nightmare tales - Chapter 2
Ab aage ....
आरव ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा...
उसके सामने कोई इंसान नहीं था। चारों तरफ़ घना अँधेरा और डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था। हवेली की टूटी खिड़कियों से आती ठंडी हवा उसके चेहरे से टकरा रही थी। दूर कहीं उल्लू की आवाज़ सुनाई दी।
उसने राहत की साँस ली और झुककर ज़मीन पर गिरी डायरी उठाने लगा।लेकिन जैसे ही उसने डायरी को हाथ लगाया, उसके सारे पन्ने अपने-आप तेज़ी से पलटने लगे।
फड़... फड़... फड़...
आरव घबरा गया। उसने डायरी बंद करनी चाही, मगर जैसे किसी अदृश्य ताकत ने उसे पकड़ रखा हो।
अचानक आख़िरी पन्ने पर लाल रंग की स्याही अपने-आप उभरने लगी।
धीरे-धीरे शब्द बनने लगे
"अगर सच जानना है... तो हवेली के पीछे वाले कुएँ तक आओ।"
आरव की धड़कन तेज़ हो गई।"ये... ये कैसे हो सकता है?" उसने खुद से कहा।तभी हवेली के बाहर पायल की आवाज़ गूँजी।
छन... छन... छन...
वह आवाज़ धीरे-धीरे दूर जाती हुई महसूस हुई।
ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसे अपने पीछे आने के लिए बुला रहा हो।
डर के बावजूद आरव ने टॉर्च उठाई और हवेली के पीछे की तरफ़ बढ़ गया।बारिश फिर से शुरू हो चुकी थी।
कुछ ही दूर पर एक पुराना, टूटा हुआ कुआँ दिखाई दिया। उसके चारों ओर सूखी घास उगी हुई थी और कुएँ के पास एक जंग लगा लोहे का झूला हवा के बिना ही धीरे-धीरे हिल रहा था।
आरव ने कुएँ के अंदर टॉर्च की रोशनी डाली।
नीचे सिर्फ़ अँधेरा था।तभी उसके पीछे किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज़ आई।
ठक... ठक... ठक...
वह झटके से पलटा।सामने वही लाल चुन्नी वाली लड़की खड़ी थी।इस बार उसका चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था।
उसकी आँखों में गुस्से से ज़्यादा दर्द था।उसने बिना कुछ बोले कुएँ की तरफ़ इशारा किया।
आरव ने फिर से नीचे झाँका।इस बार उसे कुएँ की दीवार में एक छोटा-सा लोहे का दरवाज़ा दिखाई दिया।
"क्या... मुझे नीचे जाना होगा?" उसने डरते हुए पूछा ।लड़की ने धीरे से सिर हिला दिया।इतना कहते ही वह धुएँ की तरह गायब हो गई।
आरव ने हिम्मत जुटाई। कुएँ के किनारे लगी पुरानी सीढ़ियों के सहारे वह नीचे उतरने लगा।हर कदम के साथ उसका डर बढ़ता जा रहा था।
नीचे पहुँचकर उसने उस लोहे के दरवाज़े को धक्का दिया।
चर्ररर...
दरवाज़ा खुल गया।अंदर एक छोटा-सा कमरा था।
दीवारों पर मकड़ी के जाले लटके हुए थे। कमरे के बीचों-बीच एक लकड़ी का संदूक रखा था।आरव ने संदूक खोला।
उसके अंदर एक लाल चुन्नी, टूटी हुई चूड़ियाँ, चाँदी का एक पायल और कुछ पुराने खत रखे थे।
उसने पहला खत खोला।उस पर लिखा था,,
"अगर ये खत किसी को मिले... तो समझ लेना कि मेरी मौत हादसा नहीं थी। मैंने किसी से बेइंतहा मोहब्बत की थी... लेकिन उसी मोहब्बत ने मुझे मौत दे दी।"
खत पढ़ते-पढ़ते आरव के हाथ काँपने लगे।
अचानक कमरे का दरवाज़ा अपने-आप बंद हो गया।
धड़ाम!पूरा कमरा अँधेरे में डूब गया।टॉर्च की रोशनी भी बुझ गई।
फिर उसी अँधेरे में एक लड़की की धीमी आवाज़ गूँजी—
"मेरा कातिल... अभी ज़िंदा है...",!!
आरव ने जल्दी से टॉर्च दोबारा जलाई।रोशनी होते ही उसने देखा कि सामने वाली दीवार पर लाल रंग से कुछ लिखा हुआ था।
"उस पर भरोसा मत करना..."
