शैडो किंग की दुल्हन - Chapter 3
रात के तीन बज रहे थे।
शेखावत हवेली के बाहर बारिश अब भी लगातार हो रही थी।
लेकिन हवेली के अंदर उससे भी बड़ा तूफ़ान उठ चुका था।
आर्या अचानक नींद से उठ बैठी।
उसकी साँसें तेज़ थीं।
माथे पर पसीना था।
और उसकी मुट्ठी अब भी उसी चाँदी के आधे लॉकेट को कसकर पकड़े हुए थी।
उसने काँपते हाथ से लॉकेट को रोशनी के सामने किया।
आधा गोलाकार लॉकेट...
जिसके बीच में एक बेहद छोटा-सा निशान बना था।
एक काला मुकुट।
आर्या ने उसे पलटकर देखा।
पीछे सिर्फ़ दो अक्षर खुदे थे—
A.R.
"ये मेरे पास कहाँ से आया?"
वह खुद से बुदबुदाई।
तभी दरवाज़ा खुला।
रुद्र अंदर आया।
उसकी नज़र जैसे ही लॉकेट पर पड़ी...
वह वहीं रुक गया।
उसके चेहरे की सारी कठोरता अचानक गायब हो गई।
"ये तुम्हें कहाँ मिला?"
आर्या ने उसकी तरफ देखा।
"मेरे हाथ में था।"
"सोने से पहले ये मेरे पास नहीं था।"
रुद्र धीरे-धीरे उसके पास आया।
उसने लॉकेट को देखा, लेकिन उसे छुआ तक नहीं।
"तुम्हें कुछ याद आया?"
आर्या ने आँखें बंद कर लीं।
अचानक उसके दिमाग़ में एक तस्वीर चमकी—
बारिश...
एक पुराना कमरा...
एक छोटी लड़की...
और उसके सामने खड़ा एक छोटा लड़का।
लड़के ने कहा—
"जब भी डर लगे, इसे पकड़ लेना। मैं तुम्हें ढूँढ लूँगा।"
आर्या ने अचानक आँखें खोल दीं।
"वो लड़का..."
रुद्र ने धीमे से पूछा—
"क्या?"
"उसने मुझे यही लॉकेट दिया था।"
रुद्र की आँखों में हल्की नमी आ गई।
"तुम्हें याद आ रहा है..."
आर्या ने उसे घूरकर देखा।
"तुम जानते हो वह लड़का कौन था।"
रुद्र चुप रहा।
"रुद्र!"
"हाँ।"
उसने आखिर जवाब दिया।
"वह मैं था।"
कमरे में खामोशी छा गई।
आर्या ने अपना सिर पकड़ लिया।
"तो हमारी मुलाकात आज से नहीं..."
"बहुत पहले से थी।"
"बीस साल पहले।"
रुद्र ने सिर हिलाया।
---
उसी समय...
हवेली के कंट्रोल रूम में अचानक अलार्म बज उठा।
WARNING!
कबीर दौड़कर अंदर आया।
"सर!"
रुद्र ने तुरंत पूछा—
"क्या हुआ?"
"रेड मून एक्टिवेट हो गया है।"
स्क्रीन पर शहर का नक्शा दिखाई दिया।
लाल बिंदु एक-एक करके चमकने लगे।
एक...
दो...
पाँच...
दस...
फिर पूरे नक्शे पर दर्जनों लाल निशान दिखाई देने लगे।
कबीर ने कहा—
"ब्लैक क्वीन ने एक साथ कई जगहों पर हमला शुरू कर दिया है।"
रुद्र ने स्क्रीन को ध्यान से देखा।
"ये हमले नहीं हैं।"
"फिर?"
"ये ध्यान भटकाने के लिए हैं।"
उसकी नज़र अचानक एक लाल बिंदु पर टिक गई।
वह बिंदु आर्या के पुराने घर पर था।
रुद्र की आँखें सिकुड़ गईं।
"उनका असली निशाना..."
"...आर्या की माँ हैं।"
---
आर्या ने यह सुना तो तुरंत उठ खड़ी हुई।
"माँ!"
रुद्र ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"तुम वहाँ नहीं जाओगी।"
"वो मेरी माँ हैं!"
"और इसी वजह से दुश्मन चाहता है कि तुम वहाँ जाओ।"
आर्या ने गुस्से में कहा—
"तो मैं क्या करूँ?"
