THE ROYAL CM Ch. 2

THE ROYAL C.M- Chapter 2

Posted by Priyanka Amit Bagani • Sep 10, 2026 05:04 PM

लखनऊ शहर से थोड़ा हटकर, हरियाली से घिरी वो हवेली किसी शाही किले से कम नहीं लगती थी। सफेद संगमरमर के विशाल खंभे, ऊँची मेहराबदार खिड़कियाँ, और सामने फैला एक बड़ा-सा गार्डन — मानो वक्त ठहर गया हो। ठाकुर परिवार सिर्फ राजनीति में ही नहीं, कभी रियासत से भी ताल्लुक रखता था, और आज भी उनकी हवेली की भव्यता उसी शाही विरासत की गवाही देती थी।

गार्डन के बीचों-बीच एक शिव मंदिर था सफेद संगमरमर का, घंटियों की आवाज़ से हमेशा गूँजता हुआ। हर सुबह पूरा परिवार वहाँ इकट्ठा होता, शिवजी की आरती में शामिल होता। यही वो पल था जब हवेली की दीवारें, गार्डन के पेड़, और परिवार के दिल — सब एक सुर में धड़कते थे।

दादी जी कमला देवी

घर की सबसे बुज़ुर्ग, सब से सम्मानित सदस्य। सालों पहले उन्होंने ही यह नियम बनाया था। सुबह का नाश्ता पूरा परिवार साथ बैठकर करेगा, चाहे कितनी भी व्यस्तता क्यों न हो। यह नियम आज भी उतनी ही सख्ती से निभाया जाता था, मानो दादी जी की मौजूदगी आज भी हर सुबह उस मेज़ पर महसूस होती हो।

दादाजी ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह ( ठाकुर दादा )

अस्सी की उम्र, पर तनी हुई मूँछों और सीधी कमर के साथ आज भी किसी जवान से कम नहीं। राजनीति से संन्यास ले चुके थे, पर उनकी एक नज़र ही पूरे घर में अनुशासन कायम कर देती थी।

ताऊजी ठाकुर देवेंद्र प्रताप सिंह ( ठाकुर ताऊजी )

कठोर और अडिग। "जो फैसला ले लिया, सो हो गया" यही उनका जीवन-मंत्र था।

बाबूजी ठाकुर वीरेंद्र प्रताप सिंह ( ठाकुर काका )

शांत, गंभीर, पर आँखों में वही तेज़ जो पूरे खानदान की पहचान थी। तीन पीढ़ियों से चली आ रही राजनीतिक विरासत के मौजूदा वारिस।

अम्मा सुशीला देवी

सीधी-सरल स्वभाव की, बेहद कोमल दिल। हवेली की शान-ओ-शौकत के बीच भी उनकी सादगी सबसे अलग नज़र आती थी। पूरा घर उनकी ममता की छांव में सुकून महसूस करता था।

बुआ जी कौशल्या देवी

स्वभाव से थोड़ी तीखी है पर उन की पूजा-पाठ में लगन, रीति-रिवाज़ों की रखवाली करते हुए भी उनके व्यवहार में कभी कड़वाहट नहीं थी।हर किसी से हँसकर मिलना उनकी पहचान थी।

छोटे भाई अर्जुन प्रताप सिंह ("छोटे ठाकुर कौशल्या देवी का बेटा ) 24 साल के है

मस्ती-मज़ाक में माहिर, पर काम के वक्त राम से कम नहीं। उस का असली जुनून था बाइक्स — गैराज में खड़ी हर सुपरबाइक को वो अपने बच्चे की तरह सहेजता। खाली वक्त में बाइक राइडिंग और उसकी मेंटेनेंस में डूब जाना, यही उसका सुकून था।

हीरो राम प्रताप सिंह 26 साल के है ( हुकुम ठाकुर )

गोरा रंग, तीखे नैन-नक्श, 6'1" का कद, कंधों तक झूलते बाल, सिक्स-पैक बदन। हाथ में रुद्राक्ष की माला, जिसमें त्रिशूल और डमरू झूलते थे। पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स किताबी समझ और मैदानी समझ, दोनों बराबर। कम बोलना उस का एक जुनून था लग्ज़री गाड़ियाँ हवेली के गैराज में खड़ी हर गाड़ी उसकी पसंद की झलक देती थी, और कभी-कभी लंबी ड्राइव पर निकल जाना उस की सब से पसंदीदा फुर्सत मे से एक थी। हर सुबह "हर हर महादेव" से शुरू होती, हर फैसला उसी भरोसे के साथ लिया जाता। गुस्सा तेज़ था, पर बेवजह नहीं सिर्फ अन्याय के खिलाफ भड़कता। देश उस के लिए ज़िम्मेदारी थी, और देश सेवा करना उसकी सोच।

