THE HIDDEN LEGACY - Chapter 1
अंधेरी रात की चादर में डूबे ऊँचे-ऊँचे पहाड़ किसी मौन राक्षस की तरह खड़े थे। चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन उस सन्नाटे को चीरती हुई पीली और नारंगी लपटें आसमान को निगलने की कोशिश कर रही थीं। पहाड़ की चोटी पर बना विशाल विला आग की भयंकर लपटों में घिर चुका था। लकड़ी की मोटी-मोटी बलियाँ एक-एक कर टूट रही थीं, और उनके टूटने की कर्कश आवाज़ घाटी में गूँज रही थी।
वह कभी एक आलीशान हवेली थी...
लेकिन अब...
वह केवल जलती हुई राख का ढेर बन चुकी थी।
चारों दिशाओं से दर्दनाक चीखें सुनाई दे रही थीं। कोई रहम की भीख माँग रहा था, कोई मदद के लिए पुकार रहा था, तो कोई आग से बचने के लिए भाग रहा था। मगर उन चीखों का अंत केवल लपटों में समा जाना था।
उन भयानक दृश्यों से कुछ ही दूरी पर एक चौदह वर्ष की दुबली-पतली लड़की बिल्कुल शांत खड़ी थी।
उसके हाथ में जलती हुई मशाल थी।
हवा उसके लंबे बिखरे बालों को उड़ा रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर न डर था, न घबराहट, न पछतावा।
उसकी काली, गहरी आँखें बस सामने जलते हुए विला को बिना किसी भाव के देख रही थीं।
मानो उसके सामने कोई इमारत नहीं...
बल्कि उसका अतीत जल रहा हो।
कुछ क्षण तक वह यूँ ही खड़ी रही।
फिर उसने धीरे से अपनी आँखें बंद कर लीं।
आग की तपिश उसके चेहरे तक पहुँच रही थी।
जलती हुई लकड़ी की गंध हवा में घुल चुकी थी।
और तभी उसके होंठ बहुत धीरे से हिले।
"सब... खत्म हो गया।"
उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मानो हवा भी उसे सुनने के लिए ठहर गई हो।
हाँ...
सब कुछ जल चुका था।
वह कैदखाना...
जिसने पिछले दस वर्षों तक उसकी साँसों को जंजीरों में बाँध रखा था...
आज आखिरकार आग के समुद्र में बदल चुका था।
वह जगह, जहाँ उसके बचपन की हर मुस्कान छीन ली गई थी...
जहाँ हर दिन एक नई यातना उसका इंतज़ार करती थी...
जहाँ उसे इंसान नहीं, बल्कि एक प्रयोग की वस्तु समझा गया...
आज उसी जगह की हर दीवार राख बन रही थी।
उसी समय उसके कंधे पर बैठी छोटी-सी काली बिल्ली ने अपनी चमकदार आँखें उसकी ओर उठाईं।
उसने धीरे से अपने पंजे चाटे और कोमल स्वर में पूछा—
[हम अब कहाँ जाएँगे?]
लड़की की निगाहें दूर पहाड़ों की तरफ उठ गईं।
उसने बिना किसी जल्दबाज़ी के उत्तर दिया—
"कहीं भी..."
कुछ पल रुककर उसने बहुत शांत स्वर में कहा—
"बस... यहाँ से जितनी दूर जा सकूँ।"
उसने आखिरी बार पीछे मुड़कर उस जलते हुए नरक को देखा।
फिर धीरे-धीरे मुड़ गई।
उसके पैरों में अब भी टूटी हुई लोहे की जंजीरें लटक रही थीं।
हर कदम के साथ वे पत्थरों से टकरातीं...
और खन... खन... की आवाज़ सुनाई देती।
उसकी पतली एड़ियों पर गहरे घावों के निशान थे।
लेकिन उसने एक बार भी दर्द का एहसास अपने चेहरे पर नहीं आने दिया।
वह बिना रुके ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्ते पर आगे बढ़ती रही।
अचानक...
पीछे से जोरदार धमाका हुआ।
जलती हुई इमारत के भीतर से आग में लिपटा एक आदमी लड़खड़ाते हुए बाहर निकला।
उसका पूरा शरीर आग से घिरा हुआ था।
त्वचा जल चुकी थी।
आँखों में पागलपन साफ दिखाई दे रहा था।
वह आग की परवाह किए बिना लड़की को घूर रहा था।
अगले ही पल उसकी भयावह चीख पूरी घाटी में गूँज उठी—
"वाहिका...!"
"वापस आ जाओ!"
"तुम यहाँ से कभी बाहर नहीं निकल पाओगी!"
"तुम मेरी हो!"
उसकी आवाज़ में आदेश भी था...
पागलपन भी...
और स्वामित्व का विकृत अहंकार भी।
दस वर्षों की उसकी मेहनत...
उसके सारे प्रयोग...
उसके सारे सपने...
कुछ ही मिनटों में राख बन चुके थे।
वाहिका धीरे-धीरे रुकी।
उसने बिना घबराए पीछे देखा।
वह आदमी अब पूरी तरह आग में घिर चुका था।
फिर भी वह उसे घूरे जा रहा था।
वाहिका की आँखों में कोई दया नहीं थी।
उसने बिल्कुल सपाट आवाज़ में कहा—
"तुम मर रहे हो..."
"और मैं अब भी ज़िंदा हूँ।"
यह सुनते ही उस आदमी की आँखें और फैल गईं।
उसके चेहरे पर भय, गुस्सा और अविश्वास एक साथ उभर आए।
लेकिन आग किसी का इंतज़ार नहीं करती।
कुछ ही क्षणों में लपटों ने उसे पूरी तरह निगलना शुरू कर दिया।
वाहिका ने उसे आखिरी बार देखा।
फिर बहुत धीमे स्वर में बोली—
"अलविदा..."