रुद्र ने उसकी आँखों में देखा।
"मुझ पर भरोसा करो।"
"मैं उन्हें वापस लाऊँगा।"
कुछ पल तक आर्या उसे देखती रही।
फिर उसने धीरे से सिर हिला दिया।
"लेकिन इस बार..."
"मुझे अँधेरे में मत रखना।"
रुद्र ने गंभीरता से कहा—
"इस बार तुम्हें हर सच पता चलेगा।"
लेकिन दोनों को यह नहीं पता था कि हवेली की सुरक्षा व्यवस्था में कोई ऐसा व्यक्ति मौजूद था...
जो उनकी पूरी बातचीत सुन रहा था।
उसने जेब से फोन निकाला।
एक नंबर मिलाया।
"वे निकलने वाले हैं।"
दूसरी तरफ़ से महिला की आवाज़ आई—
"उन्हें जाने दो..."
"क्योंकि असली जाल हवेली में है।"
उस आदमी ने धीरे से मुस्कुराया।
उसकी कलाई पर वही निशान था—
टूटा हुआ मुकुट।
और वह कोई बाहरी दुश्मन नहीं था।
वह...
शैडो ऑर्डर का सदस्य था।
रुद्र और आर्या के कमरे से निकलते ही हवेली की सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई।
हर गलियारे में सुरक्षाकर्मी तैनात हो गए।
लेकिन रुद्र के चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।
कबीर उसके साथ चलते हुए बोला—
"सर, मैंने पुरानी हवेली के आसपास की सभी टीमों को अलर्ट कर दिया है।"
रुद्र ने सिर हिलाया।
"और माँ के घर की स्थिति?"
"हमारी टीम वहाँ पहुँच चुकी है।"
"अच्छा।"
आर्या पीछे से उनकी बातें सुन रही थी।
वह अचानक बोली—
"मुझे एक बात पूछनी है।"
रुद्र रुक गया।
"पूछो।"
"अगर मैं बचपन में तुम्हें जानती थी..."
"तो मेरी याददाश्त क्यों मिटाई गई?"
रुद्र ने कुछ पल उसे देखा।
फिर उसने कहा—
"क्योंकि उस रात सिर्फ़ तुम्हारी जान खतरे में नहीं थी।"
"मेरी भी थी।"
"और जो हुआ..."
"...उसके बाद तुम्हारी माँ ने फैसला किया कि तुम्हें सब कुछ भूलना होगा।"
आर्या ने पूछा—
"लेकिन क्यों?"
रुद्र ने जवाब देने से पहले चारों ओर देखा।
"क्योंकि तुम्हारे पिता ने कुछ ऐसा खोज लिया था..."
"...जिसे दुनिया के ताकतवर लोग हमेशा के लिए छिपाना चाहते थे।"
आर्या की आँखें फैल गईं।
"मेरे पिता?"
उसने अपने पिता को बचपन से सिर्फ़ कुछ धुंधली यादों में ही देखा था।
रुद्र ने कहा—
"तुम्हारे पिता की मौत दुर्घटना नहीं थी।"
आर्या का चेहरा सफेद पड़ गया।
"तो फिर उन्हें किसने मारा?"
रुद्र की आँखों में गुस्सा उतर आया।
"जिसने तुम्हारे परिवार को बर्बाद किया..."
"...वही आज ब्लैक क्वीन के पीछे खड़ा है।"
---
तभी...
धड़ाम!
पूरी हवेली की लाइटें एक बार फिर बंद हो गईं।
कबीर ने तुरंत अपनी टॉर्च निकाली।
"सर!"
एक सुरक्षा अधिकारी दौड़ता हुआ आया।
"सिक्योरिटी सिस्टम ऑफलाइन हो गया है!"
