Episode 2 – एक नया फैसला
रात के लगभग साढ़े नौ बजे...
तेज़ बारिश अब भी लगातार हो रही थी। सड़क किनारे बने बस स्टॉप की लोहे की बेंच पर बैठी अन्विका राजवंशी बिल्कुल खामोश थी।
उसकी आँखें सूज चुकी थीं।
दिल इतना टूट चुका था कि अब आँसू भी सूखने लगे थे।
कुछ देर पहले ही एक अजनबी ने उसकी जान बचाई थी।
आरिज़ राठौर...
वह नाम तो नहीं जानती थी, लेकिन उसकी शांत आँखें और उसके शब्द बार-बार उसके ज़हन में घूम रहे थे।
"बारिश में भीगने से दर्द कम नहीं होता... सिर्फ़ बुखार बढ़ जाता है।"
अन्विका ने गहरी साँस ली और खुद से बोली,
"अब किसी पर भरोसा नहीं करना है... कभी नहीं।"
उसने मोबाइल निकाला।
स्क्रीन पर दर्जनों मिस्ड कॉल थीं।
माँ...
पापा...
शनाया...
लेकिन जिस नंबर का उसे इंतज़ार था...
उस नंबर को वह पहले ही ब्लॉक कर चुकी थी।
उसने बिना किसी कॉल का जवाब दिए मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया।
"आज से मेरी ज़िंदगी सिर्फ़ मेरी होगी..."
इतना कहकर वह उठी और सड़क पर चलने लगी।
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उसी समय...
राजवंशी मेंशन।
पूरे हॉल में मेहमान जा चुके थे।
लेकिन घर के अंदर माहौल बिल्कुल शांत नहीं था।
महेंद्र राजवंशी गुस्से में इधर-उधर टहल रहे थे।
"मैंने कहा था ना... उसे पहले मत बुलाओ। उसने सबके सामने तमाशा कर दिया।"
सुनीता ने धीरे से कहा,
"वो हमारी बेटी है..."
"बेटी है इसलिए समझदारी दिखानी चाहिए थी।"
शनाया सोफे पर आराम से बैठी कॉफी पी रही थी।
उसके चेहरे पर जीत की मुस्कान थी।
करण उसके बगल में बैठा था।
"डैड..."
शनाया बोली।
"अब अन्विका की चिंता छोड़िए। अभी मीडिया को संभालना ज़रूरी है।"
महेंद्र ने भौंहें सिकोड़ लीं।
"मतलब?"
करण ने कहा,
"अगर आज की बात बाहर चली गई तो हमारी कंपनी की इमेज खराब होगी।"
शनाया मुस्कुराई।
"तो बाहर वही जाएगा... जो हम चाहेंगे।"
महेंद्र ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
"क्या करने वाली हो?"
शनाया ने अपना मोबाइल निकाला।
"मैंने पहले ही पीआर टीम से बात कर ली है।"
उसने स्क्रीन करण की तरफ घुमाई।
हेडलाइन तैयार थी—
"राजवंशी ग्रुप की छोटी बेटी ने नशे की हालत में सगाई समारोह में किया हंगामा।"
करण मुस्कुराया।
"परफेक्ट..."
सुनीता घबरा गईं।
"ये झूठ है।"
शनाया ने ठंडी नज़र से उन्हें देखा।
"सच वही होता है... जिस पर लोग यकीन कर लें।"
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दूसरी तरफ...
राठौर हाउस।
दिल्ली के बाहरी इलाके में फैला हुआ विशाल महल...
जहाँ हर कोने में शाही ठाठ दिखाई देता था।
काली Rolls-Royce पोर्च में आकर रुकी।
आरिज़ कार से उतरा।
जैसे ही वह अंदर पहुँचा...
एक बुज़ुर्ग महिला मुस्कुराते हुए उसके सामने आ गईं।
"आ गए, बेटा?"
आरिज़ ने झुककर उनके पैर छुए।
"कैसी हैं आप, दादी?"
राजेश्वरी देवी राठौर...
राठौर परिवार की मुखिया।
उन्होंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा।
"मैं ठीक हूँ... लेकिन तुम ठीक नहीं लग रहे।"
आरिज़ हल्का-सा मुस्कुराया।
"मैं बिल्कुल ठीक हूँ।"
"झूठ..."
दादी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा।
"तुम जब भी किसी बात में उलझते हो... तुम्हारी आँखें बता देती हैं।"
आरिज़ कुछ पल चुप रहा।
फिर धीरे से बोला,
"आज एक लड़की मिली थी।"
दादी की आँखों में चमक आ गई।
"अच्छा..."
"वो मुश्किल में थी।"
"सुंदर थी?"
आरिज़ ने हल्की मुस्कान दबा ली।
"दादी..."
