हँसी की कहानी — अध्याय 1: मुस्कान की वजह Ch. 3

हँसी की कहानी — अध्याय 1: मुस्कान की वजह - Chapter 3

Posted by Shani Rajput • Aug 16, 2026 08:51 AM

हँसी की कहानी — अध्याय 4: पुराने पुल का रहस्य

सूरजपुर में अभी अंधेरा था। मुर्गे की पहली बाँग भी नहीं हुई थी। गाँव के ज्यादातर लोग गहरी नींद में थे, लेकिन हँसी की आँखों में नींद का नाम तक नहीं था।

उसके सामने मेज पर उसकी माँ की लाल डायरी रखी थी।

उस डायरी में इतने सवाल छिपे थे कि हँसी का मन बार-बार उसी एक सवाल पर जाकर रुक जाता—

“मेरे पिता अरुण आखिर कहाँ हैं?”

आरव ने अपना बैग उठाया और धीरे से कहा,

“चलें?”

हँसी ने डायरी को कपड़े में लपेटकर अपने बैग में रखा।

“हाँ। आज हमें पुराने पुल का सच जानना ही होगा।”

दोनों घर से बाहर निकले।

गाँव की गलियाँ शांत थीं। आसमान पर हल्की नीली रोशनी दिखाई देने लगी थी। रास्ते में उन्हें मोहन सर मिल गए।

उन्होंने दोनों को देखते ही कहा,

“मैंने कहा था कि अकेले मत जाना।”

आरव बोला,

“इसलिए तो आपको साथ चलने के लिए कहा था।”

मोहन सर ने कुछ पल हँसी को देखा।

“तुम्हारी माँ भी ऐसी ही थी। डर के सामने कभी पीछे नहीं हटती थी।”

हँसी ने पूछा,

“क्या मेरी माँ भी पुराने पुल पर गई थीं?”

मोहन सर ने धीमे से कहा,

“हाँ। और उसी के बाद बहुत कुछ बदल गया था।”

तीनों पुराने पुल की ओर चल पड़े।

सूरजपुर से करीब दो किलोमीटर दूर एक सूखी नदी थी। बरसात के मौसम में उसमें तेज पानी बहता था, लेकिन गर्मियों में नदी लगभग सूख जाती थी। नदी के ऊपर पत्थरों और लोहे से बना एक पुराना पुल था।

गाँव वाले उसे पुराना पुल कहते थे।

कई सालों से उस पुल का इस्तेमाल कोई नहीं करता था।

जैसे ही वे पुल के पास पहुँचे, हँसी अचानक रुक गई।

“यहीं है।”

आरव ने पूछा,

“तुम्हें कैसे पता?”

हँसी ने अपनी माँ की डायरी निकाली।

उसने एक पन्ना खोला।

उस पर लिखा था—

“अगर कभी सच की तलाश में जाना पड़े, तो पुराने पुल के तीसरे पत्थर को देखना।”

तीनों पुल के तीसरे पत्थर के पास पहुँचे।

पत्थर बाकी पत्थरों से थोड़ा अलग था।

आरव ने उसे हटाने की कोशिश की।

पत्थर हिला नहीं।

मोहन सर बोले,

“रुको।”

उन्होंने आसपास देखा और पास पड़ी एक लोहे की छड़ उठा ली।

कुछ कोशिश के बाद पत्थर थोड़ा खिसका।

नीचे एक छोटी-सी लोहे की पेटी दिखाई दी।

हँसी की धड़कन तेज हो गई।

“यही है…”

आरव ने पेटी बाहर निकाली।

उस पर एक छोटा-सा ताला लगा था।

हँसी ने अपनी जेब से चाँदी की डिबिया में मिली छोटी चाबी निकाली।

चाबी ताले में लगते ही ताला खुल गया।

पेटी के अंदर कुछ पुराने कागज, एक छोटी घड़ी और एक फोटो थी।

फोटो देखकर हँसी की आँखें फैल गईं।

उसमें उसकी माँ मीरा, उसके पिता अरुण और एक तीसरा आदमी खड़ा था।

तीसरे आदमी के चेहरे पर गहरी मूँछें थीं।

मोहन सर ने फोटो देखते ही कहा,

“यह आदमी…”

आरव ने पूछा,

“कौन?”

मोहन सर ने धीमी आवाज में कहा,

“रघुवीर सिंह।”

हँसी ने पूछा,

“कौन हैं ये?”

मोहन सर ने जवाब दिया,

“आज गाँव में उनकी सबसे बड़ी जमीन है। लेकिन कई साल पहले वे इतने अमीर नहीं थे।”

हँसी ने डायरी खोली।

उसी पन्ने के नीचे रघुवीर का नाम लिखा था।

“रघुवीर को सच पता है।”

हँसी ने घबराकर कहा,

“क्या यही आदमी मेरी माँ की मौत के पीछे था?”

मोहन सर ने तुरंत कहा,

“बिना सबूत किसी पर आरोप मत लगाओ।”

आरव ने पेटी के बाकी कागज निकाले।

उनमें जमीन के पुराने नक्शे और कुछ सरकारी दस्तावेज थे।

एक कागज पर लाल निशान बना था।

मोहन सर ने उसे ध्यान से पढ़ा।

उनके चेहरे का रंग बदल गया।

“ये तो…”

हँसी ने पूछा,

“क्या हुआ?”

“इसमें लिखा है कि स्कूल की जमीन असल में गाँव की सामूहिक जमीन है। इसे कोई निजी व्यक्ति बेच नहीं सकता।”

आरव को अचानक कुछ समझ आया।

“तो कोई स्कूल की जमीन पर कब्जा करना चाहता था?”