रुद्र ने तुरंत आदेश दिया—
"सभी दरवाज़े लॉक करो।"
कुछ सेकंड बाद जवाब आया—
"सर, हम सिस्टम को नियंत्रित नहीं कर पा रहे।"
रुद्र की आँखें सिकुड़ गईं।
"अंदर का कोई व्यक्ति सिस्टम चला रहा है।"
कबीर ने तुरंत सभी सदस्यों की सूची स्क्रीन पर खोल दी।
एक-एक करके नाम सामने आने लगे।
रुद्र ने कहा—
"सभी को मुख्य हॉल में बुलाओ।"
कुछ मिनट बाद लगभग बीस सदस्य वहाँ जमा हो गए।
रुद्र ने सबकी ओर देखा।
"हमारे बीच गद्दार है।"
कमरे में खामोशी छा गई।
एक सदस्य ने कहा—
"सर, हममें से कोई आपके खिलाफ़ नहीं जा सकता।"
रुद्र ने शांत स्वर में जवाब दिया—
"मुझे भी यही लगता था।"
फिर उसने सबके हाथों की कलाई पर बने निशान देखे।
अचानक उसकी नज़र एक आदमी पर टिक गई।
उस आदमी ने तुरंत अपनी कलाई पीछे कर ली।
रुद्र ने कहा—
"तुम।"
वह आदमी चौंका।
"सर?"
"अपना हाथ दिखाओ।"
"सर, इसमें क्या..."
"हाथ।"
उसने धीरे से हाथ आगे किया।
उसकी कलाई पर शैडो ऑर्डर का निशान था।
लेकिन उसके नीचे...
एक बहुत छोटा टूटा हुआ मुकुट भी बना था।
कबीर ने तुरंत अपनी पिस्तौल निकाल ली।
"गद्दार!"
आदमी पीछे हट गया।
उसने अचानक पास खड़े सुरक्षाकर्मी को धक्का दिया और भागने लगा।
कबीर उसके पीछे दौड़ा।
कुछ ही सेकंड में वह पकड़ लिया गया।
रुद्र उसके सामने पहुँचा।
"ब्लैक क्वीन के लिए काम कर रहे हो?"
वह आदमी चुप रहा।
रुद्र ने फिर पूछा—
"कहाँ है आर्या की माँ?"
उस आदमी के चेहरे पर अचानक मुस्कान आई।
"बहुत देर हो चुकी है..."
"तुम्हारी माँ नहीं..."
"...तुम्हारी हवेली निशाने पर है।"
रुद्र की आँखें तुरंत ऊपर उठीं।
बीप... बीप... बीप...
हवेली के मुख्य सिस्टम में एक चेतावनी चमक उठी—
RED MOON — PHASE TWO ACTIVATED
कबीर चिल्लाया—
"सर! पूरी हवेली की सुरक्षा दीवारें लॉक हो गई हैं!"
आर्या ने घबराकर पूछा—
"अब क्या होगा?"
रुद्र ने उसकी ओर देखा।
उसकी आवाज़ बिल्कुल शांत थी—
"अब हम उनके जाल में नहीं..."
"...उनके घर में जा रहे हैं।"
आर्या समझ नहीं पाई।
"क्या मतलब?"
रुद्र ने गद्दार की ओर देखा।
"इसके पास ब्लैक क्वीन तक पहुँचने का रास्ता है।"
गद्दार हँस पड़ा।
"तुम कभी उसे नहीं पकड़ पाओगे।"
रुद्र उसके करीब झुका।
"मैं उसे पकड़ने नहीं जा रहा..."
"मैं उसे सामने आने के लिए मजबूर करूँगा।"
उसी पल हवेली की सबसे बड़ी स्क्रीन पर ब्लैक क्वीन का चेहरा दिखाई दिया।
उसकी नीली आँखें सीधे आर्या पर टिकी थीं।
वह मुस्कुराई।
"आर्या..."
"तुम्हें अपनी यादें वापस चाहिए?"
"तो अगली बार..."
"...अपने पति के साथ नहीं।"
"अकेले आना।"
स्क्रीन काली हो गई।
आर्या के हाथ में मौजूद आधा लॉकेट अचानक गर्म होने लगा।
और उसके दिमाग़ में एक और पुरानी याद चमक उठी—
एक छोटी लड़की रो रही थी...
एक लड़का उसका हाथ पकड़े हुए था...
और दूर खड़ी एक महिला चिल्ला रही थी—
"रुद्र! आर्या को लेकर भागो!"
फिर...
एक गोली की आवाज़।
और सब कुछ अंधेरा।
आर्या ने आँखें खोल दीं।
उसके सामने रुद्र खड़ा था।
लेकिन अब उसकी आँखों में एक सवाल था—
क्या आर्या को सचमुच सब कुछ याद आने वाला था?
