तेरे इश्क़ में जोगी Ch. 2

तेरे इश्क़ में जोगी - Chapter 2

Posted by Siya • Aug 30, 2026 11:39 AM

एक छोटा-सा घर था, दोपहर का समय। और एक लड़की डूबी हुई थी अपनी दुनिया में। अमृता लैपटॉप बंद करके चुपचाप बालकनी में बैठी थी। चेहरा थका हुआ था, आंखों में निराशा झलक रही थी। भाभी चाय लेकर आई।

भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा।लो, चाय पी लो... सुबह से देख रही हूं, बस स्क्रीन में आंखें गड़ाए बैठी हो।

भाभी... अब तो समझ नहीं आता क्या करूं। जहाँ भी अप्लाई करती हूं, या तो "ओवरक्वालिफाइड" कह देते हैं,या"एक्सपीरियंस कम"।

भाभी कप रखकर उसके पास बैठ गई।ये जो "कम" और "ज्यादा" कहते हैं ना, वही लोग बाद में तुम्हें पाने के लिए लाइन में लगेंगे। बस वक्त की बात है, अमृता।

अमृता ने उसी थकी मुस्कान के साथ कहा।लेकिन भाभी, इतनी पढ़ाई करने के बाद भी जब खुद की काबिलियत किसी को दिखा नहीं पाती... तो लगता है शायद मैं ही कुछ गलत कर रही हूं।

भाभी ने प्यार और अपने पन के साथ धीरे से उसका हाथ थामते हुए कहा।नहीं पगली, तेरे अंदर कोई कमी नहीं है। तेरी किस्मत अभी लाइन में है, बस थोड़ी देर से आएगी।

और सुन, नौकरी ढूंढने से पहले खुद पर भरोसा मत खो देना। दुनिया में लाखों नौकरी हैं, पर अमृता जैसी मेहनती लड़की एक ही है।

अमृता की आंखें नम होकर रह गई।आपको तो हमेशा सब सही कहना आता है, भाभी...

अरे, सही नहीं कहती... बस याद दिलाती हूं, कि तू खुद भी कितना खास है।

चल अब, ये चाय खत्म कर , और अगला आवेदन भेजो। कौन जाने किस में तुम्हारी मंज़िल छिपी हो। अगले कदम पर तकदीर ने तुम्हारे लिए क्या लिखा हो।

अमृता ने गहरी सांस लेकर सिर हिलाया, मुस्कुराने की कोशिश की। हवा में थोड़ी उम्मीद घुल गई। शायद........ यह शायद ही तो उन्हें अब तक जोड़े हुए था, उन्हें हिम्मत से बांधे हुए था। इस शायद के पीछे ही तो वह अपना छोटा सा शहर छोड़ कर इस बड़े शहर तक आई थी। इसी में तो उन तीन लोगों का परिवार बंधा हुआ था ,यह शायद ही उन्हें जीने की रोशनी दे रहा था। यह एक छोटा सा शब्द बहुत कीमती था उनके लिए।

मुंबई की ऊँची इमारतों के बीच सूरज की पहली किरण जब समर्थ राजपूत के पेंटहाउस के शीशे पर पड़ी, तो पूरा कमरा सुनहरी चमक से भर उठा।सामने समुद्र की लहरें दिख रही थी, लेकिन समर्थ की आँखों में कोई ठहराव नहीं,बस खालीपन था।

देर रात क्लब में पार्टी करके वह देर से सोया था ,लेकिन अब उठकर ऑफिस के लिए तैयार था।

वह नंगे पाँव बालकनी में खड़ा था, हाथ में कॉफी मग और दूसरे हाथ में मोबाइल।फोन पर स्टॉक मार्केट, बिजनेस मेल, और मॉडल्स के मैसेज,तीनों साथ चल रहे थे।उसे सब मिला था , नाम, पैसा, शोहरत... बस कोई अपनापन नहीं। उसका दोस्त सही ही कहता था कैसेनोवा के अलावा उसमें और कोई कमी नहीं थी।

डोरबेल बजी।मैनेजर अंदर आया ।बोस आपकी कार तैयार है, आज नया प्रोजेक्ट साइन करना है।”

“Hmm…”  समर्थ ने बस इतना कहा, और धूप में खड़े होकर अपने बाल पीछे किए।

समर्थ की सुबह इतनी खास और आलीशान थी,उतनी ही जटिलताओं से भरी हुई सुबह किसी और की थी"अमृता की सुबह" हमेशा ऐसे ही होती।

शहर के दूसरे छोर पर, एक छोटे से किराए के घर में अमृता अपनी भतीजी रिया को स्कूल के लिए तैयार कर रही थी। रोज यही होता था।

भाभी किचन में थी, चेहरा थका हुआ, लेकिन दिल सख्त।अमृता की भाभी का दिन चाय, सिलाई, और संघर्ष से शुरू होता था। और अमृता का नौकरी और नौकरी ढूंढने की भागदौड़ में.....

