बंजारन (एक पुनर्जन्म दास्तां) - Chapter 3
खाना खाने के बाद जैसे ही महेंद्र और वीर अपने कमरे में जाकर बातें करते हुए गहरी नींद में सो गए,,,,,
आधी रात को बीर को ऐसा लगा जैसे कोई उसके पास बैठकर उसके बालों को सहला रहा हो,,,,,,
किसी के हाथ का स्पर्श पाकर वीर की आंखें खुल गई और उसने देखा तो वहां कोई नहीं था, लेकिन ऐसा लगा जैसे कमरे में कोई चल रहा हो और किसी की पायल की आवाज आ रही थी,,,,,
यह देखकर वीर बोला कौन है कौन है सामने आओ मेरे,,,,,,
उसकी आवाज सुनकर महेंद्र की भी नींद खुल गई, महेंद्र नींद से जागते ही बोला क्या हुआ वीर,,,,,,
तब वीर बोला पता नहीं यार ऐसा लगा जैसे कमरे में कोई लड़की हो, पायल बजने की आवाज आ रही थी,,,,,,
यह सुनकर महिंद्र हसते हुए बोला लड़की और तुम्हारे कमरे में अरे बाबा ऐसे कैसे हो सकता है तुम तो आज तक किसी की लड़की की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखते,,,, अरे आई भी होगी तो कोई मेरे लिए आई होगी महेंद्र मुस्कुराते हुए बोला,,,,,
तब बीर बोला तुम्हें तो हमेशा जब देखो तब मजाक सूझता है, चलो सो जाओ,,,,,,
तब महेंद्र बोला अरे यार नींद में सपना देखा होगा आधी रात को कोई लड़की हमारे कमरे में क्यों आएगी,,,,,
यह सुनकर वीर बोला हां यह हो सकता है,फिर दोनों गहरी नींद में सो गए,,,,,
बीर को सारी रात सपनों में अजीबोगरीब चीजें दिखाई दे रही थी, जैसे ही सुबह उनकी नींद खुली तो उसे अपना सिर थोड़ा भारी सा लग रहा था,,,,,
यह देखकर महेंद्र बोला क्या हुआ वीर,,,,,
तब बीर बोला पता नहीं यार रात में कुछ अजीब गरीब सी चीजें दिखाई दे रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे मैं अलग ही दुनिया में हो लेकिन सब कुछ धुंधला धुंधला था कुछ भी याद नहीं आ रहा ठीक से,,,,,
यह सुनकर महेंद्र बोला अरे यार सपने है आते ही रहते हैं चलो अब,,,,,,
फिर दोनों दोस्त स्नानादि करके नीचे आ गए सबने एक साथ नाश्ता किया,,,,,
फिर वीर अपनी दादी पास गया उसकी दादी सा भी नींद से जाग चुकी थी और उसने भी नाश्ता कर लिया था,,,,
अपनी दादीसा को देखकर वीर बोला दादीसा मैं और महेंद्र बाहर घूम कर आते हैं,,,,
यह सुनकर वीर की दादी का काफी घबरा गई और हड़बड़ा कर बोली ना बेटा ना बाहर ना जावो थारे लिए चौका ना है,,,,,,
यह सुनकर बीर बोला क्यों दादीसा अरे अब मैं बच्चा थोड़ी ना हूं बड़ा हो गया हूं वीर मुस्कुराते हुए बोला,,,,,
तब वीर की दादी सा बोली ना बेटा थारे को कैसे समझाऊं,,,,,
तब फिर बोला क्यों ऐसी कौन सी बात है कि आप मुझे बाहर नहीं जाने देना चाहती,,,,,
तब वीर की दादी सा बोली लेकिन बेटा,,,,,
तब बीर की मासा बोली मां सा वीर अब बड़ा हो गया है उसे जाने दो,,,,,
तब बीर की दादी सा बोली ना अकेले ना जावेगा थारे साथ धीरू और भैरव दोनों जाबेगे,,,,,
यह सुनकर वीर बोला अरे दादीसा अब मैं बच्चा थोड़ी ना हूं मैं और महेंद्र दोनों पूरा गांव अच्छे से घूम आएंगे, उन्हें हम साथ ले जाकर क्या करेंगे उन्हें यहां भी तो और भी काम होगा,,,,,
यह सुनकर वीर की मासा बोली बेटा दादी सा जो कह रही है थारे भले के खातिर कह रही है, तू धीरु काका और भैरव काका दोनों को साथ ले जा,,,,,,