आर्या कुछ पल तक बिल्कुल स्थिर खड़ी रही।
उसके हाथ में पकड़ा आधा लॉकेट अब भी गर्म था।
उसकी आँखों के सामने वही दृश्य घूम रहा था—
एक छोटी लड़की...
एक छोटा लड़का...
बारिश...
चीखती हुई एक महिला...
और फिर गोली की आवाज़।
आर्या ने अचानक अपना सिर पकड़ लिया।
"आह..."
रुद्र तुरंत उसके पास पहुँचा।
"आर्या!"
उसने उसे संभाल लिया।
"क्या देखा?"
आर्या ने काँपती आवाज़ में कहा—
"एक घर..."
"बहुत बारिश हो रही थी..."
"एक औरत मुझे बचाने के लिए चिल्ला रही थी..."
रुद्र की साँस जैसे थम गई।
"उस औरत का चेहरा?"
आर्या ने आँखें बंद कर याद करने की कोशिश की।
"मुझे साफ़ नहीं दिखा..."
"लेकिन उसने तुम्हारा नाम लिया था।"
रुद्र की आँखों में पुराना दर्द लौट आया।
"हाँ..."
"वह मेरी माँ थी।"
आर्या ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
"तुम्हारी माँ?"
रुद्र ने धीरे से सिर हिलाया।
"उस रात मेरी माँ ने तुम्हें बचाया था।"
बीस साल पहले
शहर से दूर एक पुरानी हवेली में बारिश हो रही थी।
एक छोटा रुद्र खिड़की के पास खड़ा था।
उसकी उम्र मुश्किल से दस साल थी।
उसके सामने आठ साल की आर्या बैठी थी।
दोनों के हाथों में वही चाँदी का लॉकेट था।
आर्या रोते हुए बोली—
"मुझे घर जाना है।"
रुद्र ने उसका हाथ पकड़ा।
"डरो मत। मैं हूँ।"
तभी दरवाज़ा खुला।
रुद्र की माँ अंदर आईं।
उनके चेहरे पर डर था।
"रुद्र..."
"आर्या को लेकर पीछे वाले रास्ते से भागो।"
"क्यों?"
उन्होंने खिड़की से बाहर देखा।
दूर कई गाड़ियाँ हवेली की ओर आ रही थीं।
"वे लोग हमें ढूँढते हुए यहाँ तक पहुँच गए हैं।"
रुद्र ने पूछा—
"कौन लोग?"
उनकी माँ ने जवाब दिया—
"जिन्होंने तुम्हारे पिता को मारा।"
रुद्र का चेहरा सफेद पड़ गया।
उसी पल बाहर गोलियों की आवाज़ गूँजी।
उनकी माँ ने दोनों बच्चों को एक गुप्त रास्ते की ओर धकेल दिया।
"भागो!"
रुद्र ने आर्या का हाथ पकड़ लिया।
दोनों दौड़ पड़े।
पीछे से आवाज़ आई—
"बच्चों को पकड़ो!"
वर्तमान
आर्या ने आँखें खोलीं।
उसके गालों पर आँसू थे।
"मुझे थोड़ा-थोड़ा सब याद आ रहा है..."
रुद्र चुपचाप उसे देखता रहा।
आर्या ने पूछा—
"उस रात तुम्हारी माँ का क्या हुआ?"
रुद्र की आवाज़ धीमी हो गई।
"वह हमें बचाते हुए मारी गईं।"
आर्या ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया।
"और मेरी माँ?"
"उन्होंने तुम्हें ढूँढ लिया था।"
"लेकिन तब तक..."
रुद्र रुक गया।
"तुम्हारी याददाश्त बुरी तरह प्रभावित हो चुकी थी।"
"तुम्हारी माँ ने तय किया कि तुम्हें उस दुनिया से दूर रखा जाए।"
आर्या ने पूछा—
"और तुम?"
रुद्र ने उसकी आँखों में देखा।
"मैंने फैसला किया कि जब तक मैं उस संगठन को खत्म नहीं कर दूँगा जिसने सब कुछ छीना..."
"...तब तक मैं तुम्हारे पास नहीं आऊँगा।"
"लेकिन अब..."
उसने लॉकेट की ओर देखा।
"अब उन्होंने तुम्हें फिर से इस खेल में खींच लिया है।"
तभी कबीर दौड़ता हुआ अंदर आया।
"सर!"
