रिश्ते नाम के Ch. 3

रिश्ते नाम के - Chapter 3

Posted by Arohi Gupta (मुस्कान) • Jun 30, 2026 04:14 PM

"शिव की बात सुनकर सिया जल्दी से अपना हाथ उससे हटा लेती है और हैरानी से अपनी भरी हुई आंखों से उसे देखती है।"

वो धीरे से बोली : " भाई आप भी।"

"सिया तुझे मेरी कसम है बता क्या सच्च हैं...! कौन हैं इस बच्चे का बाप।" शिव उसके कन्धों को पकड़ते हुए बोला।"

"भाई मैं सच्च बोल रही हूं मुझे नहीं पता ये बच्चा मेरे पेट में कैसे आया।"

"सिया की बातें सुनकर शिव उसे हैरानी से देखने लगता है।"

"क्यों अपना वक्त बर्बाद कर रहे हो शिव ये लड़की नहीं बताएगी अपने यार का नाम...! अरे तुझे नहीं पता होगा तो क्या हमे पता होगा की ये बच्चा किसका है।" अनिता गुस्से से उसे अपनी तरफ करते हुए बोली।

"बस करो तुम सब क्या तुम लोगों को अपने दिए गए संस्कार पर भरोसा नहीं है हमारी सिया ऐसा कुछ नहीं कर सकती हैं।" दादी सबको घूरते हुए चिल्ला कर बोली।

"पर मम्मी जी इस लड़की ने यही किया है अब हम क्या मुंह दिखाएंगे समाज को क्या बोलेंगे इस बच्चे का बाप कौन है।" अरविंद अपने सर पर हाथ रखते हुए बोले।

"अरे हम क्यों ये सब सोचे जिसने ये सब किया है वो जाने...! हम क्यों समाज के सामने झुकेंगे...! जब ये लड़की यहां रहेंगी नही तो हमसे क्या मतलब।" अनिता जी सिया को बाहर खींचते हुए ले जाने लगती है।

"अरे छोड़ दो मेरी पोती को...! अरे ये तुम्हारी सगी बेटी है कोई अपनी सगी बेटी के साथ ऐसा करता है क्या....! अरविंद ये तेरा खून हैं...! कहां जाएंगी वो।"दादी व्हीलचेयर को बाहर की तरफ खीच रही थी पर पीछे से अरविंद ने उसे पकड़ा हुए था जिससे वो आगे नहीं बढ़ पा रही थी और वो गेट के पास से ही चिल्ला कर बोल रही थी।

"ये हमारा खून नहीं हैं...! इसने हमारे खानदान को कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा है...! इस लड़की को मैं अपनी बेटी नहीं मानती हूं आज से हमारे परिवार से इसके सभी रिश्ते खत्म ये जहा भी जाए हमसे कोई मतलब नहीं है ये दिन देखने से अच्छा होता की तू पेदा होते ही मर जाती।" अनिता जी सिया को खींचते हुए बाहर ले जाते हुए बोली।

"वही सिया अपने हाथ को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी और बार बार पीछे खड़े अपने पापा अपने भाई और दादी को देख रही थी उसको अभी भी उम्मीद थी कि कोई उसको समझे या ना समझे पर उसका भाई उसका साथ जरूर देखा पर ऐसा कुछ नहीं हुआ उसके भाई ने भी अपने नजरें फेल ली थी।"

"जब शिव ने सिया से नजरें फेरी तो ये देख कर सिया अन्दर से टूट गई थी उसकी कोई ग़लती ना होने पर भी उसको ही सजा मिल रही थी।"

"सिया अपने परिवार में दुसरे नंबर पर थी...! अनिता और अरविंद के तीन बच्चे थे जिसमें से सिया दुसरे नंबर पर आती थी....! सिया से बड़ा उसका भाई शिव था जिसकी शादी सिया की शादी से पहले से तैय थी पर परिवार वाले पहले सिया की शादी करना चाहते थे इसलिए उन्होंने ने शिव की मंगनी करवा दी थी..! सिया से छोटी उसकी बहन अंकिता थी।"

"सिया अनिता और अरविंद की अपनी ओलाद थी अपना खून थी पर तब भी जितना प्यार शिव और अंकिता को उनसे मिलता था उसका एक पर्सेंट सिया को बचपन से बहुत मुश्किल से मिला होगा....! जहां शिव और अंकिता की पढ़ाई अच्छे स्कूल कॉलेज से हुई है वही सिया ने अपनी पढ़ाई स्कॉलरशिप की मदद से पूरी की थी...! मां बाप का प्यार तो नहीं मिला उसे पर सिया की दादी ने उसे हमेशा प्यार किया है वो उनके लिए सबसे उपर थी।"

"वहीं अरविंद का एक छोटा सा बिजनेस हैं जिसे वो बड़ा बनाने के लिए राजीव जी के साथ पार्टनरशिप कर रहे थे...! अरविंद और राजीव अपनी बच्चों की शादी एक दुसरे के बच्चों से करवाना चाहते थे।"

"जहां अरविंद रजवीर की शादी अपनी छोटी बेटी अंकिता से करवाने का सोच रहे थे वही राजीव को राजवीर के लिए सिया पहली नजर में पसंद आ गई थी उन्होंने ने राजवीर के सिया की बात की थी जिसे सुनकर अनिता ने साफ साफ मना कर दिया था पर बिजनेस के खातिर अरविंद तैयार हो गए थे और ऐसे राजवीर और सिया की शादी हो गई थी।"

