तेरे इश्क़ में जोगी Ch. 3

तेरे इश्क़ में जोगी - Chapter 3

Posted by Siya • Aug 30, 2026 05:23 PM

अमृता कमरे में अकेली थी। लैपटॉप खुला था, लेकिन स्क्रीन पर नज़र नहीं थी। खिड़की से आती हल्की हवा उसके बालों को उड़ा रही थी। तभी मोबाइल की रिंग बजी।

अमृता ने थोड़ा झुंझलाते हुए कहा।अब कौन होगा…?  हेलो?

आवाज़ ने फोन पर, प्रोफेशनल लहजे में उसके मन को सुकून सा दिया।

हैलो, मिस अमृता ? मैं रिद्धिमा तनेजा बोल रही हूं, Arista Group से। आपने कुछ दिन पहले कंटेंट स्ट्रेटेजिस्ट के लिए अप्लाई किया था?

अमृता चकित होकर सीधी बैठ गई।

जी... जी हां, किया था। पर मुझे लगा उस पोस्ट के लिए तो बहुत एक्सपीरियंस चाहिए था।

हमने आपका पोर्टफोलियो देखा है। कुछ चीज़ें अलग लगीं। क्या आप कल एक वर्चुअल इंटरव्यू के लिए फ्री हैं?

अमृता थोड़ी देर चुप रही, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली।हाँ, मैं फ्री हूँ। कल सुबह… किस समय?

साढ़े दस बजे। मेल पर डिटेल भेज रही हूँ।ऑल द बेस्ट, मिस अमृता।

कॉल कट हुई। अमृता कुछ देर तक फोन को देखती रही जैसे यकीन न हो। फिर मुस्कुराकर खुद से बुदबुदाई।

शायद… वक्त सच में लाइन में था।

भाभी कमरे में आई। उनके चेहरे पर स्नेह भरी जिज्ञासा थी।

कौन था? चेहरा तो ऐसे चमक रहा है जैसे रिजल्ट आ गया हो।

अमृता ने हंसते हुए, आँखों में चमक के साथ कहा।भाभी... Arista Group से कॉल आया है। इंटरव्यू है कल सुबह!

भाभी ने खुश होकर उसका माथा चूम लिया।देखा! मैंने कहा था ना , किस्मत देर से आती है, लेकिन खाली हाथ नहीं जाती।

अमृता हंसते हुए भाभी से लिपट गई। उम्मीद, प्यार और एक नई शुरुआत की आहट के साथ वह हमेशा एक दूसरे के लिए सहारा बनी थी।

वो शांत सी खड़ी कुछ सोच रही थी जब रिया अमृता के पास आकर चुपचाप बैठ गई। शायद आज मन कुछ भारी था।वो खुश थी या भावुक या परेशान..... उसे नहीं मालूम... एक मिला जुला सा एहसास था। एक अनकहा डर, एक अनसुना सच..... एक भावना जो अमृता पर हावी हो रही थी। और वो नहीं जानती थी कि वह क्या और कैसी भावना थी?इसी उधेड़बुन में खोई हुई थी।

थोड़ी देर बाद रिया बोली।बुआ… आप हमेशा रात को खिड़की के पास क्यों खड़ी रहती हो?

कभी-कभी हवा से बातें करने का मन करता है, रिया।

हवा कुछ नहीं पूछती… बस सुन लेती है।अमृता ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

तो क्या मैं भी आपकी बातें सुन सकती हूँ?रिया ने मासूमियत से पूछा।

तुम तो वो हो, जो बिना कहे भी सब समझ जाती हो।अमृता ने रिया के बाल सहलाते हुए कहा।

आप दुखी हो न, बुआ?

अमृता एक पल चुप हो गई।दुखी नहीं… बस थकी हुई हूँ।

कुछ सपने हैं जो रोज़ उठकर फिर चलने को कहते हैं।

पापा कहते थे, आप बहुत मज़बूत हो।

मज़बूत होना कोई शौक नहीं होता, रिया।कभी-कभी मजबूरी होती है।अमृता ने धीमे स्वर में कहा।

तो जब आप थक जाओ, मैं आपकी ताक़त बन जाऊँ?रिया ने अचानक गले लगते हुए कहा।

अमृता की आँखें भर आई।तुम्हारे होते हुए… मैं हार ही कैसे सकती हूँ?