बुआ, आप स्कूल क्यों नहीं जातीं?”  रिया ने पूछा।

“मैं अब बड़ी हो गई हूं ना, मुझे काम करना है।”  अमृता मुस्कुरा कर बाल संवारती रही।

मैं पढ़ने की नहीं पढ़ाने की बात कर रही हूं। ऐसे जवाब दे रहे हैं, जैसे मैं छोटी बच्ची हूं कुछ नहीं जानती।वह 10th में थी ।और रोज अमृता ही उसके बालों की चोटी बनाती थी ।अमृता की आंखों में कुछ आया ,और गया।

बस यूं ही, नई जॉब की तलाश में हूं ।शायद उससे बेहतर कुछ मिले, और फिर एनजीओ का काम तो है ही.....

अच्छा उसके लिए भी आपको सैलरी मिलती है ।अमृता ने उसके सिर पर होने से चपत लगाई।

बहुत बातें आती है तुम्हें ,

और आपको बिल्कुल नहीं आती ,ठीक से बनाओ, बाल खींच रहे हैं मेरे ......

जी राजकुमारी.....वह उसे नहीं बताना चाहती थी, कि पिछले कुछ दिनों में उसके साथ क्या हुआ।

और वो ये भी नहीं जानती ,कि उसकी ज़िंदगी अब जिस शख्स से टकराने वाली है...जिसकी दुनिया में प्यार एक मज़ाक है, और रिश्ते एक खेल।

शाम का वक्त था।साउथ मुंबई का सबसे एक्सक्लूसिव क्लब , “Aurora Sky Lounge।”यहाँ हर कोई Samarth Rajput को जानता था।वो जैसे ही अंदर आया , पूरा माहौल बदल गया।

DJ ट्रैक बदल दिया गया, लोगों ने निगाहें उसकी ओर मोड़ ली।समर्थ ,ब्लैक शर्ट, ओपन कॉलर, हल्की दाढ़ी, और वही आत्मविश्वास जो हर चीज़ को अपने क़ाबू में रखता था।

हाथ में ग्लास, होंठों पर हल्की मुस्कान, और आँखों में एक बेमानी ठहराव। वहां का माहौल कुछ अलग ही था ,और सेम इसको हमेशा और ही रंग दे देता ।

यह शुरुआत होती और जाते वक्त हाथ एक हसीना के हाथों में होता ,और फिर रात खत्म होने के साथ-साथ वह रिश्ता भी खत्म।

“Hey Sam! Long time, man!”

“Work keeps me busy, you know that.”

हँसी के साथ जवाब दिया, लेकिन उसके अंदर कोई सच्ची हँसी नहीं थी।सब कुछ दिखावटी बनावटी था।

हर टेबल पर कोई न कोई लड़की उसकी तरफ़ देख रही थी,

किसी के साथ डिनर, किसी के साथ डांस, किसी के साथ बस एक शाम का रिश्ता।लेकिन किसी के साथ दिल नहीं।यह हमेशा का था। हर कोई चाहता कि काश सेम की निगाह उस पर पड़े, और एक रात की मोटी आमदनी वह कमा ले ।वहां आने वाली लगभग लड़कियों का यही नजरिया था। वह जान बूझ कर ऐसे ही क्लब में जाता ।जहां उसकी अय्याशी पर कोई रोक-टोक नहीं हो, कोई लगाम न लग सके।

क्लब की बालकनी में खड़ा होकर वो शहर की लाइट्स देख रहा था।नीचे ट्रैफिक की भीड़, ऊपर तारों की ख़ामोशी।और वो खुद , दोनों के बीच फँसा एक अकेला आदमी। आसपास हुस्न था, जो उसे बेहद पसंद था। और यह हुस्न हीं हर रात का उसका साथी होता ,और वह अकेलेपन को कुछ देर के लिए कुछ हद तक कम कर लेता।