"ब्लैक क्वीन का ठिकाना मिल गया।"
रुद्र तुरंत खड़ा हो गया।
"कहाँ?"
कबीर ने स्क्रीन पर एक जगह दिखाई।
देवगढ़ किला।
"शहर से लगभग सौ किलोमीटर दूर।"
"हमारी टीम ने वहाँ कई गाड़ियाँ देखी हैं।"
रुद्र ने तुरंत आदेश दिया—
"टीम तैयार करो।"
आर्या ने कहा—
"मैं भी चलूँगी।"
"नहीं।"
"इस बार नहीं।"
"रुद्र, यह सब मेरे अतीत से जुड़ा है।"
"और शायद वही लोग मेरी माँ को लेकर गए हैं।"
रुद्र ने कुछ क्षण उसे देखा।
फिर बोला—
"ठीक है।"
"लेकिन मेरे साथ रहना।"
आर्या ने सिर हिला दिया।
देवगढ़ किला
रात के करीब ग्यारह बजे...
काली गाड़ियाँ घने जंगल के बीच से गुजर रही थीं।
आसमान में बादल थे।
किले की टूटी दीवारें दूर से ही दिखाई देने लगीं।
रुद्र की कार सबसे आगे थी।
आर्या उसके बगल में बैठी थी।
उसने धीरे से पूछा—
"अगर ब्लैक क्वीन मेरी माँ के पास है तो?"
"मैं उन्हें वापस लाऊँगा।"
"और अगर..."
रुद्र ने उसकी ओर देखा।
"मैं तुम्हें दूसरा जवाब नहीं दूँगा।"
"तुम्हारी माँ वापस आएँगी।"
काफ़िला किले के सामने रुक गया।
सभी लोग नीचे उतरे।
रुद्र ने किले की ओर देखा।
"अजीब है..."
कबीर ने पूछा—
"क्या?"
"यहाँ कोई सुरक्षा नहीं।"
"इतना बड़ा ठिकाना..."
"और कोई पहरा नहीं।"
आर्या ने अचानक कहा—
"शायद..."
"वे चाहते हैं कि हम अंदर जाएँ।"
रुद्र उसकी तरफ देखकर हल्का-सा मुस्कुराया।
"अब तुम समझने लगी हो।"
तभी किले के विशाल दरवाज़े अपने आप खुल गए।
अंदर पूर्ण अंधकार था।
और दीवार पर सिर्फ़ एक संदेश लिखा था—
"स्वागत है, Shadow King."
नीचे दूसरी पंक्ति थी—
"इस बार तुम्हें अपनी दुल्हन नहीं मिलेगी..."
कुछ सेकंड बाद तीसरी पंक्ति चमकी—
"...तुम्हें अपना असली दुश्मन मिलेगा।"
रुद्र की आँखें ठंडी हो गईं।
उसने आर्या का हाथ थाम लिया।
दोनों किले के अंदर कदम रख चुके थे।
उन्हें नहीं पता था कि बाहर...
उनकी पूरी टीम के पीछे एक और काली गाड़ी आकर रुक चुकी थी।
उस गाड़ी से उतरने वाला आदमी रुद्र को देखकर मुस्कुराया।
और उसके चेहरे पर वही निशान था—
टूटा हुआ मुकुट।
देवगढ़ किले के अंदर कदम रखते ही आर्या को एक अजीब-सी ठंड महसूस हुई।
बाहर गर्मी और उमस थी, लेकिन किले के भीतर हवा बर्फ जैसी ठंडी थी।
दीवारों पर पुरानी मशालें जल रही थीं।
हर तरफ़ धूल जमी थी।
फिर भी...
ऐसा लग रहा था जैसे कोई अभी-अभी वहाँ से गुज़रा हो।
आर्या ने रुद्र का हाथ कसकर पकड़ लिया।
"यह जगह मुझे जानी-पहचानी लग रही है।"
रुद्र ने उसकी तरफ देखा।
"तुम पहले यहाँ आ चुकी हो।"
आर्या चौंक गई।
"क्या?"
"बीस साल पहले।"
उसके कदम रुक गए।
"लेकिन मुझे तो कुछ याद नहीं।"
"याद आएगा।"
रुद्र आगे बढ़ गया।
किले के मुख्य हॉल में पहुँचते ही अचानक सभी दरवाज़े बंद हो गए।
धड़ाम!
