Daddy Obsession - Chapter 3
ऊपर की मंज़िल से भागती हुई मध्यम आयु की एक महिला नीचे आई।
उसकी नज़र सबसे पहले अमर पर पड़ी, फिर कायल पर।
उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
"कायल...!"
उन्होंने घबराकर उसका हाथ पकड़ लिया।
"बेटा... तुमने क्या किया?"
कायल ने मासूमियत से उनकी ओर देखा।
"आंटी, ये अंकल अनाया को मारने वाले थे। मैंने बस—"
"चुप...!"
महिला ने धीरे से उसकी बात काट दी।
उन्होंने काँपते हुए अमर की तरफ देखा।
"स... सर... माफ़ कर दीजिए। इसे नहीं पता था कि..."
कायल ने हैरानी से दोनों को देखा।
"क्या नहीं पता था?"
महिला ने गहरी साँस ली।
"बेटा... ये... ये अनाया के पापा हैं।"
एक पल...
बस एक पल के लिए जैसे पूरी दुनिया रुक गई।
कायल की बड़ी-बड़ी आँखें अविश्वास से फैल गईं।
उसने पहले अमर को देखा...
फिर अनाया को...
फिर वापस अमर को।
"ये..."
उसके होंठ सूख गए।
"ये... मिस्टर अमर सिंह राजपूत हैं?"
पास खड़े विकास ने सिर झुका लिया।
"जी।"
कायल का हाथ अनायास अमर की कलाई से छूट गया।
वह दो कदम पीछे हट गई।
उसका चेहरा शर्म से लाल पड़ चुका था।
"म... मुझे लगा..."
वह कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन शब्द साथ नहीं दे रहे थे।
कुछ क्षण पहले जिस हिम्मत से वह अमर के सामने खड़ी थी, वही हिम्मत अब संकोच में बदल चुकी थी।
उसने झट से दोनों हाथ जोड़ लिए।
"मुझे माफ़ कर दीजिए। मुझे सच में नहीं पता था।"
पूरे हॉल में सन्नाटा था।
हर कोई अमर के जवाब का इंतज़ार कर रहा था।
किसी और ने ऐसा किया होता...
तो शायद उसी समय उसे इस घर से बाहर निकलवा दिया जाता।
लेकिन...
अमर बस उसे देख रहा था।
उसकी आँखों में डर था...
लेकिन डर के साथ ईमानदारी भी।
उसने अपनी गलती छिपाने की कोशिश नहीं की।
न बहाना बनाया।
न किसी और पर दोष डाला।
बस सीधी नज़र से माफ़ी माँग ली।
अमर ने धीमे स्वर में कहा,
"तुमने वही किया जो तुम्हें सही लगा।"
कायल ने चौंककर उसकी ओर देखा।
"ज... जी?"
"अपनी दोस्त के लिए खड़ी हुई।"
बस इतना कहकर अमर ने अपनी कलाई का कोट सीधा किया।
पूरे हॉल में खड़े लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था।
जिस आदमी के सामने बड़े-बड़े उद्योगपति बोलने से पहले दस बार सोचते थे...
वह आज एक अनजान लड़की से नाराज़ तक नहीं हुआ।
अनाया अब तक आधी बेहोशी में सोफ़े पर बैठ चुकी थी।
कायल तुरंत उसके पास गई।
वह घुटनों के बल बैठ गई और बहुत धीरे से उसके चेहरे से बिखरे बाल हटाने लगी।
"अनाया..."
उसकी आवाज़ में अजीब-सी नरमी थी।
"चल... पानी पी ले।"
अनाया ने मुँह फेर लिया।
"नहीं चाहिए।"
कायल ने बिना झुँझलाए पास रखा गिलास उठाया।
"देख... अगर तू नहीं पिएगी तो सुबह सिर बहुत दर्द करेगा।"
उसने बिल्कुल वैसे समझाया जैसे कोई माँ छोटे बच्चे को मनाती है।
आख़िरकार अनाया ने थोड़ा-सा पानी पी लिया।
अमर यह सब चुपचाप देख रहा था।
कायल ने अपना रूमाल निकाला और अनाया के होंठों के पास लगी पानी की बूँद पोंछ दी।
फिर उसने आसपास खड़े नौकर से कहा,
"क्या थोड़ा नींबू पानी मिल सकता है?"
"ज... जी मैडम।"
"और अगर डॉक्टर को बुलाना पड़े तो बुला लीजिए।"
उसके चेहरे पर किसी तरह की घबराहट नहीं थी।
न दिखावा...
न बनावटी चिंता...
जो कर रही थी, पूरे मन से कर रही थी।
अमर ने जाने क्यों पहली बार ध्यान से उसे देखना शुरू किया।
साधारण कपड़े...
चेहरे पर हल्की-सी थकान...
हाथों में कोई महँगी ज्वेलरी नहीं...