मोहन सर ने सिर हिलाया।

“हाँ। और अगर यह दस्तावेज बाहर आ गया, तो कई लोगों का फायदा खत्म हो सकता है।”

हँसी ने पूछा,

“लेकिन मेरे पिता को इससे क्या लेना-देना था?”

मोहन सर चुप रहे।

तभी पेटी के नीचे से एक और कागज मिला।

वह बाकी कागजों से अलग था।

उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

“अरुण जिंदा है।”

हँसी के हाथ से कागज लगभग गिर गया।

“क्या?”

आरव ने कागज लिया।

“यह सच है?”

मोहन सर ने कुछ नहीं कहा।

हँसी की आँखों से आँसू निकलने लगे।

“मेरे पिता जिंदा हैं?”

तभी पीछे झाड़ियों में कुछ खड़खड़ाहट हुई।

आरव तुरंत पीछे मुड़ा।

“कौन है?”

कोई जवाब नहीं आया।

वह दौड़कर झाड़ियों के पास गया, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

सिर्फ जमीन पर जूते के निशान थे।

मोहन सर ने निशान देखकर कहा,

“कोई हमारा पीछा कर रहा था।”

हँसी ने पूछा,

“क्या वह रघुवीर था?”

मोहन सर बोले,

“हो सकता है। हमें यहाँ से तुरंत निकलना चाहिए।”

तीनों ने पेटी के कागज सुरक्षित रखे और वापस गाँव की तरफ चल पड़े।

लेकिन रास्ते में हँसी अचानक रुक गई।

“आरव।”

“हाँ?”

“अगर मेरे पिता जिंदा हैं, तो वे इतने सालों से हमसे दूर क्यों हैं?”

आरव के पास कोई जवाब नहीं था।

मोहन सर ने कहा,

“शायद उन्हें किसी खतरे से बचने के लिए छिपना पड़ा।”

“किस खतरे से?”

मोहन सर ने हँसी की तरफ देखा।

“उसी खतरे से, जिससे तुम्हारी माँ तुम्हें बचाना चाहती थीं।”

गाँव लौटते समय तीनों ने देखा कि स्कूल के बाहर कुछ लोग खड़े हैं।

रघुवीर सिंह भी वहाँ मौजूद थे।

उनके चेहरे पर सामान्य मुस्कान थी।

उन्होंने हँसी को देखते हुए पूछा,

“सुबह-सुबह कहाँ गई थीं?”

हँसी ने सीधे उनकी आँखों में देखा।

“पुराने पुल पर।”

रघुवीर के चेहरे की मुस्कान एक पल के लिए गायब हो गई।

“पुराने पुल पर?”

“हाँ।”

कुछ सेकंड तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

फिर रघुवीर ने कहा,

“वहाँ तो कुछ नहीं है।”

हँसी ने जवाब दिया,

“कभी-कभी जहाँ कुछ नहीं दिखता, वहीं सबसे बड़ा सच छिपा होता है।”

रघुवीर चुप हो गए।

आरव ने पहली बार उनके चेहरे पर डर देखा।

उस शाम हँसी घर लौटी तो उसने लाल डायरी फिर खोली।

पिछले पन्ने के बाद एक नया पन्ना था, जिसे उसने पहले नहीं देखा था।

शायद पेटी से मिली चाबी की मदद से डायरी का एक छिपा हुआ हिस्सा खुल गया था।

उसमें उसकी माँ ने लिखा था—

“हँसी, अगर तुम यहाँ तक पहुँच गई हो, तो इसका मतलब है कि तुम्हें पुराने पुल का सच मिल चुका है। अब अगला कदम तुम्हें अकेले नहीं उठाना है। जिस व्यक्ति पर तुम सबसे ज्यादा भरोसा करती हो, वही तुम्हें तुम्हारे पिता तक पहुँचाएगा।”

हँसी ने डायरी बंद कर दी।

“सबसे ज्यादा भरोसा…”

उसने धीरे से आरव की तरफ देखा।

लेकिन उसी समय उसे खत की आखिरी लाइन याद आई—

“आरव पर भरोसा करना।”

उसके मन में एक नया सवाल उठा।

“आखिर मेरी माँ आरव को पहले से कैसे जानती थीं?”

रात में आरव अपने घर पहुँचा।

दरवाजे पर पहुँचते ही उसे एक लिफाफा मिला।

उसने लिफाफा खोला।

अंदर एक छोटा-सा कागज था।

उस पर लिखा था—

“अगर तुम हँसी को बचाना चाहते हो, तो उसे सच्चाई मत बताना। वरना अगला हादसा तुम्हारे घर में होगा।”

आरव के हाथ काँपने लगे।

उसने चारों तरफ देखा।

गली खाली थी।

लेकिन दूर अंधेरे में कोई खड़ा था।

आरव उस परछाईं की ओर बढ़ा।

परछाईं तुरंत मुड़ी और अंधेरे में गायब हो गई।

आरव वापस अपने घर आया।

उसके सामने अब दो रास्ते थे—

एक तरफ हँसी से सच छिपाना।

दूसरी तरफ उसे सब कुछ बता देना।

और तभी उसकी नजर लिफाफे के पीछे लिखे एक नाम पर पड़ी—

“अरुण।”

आरव की साँस थम गई।

क्योंकि अरुण सिर्फ हँसी के पिता का नाम नहीं था।

वह नाम उसके अपने परिवार के अतीत से भी जुड़ा हुआ था।

अध्याय 4 समाप्त।

अगले अध्याय में:

अध्याय 5 — आरव के परिवार का छिपा हुआ राज

अब हँसी को अपने पिता की तलाश थी, लेकिन उसे नहीं पता था कि उसके पिता का रहस्य आरव के परिवार से जुड़ा हुआ है।

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