Daddy Obsession - Chapter 2
अमर सिंह राजपूत की काली बुलेटप्रूफ मर्सिडीज़ रात की सड़कों को चीरती हुई तेज़ी से आगे बढ़ रही थी।
कार के भीतर हमेशा की तरह सन्नाटा था।
स्टीयरिंग पर ड्राइवर...
पीछे दाईं ओर अमर...
और उससे दो सीट आगे टैबलेट हाथ में लिए विकास।
"सर, कल सुबह नौ बजे दुबई बोर्ड की वीडियो मीटिंग है। उसके बाद रक्षा मंत्रालय के प्रतिनिधियों के साथ—"
"सुबह याद दिला देना।"
"जी, सर।"
फिर वही खामोशी।
खिड़की के बाहर शहर की जगमगाती रोशनियाँ पीछे छूटती जा रही थीं, लेकिन अमर की आँखें कहीं और थीं। वह उन लोगों में से था जो घर लौटते समय भी दफ़्तर को पीछे नहीं छोड़ते थे।
करीब तीस मिनट बाद...
कार विशाल लोहे के गेट के सामने आकर रुकी।
गेट अपने आप खुल गया।
अंदर कई एकड़ में फैला राजपूत हाउस किसी महल से कम नहीं था। सामने संगमरमर का विशाल फव्वारा, दोनों ओर विदेशी पेड़ों की कतारें, लंबा ड्राइव-वे और दूर सफेद पत्थरों से बना तीन मंज़िला बंगला, जिसकी हर बालकनी सुनहरी रोशनी में नहा रही थी।
लेकिन...
आज कुछ अलग था।
बंगले के बाहर दर्जनों लग्ज़री कारें खड़ी थीं।
अंदर से तेज़ म्यूज़िक की आवाज़ आ रही थी।
अमर की भौंह हल्की सिकुड़ी।
"आज घर में क्या है?"
विकास ने तुरंत टैबलेट देखा।
"सर... आज आपकी बेटी अनाया का जन्मदिन नहीं है... कोई पारिवारिक कार्यक्रम भी नहीं..."
अमर बिना कुछ बोले कार से उतर गया।
मुख्य दरवाज़ा खुलते ही तेज़ संगीत और शोर ने उसका स्वागत किया।
पूरा हॉल रंग-बिरंगी लाइटों से जगमगा रहा था।
कहीं डांस हो रहा था...
कहीं शराब के ग्लास टकरा रहे थे...
कहीं ज़ोर-ज़ोर से हँसी गूँज रही थी।
महँगे सोफ़ों पर बैठे लड़के-लड़कियाँ जैसे इस बात से बेख़बर थे कि यह किसी होटल का नहीं, बल्कि अमर सिंह राजपूत का घर है।
एक नौकर घबराकर उसकी ओर दौड़ा।
"स...सर... हम रोक नहीं पाए। मैडम ने किसी की बात नहीं सुनी।"
अमर की ठंडी निगाह पूरे हॉल पर घूमी।
म्यूज़िक उसी पल बंद हो गया।
कुछ लोगों ने उसे पहचान लिया।
एक पल पहले जो लोग हँस रहे थे, अब उनके चेहरों का रंग उड़ चुका था।
सीढ़ियों के पास...
फर्श पर बैठी एक लड़की ज़ोर-ज़ोर से रो रही थी।
उसके हाथ में आधा भरा ग्लास था।
बाल बिखरे हुए...
आँखें लाल...
और शराब की तेज़ गंध।
वह थी—
अनाया।
अमर की इकलौती बेटी।
"उसने... उसने मुझे छोड़ दिया..."
अनाया लड़खड़ाती आवाज़ में बुदबुदाई।
"उसने कहा... अब उसे मुझसे प्यार नहीं..."
वह फिर हँसने लगी...
और अगले ही पल रोने लगी।
"मैं इतनी बुरी हूँ क्या...?"
आसपास खड़े उसके दोस्त असहज होकर एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
किसी की हिम्मत नहीं हुई आगे बढ़ने की।
अमर धीरे-धीरे उसके सामने पहुँचा।
उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था...
लेकिन वही डरावनी शांति थी जिसे उसके कर्मचारी अच्छी तरह जानते थे।
"उठो।"
उसकी धीमी आवाज़ पूरे हॉल में गूँज गई।
अनाया ने ऊपर देखा।
शराब के नशे में भी वह अपने पिता को पहचान गई।
"ओह..."
वह कड़वी हँसी हँसी।
"आ गए आप...?
बधाई हो...
आपकी कंपनी नंबर वन है...
लेकिन आपकी बेटी हार गई..."
उसने फिर ग्लास से घूँट लेने की कोशिश की।
अमर ने बिना कुछ कहे उसके हाथ से ग्लास लेकर फर्श पर रख दिया।
"बस।"
"आपको क्या पता प्यार क्या होता है..."
