THE ROYAL C.M - Chapter 1
पहला दृश्य — एक वचन, जो नियति बनेगा.......
लखनऊ की वह रात सामान्य नहीं थी। तिवारी हॉउस के सबसे भीतरी कक्ष में, जहाँ आम तौर पर सिर्फ परिवार के लोग या सबसे विश्वस्त सलाहकार ही कदम रखते थे, आज रघुनाथ तिवारी उम्र के इस पड़ाव पर उनके बाल पूरी तरह सफ़ेद हो चुके थे, पर आँखों में वही चमक थी जो तीस साल पहले हुआ करती थी, जब उन्होंने और विजय प्रताप सिंह ने साथ मिलकर पहला चुनाव लड़ा था। तब न विजय मुख्यमंत्री थे, न रघुनाथ इतने बीमार। बस दो दोस्त थे, जिन्होंने एक-दूसरे की जान बचाने की कसमें खाई थीं।
आज रघुनाथ जी की साँसें उखड़ी हुई थीं। डॉक्टरों ने साफ़ कह दिया था समय कम है। और जब इंसान को पता चल जाए कि उसका वक़्त गिना-चुना है, तो वह अपने सबसे प्रिय व्यक्ति की चिंता सबसे पहले करता है।
"विजय..." रघुनाथ जी की आवाज़ काँप रही थी, पर शब्दों में दृढ़ता थी। "मेरे बाद इस दुनिया में मेरी बेटी ओर पत्नी का कोई नहीं है। न कोई भाई-बहन। बस मैं हूँ, और अब मैं भी नहीं रहूँगा।"
विजय प्रताप सिंह — प्रदेश के मुख्यमंत्री, जिनके एक इशारे पर सत्ता के गलियारे हिल जाते थे। इस वक़्त सिर्फ एक दोस्त थे। उन्होंने रघुनाथ जी का हाथ अपने हाथों में ले लिया।
"रघुनाथ, तुम ऐसी बातें क्यों कर रहे हो? तुम्हें कुछ नहीं होगा।"
"नहीं विजय, मुझे मालूम है।" रघुनाथ जी ने हल्की सी मुस्कान दी। "मैं तुमसे कुछ माँगने नहीं। मैं तुमसे एक वचन माँगने रहा हूँ दोस्ती के नाम पर, उस खून के नाम पर जो हमने कभी एक-दूसरे के लिए बहाने की कसम खाई थी।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।
"बोलो।" विजय प्रताप सिंह की आवाज़ भारी हो गई।
"मेरी बेटी... मेरे जाने के बाद अकेली रह जाएगी। मुझे उसकी काबिलियत पर शक नहीं, वह मुझसे भी ज़्यादा समझदार है। पर इस दुनिया में सिर्फ काबिलियत काफी नहीं होती, विजय। एक छत चाहिए होती है, एक परिवार चाहिए होता है, एक नाम चाहिए होता है जो उसे यह एहसास दिलाए कि वह अकेली नहीं है।"
रघुनाथ जी ने एक गहरी साँस ली, मानो अपने जीवन का सबसे भारी बोझ उतार रहे हों।
"मुझे वचन दो विजय — तुम्हारे घर की बहू, मेरी बेटी बनेगी। तुम्हारा परिवार, मेरी बेटी का परिवार होगा।"
विजय प्रताप सिंह कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गए। यह कोई साधारण माँग नहीं थी। यह एक ऐसा वचन था जो आने वाले सालों में उनके पूरे परिवार की दिशा बदल सकता था। पर सामने बैठा व्यक्ति उनका सबसे पुराना दोस्त था, जिसकी साँसें अब गिनी-चुनी थीं। कुछ बातें तर्क से नहीं, दिल से तय होती हैं।
विजय प्रताप सिंह ने रघुनाथ जी की आँखों में देखा, और धीरे से सिर झुकाकर कहा —
"वचन है, रघुनाथ। जिस दिन भी वक़्त आएगा, तुम्हारी बेटी इस घर की बहू बनेगी। यह मेरा वचन है — मैं वचन देता हूँ ।"
