THE HIDDEN LEGACY Ch. 2

THE HIDDEN LEGACY - Chapter 2

Posted by Rine star ✨ • Aug 14, 2026 06:36 PM

सामंत राजा की पोती—वाहिका। सामंत महल की वह इकलौती लाड़ली युवती, जिसका नाम पूरे राज्य में उसके सौंदर्य से कहीं अधिक उसके घमंड और अभिमान के लिए प्रसिद्ध था। बचपन से ही अपार स्नेह और अधिकार के बीच पली-बढ़ी वाहिका ने कभी किसी को अपने बराबर समझना सीखा ही नहीं। उसकी नज़र में सामान्य लोग तो तुच्छ थे ही, यहाँ तक कि राजपरिवार के सदस्य भी उसके लिए विशेष सम्मान के पात्र नहीं थे। उसकी इच्छा ही उसका नियम थी और उसके सामने किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि उसकी बात काट सके।

इस अहंकार की जड़ भी साधारण नहीं थी।

सामंत राजा और आर्यावर्त राज्य के संस्थापक सम्राट का संबंध दशकों पुराना था। दोनों ने अनगिनत युद्ध साथ लड़े थे, मृत्यु को अनेक बार एक-दूसरे के सामने से गुजरते देखा था और अंततः स्वर्ग को साक्षी मानकर जीवन भर के लिए भाई बनने की शपथ ली थी। जब क्यूई राज्य की स्थापना हुई, तब संस्थापक सम्राट ने स्वयं भार्गव सिसोदिया को सामंत राजा की उपाधि प्रदान की। यह केवल एक सम्मान नहीं था, बल्कि ऐसा अधिकार था जिसने उन्हें लगभग राजपरिवार के बराबर स्थान दे दिया।

पूरे राज्य में सामंत महल का प्रभाव अपार था।

यह ऐसा स्थान था जहाँ पहुँचने से पहले बड़े-बड़े मंत्री भी अपने शब्द सोच-समझकर बोलते थे। यहाँ तक कि वर्तमान सम्राट भी सामंत राजा के सामने औपचारिक सम्मान प्रकट करना अपनी मर्यादा समझते थे।

सामंत राजा के दो योग्य पुत्र थे, किंतु यदि कोई उनके हृदय का सबसे प्रिय था, तो वह उनकी पोती वाहिका थी।

वह उनकी आँखों का तारा थी।

जिस चीज़ पर वाहिका की नज़र पड़ जाती, सामंत राजा उसे हर हाल में उसके सामने लाकर रख देते। उसकी छोटी-सी इच्छा भी उनके लिए आदेश के समान थी। पूरे सामंत महल में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति था जो वाहिका को नाराज़ करने का साहस करता।

समय बीता और एक दिन वाहिका का मन राज्य के द्वितीय राजकुमार पर आ गया।

उसने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि वह उसी से विवाह करेगी।

सामंत राजा ने बिना एक पल गँवाए सीधे राजमहल का रुख किया। उनके प्रभाव और प्रतिष्ठा के आगे स्वयं सम्राट भी अधिक देर तक विरोध नहीं कर सके। अंततः राजाज्ञा जारी हुई और द्वितीय राजकुमार तथा वाहिका की सगाई निश्चित कर दी गई।

पूरा राज्य इस समाचार से गूँज उठा।

लोग कहते थे कि वाहिका जितनी भाग्यशाली है, उतनी ही अभिमानी भी।

लेकिन किसे पता था कि वही युवती, जिसके एक संकेत पर सैकड़ों सैनिक तलवारें निकाल लेते थे, आज जीवन और मृत्यु के बीच अकेली पड़ी होगी।

इस समय उसका शरीर नुकीली चट्टानों पर लहूलुहान पड़ा था।

उसकी साँसें बहुत धीमी थीं।

यदि उसके भीतर अब भी जीवन की हल्की-सी लौ न जल रही होती, तो दूर से देखने वाला कोई भी उसे जंगल में फेंकी गई एक निर्जीव लाश समझ बैठता।

चारों ओर केवल घना जंगल था।

ऊपर आसमान में काले बादल गरज रहे थे।

बिजलियाँ चमक रही थीं।

मूसलाधार वर्षा बिना रुके उसके घायल शरीर पर बरस रही थी।

उसी समय उसके भीतर एक शांत, यांत्रिक आवाज़ गूँजी—

[दोनों पैर पूरी तरह टूट चुके हैं... बाईं ओर की तीन पसलियाँ चटक चुकी हैं... दाहिनी कलाई अपनी जगह से खिसक गई है... इतनी ऊँचाई से गिरने के बाद भी इस शरीर का जीवित बच जाना किसी चमत्कार से कम नहीं है।]

वह आवाज़ बेहद परिचित थी।

वर्षों से उसके साथ रहने वाली वही छोटी काली बिल्ली।

एक दशक से भी अधिक समय तक जिसने हर कठिन परिस्थिति में उसका साथ दिया था।

आश्चर्य की बात यह थी कि इस नए शरीर में आने के बाद भी वह उसके साथ ही थी।

वाहिका ने बिना किसी विशेष भाव के अपनी धुँधली आँखें खोलीं।

उसके चेहरे पर दर्द की कोई स्पष्ट झलक नहीं थी।

मानो उसका शरीर टूट चुका हो, लेकिन उसका मन अब भी अडिग खड़ा हो।

उसने धीमे स्वर में केवल इतना कहा—

“अभी भी... ज़िंदा हूँ...”

