अहिर ने दुहे कजरी के दूध
अगली सुबह गाँव में कोहरा छाया हुआ था। अहीर काका अपनी बाल्टी और बर्तन लेकर भैंस दुहने के लिए खूंटे की ओर बढ़े। कजरी को पहले से ही पता था कि काका की आँखें बिना चश्मे के कितनी कमज़ोर हैं, और आज सुबह-सुबह ही उसने शरारत का एक नया जाल बुन लिया था। उसने चुपके से काका का चश्मा उठाकर पास ही एक घास के ढेर में दबा दिया था।
अहीर काका बिना चश्मे के जैसे-तैसे भैंस के पास पहुँचे। अहीर काका अपनी धुंधली नज़रों के साथ बाल्टी लेकर आगे बढ़े। उन्हें लगा कि उनकी भैंस खूंटे से बंधी खड़ी है। कजरी, जो बिल्कुल भैंस की मुद्रा में झुककर खड़ी थी, अपनी नग्नता को लेकर पूरी तरह बेफिक्र थी। उसने अपनी चोली उतारकर दूर फेंक दी थी, जिससे उसके दोनों दूध पूरी तरह से खुले और उभरे हुए थे।
काका ने भैंस समझकर जैसे ही अपना हाथ बढ़ाया, उनके हाथ कजरी के नर्म और भारी दूध पर पड़े। बिना चश्मे के उन्हें बस एक मांसल और मुलायम अहसास हुआ। उन्होंने भैंस का थन समझकर कजरी के दूध को कसकर मुट्ठी में लिया और उसे जोर से नीचे की ओर खींचने लगे।
कजरी के दूध, जो पहले से ही चोली के बंधन से मुक्त थे, काका की मजबूत पकड़ में आकर और भी ज्यादा बाहर की तरफ उभर आए। काका ने उसे जैसे ही खींचा, कजरी की त्वचा में एक अजीब सी सिहरन दौड़ी। उसे दूध दुहने जैसा तो नहीं, बल्कि एक अजीब सी कामुक गुदगुदी महसूस हो रही थी। काका बार-बार एक के बाद एक मुट्ठियां भींच रहे थे, जिससे कजरी के निप्पल रगड़ खा रहे थे।
कजरी अपने मुँह पर हाथ रखकर अपनी हंसी को रोकने की पुरजोर कोशिश कर रही थी। उसे लग रहा था कि यह अब तक की उसकी सबसे बड़ी और मजेदार शरारत है। काका को ये भनक तक नहीं थी कि वे भैंस का थन नहीं, बल्कि एक जवान लड़की के दूध को अपने हाथों से दबा रहे हैं। कजरी अपनी जांघों को थोड़ा और फैलाकर खड़ी हो गई थी, जिससे उसके चूतड़ और योनि का खुला हिस्सा पूरी तरह से काका के पैरों के पास था।
काका मजे से बोले, "आज तो भैंस बड़ी नरम लग रही है और दूध भी बड़ा भरपूर उतर रहा है!"
काका के इस वाक्य ने कजरी के अंदर हंसी का एक और तूफान खड़ा कर दिया। वह अपनी नग्नता में, अपने दूध को काका के हाथों में झूलते हुए महसूस कर रही थी और इस खेल का पूरा लुत्फ उठा रही थी। उसके लिए यह शर्म की बात नहीं, बल्कि एक ऐसा रोमांच था जिसने उसकी सुबह को यादगार बना दिया था।
अहीर काका पूरी तरह से अपनी धुन में मग्न थे। उन्हें लग रहा था कि आज उनकी भैंस वाकई बहुत शांत खड़ी है। उन्होंने अपनी मुट्ठियों को और कस लिया और कजरी के भारी, मखमली दूध को भैंस के थन की तरह ही बार-बार नीचे की ओर मथने लगे।
कजरी के दूध, जो पहले से ही हवा में पूरी तरह खुले थे, काका की मजबूत और खुरदरी हथेलियों के बीच आकर और भी ज्यादा दबता और छलकता महसूस हो रहा था। काका के हाथ जिस तरह से उसके निप्पल पर रगड़ खा रहे थे, उससे कजरी की पूरी देह में एक अजीब सी बिजली सी दौड़ रही थी। वह अपनी कमर को और भी हल्का सा हिलाकर काका की पकड़ को और अधिक आनंदमय बना रही थी।
काका बड़े संतोष से बुदबुदा रहे थे, "अरे वाह! आज तो मेरी भैंस ने कमाल ही कर दिया है। न रंभा रही है, न पैर पटक रही है। इतनी शांति तो कभी नहीं रहती!"