"मैंने जो पूछा उसका जवाब दो।"
कुछ सेकंड की चुप्पी के बाद उसने कहा,
"...हाँ।"
दादी हँस पड़ीं।
"लगता है भगवान ने आखिरकार तुम्हें किसी से मिलवा ही दिया।"
"ऐसी कोई बात नहीं है।"
"तो फिर उसके बारे में सोच क्यों रहे हो?"
आरिज़ के पास कोई जवाब नहीं था।
वह खुद भी नहीं समझ पा रहा था...
आखिर एक अजनबी लड़की बार-बार उसके ख्यालों में क्यों आ रही थी।
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उधर...
अन्विका पूरी रात सड़कों पर भटकती रही।
आख़िरकार उसे अपनी कॉलेज की सबसे अच्छी दोस्त मेहर अरोड़ा याद आई।
उसने उधार लेकर एक फोन से मेहर को कॉल किया।
"हैलो..."
दूसरी तरफ से नींद भरी आवाज़ आई।
"मेहर..."
अन्विका की आवाज़ सुनते ही मेहर एकदम उठ बैठी।
"अन्वी...? तू रो क्यों रही है? क्या हुआ?"
कुछ पल तक अन्विका कुछ बोल ही नहीं पाई।
फिर उसकी सिसकियाँ सुनाई देने लगीं।
"मेहर..."
"उन्होंने... सबने मिलकर मुझे धोखा दे दिया..."
मेहर का चेहरा गंभीर हो गया।
"तू वहीं रुक। मैं दस मिनट में पहुँच रही हूँ।"
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करीब पंद्रह मिनट बाद...
मेहर अपनी कार लेकर वहाँ पहुँच गई।
जैसे ही उसने अन्विका को देखा...
वह दौड़कर उसके गले लग गई।
"तू पूरी भीग गई है।"
अन्विका खुद को रोक नहीं पाई।
वह फूट-फूटकर रोने लगी।
मेहर उसे कार में बैठाकर अपने फ्लैट की ओर ले गई।
लेकिन...
दोनों को बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था...
कि थोड़ी ही दूर एक काली SUV उनकी कार का पीछा कर रही थी।
SUV के अंदर बैठा आदमी फोन पर बोला—
"मैडम..."
"अन्विका राजवंशी अपने घर नहीं गई।"
दूसरी तरफ से शनाया की ठंडी आवाज़ आई—
"उस पर नज़र रखो..."
"मुझे उसकी हर साँस की खबर चाहिए।"
SUV धीरे-धीरे मेहर की कार के पीछे चलती रही...
और अन्विका को इसकी ज़रा-सी भी भनक नहीं लगी।
मेहर की कार धीरे-धीरे उसके अपार्टमेंट की पार्किंग में आकर रुकी।
"चल... ऊपर चल।"
मेहर ने अन्विका का हाथ पकड़ते हुए कहा।
लेकिन अन्विका अभी भी खामोश थी।
उसकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य घूम रहा था...
करण का शनाया का हाथ थामना...
पापा का चुप रहना...
और माँ का उसकी तरफ़ न देख पाना।
"अन्वी..."
मेहर ने उसका चेहरा अपनी तरफ़ घुमाया।
"तू अकेली नहीं है।"
बस इतना सुनते ही अन्विका फिर रो पड़ी।
मेहर उसे अपने फ्लैट में ले गई।
उसने गर्म कॉफी बनाकर उसके हाथ में दी।
"अब मुझे शुरू से सब बता।"
अन्विका ने एक-एक करके पूरी बात बता दी।
चार साल का रिश्ता...
अचानक सगाई...
परिवार का साथ छोड़ देना...
सब कुछ।
मेहर गुस्से से भर गई।
"अगर मैं वहाँ होती ना... उस करण को वहीं थप्पड़ मार देती।"
अन्विका फीकी-सी मुस्कुराई।
"अब उससे कोई मतलब नहीं है।"
"मतलब क्यों नहीं है?"
"क्योंकि..."
उसने आँसू पोंछे।
"जिस इंसान ने मुझे इतनी आसानी से छोड़ दिया... उसके लिए मैं एक आँसू भी और नहीं बहाऊँगी।"
मेहर ने राहत की साँस ली।
यही अन्विका थी...
जो टूटती थी...
लेकिन बिखरती नहीं थी।
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उसी समय...
राजवंशी मेंशन।
शनाया अपने कमरे में बैठी मोबाइल स्क्रॉल कर रही थी।
तभी उसके फोन पर एक मैसेज आया।
"मैम... अन्विका मेहर अरोड़ा के फ्लैट में है।"
शनाया के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
"अच्छा है..."
उसी समय करण कमरे में आया।
"क्या सोच रही हो?"
"यही कि अन्विका इतनी जल्दी हार मानने वालों में से नहीं है।"
करण ने लापरवाही से कहा,
"अब वो कर भी क्या सकती है?"
शनाया उसकी तरफ़ मुड़ी।
"तुम उसे जानते नहीं हो।"
"मतलब?"
"अगर उसने वापस आकर सच बोल दिया... तो हमारी इमेज खराब हो सकती है।"
करण कुछ पल चुप रहा।
"तो फिर?"