कबीर और बाकी लोग बाहर रह गए।
आर्या और रुद्र अंदर फँस चुके थे।
कबीर ने बाहर से आवाज़ लगाई—
"सर!"
रुद्र ने दरवाज़ा देखा।
"पीछे हटो!"
कबीर ने जवाब दिया—
"सर, दरवाज़ा अंदर से लॉक है!"
रुद्र ने चारों तरफ़ देखा।
"आर्या..."
"हाँ?"
"डरो मत।"
"क्योंकि यही तो वे चाहते हैं।"
अचानक हॉल की सारी मशालें बुझ गईं।
अंधेरे में एक आवाज़ गूँजी—
"बहुत देर कर दी, रुद्र।"
आर्या ने आवाज़ पहचानने की कोशिश की।
"ब्लैक क्वीन?"
कोई जवाब नहीं आया।
फिर सामने एक विशाल स्क्रीन जल उठी।
स्क्रीन पर एक कमरा दिखाई दिया।
उस कमरे में आर्या की माँ बैठी थीं।
आर्या चीख पड़ी—
"माँ!"
उसकी माँ ने कैमरे की तरफ देखा।
उनके चेहरे पर डर था।
लेकिन अगले ही पल उन्होंने कुछ ऐसा कहा जिससे आर्या स्तब्ध रह गई—
"आर्या... रुद्र पर भरोसा मत करना।"
स्क्रीन बंद हो गई।
आर्या ने तुरंत रुद्र की तरफ देखा।
रुद्र बिल्कुल शांत था।
लेकिन उसकी आँखों में एक गहरा दर्द था।
"तुम्हारी माँ ऐसा क्यों कहेंगी?"
रुद्र ने धीरे से कहा—
"क्योंकि शायद..."
"...उन्हें मजबूर किया गया है।"
अचानक हॉल के पीछे की दीवार खुली।
एक गुप्त रास्ता दिखाई दिया।
रुद्र ने आर्या से कहा—
"मेरे पीछे रहना।"
दोनों अंदर गए।
कुछ दूर चलने के बाद उन्हें एक बड़ा कमरा मिला।
कमरे के बीच एक लोहे की कुर्सी थी।
उस पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था।
उसके हाथ बंधे हुए थे।
चेहरे पर उम्र की कई लकीरें थीं।
रुद्र उसे देखते ही रुक गया।
"तुम..."
बूढ़े आदमी ने सिर उठाया।
और मुस्कुराया।
"आख़िरकार..."
"शैडो किंग खुद यहाँ आ गया।"
आर्या ने पूछा—
"आप कौन हैं?"
बूढ़े आदमी ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में हैरानी भर गई।
"तुम..."
"तुम सचमुच ज़िंदा हो।"
आर्या ने घबराकर पूछा—
"आप मुझे जानते हैं?"
वह आदमी कुछ बोल पाता, उससे पहले रुद्र ने कहा—
"इनका नाम देवेंद्र राठौर है।"
आर्या ने रुद्र की ओर देखा।
"तुम इन्हें जानते हो?"
"ये मेरे पिता के सबसे भरोसेमंद दोस्त थे।"
देवेंद्र ने कड़वी हँसी हँसी।
"भरोसेमंद?"
"काश..."
"मैं उस रात सच में भरोसेमंद होता।"
रुद्र का चेहरा कठोर हो गया।
"क्या कहना चाहते हो?"
देवेंद्र ने सिर झुका लिया।
"तुम्हारे पिता की मौत..."
"तुम्हारी माँ की मौत..."
"आर्या की याददाश्त..."
"...इन सबके पीछे सिर्फ़ ब्लैक क्वीन नहीं थी।"
आर्या की साँस रुक गई।
"तो फिर कौन था?"
देवेंद्र ने सीधे रुद्र की तरफ देखा।
"तुम्हारा अपना परिवार।"
रुद्र के चेहरे पर अविश्वास छा गया।
"झूठ।"
"नहीं..."
देवेंद्र ने कहा।
"तुम्हारे पिता के सबसे करीबी लोगों में से किसी ने उन्हें धोखा दिया था।"
"और वही आदमी आज भी ज़िंदा है।"
आर्या ने पूछा—
"कौन?"
देवेंद्र ने जवाब देने के लिए मुँह खोला ही था कि...
धाँय!