कजरी ये सुनकर खिलखिलाकर हंस पड़ी, हालांकि उसने अपनी हंसी को दबाए रखा। उसे इस बात का बहुत मज़ा आ रहा था कि काका को ज़रा भी शक नहीं हो रहा कि वे क्या कर रहे हैं। उसके चूतड़ काका के पैरों के करीब थे और उसकी योनि की पंखुड़ियाँ सुबह की ठंडी हवा में खुली थीं। काका का पैर कभी-कभी गलती से उसकी नंगी जांघों से छू जाता, लेकिन वे इसे भैंस की खाल समझकर बेखबर बने हुए थे।
काका ने एक और ज़ोरदार झटका दिया, जिससे कजरी के दूध का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह से बाहर को उभर आया। उसे काका के इस 'दुहने' के अंदाज़ में एक अनोखी मस्ती मिल रही थी। वह अपनी गर्दन को थोड़ा झुकाकर काका की तरफ तिरछी नज़रों से देख रही थी, और उसके चेहरे पर वही नटखटपन था।
अहीर काका अपनी बाल्टी भरते हुए कल्पना कर रहे थे कि आज बहुत दूध निकलेगा, और कजरी काका को भैंस समझकर अपनी उस नग्नता में, उनके हाथों के स्पर्श के साथ पूरी तरह डूब गई थी। उसके लिए यह कोई गलत काम नहीं था, यह तो बस एक खेल था—एक ऐसी शरारत जिसमें वह काका को बेवकूफ बनाकर उनके हाथों के जरिए अपनी खुद की देह का मज़ा ले रही थी। गाँव की उस धुंधली सुबह में, वह दृश्य वाकई अजीबोगरीब था—एक तरफ अनभिज्ञ काका और दूसरी तरफ दूध दुहाती, खिलखिलाती हुई बेपरवाह कजरी।
अहीर काका की पकड़ अब और भी मज़बूत हो चुकी थी। वे अपनी पूरी ताकत लगाकर कजरी के भारी दूध को निचोड़ रहे थे, जैसे कि उन्हें किसी भी हाल में सारा दूध बाल्टी में उतारना हो। उनकी खुरदरी हथेलियों का दबाव कजरी के कोमल स्तनों पर साफ महसूस हो रहा था।
जब काका निप्पलों को नीचे की ओर खींचते, तो कजरी के चेहरे पर एक अलग ही भाव उभर आता। उसकी सांसें थोड़ी तेज हो गई थीं। उसके निप्पल, जो पहले ही पूरी तरह बाहर थे, काका की खींचने वाली हरकत से और भी लंबे और संवेदनशील हो गए थे। काका उन्हें झटकों के साथ नीचे खींचते, जिससे कजरी की पूरी देह में एक अजीब सी झनझनाहट फैल जाती।
काका की उंगलियाँ उसके निप्पल के इर्द-गिर्द घूम रही थीं, और कभी-कभी वे अपने अंगूठों से उसके दूध के ऊपरी हिस्से को दबाते हुए नीचे की तरफ लाते थे। कजरी को लग रहा था जैसे उसका शरीर का वह हिस्सा काका की मेहनत से पूरी तरह पिघल रहा है। उसे अपने दूध के बाहर आने का एहसास, काका की उंगलियों की गर्मी और निप्पलों का खिंचाव—सब कुछ एक अद्भुत शरारत की तरह लग रहा था।
वह झुककर खड़ी थी, उसके चूतड़ हवा में हल्के से थिरक रहे थे और उसकी योनि की पंखुड़ियाँ काका की हर हरकत के साथ खुली और सिमटी हुई दिखाई दे रही थीं। अहीर काका अपनी बाल्टी को दूध से भरने की धुन में थे, उन्हें ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि वे जिस 'थान' को निचोड़ रहे हैं, वह कोई जानवर नहीं बल्कि कजरी का शरीर है।
कजरी की आंखों में शरारत और भी गहरी हो गई थी। वह काका की उन मेहनत भरी उंगलियों को महसूस कर रही थी और मन ही मन अपनी उस नग्नता पर गर्व कर रही थी कि उसने काका को किस कदर अपनी उंगलियों के इशारे पर नचा रखा है। वह धीरे से अपनी कमर को और आगे की तरफ ढीला छोड़ देती ताकि काका का काम और आसान हो जाए। उसकी चुलबुली फितरत उसे इस पल को और भी लंबा खींचने के लिए उकसा रही थी, और काका अपनी पूरी लगन से कजरी के दूध को निचोड़ने में लगे थे।