बंजारन (एक पुनर्जन्म दास्तां) - Chapter 1
यह मेरी एक हांरर कहानी है बड़ी ही मेहनत से मैंने से यह कहानी लिखने के लिए तैयार की है, और अब आप सबके सामने पेश कर रही हूं,,,,,,,
उम्मीद है कि मेरी और रचनाओं की तरह आप मेरी इस रचना को भी अपना कीमती वक्त और प्यार देंगे अब आगे,,,,,,,,,
बीर मैंने सुना है कि तुम गांव जा रहे हो, वीर के दोस्त महेंद्र ने बीर से कहा,,,,,
हां यार सुबह माशा का फोन आया था, दादीसा की तबीयत खराब है इसलिए गांव जा रहा हूं है,बीर ने कहा,,,,,
तब महेंद्र बोला लेकिन वीर तुम्हारी दादी सा और तुम्हारे घर वाले तो यही चाहते थे ना कि तुम कभी गांव भी ना आओ,,,,,
पता नहीं यार क्यों दादीसा, मासा मुझे गांव में नहीं रुकने देना चाहते, पूरे 4 साल हो गए मुझे गांव गए हुए, हर बार जाने का मन करता है अपने परिवार के साथ रहने का मन करता है, अपने चचेरे भाई जय और विनय के साथ भी रहने का मन करता है,,,,,
और मेरी छोटी बहन वीरा बहुत याद आती है उसकी उसके साथ रहने का मन करता है लेकिन क्या करूं यह कहते हुए भी बीर की आंखों में आंसू आ गए और चेहरे पर मुस्कान,,,,,,
पता है महेंद्र वीर फिर बोला 12 साल का होने के बाद दादीसा और मासा मुझे कभी गांव में रुकने ही नहीं देना चाहते थे, जाता तो बड़ी मुश्किल से एक-दो दिन उस पर भी दिन रात पहरे हवन यज्ञ पता नहीं क्या क्या,,,,,
और जैसे ही 21 साल का हुआ तब से तो घरवाले कभी भी गांव बुलाना ही नहीं चाहते, जब भी गांव जाने के बारे में बोलता हूं तो जैसे उन में खलबली सी मच जाती है और सभी डर के साथ मना कर देते हैं,,,,,,,
तब महेंद्र बोला लेकिन तुम्हारे घर वालों ने तुम्हें बताया नहीं कि बह कभी तुम्हें गांव क्यों नहीं रुकने देना चाहते, क्यों बे तुम्हें अपने आप से दूर रखते हैं,,,,,,
और तुम्हारी मासा तुम तो उसके इकलौते बेटे हो उसका दिल नहीं करता तुम्हे अपने पास रखने का,,,,,
करता है यार बाबोसा के जाने के बाद माशा तो जैसे टूट सी गई थी,, पता है महेंद्र जब मैं 2 साल का था और मेरी बहन वीरा मां के पेट में थी उसने तो इस दुनिया में कदम ही नहीं रखा था तभी हमारे बाबोसा हमें छोड़ कर चले गए,,,,,,,
तब दादीसा, मासा, काकी सा, काका सा सब ने मुझे बहुत प्यार दिया कि जिससे मुझे बाबूसा की कमी महसूस ना हो,,,,,,,
और जब मैं 12 साल का हुआ तो मासा ने जब मुझे यहां पर भेजा था तो बह बहुत रोई थी, कही दिन तक खाना तक नही खाया था उसने,,,,,,,
लेकिन शायद कोई ऐसी मजबूरी है जो वह मुझे बताना नहीं चाहती, सारे घर वाले मुझसे कोई बात छुपा रहे है,,,,,,,
ऐसी कौन सी बात हो सकती है महेंद्र ने हैरानी से कहा,,,,,,
तब बीर बोला पता नहीं आखिर इस निशान,,,,,, वह अपने दाएं हाथ की बाह पर बने हुए एक गोलाकार निशान की तरफ इशारा करते हुए बोला पता नहीं इस निशान का क्या राज है,,,,,,,
जब भी मेरी दादी सा इस निशान को देखती है तो परेशान हो जाती है कभी भी उन लोगों ने मुझे इस निशान का राज नहीं बताया,,,,,,
यह निशांन एकमात्र तुम्हारे हाथ पर है तुम्हारे खानदान में महिन्द्र बोला,,,,,,