"अनिता उसे धक्का दे कर घर से बाहर रोड़ पर फेंक देती है।"

"आज से हमारा तेरा कोई रिश्ता नहीं है समझी तूं आज के बाद हमे अपनी ये मनहूस सक्ल कभी मत दिखाना अब निकल जा यहा से।" ये बोल कर अनिता दरवाजा बन्द कर देती है।

"मां...! नहीं खोलो दरवाजा मां।" सिया रोते हुए दरवाजे को धक्का दे रही थी।

"प्रेजेंट टाइम"

ये सब याद करते हुए सिया रोए जा रही थी...! वो रोते हुए बोली : "कोई किसी का नहीं होता है इस दुनिया में खून का भी रिश्ते भी नाम के होते हैं।"

फिर सिया अपने आंसू पोंछते हुए बोली : " अब मैं क्या करूंगी जी कर किसके लिए जीऊ इस बच्चे के लिए जो अभी आया भी नहीं...! उसको पहले ही इतना सब बुरा भला बोल रहे हैं।"



"सिया चलते चलते एक पहाड़ी के पास आ जाती है...! नीचे बड़ी सी नंदी बहें रही थी...! बारिश की वजहा से नंदी मे पानी उपर नीचे हो रहा था।"



"मैं अपने बच्चे को ऐसे लोगो के साथ नहीं रखना चाहती हूं...! नहीं जीना मुझे...!  सबकी जिंदगी की परेशानी हूं ना में जा रही हूं मां, पापा, भाई, दादी मुझे माफ कर दो मेरी वजहा से आपको सुना पड़ेगा जा रही हूं सबको छोड़ कर " ये बोल कर सिया नांदी मे कूद जाती है।"

"वो पानी के अन्दर डूबती जा रही थी...! आंखों से आंसू निकल रहे थे...!

"तूं मर क्यों नहीं जाती है।"

"तू हमारा खून नहीं हैं तूने हमारी नाक कटवा दी।"

"तुझे मेरी कसम है बता ये किसका बच्चा हैं।"

"सिया मैं तुम्हारे साथ हमेशा हूं मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं।"

"सिया जितना पानी के अन्दर जा रही थी उसको ये सब बातें याद आ रही थी उसको हर एक बात हर एक पल अपनी जिंदगी का बिताया हुआ याद आ रहा था।"



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"तीन साल बाद "

"सुबह की पहली किरण के साथ एक सूरज को छूती हुई बिल्डिंग के अन्दर एक लक्जरियस ऑफिस के गेट पर बड़ा सिल्वर प्लेट पर लिखा था सीईओ मिस सीरत।"

"उसके ऑफिस में चार पांच लोग अपनी नजरें झुकाए डर से कांप रहे थे और उन्हीं के सामने एक कुर्सी जो वॉल की तरफ थी।"

"जो पूरी शीशे से बनी थी और वो शख्स बाहर की तरफ देख रही थी जैसे अपने गुस्से को शांत कर रही हो और वो अपनी कुर्सी के हेडल पर वो अपनी उंगली तेब कर रही थी।"

"जैसे वो अपने आप को कुछ भी ग़लत करने से रोक रहीं हों....! उसके बगल मे उसका सेक्रेटरी खड़ा था और उसको देख कर लग ही नहीं रहा था कि उसको कोई भी फर्क पड़ रहा हों केबिन के ऐसे घुटन भरे महोल से पर हमारी सोच यही ग़लत होती है जब तक उसके हिलते पैर ना देखें क्योंकि जब कोई उसके हिले पर देखे तो समझ जाएगी सबसे ज्यादा डर उसको ही लग रहा है क्योंकि वह कहीं ना कहीं जानता है कि अब उन पांचों के साथ क्या होने वाला है।"

"तो इन सब कम के पीछे किसका आइडिया था कौन है तुम सबका गुरू।" वो अपनी चेयर को सामने करते हुए बोली।



"बड़ी नहीं पर नोर्मल गोल हिरनी जैसी आंखें....! पतला मगर प्यारा चेहरा जिस पर कोई भाव नहीं थे एक घमंड था उस चेहरे पर उस चेहरे पर मासुमियत तो थी...! पर उसे ज्यादा उस चेहरे पर दर्द और गुस्सा दिख रहा था...! लंबे इस्टेट बाल...! उसने सफ़ेद रंग का बिजनेस सूट पहना हुआ था।"

"तुम सबकी हिम्मत कैसे हुई मेरे ऑफिस में घोटाला करने की तुमको क्या लगा की मुझे कभी कुछ पता नहीं चलेगा।" वो चिल्लाते हुए गुस्से में बोली।

"उन सब मे से किसी की भी हिम्मत नहीं हो रहीं थीं की वो उसे कुछ बोल सके वो लोग वैसे ही खड़े थे।"

"क्या सिया का जीवन यही तक था...! और कौन हैं ये सिरत और वो क्यों इन आदमियों पर चिल्ला रही हो आखिर ऐसा भी क्या किया है इन सबने ये सब जाने के लिए पढ़ते रहिए रिश्ते नाम के।"

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क्रमशः

मुस्कान

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