“You’ve got everything, Sam,” उसके बिज़नेस पार्टनर ने कहा।

“Yeah,”  समर्थ मुस्कुरा दिया,“बस... कुछ समझ नहीं आता कि इतना सब कुछ होते हुए भी, सुकून क्यों नहीं मिलता।”

उसका फ्रेंड सर्कल भी उसी की तरह था। बस एक दो वफादार दोस्त को छोड़कर ,बाकी हर कोई उसके पैसे पर ऐश करना चाहता था ।यहां तक की उसके बिजनेस फ्रेंड्स भी, और डील निकलवाने का उसका अपना तरीका था ।जिससे खास कर उसके इर्द-गिर्द ऐसे ही लोग जमा होते थे।

अब पूरी रात वह बातों में नहीं गुजरना चाहता था ।इसलिए उसने अपना अगला कदम उठाया ,जो कि अमूमन वह उठा ही लिया करता था।

शहर के एक हाई-एंड क्लब में अब समर्थ की निगाह अपने लिए साथी तलाश रही थी। यूं तो लड़कियां खुद उसे अप्रोच करती, लेकिन वह किसके साथ जाने का इच्छुक है ।यह चुनाव उसका खुद का होता ।और वह इसी तरह नजरों में तोल कर अपने लिए एक **** सेलेक्ट कर लेता। उसके लिए यही नजरिया था, इससे ज्यादा वह कोई और रिश्ता ना समझता था ,ना मानता था।

संगीत, रोशनी और भीड़ के बीच समर्थ राजपूत का अंदाज़ वही है , बेफिक्र, स्टाइलिश और थोड़ा अय्याश असल में बहुत ज्यादा।

डीजे की धुन पर लोग अब भी नाच रहे थे। समर्थ एक कोने में व्हिस्की का ग्लास लिए बैठा था। उसकी आंखों में ठंडा आत्मविश्वास नजर आ रहा था, जैसे ज़िंदगी उसके लिए सिर्फ एक खेल हो।

तभी उसके पास एक ग्लैमरस औरत आई ,जिया। हंसी में तेज़ी, लहजे में नशा। और मुस्कुराहट जानलेवा। और समर्थ को मानो इसी का इंतजार था।

आप हर बार ऐसे अकेले क्यों बैठते हो, मिस्टर राजपूत?किसी का इंतज़ार है या बस सबका ध्यान अपने ऊपर?

समर्थ ने हलक़ी मुस्कान के साथ कहा। उसकी खुद की मुस्कुराहट कातिलाना थी।ध्यान तो वैसे भी सबका रहता है, जिया।मुझे बस रात थोड़ी दिलचस्प चाहिए।

दोनों के बीच बातचीत हुई ...हल्की, लेकिन फ्लर्ट से भरी। कभी उनकी हंसी दिखाने लायक थी, कभी समर्थ की आंखों में झलकता खालीपन। आखिर बातचीत ख़त्म हुई।

देर रात नज़ारा बदल गया था, होटल की लॉबी में दोनों नज़र आए। दोनों अंदर गये। रोशनी धीमी थी, नशा जैसे उनके पीछे-पीछे चल रहा था।

दरवाज़ा बंद हुआ और इंतजार बाहर ही ठहर गया। खिड़की के शीशे में शहर की रोशनी झिलमिला रही थी। संगीत धीरे-धीरे थम गया था। लेकिन उस नीम अंधेरे कमरे में किसी की सांसों का शोर था, किसी की आहों का। और यह सिलसिला सुबह होने तक चलता रहा।

समर्थ अकेला खिड़की के पास खड़ा था। सिगरेट का धुआं हवा में उड़ रहा था। बेड पर जिया अब भी सो रही थी। लेकिन समर्थ की आंखों में कोई सुकून नहीं , बस एक खालीपन, जैसे हर रात उसे और भीतर से खोखला कर रही हो।

पता नहीं... ये सब जीतने के बाद भी क्यों लगता है कि कुछ हार गया हूं। कहीं वैभव की बात सच न हो जाए। एक अंदेशा मन में उठा। और उसकी आंखें एक अनजाने खौफ के तहत पल में बंद हुई।

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