अपनी दादी सा और मासा का मन रखने के लिए बीर अनमने ढंग से भी हां कर दी, फिर महिंद्र, वीर, धीरु काका और भैरव काका जो दोनों उनके यहां पुराने नौकर थे,,,,,
बह भी उनके साथ हो लिए, उन लोगों ने गांव में घूमने के लिए घोड़े की सवारी उचित समझी क्योंकि गांव के ऊबर खाबड़ रास्तों में घोड़े की सवारी ही उनके लिए उचित थी,,,,,,
चारों गांव घूमने के लिए निकल पड़े, गांव घूमते घूमते वीर किसी गहरी सोच में डूबा हुआ था, भई महेंद्र कह रहा था अरे यार वीर सच में तुम्हारा गांव तो बहुत ही खूबसूरत है,,,,,,
लेकिन बीर की तरफ से कोई जवाब ना पाकर महेंद्र बोला क्या हुआ यार कहीं खोए हुए हो क्या,,,,,
या सुनकर बीर बोला पता नहीं महेंद्र लेकिन मुझे तो कभी दादी सा और मासा ने घर से बाहर नहीं निकलने दिया,,,,,
फिर भी मुझे ऐसा क्यों लग रहा है जैसे इस गांव की बहुत सी चीजें मेरी जानी पहचानी हो,,,,,,
ऐसा लग रहा है जैसे यह है जंगल है इसके दूसरी तरफ एक पहाड़ी है उसके पास खुलासा मैदान और झरना है और वहां पर वीर आगे कुछ कहता,,,,,,
उससे पहले ही भैरव काका हडबढ़ाते हुए बोले अरे हा बेटा अपने काका सा और म्हारे साथ बचपन में आया था इसलिए बचपन की यादें याद आ रही होगी,,,,,
यह सुनकर वीर बोला पता नहीं लेकिन सब कुछ जाना पहचाना सा लग रहा है,,,,
जैसे ही वे लोग जंगल के समीप पहुंचे तब वीर ने कहा कि हम जंगल भी घूम कर आते हैं,,,,,
यह सुनकर भैरव काका बोले ना बेटा ना जंगल के अंदर से खतरे से खाली ना है,,,,
यह सुनकर वीर बोला अरे काका सा आप भी दादीसा जैसी बातें कर रहे हो अरे कुछ नहीं होगा और वैसे भी हमारे हाथ में बंदूक है ना और ठाकुर है हम अगर ऐसी कोई परेशानी आई ना तो हम उससे निपटना अच्छी तरह जानते हैं,,,,,
धीरु काका और भैरव काका दोनों ने ही वीर से जंगल में जाने के लिए बहुत मना किया, लेकिन वीर किसी की ना सुनते हुए जंगल में घुस गया,,,,,
उसके पीछे पीछे महिंद्र और उनके पीछे धीरू और भैरू काका को जाना पड़ा,,,,,
वे लोग जंगल घूम रहे थे लेकिन जंगल को देखते हुए वीर को ऐसा लग रहा था जैसे कोई बातें है जो उसे याद आना चाहती है लेकिन याद नहीं आ रही हो,,,,,
तभी जैसे ही बह जंगल के उस पार पहुंचा तो एक तालाब के नजर आते ही ऐसा लगा जैसे बह तालाब उसे काफी जाना पहचाना लग रहा है, ऐसा लग रहा था जैसे मैं वहां एक बार नहीं अनेकों बार आ चुका हो,,,,,,,
बह अपने दिमाग पर जोर डालने लगा, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था, पल भर में ही उसे लगा जैसे उसे सारी दुनिया उसके चारों तरफ घूम रही हो,,,,,,
कहीं आवाजें है उसे चिल्ला चिल्ला कर कुछ कह रही हो किसी के हंसने की आवाज, किसी की पायल की आवाज तो किसी के गुनगुनाने की आवाज, वीर को चारों तरफ धरती घूमती नजर आ रही हो,,,,,
तभी बह अपने कानों पर हाथ लगाकर जोर से बोल पड़ा क्या है यह सब कुछ मुझे सब कुछ ठीक से दिखाई क्यों नहीं दे रहा क्यों क्या है यह धुंधली यादें,,,,, कहते हुए बेहोश होकर गिर गया,,,,,
उसे बेहोश होते देखकर धीरु काका भैरव काका और महेंद्र बहुत घबरा गए और उन्होंने दौड़ कर उसे उठा लिया, और होश में लाने की कोशिश की,,,,,
लेकिन वीर को होश नहीं आया तो वे लोग उसे अपने साथ लेकर वापस हवेली लौट आए,,,,,,