हँसी की कहानी — अध्याय 1: मुस्कान की वजह - Chapter 2
हँसी की कहानी — अध्याय 2: बंद होने वाला स्कूल और हँसी का बड़ा फैसला
सूरजपुर गाँव की सुबह आज बाकी दिनों से बिल्कुल अलग थी। सूरज निकल चुका था, लेकिन गाँव के लोगों के चेहरों पर रोशनी नहीं थी। हर तरफ एक ही चर्चा थी—गाँव का पुराना स्कूल बंद होने वाला था।
आरव और हँसी स्कूल के सामने पहुँचे। वहाँ पहले से ही बहुत सारे लोग जमा थे। बच्चे अपने बस्ते लेकर खड़े थे और कुछ छोटे बच्चे अपनी माँओं का हाथ पकड़े हुए थे।
गाँव के प्रधान ने सबको शांत करते हुए कहा,
“शहर से अधिकारियों का आदेश आया है। स्कूल की इमारत बहुत पुरानी हो चुकी है और बच्चों की संख्या भी कम है। अगर जल्द ही इसकी मरम्मत नहीं हुई, तो स्कूल बंद कर दिया जाएगा।”
एक बच्चे ने घबराकर पूछा,
“अगर स्कूल बंद हो गया तो हम पढ़ेंगे कहाँ?”
किसी के पास जवाब नहीं था।
आरव ने हँसी की तरफ देखा। उसकी आँखों में चिंता थी।
“हमें कुछ करना होगा,” आरव ने कहा।
हँसी ने धीरे से सिर हिलाया।
“हाँ, लेकिन सिर्फ सोचने से कुछ नहीं बदलेगा।”
दोनों स्कूल के अंदर चले गए।
कमरों की दीवारों पर दरारें थीं। कई खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे। किताबों की अलमारी पुरानी हो चुकी थी और बरसात में छत से पानी टपकता था।
वहीं उनके शिक्षक मोहन सर बच्चों की पुरानी किताबें व्यवस्थित कर रहे थे।
आरव ने पूछा,
“सर, स्कूल को बचाने के लिए कितना पैसा चाहिए?”
मोहन सर ने कुछ पल सोचा।
“कम से कम दो लाख रुपये। छत की मरम्मत, खिड़कियाँ, फर्श और बिजली—सब ठीक करना होगा।”
आरव निराश होकर बोला,
“दो लाख रुपये! इतने पैसे गाँव वाले कहाँ से लाएँगे?”
हँसी चुपचाप खिड़की से बाहर देखने लगी।
कुछ देर बाद उसने कहा,
“अगर पैसे नहीं हैं, तो क्या हम मेहनत से स्कूल को नहीं बचा सकते?”
मोहन सर मुस्कुराए।
“बेटी, मेहनत से बहुत कुछ किया जा सकता है, लेकिन कुछ चीजों के लिए पैसे भी चाहिए।”
हँसी ने दृढ़ आवाज में कहा,
“तो हम पैसे भी जुटाएँगे।”
आरव ने हैरानी से पूछा,
“कैसे?”
हँसी ने जवाब नहीं दिया।
वह सीधे गाँव के बीचों-बीच चली गई और वहाँ खड़े पुराने लाउडस्पीकर के पास पहुँच गई।
उसने गाँव वालों को बुलाया।
“सुनिए! अगर हम सब मिलकर थोड़ा-थोड़ा योगदान दें, तो क्या हम अपना स्कूल बचा सकते हैं?”
