The Queen's Choice - Chapter 2
घास की चादर पर एक उन्नीस वर्षीय युवती हाथ में तीर लिऐ एक नेत्र बंद कर अनेक दूरी के एक बृक्ष पर निशाना साध रही थी, बातास शितल है, उसकी दृष्टि एकाग्रता एवं स्थिरता से अपने लक्ष्य को यानी बृक्ष के मध्यम लगाये लाल चिह्न को देखे जा रही थी, उसकी श्वास शांत है उसने बातास के प्रवाह को अनुभव करते हुये धनुष से तीर छोड़ा, तीर बातास को चिड़ते हुये दुरी पर उपस्थित बृक्ष के मध्यम लाल चिह्न पर जा लगा, तीर सम्पूर्ण लक्ष्य पर लगा धनुष हाथ में लेकर वो देखने लगी, धनुष झुकाने के पश्चात् उसका मुख दिख रहा है,स्रोतास्विनी की भातिं शांत ,गभीर एंव गम्भीर नेत्र, हल्के बड़े गुलाबी होंठ, तीखा नाक ,गौर वर्ण जो की सुर्य की किरणे परने से अधिक स्वर्ण की भातिं चमक रही है ,कमर तक आतें घने काले केश जिन्हें उसने जुड़ा बनाकर रखा है,
लक्ष्य तक पहचने के पश्चात भी उसके मुख पर संतुष्टि के भाव नहीं वो पुनः निशाना साधने बाली थी , परन्तु उसके पुर्व ही उसके कानों से एक आबाज टकराई "क्षमा करेँ राजकुमारी आपके अभ्यास के बीच टोकने के लिऐ, परन्तु महाराज ने आपको स्मरण किया है " ये बात सुन राजकुमारी ने धनुष झुका दिया केबल धीमे से शीष हिलाया,, एंव कुछ कहा नहीं ये देख शीष झुकाकर सेविका चली गई,,
उसके जाने के पश्चात, राजकुमारी ने आखें मीच़ कर कुछ सोचा इसके उपरांत पलकें खोल, उस लाल दाग को देखा कुछ क्षणों तक ताकने के पश्चात उसनें कदम मोड़ लिये,,
कुछ समय पश्चात,,
यशवशं पीछे हाथ बाधें खड़े अपने बिचार में मग्न थे उसी क्षण उनके कानों में एक स्वर आई "आपने हमें स्मरण किया पिताश्री?", ये स्वर सुन वो उसके सम्मुख होते हुये बोले " हां आत्रेयी हमें आपसे बिशेष बात करनी है, "ये सुनते हुये आत्रेयी उनके नीकट गई और झुककर उनके चरणस्पर्श किये यशवशं ने हाथ आगे बढाकर उसके सर पर हाथ रख कहा
" सदा सुखी रहों पुत्री "हमेशा उनके चरण स्पर्श करने पर महाराज यही आशीर्वाद देते के आयुष्मानभव: परन्तु आज उनके मुख से सुखी रहने की बात सुन आत्रेयी के मुख पर
बिचित्र लकीरें मध्यम मात्रा में उभर आई, वो गभीर श्वास लेकर, महाराज के स्वर को सुन कहने लगी
" आप इतने चिंतित क्यों है पिताश्री ?एवं वो विषेश बात क्या है",, उसके ये दो प्रश्न सुन महाराज यशवशं कहने लगे,,
यशवंश - पुत्री आप तो सब जानती है के शौर्यकेतु के विश्वासघात के पश्चात हमारा राज्य बिखर चुका है, भले ही उन्होंने विश्वासघात किया परन्तु उनसे अधिक उत्तम सेनापति हमारे राज्य को इस समय अवधि नहीं मिला इसी कारणवश हमारी सुरक्षा सेना निस्तेज पर गई है, उद्दयन गढ़ की परिस्थितिया पुर्व से अनेक परिवर्तित हो चुकी है, योग्य नेतृत्व ना होने के कारण सेना की परिस्थिति परिवर्तित हो चुका है, प्रजा असुरक्षित है किसी भी क्षण आर्कमण हो सकता है, राज्य के इस बिपदा के समय में केशम्भभुमि के महाराज वीरवर्धन प्रताप सिंह ने हमारी ओढ़ बर्षो के पश्चात मित्रता का हाथ बढ़ाया इस समय केशम्भभुमि जैसे राज्य का हाथ, साथ पाना स्वयं में ही अत्यंत बड़ी बात है,, परन्तु इस मित्रता के परिवर्तन उन्होंने एक सौदा रखा है, उस सौदा में उन्होंने आपको मांगा है,,