शनाया की आँखों में चालाकी चमक उठी।
"उसे वापस आने का मौका ही नहीं मिलेगा।"
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राठौर हाउस...
आरिज़ अपने स्टडी रूम में बैठा लैपटॉप पर काम कर रहा था।
लेकिन...
आज पहली बार उसका ध्यान काम में नहीं लग रहा था।
बार-बार उसी लड़की का भीगा हुआ चेहरा उसकी आँखों के सामने आ रहा था।
उसने फाइल बंद कर दी।
तभी कबीर अंदर आया।
"सर..."
"जी?"
"कल सुबह नौ बजे मेहरा ग्रुप के साथ मीटिंग है।"
"हूँ..."
कबीर ने गौर किया कि आरिज़ कहीं खोया हुआ है।
"सब ठीक है?"
आरिज़ ने खिड़की के बाहर देखते हुए पूछा,
"अगर किसी अजनबी की आँखों में इतना दर्द दिखे... तो क्या उसे यूँ ही छोड़ देना चाहिए?"
कबीर मुस्कुराया।
"लगता है बात गंभीर है।"
आरिज़ ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने सिर्फ़ इतना कहा,
"उस लड़की के बारे में पता करवाओ।"
कबीर चौंक गया।
"सर... सिर्फ़ नाम भी नहीं जानते।"
"फिर भी पता करो।"
"ओके, सर।"
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अगली सुबह...
सूरज की पहली किरण कमरे में दाखिल हुई।
अन्विका की आँख खुली।
कई महीनों बाद उसे एहसास हुआ कि वह अपने घर में नहीं है।
कुछ पल के लिए उसकी आँखें भर आईं।
लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभाल लिया।
"अब रोना बंद..."
"अब सिर्फ़ आगे बढ़ना है।"
वह आईने के सामने खड़ी हुई।
उसने अपने चेहरे को ध्यान से देखा।
कल वाली मासूम अन्विका...
आज कहीं खो चुकी थी।
उसने अपने आँसू पोंछे और खुद से वादा किया—
"जिस परिवार ने मुझे ठुकराया...
एक दिन वही लोग मुझ पर गर्व करना चाहेंगे।
लेकिन उस दिन...
मैं उनके साथ नहीं रहूँगी।"
तभी मेहर कमरे में आई।
"गुड मॉर्निंग।"
"गुड मॉर्निंग।"
"अब क्या प्लान है?"
अन्विका कुछ पल सोचती रही।
फिर बोली,
"मैं राजवंशी ग्रुप छोड़ रही हूँ।"
मेहर हैरान रह गई।
"क्या...?"
"अब मैं अपनी पहचान खुद बनाऊँगी।"
"लेकिन तेरे सारे प्रोजेक्ट..."
"सब छोड़ दूँगी।"
मेहर ने उसकी आँखों में देखा।
वहाँ दर्द तो था...
लेकिन अब उसके साथ एक नया आत्मविश्वास भी था।
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उसी समय...
दिल्ली के एक आलीशान कॉन्फ़्रेंस हॉल में...
आरिज़ राठौर मीटिंग के लिए पहुँचा।
मीटिंग शुरू होने ही वाली थी कि उसकी नज़र सामने लगी बड़ी LED स्क्रीन पर गई।
स्क्रीन पर अचानक एक बिज़नेस न्यूज़ फ्लैश हुई।
"राजवंशी ग्रुप की क्रिएटिव डायरेक्टर अन्विका राजवंशी ने निजी कारणों से कंपनी से इस्तीफा दिया।"
स्क्रीन पर वही चेहरा उभर आया...
जिसे उसने पिछली रात बारिश में देखा था।
आरिज़ की आँखें कुछ पल के लिए ठहर गईं।
"तो..."
उसने धीरे से कहा,
"तुम अन्विका राजवंशी हो..."
उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।
उसी वक्त कबीर तेज़ी से उसके पास आया।
"सर..."
"क्या हुआ?"
"जिस लड़की के बारे में आपने पता करने को कहा था..."
"हाँ?"
"वो कोई आम लड़की नहीं..."
"राजवंशी ग्रुप की बेटी है।"
आरिज़ ने एक बार फिर स्क्रीन की तरफ़ देखा।
उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था...
कि किस्मत अब बार-बार उसकी राह उसी लड़की से टकराने वाली है।
और दूसरी तरफ़...
शनाया अपने ऑफिस में बैठी एक फाइल पर साइन कर रही थी।
उसने मुस्कुराते हुए कहा—
"अन्विका...
ये तो बस शुरुआत है।
अब मैं तुम्हारी ज़िंदगी से वो सब छीनूँगी...
जिस पर तुम्हें सबसे ज़्यादा गर्व है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया...
और यहीं से शुरू होने वाला था...
अन्विका और शनाया के बीच असली युद्ध।
To be continue
Muskan Gupta