एक बुजुर्ग बोले,
“बेटी, गाँव में हर किसी की हालत अच्छी नहीं है।”
हँसी बोली,
“जिसके पास पैसा नहीं है, वह मेहनत दे सकता है। जिसके पास समय नहीं है, वह सामान दे सकता है। और जिसके पास कुछ भी नहीं है, वह बस एक हाथ मदद के लिए बढ़ा सकता है।”
उसकी बात सुनकर कुछ लोग एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।
रामदीन काका आगे आए।
“मेरे पास ज्यादा पैसा नहीं है, लेकिन मैं स्कूल की मरम्मत में मजदूरी करूँगा।”
उनके बाद एक दुकानदार बोला,
“मैं सीमेंट और कुछ सामान दे दूँगा।”
एक महिला बोली,
“मैं बच्चों के लिए खाना बनाऊँगी।”
धीरे-धीरे कई लोग आगे आने लगे।
आरव हँसी को देखता रहा।
उसे समझ आ रहा था कि छोटी-सी मुस्कान भी लोगों में बड़ी उम्मीद जगा सकती है।
अगले दिन से स्कूल की सफाई शुरू हो गई।
बच्चे कूड़ा उठाने लगे। बड़े लोग टूटी दीवारों की मरम्मत करने लगे। कुछ लोग पेड़ काटने की बजाय स्कूल के आसपास की झाड़ियों को साफ करने लगे।
आरव सुबह से शाम तक काम करता।
हँसी भी हर किसी का हौसला बढ़ाती।
“चलो काका, थोड़ा और!”
“बच्चों, ये किताबें संभालकर रखो!”
“चाचा, ये लकड़ी इधर रख दीजिए।”
कुछ ही दिनों में स्कूल का रूप बदलने लगा।
लेकिन समस्या अभी खत्म नहीं हुई थी।
मरम्मत के लिए जितना सामान चाहिए था, उसका आधा ही जुट पाया था।
एक शाम आरव और हँसी स्कूल की छत पर बैठे थे।
आरव ने कहा,
“हमने बहुत कोशिश की, लेकिन अभी भी पैसे कम हैं।”
हँसी ने आसमान की तरफ देखा।
“कभी-कभी मंजिल से पहले रास्ता मुश्किल हो जाता है।”
“अगर स्कूल बंद हो गया तो?”
हँसी कुछ देर चुप रही।
फिर बोली,
“तो हम उसे बंद नहीं होने देंगे।”
आरव ने पूछा,
“लेकिन कैसे?”
हँसी ने उसकी तरफ देखकर कहा,
“हम पूरे जिले को बताएँगे कि हमारे गाँव के बच्चों को स्कूल चाहिए।”
अगली सुबह दोनों ने एक छोटा-सा वीडियो बनाया। उसमें गाँव के बच्चों ने अपनी बातें बताईं।
एक बच्ची बोली,
“मैं बड़ी होकर डॉक्टर बनना चाहती हूँ।”
एक लड़का बोला,
“मैं इंजीनियर बनना चाहता हूँ।”
एक और बच्चा बोला,
“मैं अपने गाँव में बड़ा स्कूल बनाऊँगा।”
हँसी ने वीडियो के अंत में कहा,
“हमें दान नहीं चाहिए, हमें अपने बच्चों के सपनों के लिए आपका साथ चाहिए।”
वीडियो गाँव के एक युवक ने इंटरनेट पर डाल दिया।
शाम तक वीडियो कई लोगों तक पहुँच चुका था।
अगली सुबह स्कूल के बाहर एक गाड़ी आकर रुकी।
गाड़ी से एक महिला बाहर निकली। उसके साथ दो लोग और थे।
वह सीधे हँसी के पास गई और बोली,
“तुम ही हँसी हो?”
हँसी ने कहा,
“जी।”
महिला ने मुस्कुराकर कहा,
“मैं सावित्री मेहरा हूँ। मैंने तुम्हारा वीडियो देखा।”
आरव ने पूछा,
“आप यहाँ क्यों आई हैं?”
सावित्री जी ने स्कूल की तरफ देखा।
“मैं इसी गाँव की रहने वाली हूँ। कई साल पहले मैं इसी स्कूल में पढ़ती थी।”
हँसी हैरान रह गई।
“आप?”