उनकी सभी बातें ध्यानपुर्वक सुनने के पश्चात कुछ क्षणों के हेतु वो मौन होगई, उस कुछ क्षणों के लिये कहने लिऐ वाक्य नहीं मिले ,,
उसे चुप देख महाराज यशवशं ने उसे बुलाया "आत्रेयी" उनके बुलाने से आत्रेयी मानों किसी तन्द्रा से बाहर आई, और कुछ सोच कहने लगी" जी पिताश्री.... क्षमा करे पिताश्री परन्तु हमें सोचने के लिये कुछ समय की आवश्यकता है "
ये सुन यशवशं ने दो शब्द में बोले "अवश्य पुत्री", ये सुनकर सर झुकाये वो चली गई,, दृढ़ दृष्टि से महाराज अत्रेयी को जाते हुये देखते रहें,,
आत्रेयी चहलकदमी करते हुये अपने कक्ष की ओढ़ बढ़ रही,अपने कक्ष में पहचकर वो बैठ गई, आत्रेयी की दृष्टि सम्पुर्ण स्थिर है, वो दृढ़ दृष्टि से माटि को देखे जा रही थी, कोई दृश्य उसके आखों के आगे से घुमने लगा, अपनी विचारों में डुवी आत्रेयी स्वयं से एकाएक बोल परी "पुनः बही सौदे का भवर पुनः बही शर्त का जाल, पुनः हमारे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है? " स्वयं से प्रश्न करते हुये उसके भावहीन आखों ने पलकें बंद कर लिया,,
उसकी आखें खुली एक स्वर कानों तक पहचने से "ज्येष्ठा" ये सुन आत्रेयी की पलकें खुल गई, नज़र घुमाये देखा तो पाया द्वार से लगकर एक सात बषिर्य बालक खड़ा है,, उसे देख आत्रेयी ने उसे बुलाते हुये कहा "अतीक्ष बहा क्यों खड़े हो? " उसका प्रश्न सुन अतीक्ष भीतर आया एंव उसके निकट चला गया वो चहरा झुककर खड़ा हो गया, उसे आत्रेयी उसके केश में हाथ रख बोली "क्या हुआ है?इतनें मौन क्यों हों हाँ? " उसका प्रश्न सुन अतीक्ष बोला "ज्येष्ठा आप चितिंत हो? " अपने प्रश्न के उत्तर के बजाये अतीक्ष की तरफ से प्रश्न सुन आत्रेयी ने उसे अपने पास बैठाया और कहने लगी,"अचानक ये प्रश्न का कारण क्या है? (इसपर अतीक्ष कुछ बोला नहीं तो वो कहने लगी) अतीक्ष हमारे चितिंत होने से आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं आप अभी छोटे है अभी आप के.... "वो बात खत्म करती उसके पहले अतीक्ष चहरा ऊपर अत्रेयी को देख कहने लगा,,
अतीक्ष - परन्तु ज्येष्ठा हमें छोटा नहीं रहना हमें शीघ्र बड़ा होना है एवं आपकी, माताश्री, पिताश्री एवं राज्य की सुरक्षा करना है आपकी तरह बेहतरीन बनना है, राज्य को विपदा से मुक्त करना है,,
इतना कहकर वो चुप हो गया, बही अपने मासुम से अनुज के मुख्य से ये बातें सुन और राज्य के लिये चितिंत होते देख अत्रेयी कुछ पलों के लिये हैरत में रह गई,, हैरत से स्वंय को बाहर लाकर मुस्कुराकर उसने अतीक्ष गले लगा एंव कहने लगी,
आत्रेयी - हमे तो ज्ञात ही नहीं चला के हमारे छोटे से अती इतने बड़े होगये के राज्य की सुरक्षा के हेतु हम सकल की सुरक्षा के हेतु बिचार करने लगे, आपको इतना चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, ना ही शीघ्र बडे़ होने की आवश्यकता है एंव जहा तक बात आपके बेहतरीन है तो आप हमसे भी अधिक बेहतरीन है एंव इस समय के हेतु सुरक्षा का दायित्व पिताश्री, महामंत्री, सेनापति एवं हम सम्हाल लेगें तो अभी के लिये ये सोच चिंतित ना हो,,,
क्रमश.....
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