हां यार यह निशान सिर्फ मेरे ही हाथ पर है जन्म से, जब मेरा जन्म हुआ था तभी यह निशान मेरे हाथ पर था,,,,,
इस निशान को देखकर सभी घरवालों में एक अजीब सा डर है, पता नहीं ऐसा कौन सा सच है कि वे लोग मुझसे छुपा रहे हैं,,,,,,
लेकिन दादीसा की तबीयत खराब है और मासा बोल रही थी कि दादीसा मुझसे कुछ कहना चाहती है इसलिए मुझे जाना होगा बीर बोला,,,,,
बीर अगर तुम कहो तो यार तुम्हारे साथ में भी चल सकता हूं क्या तुम्हारे गांव महेंद्र ने कहा,,,,,
हां यार क्यों नहीं मैं तो सोच रहा था लेकिन सोचा कहीं तुम ऐसे ना सोचने लग जाओ कि अपने साथ-साथ तुम्हें भी गांव ले जाकर परेशान करना चाहता हूं,,,,,,
अरे यार मैं भला ऐसे कैसे सोच सकता हूं तुम तो मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो और एक दोस्त अपने दोस्त के लिए जान भी दे सकता है,,,,,,
अच्छा ऐसी बात है बीर ने मुस्कुराते हुए कहा,,,,,
हां ऐसी ही बात है जनाब अगर यकीन ना हो तो कभी अजमा कर देख लेना महेंद्र ने कहा,,,,,,
तब वीर मुस्कुराते हुए बोला अब चलो जल्दी से पैकिंग करो गाव के लिए निकलना भी तो है बरना ट्रेन छूट जाएगी हमारी,,,,,,
हां हां क्यों नहीं महेंद्र ने मुस्कुराते हुए कहा और फिर दोनों दोस्त अपने गांव जाने के लिए पैकिंग करने लग गए,,,,,,
रात की गाड़ी से वीर और महेंद्र वीर के गाव धावनगढ जाने के लिए ट्रेन से रवाना हो गए,,,,,,
सारी रात का सफर तय करने के बाद सुबह 8:00 बजे ट्रेन ने वीर और महेंद्र को धावनगढ के छोटे से स्टेशन पर छोड़ दिया,,,,,,
वीर का चचेरा भाई विनय वीर को लेने के लिए गाड़ी लिए खड़ा था,,,,,
विनय को देखकर वीर के चेहरे पर मुस्कान आ गई, तो वही विनय ने मुस्कुराते हुए का खम्मा घणी भाई सा कहकर उसने वीर के पैर छू लिए,,,,,
तब वीर ने उसे गले लगा लिया, फिर वीर और महेंद्र विनय के साथ गाड़ी में बैठ कर अपनी हवेली की तरफ चल दिए,,,,,,
जैसे ही वे लोग हवेली के आगे उतरे तो देखा की हवेली के आगे गांव के सारे लोग इकट्ठा थे,,,,,
आखिर होंगे क्यों नहीं धावनगढ़ का इकलौता बारिश आज 4 साल बाद गांव जो लौटा था, सारी हवेली को दुल्हन की तरह सजाया गया था और कहीं नौकर नौकरानी हवेली के द्वार पर फूलों की थालियां लिए खड़े थे,,,,,,,,
यह सब देखकर वीर के चेहरे पर मुस्कान आ गई, वहीं सभी गांव वाले वीर को देख कर उसे अभिवादन करने के लिए आगे बढ़े और सभी वीर की जय-जयकार करने लगे,,,,,,
राजस्थान के इस गांव में आजादी के इतने दिनों बाद भी लोग राजस्थानी राजशाही परंपरा को अपनाए हुए थे,,,,,,,
पूरा गांव वीर के घराने का बड़ा सम्मान करता था और पुरानी परंपरा के अनुसार घराने के बड़े कुबर को ही अपने पिता के परंपरागत पगड़ी पहनाकर पूरे गांव का दायित्व सौंपा जाता था,,,,,,
गांव के इस घराने के पुरुष को गांव के लोग कुबर सा, राणा सा और ठाकुर सा कहकर बुलाते थे,,,,,
किसी को भी गांव के इस प्रथा से कोई एतराज नहीं था यहां तक कि गाव के छोटे बड़े फैसलों में भी ठाकुर घरआने की सहमति होना जरूरी था,,,,,
वीर का पूरा नाम वीर सिंह था, अपने बाबूसा के बाद बह इस राजघराने का एकलौता बारिश था, उसके 25 वर्ष के होने तक इस घराने का सारा भार उसके काका सा प्रताप सिंह ने संभाला था,,,,,