फिर भी उसमें ऐसी सादगी थी जो इस आलीशान हॉल की चमक से अलग दिखाई दे रही थी।
कायल ने अनाया की हथेली अपने हाथ में ले ली।
"तुझे पता है..."
वह मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली,
"जो लोग छोड़कर चले जाते हैं, वो हमेशा सही नहीं होते। कभी-कभी वो हमारी कहानी का गलत अध्याय होते हैं।"
अनाया की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने धीरे से अपना सिर कायल के कंधे पर रख दिया।
कायल ने बिना कुछ कहे उसकी पीठ सहलानी शुरू कर दी।
उस पल...
अमर के भीतर जैसे कोई पुराना बंद दरवाज़ा हल्का-सा खटक गया।
उसे याद नहीं था कि आख़िरी बार उसने किसी को इस तरह बिना किसी स्वार्थ के किसी और का दर्द बाँटते हुए कब देखा था।
उसकी दुनिया में रिश्ते समझौतों से बनते थे...
भरोसा अनुबंधों में लिखा जाता था...
और मुस्कानें अक्सर किसी उद्देश्य के लिए होती थीं।
लेकिन...
यह लड़की अलग थी।
उसकी हर हरकत सहज थी।
हर मुस्कान सच्ची।
हर शब्द बिना किसी गणना के।
अमर की नज़र अनायास उसके चेहरे पर टिक गई।
कायल ने ऊपर देखा तो पाया कि अमर उसे देख रहा है।
वह हल्का-सा सकपका गई।
"स... सॉरी, सर।"
"मैंने सच में आपको पहचान नहीं पाया था।"
अमर ने पहली बार उसे पूरा नाम पूछने का मन किया।
"नाम?"
"कायल..."
उसने मुस्कुराकर जवाब दिया।
"कायल सिन्हा।"
"अनाया की कॉलेज फ्रेंड हूँ।"
"आज पहली बार इस घर आई थी।"
उसकी मुस्कान बिल्कुल वैसी थी जैसे बरसात के बाद पहली धूप।
बहुत हल्की...
लेकिन सच्ची।
अमर ने केवल सिर हिलाया।
"हूँ।"
कायल ने धीरे से कहा,
"वैसे... आप उतने डरावने नहीं हैं जितना सब बताते हैं।"
यह सुनते ही विकास की आँखें फैल गईं।
हॉल में खड़े दो नौकरों ने तुरंत नज़रें झुका लीं।
कायल को शायद एहसास ही नहीं था कि उसने किससे क्या कह दिया है।
वह खुद ही शर्मिंदा होकर मुस्कुरा दी।
"मतलब..."
वह हड़बड़ा गई।
"मैं... मैं बस..."
उसकी घबराहट देखकर अमर के होंठों के किनारे बहुत हल्की मुस्कान उभरी।
सालों बाद...
इतनी स्वाभाविक मुस्कान।
इतनी छोटी कि शायद किसी और ने देखी भी नहीं।
उसने बस इतना कहा,
"अपनी दोस्त का ख़याल रखो।"
"जी।"
कायल ने तुरंत सिर हिला दिया।
अमर मुड़कर जाने लगा।
लेकिन इस बार उसके कदम पहले जैसे निश्चिंत नहीं थे।
वह दरवाज़े तक पहुँचा...
फिर जाने क्यों एक बार पलटकर देखने का मन हुआ।
कायल अभी भी अनाया को सहारा देकर सोफ़े पर ठीक से बैठा रही थी।
उसके चेहरे पर वही मासूम तसल्ली थी...
जैसे किसी की तकलीफ़ कम कर देना ही उसके लिए सबसे बड़ी जीत हो।
अमर कुछ क्षण उसे देखता रहा।
उसने अपने जीवन में अनगिनत सुंदर चेहरे देखे थे।
मॉडल...
अभिनेत्रियाँ...
विदेशी बिजनेस पार्टनर...
लेकिन उनमें से किसी ने भी उसके भीतर कोई हलचल पैदा नहीं की थी।
आज...
एक साधारण टी-शर्ट और जीन्स पहने उन्नीस साल की लड़की ने उसके मन के उस हिस्से पर दस्तक दे दी थी, जिसे वह वर्षों पहले हमेशा के लिए बंद समझ चुका था।
वह भावना प्रेम नहीं थी।
न आकर्षण का कोई घोषित रूप।
बस एक अनजाना-सा एहसास...
जिज्ञासा...
और उस मासूमियत को फिर से देखने की इच्छा।
अमर ने बिना कुछ कहे अपनी नज़रें हटाईं।
"विकास।"
"जी, सर।"
"चलो।"
दोनों बाहर निकल गए।
लेकिन पहली बार...
अमर सिंह राजपूत अपने साथ सिर्फ़ अगले दिन की मीटिंग्स नहीं ले जा रहा था।
उसके मन में एक नाम भी रह गया था—
कायल सिन्हा।