"दादाजी।"
उसके कंधे पर बैठी छोटी काली बिल्ली ने तुरंत तिरस्कार से मुँह बनाया।
[दादाजी...?]
उसने व्यंग्य से फुँफकारते हुए कहा—
[जो आदमी चिकित्सा के नाम पर पागल हो गया... जिसने अपनी ही पोती को दस साल तक पहाड़ों के भीतर कैद रखा... उसे हर दिन ज़हर, दवाइयों और प्रयोगों का शिकार बनाया... उसे इंसान नहीं, गिनी पिग समझा... क्या उसे दादा कहलाने का भी अधिकार है?]
वाहिका ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसने बस अपनी निगाहें नीचे झुका लीं।
पीछे से उस आदमी की चीखें धीरे-धीरे कमजोर होती चली गईं।
कुछ देर बाद...
सब कुछ शांत हो गया।
केवल आग जलती रही।
मानो वह अतीत के हर निशान को मिटा देना चाहती हो।
बिल्ली ने फिर धीरे से पूछा—
[मालकिन... अब आपका क्या इरादा है?]
वाहिका ने अपने पतले, गोरे हाथों को देखा।
वे हाथ...
जिन्होंने अनगिनत सर्जरी की थीं।
जिन्होंने अनगिनत जहर बनाए थे...
और उतनी ही दवाइयाँ भी।
कुछ क्षण चुप रहने के बाद उसने शांत स्वर में कहा—
"मैं..."
"...पशु चिकित्सा का लाइसेंस हासिल करूँगी।"
एक पल के लिए बिल्ली बिल्कुल चुप रह गई।
फिर अगले ही क्षण वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी।
[हा हा हा...!]
[अगर उस बूढ़े को पता चल जाता कि चिकित्सा की दुनिया की सबसे असाधारण प्रतिभा... जिसकी बुद्धि पर उसे इतना घमंड था... वही लड़की आगे चलकर इंसानों की नहीं, बल्कि जानवरों की डॉक्टर बनना चाहती है... तो मरने के बाद भी उसकी आत्मा को कभी शांति नहीं मिलती!]
वाहिका के होंठों पर बहुत हल्की मुस्कान उभरी।
"अच्छा है..."
उसने शांत स्वर में कहा—
"उसे कभी शांति नहीं मिलनी चाहिए।"
हवा का एक तेज झोंका आया।
आग की लपटें और ऊँची उठीं।
वाहिका ने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
उस रात...
वह अपने अतीत को उसी जलती हुई हवेली में छोड़कर हमेशा के लिए चली गई।
...
एक वर्ष बाद...
दिल्ली।
अब वह पहाड़ों की कैदी नहीं रही थी।
सिसोदिया परिवार के नाम के साथ नई पहचान लेकर वह इस शहर में बस चुकी थी।
उसका नाम था—
वाहिका सिसोदिया।
कई महीनों की कठिन पढ़ाई और परीक्षा के बाद उसने पशु चिकित्सा का लाइसेंस प्राप्त कर लिया।
धीरे-धीरे उसने घायल और बेसहारा जानवरों का इलाज करना शुरू किया।
हर दिन नए मरीज आते।
हर दिन नई ज़िंदगियाँ बचतीं।
और हर बार किसी जानवर की आँखों में लौटती चमक देखकर उसके भीतर वर्षों से जमी बर्फ थोड़ा-थोड़ा पिघलने लगती।
उसे पहली बार महसूस हुआ...
कि किसी को बचाने की खुशी...
किसी पर प्रयोग करने की सनक से कहीं अधिक सुंदर होती है।
लेकिन...
ज़िंदगी कभी किसी को लंबे समय तक सुकून नहीं देती।
एक दिन वह ऑपरेशन थिएटर में पूरी एकाग्रता के साथ एक जटिल सर्जरी कर रही थी।
उसके हाथ तेज़ी से काम कर रहे थे।
मशीनों की बीप लगातार सुनाई दे रही थी।
अचानक...
एक भयानक धमाका हुआ।
पूरा कमरा ज़ोर से काँप उठा।
दीवारें हिलने लगीं।
रोशनी एक पल में बुझ गई।
और फिर...
सब कुछ अंधेरे में डूब गया।
...
जब उसने दोबारा आँखें खोलीं...
तो सबसे पहले उसे ठंडी बारिश की बूँदें अपने चेहरे पर गिरती महसूस हुईं।
उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
चारों ओर घना जंगल था।
ऊँची चट्टानें...
भीगी हुई मिट्टी...
और तेज़ बारिश।
वह कुछ नुकीली चट्टानों पर पड़ी थी।
उसने बिना घबराए धीरे-धीरे उठकर अपने आसपास देखा।
उसका चेहरा अब भी शांत था।
मानो किसी भी परिस्थिति में घबराना उसने बहुत पहले छोड़ दिया हो।
धीरे-धीरे अनगिनत अनजान यादें उसके दिमाग में उमड़ने लगीं।
वे उसकी अपनी यादें नहीं थीं...
फिर भी हर दृश्य इतना स्पष्ट था, जैसे उसने स्वयं उन्हें जिया हो।
कुछ ही देर में उसे सच्चाई समझ आ गई।
वह किसी दूसरी दुनिया में आ चुकी थी।
और इस दुनिया में उसने एक मर चुकी लड़की के शरीर में जन्म लिया था।
उस लड़की का नाम भी...
वाहिका था।
लेकिन अब उसके साथ एक नया उपनाम जुड़ा था।
सिसोदिया।
अब इस नई दुनिया में...
उसकी पहचान थी—
वाहिका सिसोदिया।