रघुनाथ जी की आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्होंने विजय प्रताप सिंह का हाथ कसकर पकड़ लिया, जैसे इस एक वचन ने उनकी सारी बेचैनी को शांत कर दिया हो।
खिड़की के बाहर लखनऊ की रात गहरा रही थी, और इस कमरे के भीतर एक ऐसा वचन जन्म ले चुका था, जिसकी भनक अभी न राम को थी, न उस लड़की को, जिसके भाग्य का फैसला अभी-अभी हुआ था।
दूसरा दृश्य
अगली सुबह शहर के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित लॉ कॉलेज का माहौल किसी उत्सव से कम नहीं था। कॉलेज का विशाल ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ था — छात्र, प्रोफेसर, स्थानीय मीडिया के कैमरे, और सबसे आगे की कुछ कुर्सियाँ खासतौर पर सुरक्षित रखी गई थीं।
आज राष्ट्रीय स्तर की डिबेट प्रतियोगिता का फाइनल राउंड था, और इस आयोजन को गरिमा देने के लिए युवा राजनीति के प्रदेश अध्यक्ष को विशेष अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया था — राम प्रताप सिंह।
राम जब ऑडिटोरियम में दाखिल हुआ, तो पूरा हॉल एक पल के लिए ठहर सा गया। लंबा कद, चौड़े कंधे, कसा हुआ बदन — मानो किसी ने सालों की मेहनत से गढ़ा हो। चेहरे पर वह रोबीलापन जो पीढ़ियों की राजनीतिक विरासत से आता है, और आँखों में एक अलग ही तेज़, जिसे देखकर लोग खुद-ब-खुद रास्ता दे देते थे। वह पूरी तरह अपने पिता और दादा की परछाई लग रहा था।पर उसके चलने के अंदाज़ में एक अलग ही अकड़ थी, जो सिर्फ उसकी अपनी थी। वाइट शॉर्ट कुर्ता उस पे लाइट ब्लू जेक्ट विथ ब्लैक जींस हाथ में घड़ी और दूसरे हाथ में रुद्राक्ष ओर त्रिशूल लटके हुए मोतियों का ब्रेसलेट...... कुछ लंबे से बाल लड़कियों के दिल की धड़कन बढ़ रहा था।
आयोजकों ने उसे मंच के पास वाली विशेष कुर्सी पर बिठाने की पेशकश की, पर राम ने विनम्रता से मना कर दिया। "मैं यहाँ अतिथि बनकर नहीं, आज के युवा को सुनने आया हूँ," उसने कहा, और नीचे दर्शक दीर्घा में एक साधारण कुर्सी पर जा बैठा भीड़ के बीच, पर फिर भी हर नज़र का केंद्र।
तभी माइक पर घोषणा हुई "अब प्रस्तुत है आज का सबसे प्रतीक्षित मुकाबला — विषय है 'लेडीज़ फर्स्ट'।"
मंच पर दो प्रतिभागी आए — एक लड़का, आत्मविश्वास से भरपूर, कॉलेज की डिबेट टीम का जाना-पहचाना चेहरा। और उसके सामने एक लड़की — सांवला रंग, सादा पहनावा, न बहुत दुबली न भारी शरीर, पर उसकी आँखों में एक ऐसी दृढ़ता थी जो पूरे हॉल में साफ़ झलक रही थी।
लड़के ने अपनी बात रखनी शुरू की — पारंपरिक तर्कों के साथ, "लेडीज़ फर्स्ट हमारी संस्कृति है, यह सम्मान की निशानी है, इसे हर जगह लागू होना चाहिए..." तालियों की गड़गड़ाहट हुई। भीड़ का झुकाव उसकी तरफ साफ दिख रहा था।
फिर बारी आई लड़की की। उसने माइक थामा, एक पल के लिए हॉल में नज़र दौड़ाई, और फिर बोलना शुरू किया — शांत, पर हर शब्द में वज़न।
"मैं लेडीज़ फर्स्ट के खिलाफ नहीं हूँ। मैं सिर्फ यह पूछना चाहती हूँ — क्या यह वाकई बराबरी है, या बराबरी के नाम पर एक नई असमानता?"