अनाया लगभग चिल्ला पड़ी।
"आपने कभी किसी को चाहा ही नहीं..."
उसकी आवाज़ टूट गई।
"वो मुझे छोड़कर चला गया..."
एक पल के लिए...
अमर की आँखों में कुछ बदला।
बहुत हल्का...
इतना हल्का कि शायद कोई देख भी न पाता।
लेकिन अगले ही क्षण उसका चेहरा फिर पत्थर जैसा हो गया।
उसने अनाया का हाथ पकड़कर उठाना चाहा।
अनाया ने झटका दे दिया।
"मुझे मत छूइए!"
अमर का धैर्य पहली बार डगमगाया।
उसका हाथ अनायास ऊपर उठा—
चाँटा मारने के लिए नहीं...
बल्कि उसे झकझोरकर होश में लाने की तीखी प्रतिक्रिया में।
तभी...
एक नरम लेकिन दृढ़ हाथ ने उसकी कलाई पकड़ ली।
पूरा हॉल स्तब्ध रह गया।
अमर ने धीरे-धीरे सिर घुमाया।
उसके सामने लगभग उन्नीस वर्ष की एक लड़की खड़ी थी।
साधारण नीली जीन्स...
सफेद टी-शर्ट...
पैरों में सफेद स्नीकर्स...
चेहरे पर मेकअप नाममात्र का।
खुले बाल कंधों पर बिखरे हुए थे।
उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में डर साफ़ दिखाई दे रहा था...
लेकिन उसी डर के पीछे अजीब-सी हिम्मत भी थी।
वह काँप रही थी...
फिर भी उसने अमर की कलाई नहीं छोड़ी।
दोनों की नज़रें मिलीं।
कुछ पल...
समय जैसे थम गया।
अमर पहली बार किसी चेहरे को इतने ध्यान से देख रहा था।
उस लड़की की आँखों में बनावट नहीं थी...
दिखावा नहीं था...
बस एक सच्ची मासूमियत थी।
उधर लड़की भी उस लंबे, सख़्त चेहरे वाले आदमी को देख रही थी जिसकी मौजूदगी भर से पूरा कमरा शांत हो गया था।
उसने धीरे से होंठ भींचे।
फिर हिम्मत जुटाकर बोली,
"आप... आप कौन हैं?"
अमर की भौंह हल्की उठी।
लड़की ने अनाया के सामने एक कदम और बढ़ते हुए कहा,
"मेरी दोस्त को क्यों मार रहे हैं?"
हॉल में खड़े कई लोगों की साँस अटक गई।
विकास ने माथे पर हाथ रख लिया।
उसे समझ आ गया था कि यह लड़की घर की सच्चाई नहीं जानती।
लड़की ने पूरी गंभीरता से कहा,
"आपको पता भी है इसके पापा कौन हैं?"
अमर कुछ सेकंड उसे देखता रहा।
उसके भीतर पहली बार एक विचित्र-सी भावना उठी।
सामने खड़ी लड़की...
उसे...
उसी के नाम से डरा रही थी।
हॉल में मौजूद कुछ लोग हँसी रोकने की कोशिश करने लगे, लेकिन अमर की मौजूदगी में किसी की आवाज़ बाहर नहीं निकली।
लड़की ने फिर कहा,
"अगर इसके पापा को पता चल गया ना..."
वह बात पूरी भी नहीं कर पाई।
अमर की आँखों में पहली बार बहुत हल्की मुस्कान की रेखा उभरी।
इतनी हल्की कि शायद सिर्फ़ विकास ने देखी।
"अच्छा?"
उसने शांत स्वर में पूछा।
"और इसके पापा क्या करेंगे?"
लड़की ने तुरंत जवाब दिया,
"जो भी करेंगे... सही करेंगे।"
उसकी आवाज़ अब भी काँप रही थी।
लेकिन उसने अनाया का हाथ थाम लिया।
"मैं अपनी दोस्त को किसी के मारने नहीं दूँगी।"
अमर कुछ नहीं बोला।
उसकी नज़रें बस उसी चेहरे पर टिकी रहीं।
उसे आश्चर्य हो रहा था—
इतनी मासूम दिखने वाली यह लड़की डर के बावजूद पीछे क्यों नहीं हट रही?
उधर लड़की भी समझ नहीं पा रही थी कि सामने खड़ा यह आदमी इतना शांत क्यों है।
कमरे में मौजूद हर व्यक्ति साँस रोके इस दृश्य को देख रहा था।
अगले ही पल...
ऊपर की मंज़िल से तेज़ कदमों की आवाज़ आई।
"कायल...!"
किसी महिला की घबराई हुई आवाज़ पूरे हॉल में गूँजी।
लड़की ने पलटकर ऊपर देखा।
और उसी क्षण...
दृश्य वहीं ठहर गया।