वीर अब राजघराने की परंपरा के अनुसार पूरे 25 वर्ष का हो गया था और अपना दायित्व संभालने के लिए सुयोग्य हो गया था और अब उसका राजयोग उत्तराधिकारी बनाना श्रेष्ठ था,,,,,
वीर के स्वागत में सभी लोग आए हुए थे, वीर की मासा ने आरती का थाल लाकर वीर की आरती उतारी उसके चेहरे पर मुस्कान लेकिन आंखों में आंसू थे,,,,,,
वीर और महेंद्र दोनों ने घराने के सभी बड़ो के पैर छुए और आशीर्वाद लिया,,,,,
जैसे ही वीर ने हवेली में कदम रखा तो जोर-जोर से हवाएं चलने लगी बादल गरजने लगे, चारों तरफ अंधेरा सा छा गया, बिजली चमकने लगी, पलभर में ही सारा मौसम ने तूफान का रूप धारण कर लिया,,,,,,
यह देखकर सब लोग हैरान थे, यह देखकर वीर की मासा और काका सा,काकी सा काफी डर गए, उन्हें एक अनजाना सा डर सताने लगा,,,,,
तब वीर की मासा बोली चलो वीर अंदर चलो जल्दी से, यह कहकर बह वीर और महेंद्र को लेकर अंदर आ गई,,,,,,,
फिर वीरा दौड़ते हुए आई और वीर सिंह के गले लग गई यह देखकर वीर बोला अरे छुटकी आ गई नटखट,,,,,
तब यह सुनकर वीरा बोली हां बीर जी (भैया) में कहा जाऊंगी थारे को छोड़कर,,,,,,
यह सुनकर वीर बोला अरे तुझे यहां से भेजने के लिए ही तो मैं आया हूं तेरा ससुराल का इंतजाम करने के लिए,,,,
तब वीरा बोली देखो माशा बीर जी अभी शुरू हो गए,,,,
तब वीर की मासा मुस्कुराते हुए बोले थे भाई बहनों का तो यही चलेगा, चलो अंदर दादी सा थे लोगों का इंतजार कर रही है,,,,,
यह कहकर वीर की मासा वीर और महेंद्र को लेकर दादीसा कि कमरे में गई,,,,,,
दादी सा पलंग पर लेटी हुई थी उसकी हालत काफी दयनीय लग रही थी,,,,,,
वीर ने झुककर जैसे ही उसके पैर छुए तो दादी सा ने आंखें खोली, वीर को देखकर उसकी आंखों से आंसू छलक उठे और वह उठने का प्रयास करने लगी,,,,,
तब पास खडी नौकरानी ने उसे उठा कर बैठा दिया, बीर उसके पास बैठ गया और उसका हाथ अपने हाथों में लेकर बोला कैसी हो दादीसा,,,,,,
यह सुनकर वीर की दादी सा कुछ बोलती उससे पहले ही उसके तेज तेज खांसी होने लगी, बाहर जोर-जोर से हवाएं चलने लगी, तेज मूसलाधार बारिश होने लगी,,,,,
यह देखकर सभी घरवालों की बेचैनी और बढ़ गई दादीसा के कमरे में रखी चीजे भी इधर-उधर कर गिरने लगी,,,,,
यह देखकर दादीसा की आंखों में डर सा आ गया, बह कुछ बोलती उससे पहले ही वीर की मासा बोली वीर दादीसा की तबीयत अभी ठीक ना है उसे आराम की जरूरत है,उसे आराम करणे दो,,,,,,
थे लोग हाथ मुंह धो कर आओ, तब तक कलेवा (नाश्ता) भी तैयार है,,,,,
यह सुनकर बीर और महेंद्र ने कहा जी मासा यह कहकर बीर ने फिर अपनी दादी सा की तरफ देखते हुए कहा दादीसा आप अभी आराम करो आपसे फिर मैं मिलता हूं अभी आपको आराम की जरूरत है,,,,,
यह कहकर वीर जाने लगा तो उसकी दादी सा ने कसकर उसका हाथ पकड़ लिया जैसे बह उसे कुछ बताना चाहती हो, लेकिन कुछ बोल ना पा रही हो,,,,,
तब वीर की मासा बोली माशा बीर को जाने दो यह सुनकर बीर की दादी सा ने उसका हाथ छोड़ दिया और वीर और महेंद्र दोनों का अपने कमरे में चले गए,,,,,