यही था ठाकुर खानदान शाही ठाठ-बाट में रहते हुए भी सादगी से जुड़ा, सत्ता में रहकर भी सेवा को प्राथमिकता देता, और हर सुबह एक ही मेज़ पर, एक ही मंदिर की घंटियों के साथ, एक परिवार की तरह जुड़ा हुआ।

यही था ठाकुर खानदान — जहाँ हर सदस्य अपने आप में एक मज़बूत किरदार था, और हर किरदार के पीछे थी एक साझा विरासत: सत्ता नहीं, सेवा। रोब नहीं, ज़िम्मेदारी।

कुछ ओर किरदार है जो समय के साथ आते जायगे.....

अब आते है स्टोरी पे.....

रात के दस बज रहे थे, हवेली की गैलरी में हल्की पीली रोशनी बिखरी हुई थी। दूर कहीं झींगुरों की आवाज़ गूँज रही थी, और हवा में रातरानी की हल्की खुशबू तैर रही थी।

राम गैलरी की रेलिंग के पास खड़ा दूर अंधेरे में कुछ ढूँढ रहा था, जैसे जवाब वहीं कहीं छिपा हो। उस का एक हाथ लोअर की जेब में था, उँगलियाँ धीरे-धीरे उस पायल को सहला रही थीं छन... छन... एक हल्की सी आवाज़, जो उस के दिल की धड़कन से होड़ लगा रही थी।

[आँखें आधी बंद, होंठों पर हल्की सी मुस्कान]

दस दिन पहले का वो पल उस की आँखों के सामने घूम गया वाद-विवाद प्रतियोगिता, ट्रॉफी, और वो हाथ जो उस ने पकड़ा था। सिर्फ एक हैंडशेक, पर धड़कनें मानो रुक-सी गई थीं।वो लड़की उस की शान्ति से दिल मे हलचल मचा रही थी।

फिर वो सीढ़ियाँ, वो गिरी हुई पायल, और वो पैर जिस में एक पायल गायब थी। राम ने उसी वक्त चुपचाप वो पायल उठा ली थी, बिना ये सोचे कि क्यों।

[जेब में हाथ कसकर बंद करते हुए, जबड़ा सख्त]

मन ही मन बुदबुदाया — "बस कल का दिन है, छम-छम। अगर मिल गई तो समझ ले, तुम्हरी किस्मत अब मेरे साथ बँध गई। और अगर नहीं मिली... तो शायद महादेव कोई वही मंज़ूर नहीं । आप हमारी शांत दिल मे तूफान लाने की कोशिश कर रही है। अच्छा है.... कल आप हमें न मिले..... आप की ये छमछम ने ही हमें पिछले १० दिनों से पागल कर रखा है।"

नाम तो कॉलेज में अनाउंस हुआ था, पर राम उस की मुस्कान में इतना खो गया था कि नाम उस के कानों तक पहुँचा ही नहीं। आज भी वही नाम याद करने की कोशिश में दिमाग खाली था।

तभी कंधे पर एक हाथ पड़ा।

[चौंके बिना, बस आँखें सिकोड़ते हुए बिना पीछे मुड़ा]

राम:"बोलो, छोटे।"

छोटे:[हैरानी से हँसते हुए] "भाई, आप हर बार कैसे पहचान जाते हो बिना देखे?"

राम:[होंठों पर हल्की मुस्कान,) "यूँ ही इतने बड़े मुकाम पर नहीं पहुँच गए, ओर आप के साथ तो बचपन के है छोटे। बोले क़्या बात है जो आप रात गए हमारे कमरे मे "

छोटे: उस का बाजु मे खड़े हों कर रेलिंग से पीठ टिका कर "भाई, कल मामा जी के दोस्त की तेरहवीं है। मामा जी ने कहा है, ग्यारह बजे तक पहुँचना है वहाँ।"

राम ने सिर हल्का सा हिलाया।

राम: "हम्म्म।"

उस की नज़र फिर उसी अंधेरे में लौट गई, जेब में दबी पायल की छन-छन एक बार फिर महसूस होने लगी।

कल तेरहवीं में जाना है, और उधर कहीं वो लड़की भी मिलेगी क़्या जिसने बिना जाने राम की रातों की नींद छीन ली है... क्या कल राम को मिलेगी उसकी छम-छम, या किस्मत कुछ और ही लिख कर बैठी है?

Aapka ek Comment mere liye Award se kam nahi hai.

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Aapka pyaar hi mujhe agla Chapter likhne ke liye Motivate karta hai. 🙏

To be counties......

PRIY@NK@ BAGANI.....

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