस्से भरे चेहरे पर अपने आप भाव आ गया हैरानी, आकर्षण और कुछ और। उसने गला साफ किया, एक कदम आगे बढ़ाया और धीरे से दोनों हाथों से तिथि का दुपट्टा उठाकर उस के नाक तक ढक दिया। फिर उस ने तिथि का हाथ मजबूती से पकड़ लिया। उस की पकड़ ठंडी लेकिन दृढ़ थी।
“चलो,” उस ने कम आवाज में कहा।
तिथि का हाथ थोड़ा कांप रहा था, लेकिन वो उसके साथ मंडप की तरफ बढ़ गई। दोनों अग्नि के सामने बैठ गए। पंडित जी मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे। माहौल में फूलों की महक, अगरबत्ती का धुआं और हल्की शहनाई की धुन मिली हुई थी। मेहमान चुपचाप देख रहे थे। कोई समझ नहीं पा रहा था कि ये शादी अचानक कैसे हो गई।
चारों तरफ रॉय परिवार के सदस्य खड़े थे। दादा रुद्रप्रताप रॉय का चेहरा गंभीर था, दादी कविता रॉय की आँखें नम थीं, आर्यन और विहान थोड़ा awkward मुस्कुरा रहे थे। हर्षवर्धन का छोटा भाई आर्यन ने एक बार तिथि को देखा और फिर भाई की तरफ देखकर हल्का सा सिर हिलाया।
पंडित जी ने आवाज दी, “अब कन्यादान के लिए पिता जी आएं।”
राकेश शर्मा आगे आए। उन का चेहरा पीला पड़ थावो हल्के से नाराज नजर आ रहे थे, आँखों में दर्द साफ दिख रहा था। उन्होंने तिथि के सामने झुक कर धीरे से पूछा,
“बेटा... अभी भी वक्त है। अगर तू ये शादी नहीं करना चाहती तो बोल दे। पापा तेरे साथ है। किसी की इतनी हिम्मत नहीं की। मेरे बेटी के साथ जबरदस्ती करें यह बात उन्होंने हर्षवर्धन को घूरते हुए बोली थी"
तिथि ने कुछ बोलने के लिए मुंह खोला ही था कि हर्षवर्धन ने धीरे से उस का हाथ दबा दिया । उस की पकड़ में चेतावनी थी। तिथि ने एक नजर उस की तरफ देखा। हर्षवर्धन की आँखें उस की आँखों में गड़ गई थीं। बड़ी-बड़ी, काजल लगी, हल्की लाल और आंसुओं से भरी हुई आँखें। तिथि का चेहरा भावुक हो गया। हर्षवर्धन ने कुछ पल बाद अपनी नजर हटाई और सामने जल रही अग्नि को देखने लगा। उस की jawline सख्त थी, शरीर सीधा था उस का ओरा कॉंफिडेंट था वो जो कर राह है वो सही है। एक नजर अपने दादी को देखा जो कि उसे मुस्कुराते हुए देख रही थी ।
तिथि ने गहरी सांस ली और पापा से कहा,
“पापा... मैं तैयार हूँ।”
राकेश शर्मा की आँखों से एक आंसू गिर गया। उन्होंने कन्यादान किया। पंडित जी मंत्र बोलते रहे। दोनों ने सात फेरे लिए।हर एक वचन लिया। जो पता नहीं पूरा होगा ये नहीं......हर्षवर्धन तिथि का हाथ थामे हुए था, उस की बॉडी लैंग्वेज में दबदबा था। तिथि के कदम थोड़े भारी थे, लेकिन वो मजबूती से साथ चल रही थी।
जाने अनजाने में ही दोनों कदम से कदम मिला के चले जा रहे थे उसे रास्ते पर जहां की मंजिल शायद उन दोनों को पता नहीं थी या फिर पहले से ही सब कुछ तय है।
फिर विदाई का मुहूर्त आया।
तिथि अपने पापा और भाई की तरफ मुड़ी । उसने पहले पापा को गले लगा लिया। रोते हुए बोली,
“पापा... मैं...”
राकेश शर्मा ने उस की पीठ पर हाथ फेरा। उन की आवाज भारी हो गई थी, “बेटा, ख्याल रखना खुद का। अगर कभी कुछ हो तो...”
तभी दिशांत आगे बढ़ा। उसने तिथि को जोर से गले लगा लिया। उस की आँखें भी नम थीं।
“तेरा भाई हमेशा तेरे साथ है, समझी? किसी ने भी तेरे साथ कोई बदतमीजी करने की कोशिश की ना, तो ये मत समझना कि अब तेरा मायका पराया हो गया। तेरा घर हमेशा तेरा घर रहेगा। बस एक कॉल कर देना। मेरा भाई हमेशा तेरे पास पहुंच जाएगा। यह बात उसने हर्षवर्धन को देखकर कही थी जैसे उसे वार्निंग दे रहा हूं कि मेरी बहन के साथ कुछ भी गलत करने का सोचता भी मत”
हर्षवर्धन ने उसको एक किलिंग स्माइल दी....
तिथि फफक-फफक कर रो पड़ी। चेहरे पर आंसू बह रहे थे, लेकिन वो कुछ नहीं बोल पा रही थी। चांदनी उसे चुप करते हुए कहा कि रो मत मोटी नहीं तो तबीयत खराब हो जाएगी...... और फिर पानी की बोतल लेकर उसे एक दो घुट पानी पिलाया।
उधर दिव्या के माता-पिता (तिथि के बड़े पापा और बड़ी मां) का चेहरा बनावटी मुस्कान वाला था। वे थोड़ा असहज महसूस कर रहे थे, लेकिन कुछ बोल नहीं पा रहे थे।
तिथि के पापा राकेश शर्मा हर्षवर्धन के दादा रुद्रप्रताप रॉय के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
“ये शादी इस तरीके से नहीं होनी चाहिए थी। पर शायद किस्मत का यही लिखा था। आप मेरी बेटी का ख्याल रखिएगा। उस की मां न......”
रुद्रप्रताप रॉय ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में जवाब दिया,
“आप चिंता मत कीजिए। आप की बेटी अब हमारे घर की बहू है। वो यहां भी उतने ही सम्मान और प्यार से रहेगी, जितने आप के घर रहती थी।”
तिथि ने एक बार फिर पापा और भाई को देखा। हर्षवर्धन उस के बगल में खड़ा था। उस का काला सूट अब भी परफेक्ट था, लेकिन चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी। वो तिथि की तरफ देख रहा था उसकी आँखों में अब गुस्सा कम और कुछ और था।
तिथि को लगा जैसे उसका पूरा संसार बदल गया हो। मुंबई की इस रात में, लग्जरी होटल के मंडप में, वो अब किसी पत्नी बन चुकी थी। जिस का नाम भी उसे पता नहीं था
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Priy@nka Bagani......
To be continued...