एक गोली खिड़की से अंदर आई और देवेंद्र की कुर्सी के पास लगी।
सभी चौंक गए।
रुद्र ने तुरंत आर्या को अपने पीछे कर लिया।
बाहर से कई कदमों की आवाज़ आने लगी।
कबीर की आवाज़ ईयरपीस में गूँजी—
"सर! किले में बड़ी संख्या में लोग घुस चुके हैं!"
रुद्र ने देवेंद्र की तरफ देखा।
"हमें यहाँ से निकलना होगा।"
देवेंद्र ने अचानक कहा—
"रुको!"
उसने अपनी कमीज़ के अंदर से एक पुरानी चाबी निकाली।
"इसे लो।"
"यह तुम्हारे पिता की तिजोरी की चाबी है।"
रुद्र ने चाबी हाथ में ली।
देवेंद्र ने आर्या की ओर देखा।
"उस तिजोरी में..."
"तुम दोनों के अतीत का आख़िरी सच है।"
उसी समय दरवाज़ा टूट गया।
कई नकाबपोश अंदर घुस आए।
रुद्र ने आर्या को पीछे किया।
लेकिन हमलावरों के बीच से एक आदमी धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
उसने अपना नकाब उतार दिया।
आर्या की आँखें फैल गईं।
रुद्र का चेहरा पत्थर बन गया।
क्योंकि सामने खड़ा आदमी...
रुद्र का अपना बड़ा भाई था।
जिसे वह वर्षों पहले मृत समझ चुका था।
वह मुस्कुराया।
"कैसे हो, छोटे भाई?"
कमरे में मौजूद हर व्यक्ति जैसे पत्थर बन गया था।
आर्या की नज़र उस आदमी पर टिकी थी।
वह रुद्र से उम्र में कुछ बड़ा था। चेहरे की बनावट रुद्र जैसी थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब-सी कठोर चमक थी।
रुद्र के होंठों से सिर्फ़ एक नाम निकला—
"अर्णव..."
आदमी मुस्कुराया।
"हाँ, छोटे भाई।"
कबीर ने अविश्वास से कहा—
"लेकिन अर्णव शेखावत की मौत तो बीस साल पहले..."
अर्णव हँस पड़ा।
"यही तो सबसे बड़ी कहानी थी।"
"सबको यही बताया गया कि मैं मर गया।"
"लेकिन कुछ लोग चाहते थे कि मैं ज़िंदा रहूँ।"
रुद्र की आँखों में गुस्सा उतर आया।
"तुमने हमारे पिता के साथ क्या किया?"
अर्णव का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
"मैंने कुछ नहीं किया।"
"तुम्हारे पिता ने खुद अपने लिए रास्ता चुना था।"
आर्या ने बीच में पूछा—
"और मेरे परिवार का क्या?"
अर्णव ने उसकी तरफ देखा।
"तुम..."
"तुम्हें तो कुछ याद ही नहीं।"
आर्या ने कठोर स्वर में कहा—
"मुझे सब याद आएगा।"
अर्णव मुस्कुराया।
"यही तो मैं चाहता हूँ।"
अचानक देवेंद्र राठौर ने चिल्लाकर कहा—
"रुद्र! उसे मत सुनना!"
अर्णव ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
"बहुत देर तक तुमने मेरे परिवार के रहस्य छिपाए हैं, देवेंद्र।"
"अब तुम्हारी बारी है चुप रहने की।"
अर्णव के लोगों ने देवेंद्र को घेर लिया।
रुद्र आगे बढ़ा।
"उसे छोड़ दो।"
अर्णव ने सिर हिलाया।
"तुम अभी भी वही हो..."
"दूसरों के लिए लड़ने वाला।"
"लेकिन तुम एक बात भूल रहे हो।"
"क्या?"
अर्णव ने आर्या की तरफ इशारा किया।
"तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी अब तुम्हारे सामने खड़ी है।"
रुद्र की आँखें ठंडी हो गईं।
"आर्या मेरी कमजोरी नहीं है।"
"वह मेरी वजह है।"
कुछ क्षण के लिए अर्णव चुप रहा।
फिर उसने धीमे से कहा—
"तो फिर देखते हैं..."
"...तुम अपनी वजह के लिए कितना दूर जा सकते हो।"
अचानक किले के अंदर विस्फोट की आवाज़ हुई।
धड़ाम!
