नग्न हो कर अपने लुंगी में आम इकठ्ठा
दोपहर की चिलचिलाती धूप में रामू काका अपनी लाठी के सहारे आम के पेड़ की ऊंची डालियों को खंगाल रहे थे। नीचे टप-टप गिरते आमों की आवाज से पूरा बगीचा गूंज रहा था। थोड़ी ही दूरी पर झाड़ियों के पीछे से कजरी अपनी शरारती आँखों से यह सारा नज़ारा देख रही थी। उसके मन में तो जैसे खलबली मची थी—आम चुराने का रोमांच ही कुछ और था।
बिना सोचे-समझे, वह दबे पाँव पेड़ के नीचे जा पहुँची। उसे आम बटोरने थे, लेकिन उसके पास झोली कहाँ थी? कजरी ने एक पल भी नहीं गँवाया, उसने झटके से अपनी लुंगी अपनी कमर से खोली और उसे फैलाकर नीचे फर्श जैसी सख्त ज़मीन पर बिछा दिया। इस हरकत के साथ ही वह पूरी तरह से निर्वस्त्र हो गई थी। उसके चूतड़ बिना किसी कपड़े के खुले थे और उसकी योनि की पंखुड़ियाँ पूरी तरह से नग्न होकर हवा में स्पष्ट दिखाई दे रही थीं, लेकिन कजरी को इसकी रत्ती भर भी सुध नहीं थी।
वह तो अपनी इस 'जुगाड़' में मग्न थी कि कैसे ज़्यादा से ज़्यादा आम बटोरे जाएं। वह झुक-झुककर लुंगी के बीच में आम इकट्ठा करने लगी। जब भी कोई आम लुढ़ककर दूर जाता, वह बिना परवाह किए, अपने नंगे बदन के साथ मटकते हुए उसे पकड़ने दौड़ने लगती। उसके चूतड़ हर कदम पर हिल रहे थे और उसकी योनि का खुला हिस्सा पूरी तरह से बेपर्दा था।
ऊपर रामू काका आम तोड़ने में इतने मशगूल थे कि उन्हें नीचे चल रही इस हलचल का पता भी नहीं चला। कजरी की फितरत ही ऐसी थी—उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वह सार्वजनिक जगह पर है, या उसका बदन बिना किसी लिबास के सबके सामने है। उसके लिए तो उस पल की मस्ती और वो मीठे आम सबसे ऊपर थे।
वह लुंगी के चारों कोनों को पकड़कर एक पोटली बनाने की कोशिश कर रही थी। इस कोशिश में उसका शरीर जिस तरह झुक रहा था और उसके खुले अंग प्रदर्शन में आ रहे थे, वह एक ऐसा दृश्य था जिसे देख कोई भी दंग रह जाए। लेकिन कजरी के चेहरे पर वही पुरानी चुलबुली मुस्कान थी। उसने लुंगी में आमों का ढेर लगा लिया और जैसे ही रामू काका ने नीचे देखा, कजरी अपनी नग्नता को बिना ढके ही, आमों की पोटली उठाए खिलखिलाती हुई झाड़ियों की ओट में ओझल हो गई। उसे न किसी के देखने का डर था, न अपनी मर्यादा खोने का मलाल—वह तो बस अपनी मस्ती और अपनी उस बेबाक शरारत में जी रही थी।
कजरी आमों की उस पोटली को अपनी छाती से चिपकाए, हवा में झूमती हुई घर की ओर बढ़ रही थी। उसके चेहरे पर विजय की एक अनोखी चमक थी, मानो उसने दुनिया का सबसे बड़ा खजाना जीत लिया हो। वह अपनी ही धुन में गुनगुना रही थी, पैरों में एक ऐसी मस्ती थी कि हर कदम पर उसके शरीर की लहरें और भी निखर कर आ रही थीं।
उसने अपनी लुंगी तो आमों की पोटली में बदल ली थी, इसलिए अब उसका निचला हिस्सा पूरी तरह से खुला और बेबाक था। उसके गदराए हुए चूतड़ चलने के साथ ही तालमेल से हिल रहे थे, और उसकी योनि की पंखुड़ियाँ, जो किसी भी वस्त्र की आड़ से महरूम थीं, पूरी तरह से खुली हुई थीं। राह चलते लोग जो भी उसे देख रहे थे, ठिठक रहे थे—कुछ हैरानी से, तो कुछ उसकी इस मासूम बेपरवाही को देख सकपका रहे थे। लेकिन कजरी की दुनिया अलग थी। वह अपनी अम्मा को आम खिलाने के सुख में इतनी खोई हुई थी कि उसे इस बात का अहसास ही नहीं था कि वह अपने शरीर के सबसे निजी अंगों को पूरी तरह से सबके सामने प्रदर्शित कर रही है।
