The Queen's Choice - Chapter 1
पुर्व में कदापि केशम्भभुमि, उद्दयन गढ़, विजयगढ़ एवं अमृत नगढ़़, इन चार राज्यों एंव इनके शासकों में घनिष्ठ मित्रता होती परस्पर के राज्यों तक जाने के पथो पे पुष्प बिछे होते, प्रेम एंव स्नेह से स्वागत किया जाता, परन्तु अब किसी कारणवश इन चारों राज्यों एवं इनके शासकों में मित्रता का नहीं शत्रुता का सम्पर्क है एक दुसरे राज्यों तक जाने के पथो में अब पुष्प नहीं शव एंव लोगों के कटे शीष बिछे होते हैं घृणा की प्राचीर खीची हुई है, जो प्राचीर को कभी भुल से भी किसी ने लांघने की दुस्साहस की तो वो कदापि पुनः नहीं आपाता, राज्यों के चौराहे पर उसकी पर उसकी शव टगांई दि जाती है,,
इन चारों राज्यों में इस तरह की परिस्थितियां ऐसी है के किसी भी वक्त युध्द छीर सकती है, उद्दयन गढ़ पर परिस्थितियां बाकी तीन राज्यों से ज्यादा भयानक है कोई भी किसी भी समय इस राज्य पर आक्रमण कर सकता है, इस समय याहा के महाराज यशवशं परमान अत्यंत चितिंत है और उनके महामंत्री चंन्द्र शेखर, हरसम्भव प्रयास कर रहें है, राज्यों के घोर विपदा के समय याहा की स्नेहमयी रानी विजयी लक्ष्मी भी अत्यंत दुश्चिंता में है, प्रजा में भय फैला है, सभी प्रजा अत्यंत असहज, एवं असुरक्षित है इन दिवस उद्दयन गढ़ की सुरक्षा इतना निर्बल चुकी है,,
इसका कारण है याहा के सेनापति ने विश्वासघात किया था और विजयगढ़ के साथ मित्रता का हाथ बढाकर उद्दयन गढ़ को भीतर से खोकला कर दिया एंव इस समय अवधि कर रहा है,,
इन कठीन समय में केशम्भभुमि के स्बार्थी महाराज वीरवर्धन प्रताप सिंह ने उद्दयनगढ़ की तरफ मित्रता का हाथ बढ़या है,, परन्तु इस मित्रता के पीछे भी कोई स्वार्थ है ये बात कही न कही यशवशं जानते थे मगर उनके पास और कोई बिकल्प नहीं इस स्बार्थ भरे मित्रता को ग्रहण करने के अलावा,,आज उनके सदेंह को सत्य में बदल दिया केशम्भभुमि की तरह से आये एक पत्र ने,
उस पत्र को पढ़कर यशवशं सोच में पर गए, क्योंकि ये केबल पत्र ही नहीं है इसे सौदा पत्र भी कह सकते है या विवाह प्रस्ताव पत्र भी कह सकते है, महाराज चहलकदमी किये जारहें थे उन्हें देख विजयीलक्ष्मी व्याकुल हो रही थी, क्षणिक समय अवधि उन्हें देखने के पश्चात उन्होंने महाराज यशवशं से अपने मन में चल रहे प्रश्न को पुछ ही लिया,,
विजयीलक्ष्मी - अनेक क्षणों से हम आपको देख रहे है महाराज ये प्रश्न किये बिना हम रह नहीं पा रहे, आप इस पत्र को पढकर इतने चिंतित क्यों होगये, इस पत्र में ऐसा क्या लिखा है?