दीवारें काँपने लगीं।
अर्णव के लोग पीछे हटने लगे।
कबीर ने मौका देखकर देवेंद्र को छुड़ा लिया।
"सर! हमें निकलना होगा!"
रुद्र ने आर्या का हाथ पकड़ा।
"चलो!"
वे गुप्त सुरंग की ओर दौड़े।
पीछे से अर्णव की आवाज़ आई—
"भागो, रुद्र!"
"लेकिन याद रखना..."
"अगली मुलाकात में मैं तुम्हें तुम्हारे पिता की तिजोरी के सामने मिलूँगा।"
रुद्र ने पीछे मुड़कर देखा।
अर्णव वहीं खड़ा मुस्कुरा रहा था।
कुछ देर बाद
किले से बाहर निकलकर रुद्र की टीम जंगल के बीच सुरक्षित स्थान पर पहुँची।
देवेंद्र ने अपनी साँसें संभालीं।
रुद्र ने उसके सामने चाबी रख दी।
"अब सच बताओ।"
"मेरे पिता की तिजोरी में क्या है?"
देवेंद्र ने बहुत देर तक चुप रहने के बाद कहा—
"तुम्हारे पिता ने मरने से पहले तीन चीज़ें छिपाई थीं।"
"पहली—एक डायरी।"
"दूसरी—एक रिकॉर्डिंग।"
"और तीसरी..."
वह आर्या की तरफ देखने लगा।
"...तुम्हारी पहचान से जुड़ा एक दस्तावेज़।"
आर्या चौंक गई।
"मेरी पहचान?"
देवेंद्र ने सिर हिलाया।
"तुम जितना खुद को साधारण लड़की समझती हो..."
"...तुम उससे कहीं अधिक हो।"
रुद्र ने गंभीर स्वर में पूछा—
"क्या मतलब?"
देवेंद्र ने जवाब देने से पहले चारों ओर देखा।
"यहाँ नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि हमें कोई सुन रहा है।"
रुद्र ने तुरंत आसपास देखा।
कुछ भी असामान्य नहीं था।
लेकिन तभी आर्या के हाथ में पकड़ा आधा लॉकेट फिर से गर्म होने लगा।
उसके अंदर से एक हल्की रोशनी निकली।
आर्या ने उसे खोला।
लॉकेट के अंदर एक बहुत छोटी माइक्रो-चिप छिपी थी।
कबीर की आँखें फैल गईं।
"सर..."
"यह कोई साधारण लॉकेट नहीं।"
रुद्र ने चिप को ध्यान से देखा।
"इसमें डेटा है।"
अचानक पास खड़ी कार का रेडियो अपने-आप चालू हो गया।
कुछ सेकंड तक सिर्फ़ शोर सुनाई दिया।
फिर एक महिला की आवाज़ आई—
"रुद्र..."
वह आवाज़ सुनते ही देवेंद्र का चेहरा सफेद पड़ गया।
रुद्र ने रेडियो की तरफ देखा।
आवाज़ फिर आई—
"अगर तुम यह संदेश सुन रहे हो..."
"...तो इसका मतलब है कि मैं अब भी तुम्हारे सबसे करीब हूँ।"
आर्या ने पूछा—
"कौन है?"
रेडियो से आख़िरी वाक्य आया—
"मैं ब्लैक क्वीन नहीं हूँ।"
एक लंबा विराम।
फिर—
"मैं तुम्हारी माँ हूँ।"
रेडियो बंद हो गया।
रुद्र बिल्कुल स्तब्ध खड़ा रह गया।
बीस साल पहले उसकी माँ की मौत हो चुकी थी।
फिर...
यह आवाज़ किसकी थी?
और अगर वह सचमुच ज़िंदा थी...
तो अब तक कहाँ थी?
रुद्र ने धीरे से आर्या की तरफ देखा।
दोनों की आँखों में एक ही सवाल था—
क्या बीस साल पहले हुई मौतें सिर्फ़ एक झूठ थीं?
और उसी रात...
शहर के किसी अज्ञात स्थान पर एक महिला ने अपनी आँखें खोलीं।
उसके हाथ में वही चाँदी का दूसरा आधा लॉकेट था।
उसने आईने में खुद को देखा और धीमे से कहा—
"अब मेरे बच्चों को सच बताने का समय आ गया है।"
— Part 3 समाप्त —
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