"किस पर?" आरव चीख पड़ा।
तभी उसके पीछे किसी ने बहुत धीरे से कहा—
"जिसने मुझे मारा..."
आरव पलटा।सामने वही लड़की खड़ी थी।इस बार उसने अपना हाथ बढ़ाया।
उसकी हथेली में एक पुरानी अंगूठी थी।उसने वह अंगूठी आरव के हाथ में रख दी।
जैसे ही आरव ने अंगूठी पकड़ी, उसकी आँखों के सामने अजीब दृश्य आने लगे।उसे दिखा...!!एक लड़की भाग रही है...!?कोई उसका पीछा कर रहा है...।
फिर एक ज़ोरदार चीख...और सब कुछ खून से लाल हो गया।
आरव घबराकर ज़मीन पर गिर पड़ा।
जब उसने आँखें खोलीं, वह फिर उसी हवेली के बाहर पड़ा था।
सुबह हो चुकी थी।
सूरज की पहली किरणें हवेली पर पड़ रही थीं।
उसने अपनी मुट्ठी खोली।
अंगूठी अभी भी उसके हाथ में थी।
लेकिन उस अंगूठी के अंदर सिर्फ़ एक अक्षर खुदा हुआ था—
"K"
आरव उस अक्षर को देखकर सोच में पड़ गया।"क्या यही कातिल के नाम का पहला अक्षर है... या किसी और रहस्य की शुरुआत?"
उसी समय उसका मोबाइल बज उठा।स्क्रीन पर एक अनजान नंबर चमक रहा था।उसने कॉल उठाई।
दूसरी तरफ़ से सिर्फ़ एक ही आवाज़ आई—
"अगर ज़िंदा रहना चाहते हो... तो तुरंत देवगढ़ छोड़ दो..."!!कॉल कट गई।
आरव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
उसने एक बार फिर हवेली की ओर देखा...
ऊपरी मंज़िल की खिड़की में वही लाल चुन्नी वाली लड़की खड़ी थी।
वह इस बार मुस्कुरा नहीं रही थी...
बल्कि जैसे किसी आने वाले ख़तरे से उसे सावधान कर रही थी।
मोबाइल की कॉल कटते ही चारों तरफ़ फिर से गहरा सन्नाटा छा गया।
आरव कुछ पल तक हवेली के बाहर खड़ा रहा। उसकी धड़कनें अब भी तेज़ थीं। हाथ की मुट्ठी में कसकर पकड़ी हुई अंगूठी उसकी हथेली में चुभ रही थी।
उसने धीरे-धीरे मुट्ठी खोली। सुबह की हल्की धूप उस चाँदी की अंगूठी पर पड़ी तो उसके भीतर खुदा हुआ एक अक्षर साफ़ चमक उठा— "K"।
आरव की नज़र फिर हवेली की ऊपरी मंज़िल की उस खिड़की पर गई, जहाँ कुछ क्षण पहले लाल चुन्नी वाली लड़की खड़ी थी।
लेकिन अब वहाँ कोई नहीं था।टूटी हुई खिड़की हवा के साथ चर्र... चर्र... की आवाज़ कर रही थी।
"क्या वह मुझे सच तक पहुँचाना चाहती है... या किसी ऐसे जाल में फँसा रही है, जहाँ से वापस लौटना नामुमकिन हो?" उसने खुद से कहा।
उसने गहरी साँस ली, कैमरा उठाया और तेज़ कदमों से देवगढ़ की ओर चल पड़ा।करीब एक घंटे बाद वह देवगढ़ थाने के सामने खड़ा था।
थाना छोटा और पुराना था। दीवारों की सफेदी जगह-जगह से उखड़ चुकी थी। बरामदे में रखी लोहे की कुर्सियों पर जंग लग चुका था। भीतर एक पुराना पंखा चर्र-चर्र की आवाज़ के साथ घूम रहा था।ड्यूटी पर बैठे इंस्पेक्टर विजय सिंह किसी फ़ाइल में खोए हुए थे।
आरव ने उनके सामने जाकर कहा, "मुझे बीस साल पुराने एक हत्या के मामले की जानकारी चाहिए।"
इंस्पेक्टर ने चश्मा उतारा और उसे गौर से देखा।
"कौन-सा मामला?"
"राधिका..." आरव एक स्वर में बोल ।
किसकी अंगूठी है वो ? क्या वो कातिल का नाम है ? या फिर कुछ और .. जाने के लिए follow me and like comment share your friend's ☺️!
To be continue.......