हॉल में हल्की खुसर-फुसर हुई। राम ने अपनी कुर्सी पर थोड़ा आगे झुककर सुनना शुरू किया।
"अगर हम इक्वलिटी की बात करते हैं," लड़की ने आगे कहा, "तो इक्वलिटी का मतलब यह नहीं कि हर जगह, हर हाल में, सिर्फ इसलिए किसी को पहला हक़ मिल जाए क्योंकि वह महिला है। इक्वलिटी का असली मतलब है — ज़रूरत के आधार पर हक़ मिलना, लिंग के आधार पर नहीं।"
उसने एक उदाहरण दिया — "आपने बसों में लिखा देखा होगा 'लेडीज़ फर्स्ट'। सोचिए, एक बस में एक अठारह साल की लड़की बैठी है, स्वस्थ, ऊर्जा से भरपूर। और उसके सामने एक अस्सी साल का बुज़ुर्ग खड़ा है, जिसके पैर काँप रहे हैं। अगर हमारा नियम सिर्फ 'लेडीज़ फर्स्ट' कहता है, तो हम उस अठारह साल की लड़की को बैठे रहने का हक़ देते हैं, और उस बुज़ुर्ग को खड़ा रहने पर मजबूर करते हैं — सिर्फ इसलिए क्योंकि वह पुरुष है।"
हॉल में सन्नाटा छा गया।
"यह इंसाफ़ नहीं है। यह सिर्फ एक लेबल बदलना है — पहले पुरुष प्रधानता थी, अब हम एक नई प्रधानता बना रहे हैं, बस नाम बदल दिया। असली बराबरी तब आएगी, जब हमारी सोच यह कहे — 'जिसे ज़रूरत है, वह पहले।' चाहे वह बुज़ुर्ग हो, बीमार हो, गर्भवती महिला हो, या कोई दिव्यांग व्यक्ति। लिंग नहीं, ज़रूरत हमारा पैमाना होनी चाहिए।"
उसने अपनी बात खत्म करते हुए कहा — "अगर हम सच में एक न्यायपूर्ण समाज चाहते हैं, तो हमें 'लेडीज़ फर्स्ट' से आगे बढ़कर 'नीड फर्स्ट' की सोच अपनानी होगी। यही असली समानता है।"
एक पल के लिए हॉल में पूरी तरह खामोशी छा गई। और फिर, जैसे किसी बाँध का पानी टूटा हो, तालियों की गूंज पूरे ऑडिटोरियम में गूंज उठी। छात्र खड़े होकर ताली बजाने लगे। जज टेबल पर बैठे प्रोफेसर एक-दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुरा रहे थे।
पर इन सबके बीच, राम प्रताप सिंह की नज़र सिर्फ उस लड़की पर टिकी थी। उसने न ताली बजाई, न कोई हरकत की। वह बस देख रहा था — उस लड़की को, जिसने अपने विचारों से पूरे हॉल को अपनी मुट्ठी में कर लिया था। जिसके पास न कोई बड़ा नाम था, न कोई राजनीतिक पहचान, न दिखावटी खूबसूरती — पर जिसकी आँखों में जो सच्चाई और स्पष्टता थी, वह किसी भी सुंदरता से ज़्यादा गहरी थी।
राम के भीतर, जो एक पल पहले तक एक अकड़ भरा, गंभीर, राजनीतिक चेहरा था, कुछ बदल रहा था। यह इंप्रेशन नहीं था, यह कुछ और था — एक ऐसी अनुभूति, जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी।
डिबेट खत्म हुई, विजेता की घोषणा हुई — वही लड़की जीती थी। मंच से उतरते हुए, जब वह अपनी सीट की तरफ बढ़ी, राम की नज़रें उसका पीछा करती रहीं।
उसके पास बैठे युवा राजनीति के सचिव ने धीरे से पूछा, "सर, कुछ कहना चाहेंगे?"
राम अपने दिल पे हाथ रखते हुऐ......
"क्या यही है... यही बनेगी मेरा सुकून।"