Black Love Ch. 2

Black Love - Chapter 2

Posted by Shubhi Gupta • Aug 26, 2026 10:00 AM

उस सेवक की बात सुन, राजा साहब ओर राजकुमारी एक दूसरे को देखते है, उनके चेहरे पे शिकन दिखने लगा था फिर भी उन्होंने उस सेवक को जाने को बोल, खुद भी देववृक्ष को प्रणाम कर वहां से महल की ओर चल देते है" अब आगे, एक पहर पश्चात, सभी दरबार में बैठे हुए थे जिसमें ताम्रवती राज्य के सभी मंत्री और मित्र राज्य से आए हुए राजाओं के साथ वहां राज्य की आम जनता भी मौजूद थी और वो अतिथि भी जिनके आने से सब परेशान थे और सबकी नजरे बस उन पर ही टिकी थी क्योंकि वो सभी लोग काले कपडों में थे, कई सारे सैनिक जिनका वेश किसी दानव की तरह था और उन सभी के हाथों में धारदार हथियार थे, जिनमें एक उम्रदराज औरत भी थी जिसके चेहरे पे छल, कपट और आंखों में बर्बादी लिए बस, ताम्रवती के राजा देवव्रत को ही देखे जा रही थी. तभी वो औरत, अपनी जगह से खडी हो कर, अपने सैनिकों को अपने साथ लाया हुआ, उपहार दरबार के बीचों बीच रखने का इशारा करती है जिसे देख वो सभी सैनिक वैसा ही करते है. वो औरत जिसने काले रंग का वस्त्र पहने हुए, हाथों में मोटे मोटे कडे, माथे पे बढा सा काले रंग का टीका लगा हुआ, आंखों में गहरे काजल और गले में जाने कितने मंत्रों से सिद्ध किए हुए पत्थरों की माला, जिसे देख कर ही आम आदमी डर जाए, बहुत ही भयानक रूप था उसका वो औरत सभी को अपनी एक नजर देख, अपनी बात कहती है" मै तमस राज्य की गुरु मां चंद्रिका, आज यहां ताम्रवती में अपने तमस राज्य के राजकुमार मृत्युंजय के विवाह का प्रस्ताव लेकर आई हूं, वो आपकी राजकुरी स्वर्णप्रभा को अपनी वधू के रूप में चाहते है" इतना कह कर वो औरत चंद्रिका, अपनी नजर उस तरफ डालती है जहां राजकुमारी स्वर्णप्रभा, अपनी माता के साथ बैठी हुई थी, चंद्रिका का प्रस्ताव सुन वहां मौजूद सभी लोग आपस में बात करने लगते है और स्वर्णप्रभा भी अपनी गुस्से भरी नजरों से चंद्रिका को ही देख रही थी. चंद्रिका राजकुमारी को देखते हुए एक कुटिल मुस्कान से आगे कहती है" यदि हमारे राजकुमार चाहते तो आपका हरड कर या ताम्रवती से युद्ध में आपको जीत कर भी, अपनी वधू बना सकते थे किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि उन्हें आपको मान सम्मान के साथ आपका वरण करना था इसलिए उन्होंने ये विवाह का प्रस्ताव भेजा" चंद्री अपनी बात को जारी रखते हुए आगे कहती है" तो राजकुमारी आपके लिए और आपके राज्य के लिए थी अच्छा होगा कि आप इस विवाह प्रस्ताव को स्वीकार कर ले" चंद्रिका की बातों में चेतावनी साफ दिख रही थी क्योंकि उसका मकसद ही था ताम्रवती के लोगो में भय पैदा करना. चंद्रिका का ये दुस्साहस देख राजकुमारी, अपनी जगह से खडी हो कर गुस्से में अपनी मुठ्ठी बांधे उससे कहती है" बस करें गुरुमा आपकी बातों से यहां कोई भयभीत नहीं होने वाला और रही बात हित की तो हमें अच्छे से ज्ञात है कि हमारा हित किसमें है" इतना कह कर राजकुमारी, अपने पिता की तरफ देखते हुए आगे कहती है" एक पिता और राज्य के राजा होने के नाते आप जो भी फैसला लेंगे वो राज्य के हित में होगा इसलिए हम आपके हर निर्णय में आपके साथ है" इतना कह राजकुमारी, वहां बैठे सभी लोगों को देखती है और अपनी बात रखते हुए आगे कहती है" मै अपना निर्णय अपने पिता श्री और राज्य के वासियों को सौंपती हूं, आप सभी जो भी निर्णय लेंगे मुझे वो स्वीकार होगा" राजकुमारी अपनी बात कह, गुस्से भरी नजर गुरू मां पे डालती हैं और