रास्ते में गाँव के कुछ लड़के उसे देखकर आपस में फुसफुसाए और अपनी नज़रों को उसके खुले अंगों पर टिका दिया, लेकिन कजरी ने उनकी ओर देखकर बस एक बड़ी सी मुस्कान दी और अपने रास्ते पर बढ़ गई। उसे लगा कि वे लोग शायद उसके आमों की पोटली को देख रहे हैं।
उसकी चोली भी उसी तरह ढीली-ढाली थी, जिससे उसके दूध और निप्पल हवा में झूल रहे थे। वह अपनी चाल में जितनी चुलबुली थी, उसका नग्न बदन उतना ही बेबाक। कजरी के लिए तो आज का दिन किसी उत्सव से कम नहीं था। वह बस तेज़ कदमों से अपने आँगन की तरफ भाग रही थी, जहाँ अम्मा उसका इंतज़ार कर रही थीं। उसे यह ज़रा भी परवाह नहीं थी कि गाँव की गलियों में उसकी नग्नता का नज़ारा किसी के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है। उसके लिए, बस अम्मा को खुश करना ही उसकी उस पल की सबसे बड़ी शरारत और सबसे बड़ी खुशी थी। वह बिना किसी शर्म, बिना किसी हिचकिचाहट के, अपनी उस स्वाभाविक नग्नता को ओढ़े, पूरे गाँव को अपनी मस्ती का हिस्सा बनाती हुई घर पहुँच गई।
घर के आँगन में पहुँचते ही कजरी ने बड़े गर्व से पोटली खोल दी। मीठे, ताज़ा आमों की खुशबू से उसका चेहरा खिल उठा था। उसने बड़ी उत्सुकता से अम्मा को पुकारा, "अम्मा! देखो, देखो मैं क्या लाई हूँ!"
अम्मा जैसे ही रसोई से बाहर निकलीं, उनके हाथ से लोटा छूट गया। अपनी बेटी को उस हालत में देखकर—जहाँ उसका शरीर पूरी तरह बेपर्दा था, उसके चूतड़ और योनि के अंग बिना किसी कपड़े के सबके सामने थे—अम्मा का चेहरा गुस्से और शर्म से लाल हो गया। उन्होंने एक पल भी इंतज़ार नहीं किया। पास पड़ी झाड़ू उठाकर उन्होंने कजरी पर बरस पड़ना शुरू कर दिया।
"बेहया! कुलच्छनी! ये क्या कर डाला तूने?" अम्मा की चीखें पूरे घर में गूँज रही थीं। एक के बाद एक झाड़ू की मार कजरी की पीठ और उसके खुले बदन पर पड़ रही थी। कजरी बिलख उठी, वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर हुआ क्या है। उसने तो बस आम तोड़े थे, जो अम्मा को बहुत पसंद थे।
वह मार खाते-खाते आंगन के कोने में दुबक गई, उसकी आँखें आंसुओं से भर आई थीं। वह सिसकते हुए बोली, "अम्मा, तुम मुझे क्यों मार रही हो? मैंने तो बस तुम्हारे लिए आम लाए हैं... देखो, कितने मीठे आम हैं!"
कजरी को सच में यह समझ नहीं आ रहा था कि उसकी पिटाई क्यों हो रही है। उसके मासूम मन के लिए शरीर का ढका होना या खुला होना कोई मायने नहीं रखता था। उसे तो लगता था कि शरीर तो बस एक अंग है, जैसे हाथ या पैर। उसने कभी समाज की नज़रों से अपने अंगों को नहीं देखा था, इसलिए उसके लिए योनि का खुला होना या चूतड़ों का बेपर्दा होना बिल्कुल वैसा ही था जैसे किसी का खुले बाल रखना।
अम्मा की मार जारी थी और कजरी की मासूमियत की दलीलें भी। उसे यह बात बिल्कुल भी समझ नहीं आ रही थी कि आम लाने में उसकी जो 'खूबसूरती' या 'नग्नता' प्रदर्शित हुई, उस पर अम्मा इतना आग-बबूला क्यों हैं। वह तो बस यही सोचकर रो रही थी कि उसकी इतनी मेहनत से लाए हुए आमों का भी अम्मा ने कोई मोल नहीं समझा।
उसकी चोली, जो पहले से ही अस्त-व्यस्त थी, और भी खिसक गई थी, जिससे उसके दूध और निप्पल और भी साफ़ दिख रहे थे। अपनी बेटी की इस अद्भुत और गहरी नासमझी को देखकर अम्मा का गुस्सा और भी बढ़ जाता, लेकिन कजरी की आँखों में वही सवालिया निशान था—"अम्मा, आखिर मैंने किया ही क्या है?"