nightmare tales - Chapter 3
Ab aage ....
मोबाइल की कॉल कटते ही चारों तरफ़ फिर से गहरा सन्नाटा छा गया।
आरव कुछ पल तक हवेली के बाहर खड़ा रहा। उसकी धड़कनें अब भी तेज़ थीं। हाथ की मुट्ठी में कसकर पकड़ी हुई अंगूठी उसकी हथेली में चुभ रही थी।
उसने धीरे-धीरे मुट्ठी खोली। सुबह की हल्की धूप उस चाँदी की अंगूठी पर पड़ी तो उसके भीतर खुदा हुआ एक अक्षर साफ़ चमक उठा— "K"।
आरव की नज़र फिर हवेली की ऊपरी मंज़िल की उस खिड़की पर गई, जहाँ कुछ क्षण पहले लाल चुन्नी वाली लड़की खड़ी थी।
लेकिन अब वहाँ कोई नहीं था।टूटी हुई खिड़की हवा के साथ चर्र... चर्र... की आवाज़ कर रही थी।
"क्या वह मुझे सच तक पहुँचाना चाहती है... या किसी ऐसे जाल में फँसा रही है, जहाँ से वापस लौटना नामुमकिन हो?" उसने खुद से कहा।
उसने गहरी साँस ली, कैमरा उठाया और तेज़ कदमों से देवगढ़ की ओर चल पड़ा।करीब एक घंटे बाद वह देवगढ़ थाने के सामने खड़ा था।
थाना छोटा और पुराना था। दीवारों की सफेदी जगह-जगह से उखड़ चुकी थी। बरामदे में रखी लोहे की कुर्सियों पर जंग लग चुका था। भीतर एक पुराना पंखा चर्र-चर्र की आवाज़ के साथ घूम रहा था।ड्यूटी पर बैठे इंस्पेक्टर विजय सिंह किसी फ़ाइल में खोए हुए थे।
आरव ने उनके सामने जाकर कहा, "मुझे बीस साल पुराने एक हत्या के मामले की जानकारी चाहिए।"
इंस्पेक्टर ने चश्मा उतारा और उसे गौर से देखा।
"कौन-सा मामला?"
"राधिका..." आरव एक स्वर में बोल ।
यह नाम सुनते ही इंस्पेक्टर के चेहरे का भाव बदल गया।
उन्होंने धीरे से फ़ाइल बंद कर दी।
"तुम कौन हो?" तुम्हारी शक्ल जानी पहचानी सी क्यों लग रहा है मुझे ? ।
"मैं पत्रकार हूँ। सच जानने आया हूँ।"आरव अपना बारे में बताते हुए बोला ।
इंस्पेक्टर कुछ देर तक चुप रहे। फिर धीमी आवाज़ में बोले, "कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें दफ़न ही रहने देना चाहिए।"
"लेकिन किसी की हत्या हुई थी। उसका कातिल आज भी खुला घूम रहा है।" आरव बोला ...।
इंस्पेक्टर की उँगलियाँ मेज़ पर बेचैनी से थिरकने लगीं।"तुम्हें यह सब किसने बताया?"
आरव ने बिना कुछ कहे अपनी जेब से अंगूठी निकाली और मेज़ पर रख दी।अंगूठी देखते ही इंस्पेक्टर जैसे पत्थर के हो गए।
उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
"यह... यह अंगूठी तुम्हें कहाँ मिली?"
"राधिका ने दी।" आरव एक टुक जवाब दिया।
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।पंखे की आवाज़ भी जैसे बहुत दूर से आती हुई महसूस होने लगी।इंस्पेक्टर ने काँपते हाथों से अंगूठी उठाई। उनकी आँखों में साफ़ डर दिखाई दे रहा था।
"यह नामुमकिन है..."
"क्या नामुमकिन है?" आरव हैरानी से पूछा ?..।
उन्होंने धीरे से कहा, "यह अंगूठी करण की थी..."इंस्पेक्टर साहब ने बोला ।
"करण?" आरव मन में दोहराते हुए बोला ।
"हाँ... राधिका का प्रेमी।"इंस्पेक्टर साहब ने हल्की आवाज में बोला ।
आरव की साँसें तेज़ हो गईं।"क्या वही 'K' है?"
इंस्पेक्टर ने तुरंत चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई, जैसे उन्हें किसी के सुन लेने का डर हो।फिर वे अपनी कुर्सी से उठे और धीरे से बोले—
"आज रात ठीक बारह बजे पुराने शिव मंदिर के पीछे मुझसे मिलना। यहाँ नहीं... दीवारों के भी कान होते हैं।"
"लेकिन—" आरव के मन में बहुत से सवाल थे वो पूछा चाहता था कि इंस्पेक्टर साहब ने बीच में बोला ...