अगले ही क्षण उसके सीने से हल्का-सा काला धुआँ निकला।

धुआँ हवा में घूमता हुआ धीरे-धीरे एक छोटी-सी काली बिल्ली का रूप लेने लगा।

कुछ ही पल में वह बिल्ली उसके पास आकर खड़ी हो गई और अपनी चमकती आँखों से उसे देखने लगी।

[बधाई हो, स्वामिनी... आपने एक बार फिर मृत्यु को धोखा दे दिया।]

उसकी आवाज़ में राहत भी थी और हल्का-सा व्यंग्य भी।

वाहिका ने कोई उत्तर नहीं दिया।

वह जानती थी कि अभी खुश होने का समय नहीं था।

मृत्यु उसके पीछे से हटकर सामने आ खड़ी हुई थी।

लगातार बरसती वर्षा उसके शरीर की बची हुई गर्मी भी छीन रही थी।

उसके होंठ नीले पड़ने लगे।

दाँत अनियंत्रित रूप से बजने लगे।

उसे स्पष्ट महसूस हो रहा था कि उसकी चेतना धीरे-धीरे धुँधली होती जा रही है।

यदि उसने शीघ्र ही बारिश से बचने का कोई स्थान नहीं खोजा, तो शायद चोटें नहीं, बल्कि ठंड ही उसकी जान ले लेगी।

उसने बड़ी कठिनाई से सिर उठाया।

पास ही कुछ नीची चट्टानों के नीचे अँधेरी-सी एक गुफा दिखाई दी।

वह अधिक दूर नहीं थी।

लेकिन उसकी वर्तमान अवस्था में वह छोटी-सी दूरी भी किसी पर्वत को पार करने जैसी प्रतीत हो रही थी।

वाहिका ने दोनों हाथों का सहारा लिया।

उसके टूटे हुए पैरों में असहनीय पीड़ा दौड़ गई।

लेकिन उसने कराहना भी उचित नहीं समझा।

धीरे-धीरे...

इंच-इंच...

वह स्वयं को चट्टानों पर घसीटने लगी।

बारिश लगातार उसके ऊपर बरस रही थी।

उसके फटे हुए वस्त्र पूरी तरह भीग चुके थे और उसके कमजोर शरीर से चिपक गए थे।

घुटनों और पैरों के घावों से गहरा लाल रक्त बह रहा था।

लेकिन वर्षा की तेज धार हर बार उस रक्त को बहाकर अपने साथ ले जाती।

चट्टानों पर लाल रंग की लकीरें बनतीं और अगले ही पल पानी उन्हें मिटा देता।

उसके पीछे केवल संघर्ष के निशान रह जाते।

छोटी काली बिल्ली भी उसके साथ-साथ चल रही थी।

कभी वह उसके कंधे से हल्का-सा धक्का देती।

कभी उसके हाथ के पास आकर धीरे से म्याऊँ करती।

मानो हर पल उसे याद दिला रही हो—

हार मत मानो।

बस थोड़ा और।

वाहिका ने अपने शरीर की बची हुई हर शक्ति समेट ली।

हर साँस भारी होती जा रही थी।

हर हरकत उसके शरीर की टूटी हुई हड्डियों को और अधिक पीड़ा दे रही थी।

इतनी गंभीर चोटों के बाद साधारण व्यक्ति तो कब का बेहोश हो चुका होता।

लेकिन उसकी अद्भुत इच्छाशक्ति ही उसे आगे बढ़ा रही थी।

आख़िरकार...

अनगिनत क्षणों जैसे प्रतीत होने वाले संघर्ष के बाद...

वह गुफा के भीतर पहुँच गई।

जैसे ही वर्षा की धारें उसके शरीर से हट गईं, उसने ठंडी पत्थर की दीवार का सहारा लिया।

उसका चेहरा पूरी तरह सफेद पड़ चुका था।

होंठों से रक्त उतर चुका था।

साँसें बुरी तरह काँप रही थीं।

उसने धीरे-से आँखें बंद कीं और राहत की एक लंबी साँस ली।

कम से कम अब वह लगातार बरसती बारिश से सुरक्षित थी।

लेकिन तभी...

गुफा की गहराइयों में फैले घने अँधेरे से अचानक एक विचित्र आहट सुनाई दी।

वातावरण एकदम शांत हो गया।

हवा तक जैसे थम गई।

छोटी काली बिल्ली का पूरा शरीर सतर्क हो उठा।

उसकी पीठ धनुष की तरह तन गई।

पूँछ सीधी खड़ी हो गई।

उसने अँधेरे की ओर घूरते हुए काँपती आवाज़ में पूछा—

[कौन है...?]

कोई उत्तर नहीं आया।

सिर्फ गुफा की गहराइयों से आती रहस्यमयी निस्तब्धता।

वाहिका ने कठिनाई से अपनी आँखें खोलीं।

उसकी आवाज़ कमजोर थी, लेकिन निर्णय दृढ़ था।

“जाकर... देखो...”

वह अपनी वर्तमान स्थिति भली-भाँति समझती थी।

इस हालत में वह न अपने शरीर का उपचार कर सकती थी और न ही किसी शत्रु से लड़ सकती थी।

यदि वहाँ कोई साधारण मनुष्य भी हुआ, तो शायद वही उसकी सहायता कर सके।

और यदि शत्रु हुआ...

तो भागने की शक्ति भी अब उसके भीतर नहीं बची थी।

छोटी काली बिल्ली सावधानी से एक-एक कदम बढ़ाती हुई गुफा के भीतर जाने लगी।

उसके पंजों की हल्की आहट अँधेरे में गूँज रही थी।

वाहिका ने भी अपनी साँस रोक ली।

धीरे-धीरे उसे महसूस हुआ...

वहाँ सचमुच कोई और मौजूद था।

अचानक उसके सिर के ऊपर से एक गहरी, मर्दाना आवाज़ गूँजी।

उस आवाज़ में अजीब-सी शरारत और रहस्य छिपा था।

“तुम... मरने ही वाली हो।”

100%