सावित्री जी ने सिर हिलाया।
“हाँ। इसी स्कूल के एक शिक्षक ने मुझे पढ़ाया था। आज मैं शहर में एक कंपनी चलाती हूँ। अगर यह स्कूल बंद हो गया, तो शायद मेरे जैसी कई कहानियाँ शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएँगी।”
उन्होंने अपने साथ आए व्यक्ति को इशारा किया।
उसने एक कागज निकाला।
“स्कूल की पूरी मरम्मत का खर्च हम उठाएँगे।”
कुछ पल के लिए सब लोग चुप हो गए।
फिर बच्चों में खुशी की लहर दौड़ गई।
“स्कूल बंद नहीं होगा!”
आरव खुशी से हँस पड़ा।
हँसी की आँखों में आँसू थे।
मोहन सर ने पूछा,
“बेटी, तुम रो क्यों रही हो?”
हँसी ने आँसू पोंछते हुए कहा,
“खुशी के आँसू हैं।”
उस दिन स्कूल की मरम्मत का काम तेजी से शुरू हुआ।
कुछ हफ्तों बाद स्कूल पूरी तरह बदल गया। नई खिड़कियाँ लग गईं, दीवारों पर रंग चढ़ गया, बच्चों के लिए नई किताबें आ गईं और बरामदे में सुंदर पौधे लगाए गए।
स्कूल के उद्घाटन के दिन पूरा गाँव जमा था।
प्रधान ने मंच पर खड़े होकर कहा,
“आज इस स्कूल को बचाने का श्रेय सिर्फ किसी एक व्यक्ति को नहीं जाता। यह पूरे गाँव की जीत है। लेकिन इसकी शुरुआत दो बच्चों ने की थी—आरव और हँसी ने।”
सबने तालियाँ बजाईं।
आरव ने हँसी की तरफ देखा।
“तुमने कर दिखाया।”
हँसी मुस्कुराई।
“नहीं, हमने कर दिखाया।”
लेकिन उसी समय मंच के पीछे खड़ी एक बूढ़ी महिला की नजर हँसी पर पड़ी।
वह अचानक आगे बढ़ी।
उसने हँसी को ध्यान से देखा और काँपती आवाज में कहा,
“तुम… तुम बिल्कुल अपनी माँ जैसी दिखती हो।”
हँसी का चेहरा अचानक बदल गया।
“आप मेरी माँ को जानती थीं?”
बूढ़ी महिला कुछ बोलती, उससे पहले ही उसकी आँखों में आँसू आ गए।
उसने सिर्फ इतना कहा,
“तुम्हारी माँ ने जाते-जाते मुझे एक बात बताई थी… और शायद अब समय आ गया है कि वह बात तुम्हें भी बता दूँ।”
हँसी और आरव एक-दूसरे को देखने लगे।
हँसी ने घबराकर पूछा,
“मेरी माँ ने क्या कहा था?”
बूढ़ी महिला ने चारों तरफ देखा और धीमी आवाज में बोली,
“तुम्हारी माँ की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं थी।”
हँसी के पैरों तले जमीन खिसक गई।
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“क्या मतलब?”
बूढ़ी महिला ने जवाब दिया,
“इसका सच तुम्हें उस पुराने घर में मिलेगा… जहाँ तुम अपनी माँ के साथ रहती थीं।”
हँसी की आँखों में डर और सवाल दोनों थे।
उसे पहली बार लगा कि उसकी माँ के अतीत में ऐसा राज छिपा था, जिसके बारे में उसे कभी कुछ नहीं बताया गया।
उस रात हँसी और आरव उसी पुराने घर के सामने खड़े थे।
दरवाजा बंद था।
हँसी ने काँपते हाथों से कुंडी उठाई।
दरवाजा धीरे-धीरे खुला।
अंदर अंधेरा था।
लेकिन कमरे के बीचों-बीच एक पुराना लकड़ी का संदूक रखा था।
संदूक के ऊपर एक कागज पड़ा था।
उस पर सिर्फ चार शब्द लिखे थे—
“मेरी प्यारी हँसी के लिए।”
हँसी ने काँपते हाथों से वह कागज उठा लिया।
और यहीं से उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य खुलने वाला था।
अध्याय 2 समाप्त।
अगले अध्याय में:
अध्याय 3 — माँ का आखिरी खत और संदूक का रहस्य