"कोई सवाल मत पूछो। अगर ज़िंदा रहना चाहते हो, तो अभी यहाँ से चले जाओ।"
उन्होंने जल्दी से अंगूठी वापस आरव की जेब में रख दी।
थाने से बाहर निकलते ही आरव को अजीब-सा एहसास हुआ।
जैसे कोई उसकी हर हरकत पर नज़र रखे हुए हो।
सड़क पर लोग अपने काम में व्यस्त थे, लेकिन उसे बार-बार महसूस हो रहा था कि कोई उसकी पीठ के पीछे चल रहा है।वह अचानक पलटा।सड़क के दूसरी ओर काले कपड़ों में एक लंबा आदमी खड़ा था।उसका चेहरा काले नकाब से ढका हुआ था।
वह बिल्कुल स्थिर खड़ा था।उसकी नज़रें सिर्फ़ आरव पर टिकी थीं।आरव तेज़ी से उसकी ओर बढ़ा।लेकिन तभी एक ट्रक उनके बीच से गुज़रा।जब ट्रक आगे निकला...
वह आदमी गायब था ।
"यह कैसे...?"आरव ने चारों तरफ़ देखा हैरानी से ।
वह कहीं नहीं था।उसी समय उसके कैमरे से अचानक क्लिक... की आवाज़ आई।।
कैमरा अपने-आप चालू हो चुका था।स्क्रीन पर नई तस्वीर दिखाई दी।तस्वीर में सड़क बिल्कुल खाली थी।लेकिन आरव के ठीक पीछे...
वही नकाबपोश आदमी खड़ा था।उसका दायाँ हाथ होंठों पर था।जैसे वह इशारे से कह रहा हो—
"चुप रहो..."आरव का गला सूख गया।
उसने घबराकर पीछे देखा।वहाँ कोई नहीं था।जब उसने दोबारा कैमरे की स्क्रीन देखी...!!तस्वीर बदल चुकी थी।
अब नकाबपोश आदमी की जगह लाल चुन्नी वाली राधिका खड़ी थी।
उसकी आँखों में आँसू थे।वह धीरे-धीरे सिर हिला रही थी...।
जैसे किसी बड़े ख़तरे से सावधान कर रही हो।अचानक कैमरे की स्क्रीन झिलमिलाने लगी।उस पर लाल रंग के अक्षर अपने-आप उभरने लगे—
"उस पर भरोसा मत करना..."
आरव के माथे पर पसीना छलक आया।
"किस पर?"
अगले ही पल शब्द बदल गए—
"वह तुम्हें भी मार देगा..."स्क्रीन एकदम काली हो गई।
कैमरा अपने-आप बंद हो गया।आरव के हाथ काँपने लगे।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि राधिका इंस्पेक्टर की बात कर रही थी... या उस नकाबपोश आदमी की।इसी उलझन में उसका मोबाइल फिर बज उठा।स्क्रीन पर इस बार भी कोई नंबर नहीं था।
उसने काँपते हाथों से कॉल रिसीव की।दूसरी तरफ़ कुछ सेकंड तक सिर्फ़ भारी साँसों की आवाज़ आती रही।
फिर एक धीमी, डरावनी फुसफुसाहट सुनाई दी—
"आज रात... एक और सच दफ़न होने वाला है।"
कॉल कट गई।
आरव का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
उसने जेब में रखी अंगूठी को कसकर पकड़ लिया।
दूर पहाड़ी पर बना पुराना शिव मंदिर धुंध में आधा छिपा दिखाई दे रहा था।
उसे एहसास हो चुका था कि आज की रात उसकी ज़िंदगी बदलने वाली है।
लेकिन उसे यह नहीं पता था...
कि मंदिर में उसका इंतज़ार सिर्फ़ इंस्पेक्टर नहीं, बल्कि मौत भी कर रही थी।
रात के ठीक ग्यारह बजकर पचपन मिनट हो रहे थे।
देवगढ़ का पुराना शिव मंदिर घने कोहरे में डूबा हुआ था। चारों ओर फैला सन्नाटा किसी अनहोनी का संकेत दे रहा था। हवा में नमी थी और मंदिर के पीछे खड़े पीपल के पेड़ की सूखी डालियाँ आपस में टकराकर अजीब-सी आवाज़ें पैदा कर रही थीं।
आरव ने अपनी घड़ी पर नज़र डाली।
उसकी जेब में रखी "K" वाली अंगूठी जैसे हल्की-हल्की गर्म होने लगी।
उसने जेब से अंगूठी निकाली। चाँदनी की हल्की रोशनी में वह पहले से ज़्यादा चमक रही थी।
"आख़िर तुम मुझे कहाँ ले जाना चाहती हो, राधिका?" उसने बुदबुदाते हुए कहा।तभी दूर मंदिर की घंटी अपने-आप बज उठी।
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To be continue...