फिर अपनी जगह पे बैठ जाती है, तो वहीं चंद्रिका राजकुमारी की बातों से बहुत क्रोधित लग रही थी जिससे वो आंखों में कोध लिए, अपनी बात रखते हुए कहती है" सही कहा राजकुमारी ने, आपको एक पिता होने से पहले एक राजा की तरह सोचना चाहिए, आपका एक गलत निर्णय पूरे राज्य को श्मशान बना सकता है इसलिए सोच समझ कर फैसला लीजिए गा राजा साहब" अपनी बात कह चंद्रिका अपने स्थान पे पुनः बैठ जाती है, इस समय उस दरबार में इतने लोगों के मौजूद होने के बाद भी, वहां सन्नाटा फैला हुआ था सब एक दूसरे को ही देख रहे थे तभी राजा देवव्रत, जो ताम्रवती के सिंहासन पे बैठे वहां मौजूद सभी को देख कहते है" ये सिर्फ मेरी पुत्री के विवाह या उसके भविष्य की बात नहीं जिसका निर्णय मैं अकेले ही कर लूं, इस निर्णय से हमारे राज्य का भविष्य जुडा हुआ है इसलिए मैने आप सबको यहां आमंत्रित किया है क्योंकि राजकुमारी से जुडा फैसला हम सभी के लिए और इस राज्य के लिए अति महत्वपूर्ण है" इतना कह राजा कुछ क्षण रुकते है और फिर आगे कहते है" इसलिए सबसे पहले मैं अपनी जनता का मत जानना चाहता हूं" और अपने मित्र राज्यों के राजाओं और मंत्रियों को देख उनसे कहते है" आप सब भी एक मित्र की भांति ही मुझे अपनी राय दे तभी वहां मौजूद एक आदमी की आवाज आती है जो ताम्रवती की आम जनता के साथ खडा था" हम अपनी राजकुमारी को ऐसे राज्य कैसे भेज सकते है राजा साहब जहां रोशनी, अच्छाई और ईश्वर का कोई वास ही नहीं है" तभी उनमें से एक बुजुर्ग व्यक्ति की आवाज आती है जो कहता है" हां राजा साहब, राजकुमारी सिर्फ इस राज्य की राजकुमारी नहीं बल्कि हमारी पुत्री समान है और हम उन्हें ऐसे राज्य में नहीं जाने देंगे जहां सिर्फ काली शक्तियों का राज चलता हो और हर तरह सिर्फ मातम और चीखें ही सुनाई देती हो और फिर सभी एक साथ कहते है" हमें ये विवाह प्रस्ताव स्वीकार नहीं है राजकुमारी को हम वहां नहीं जाने देंगे" उन सबकी बात सुन राजा देवव्रत को आने हृदय में बहुत ही प्रसन्नता महसूस होती है क्योंकि एक पिता होने के नाते वो कभी नहीं चाहेंगे की उनकी पुत्री ऐसे राज्य में जाए जहां के लोग छल कपट से घिरे हो. राजा देवव्रत अपनी नजर अपने मंत्री और मित्र राजाओं की तरफ करते है तो उनमें से एक मंत्री कहता है" यदि हमने इस विवाह प्रस्ताव से इनकार किया तो हमें युद्ध का सामना करना पडेगा जिसमें सिर्फ और सिर्फ हमें हानि ही होगी" तभी दूसरा मंत्री अपनी राय रखते हुए कहता है" हम कायर नहीं जो युद्ध से डर जाए किंतु हम ऐसी सुख समृद्धि का क्या करेंगे जब इस राज्य की राजकुमारी का पूरा जीवन और उनकी प्रसन्नता ही डर के साए में रहेगी" तभी एक मित्र राज्य के राजा भी अपनी राय देते हुए कहते है" एक पिता कभी ये नहीं चाहेगा कि उसकी पुत्री ऐसे इंसान के साथ विवाह के बंधन में बंधे जो पूरे संसार में सबसे क्रूर और निर्दयी हो, जिसे काली शक्तियों में महारथ हासिल हो जो किसी को मृत्यु देने से पहले एक बार भी न सोचे, ऐसे व्यक्ति के साथ राजकुमारी कभी प्रसन्न नहीं रह पाएंगी और जब आपकी जनता आपके साथ हैं तब आपको अत्यधिक विचार न करते हुए अपना निर्णय, अतिथियों को बता देना चाहिए" इतना कह वो राजा अपने स्थान पे पुनः बैठ जाते है और फिर ऐसे ही न जाने कितने मत वहां रखे जाते है जिसे सुन राजा एक निर्णय पर पहुंचते है क्या निर्णय होगा राजा देवव्रत का? क्या राजकुरी, इस विवाह प्रस्ताव को स्वीकार करेगी?

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