उनकी बात सुन यशवशं के कदम ठहर गए वो महारानी सम्मुख देख कुछ क्षण मौन रहकर गहरी सांस ले कर बोले
यशवशं- चिंता का विषय ही है महारानी, ये कोइ साधारण पत्र नहीं है, उन्होंने केबल मित्रता का हाथ ही नहीं बढाया इसके अपितु...(इतना बोल वो एकबार फिर मौन हो गये, उन्हें आधी बात कहते देख विजयीलक्ष्मी बैचेन होगई, वो फिर से कहने लगी "अपितु क्या महाराज? कृपा कर ऐसे मौन न रहे हमारा मन बिचलीत हुआ जारहा है, " उनकी बातें सुन यशवशं चुप्पी तोड़ते हुये एक बार फिर गहरी सांस ले कर बोले) ये एक पत्र नहीं एक विवाह प्रस्ताव पत्र है या ये भी कह सकते हैं ये एक सौदा पत्र है,(विवाह प्रस्ताव सुन कुछ समय के हेतु विजयीलक्ष्मी के श्वास में श्वास आई थी परन्तु सौदा सुन वो फिर से बिचलीत हो उठी, अब उन्होंने कुछ पुछा या कहा नहीं इसके अपितु उनके आगे कहने के प्रतिक्षा में व्याकुल दृष्टि से उन्हें देखने लगी, तो वो आगे कहने लगे) उन्होंने हमारी सबसे मुल्यवान चिज़ मांगी है, उन्होंने हमसे हमारी राजकुमारी आत्रेयी को मांगा है, अपने चार पुत्रों के हेतु...(उनकी बात वो सम्पूर्ण अवाक होकर प्रश्न करने लगी "इसका क्या अर्थ हुआ? ") इसका ये अर्थ के आत्रेयी को बाहा रहकर चार युवराजों में किसी एक को अपना जीवनसाथी चुनना होगा यदि हमने उनका शर्त ये सौदे नहीं ग्रहण किया तो वो किसी भी समय उद्दयन गढ़ पर आर्कमन कर सकते हैं,,,
उनकी सकल बाते सुनने के पश्चात भी एक प्रश्न अब भी विजयीलक्ष्मी के मन में रह गये जो उन्होंने इसबार भी पुछ ही लिया " क्षमा करे महाराज परन्तु हम ये नहीं समझ पारहे है आप इस प्रस्ताव को ग्रहण करने से आपत्ति क्यों कर रहे हैं? " उनका प्रश्न सुन महाराज यशवशं के चहरे के अशांत भाव और अशांत हो गये वो इसबार कुछ क्षण उन्हें देख वो बोलने लगे,,
यशवशं - विजयीलक्ष्मी सब कुछ भलीभाँति जानते हैं के पश्चात भी आप ये कह रही है? उद्दयन गढ़ और केशम्भभुमि इन दोनों राज्यों में पुर्व की भातिं घनिष्ठ मित्रता होती परन्तु अब केबल शत्रुता है एवं इस समय उनकी शर्त ग्रहण कर हमारी राजकुमारी को वहाँ भेजने का अर्थ अपनी सबसे अनमोल चिज को शत्रुओ को सौपना है वो कुछ भी कर सकते हैं उसके साथ वीरवर्धन प्रताप सिंह अत्यंत स्वार्थी है वो स्वयं के स्वार्थ के हेतु कुछ भी कर सकते हैं हमें चिंता इसी बात की है... एवंं उन्होंने ये भी लिखा है यदि हमने उनकी शर्त नहीं स्वीकारी तो युद्ध के लिए प्रस्तुत रहने को कहा है, राज्य के इस विपदा के समय में केशम्भभुमि जैसे शक्तिशाली राज्य का साथ पाने का अर्थ है के हमारा राज्य सुरक्षीत हो सकता है इस विपद से मुक्त हो सकता है अपने प्रजा को देखते हुए प्रजा की सुरक्षा के लिए हमें इस शर्त को ग्रहण कर लेना चाहिए परन्तु अपनी पुत्री के समक्ष देख कैसे ग्रहण कर ले इस सौदे को? कैसे सौप दे उसे उनके हबाले? परन्तु कैसे? हमे समझ नही आरहा विजयीलक्ष्मी,,
इतना कुछ कहकर यशवशं एक बार पुनः बिचलीत होउठे उनके कदम लड़खडाने लगे ये देख विजयीलक्ष्मी आगे बढ़ उन्हें सम्हालते हुए बोली "महाराज कृपया धैय रहे अधिक बिचलीत होने से आपके स्वास्थ्य पर प्रभाव पर सकता है "
यशवशं बैठ गये उन्होंने अपने हाथ को माथे से लगाया उन्हें विजयीलक्ष्मी बोली "महाराज आपको चिकित्सक की आवश्यकता है हम.... " वो बात आगे कहती उसके पहले यशवशं उन्हें टोकते हुए बोले "नहीं उसकी आवश्यकता नहीं हम ठीक है,, राजकुमार कहाँ है? " उनका सबाल सुन महारानी जबाब देते हुए बोली वो अपने तिरंदाजी का अभ्यास कर रही है ",,,
क्रमश....
(ये कहानी अलग है शुरुआती कुछ एपिसोड में थोड़ी बोरिंग लग सकतीं है आपको पर मै ये बात दावे के साथ कह सकती हु बाद में बिलकुल वोटिंग नहीं लगेगी तो कृपया धैर्य बनाये रखे पढते रहे प्यार देते रहे एंड बी रेडी फॉर द रोलरकोस्टर राइड रीडर्स)