रिया मुस्कुरा दी, जैसे उसे दुनिया का सबसे बड़ा जवाब मिल गया हो।

रसोई में चाय उबल रही थी।अमृता सब्ज़ी काटते हुए खामोश थी।

भाभी उसे देख रही थी,काफ़ी देर से।

अमृता… हाथ रुक-रुक कर क्यों चल रहे हैं आज?

अमृता हल्का सा हँसी ।थोड़ा मन भारी है, भाभी।सब्ज़ी नहीं, शायद यादें कट रही हैं।

भाभी ने चूल्हा धीमा कर दिया।घर में रहकर भी तुम घर में नहीं रहती हो। क्या हुआ है?

अमृता ने चाकू रख दिया।कभी-कभी अपने होने के लिए

थोड़ा दूर रहना पड़ता है।

भाभी ने धीमे मगर दृढ़ स्वर में कहा।जोब को लेकर… अब भी डर लगता है तुम्हें?अमृता की आँखें झुक गई।

डर नहीं है, भाभी।बस भरोसा करना भूल गई हूँ।

सब मर्द एक जैसे नहीं होते।

अमृता ने कड़वी मुस्कान के साथ कहा।और कुछ औरतें हर बार उम्मीद करके ख़ुद को खो देती हैं।भाभी ने अमृता का हाथ थाम लिया।

मैं तुम्हें बेटी की तरह मानती हूँ।अगर कभी लगे कि तुम अकेली हो।तो याद रखना, ये घर तुम्हारा है।अमृता की आवाज़ भर्रा सी गई।

घर तब घर लगता है, भाभी,जब कोई बिना सवाल किए साथ खड़ा हो।

तो आज से… सवाल बंद।बस साथ रहेगा।

चाय उबलकर आवाज़ कर रही थी,और रसोई में पहली बार

खामोशी सुकून बन गई थी।बस वो तीन ही तो थी एक दूसरे का सहारा......पर आज अमृता पर कुछ असर नहीं कर रहा था। कुछ था जो उसे रोक रहा था।

शहर की ऊँची इमारत…नीचे रोशनी, ऊपर शोर।समर्थ के पेंटहाउस में संगीत तेज़, बेखौफ हँसी, ग्लासों की टकराहट, और बेपरवाह क़दमों की आवाज़ें।बस इस तरह की रातें अक्सर आती थी।

समर्थ सोफ़े पर आधा लेटा था।कलाई पर महँगी घड़ी, उँगलियों में ड्रिंक,आँखों में वो नशा, जो खुशी नहीं, आदत से आता है।

कोई उसके कंधे पर झुककर कुछ कहती।वो मुस्कुराता ,वही अभ्यास की हुई मुस्कान।इठलाना.... शर्माना....इतराना..... और बेहयाई भी।

वो नाम पूछना भूल जाता है… या पूछना ज़रूरी नहीं समझता। लेकिन हुस्न का सहारा उसे हर रोज़ चाहिए था।

रातें बदल जाती हैं, चेहरे बदल जाते हैं।पर सुबह वही सन्नाटा लौट आता है। और एक नया समर्थ भी।

बालकनी का दरवाज़ा खुला था।हवा भीतर आ रही थी, जैसे पूछ रही हो।“आज किससे भाग रहे हो?”

समर्थ ने ग्लास रख दिया।भीतर का शोर अचानक बेमानी लगने लगा ।

उसका फोन वाइब्रेंट किया।एक पल को स्क्रीन देखी।और फिर उल्टा रख दिया। इस वक्त उसे दोस्त की नहीं, एक **** की जरूरत थी।

कभी-कभी लगता है,मैं लोगों से नहीं,अपने ख़ालीपन से घिरा हूँ।रात आगे बढ़ती है।हँसी गूंजती रहती है।पर मेरी आँखों में

हर बार एक अलग थकान उतर आती है।वो बुदबुदाया।

अय्याशी की इस रात में भी,वो अकेला था, बस पहले से ज़्यादा। और सोच में डूबा हुआ।न जाने मन में क्या चल रहा था? क्या आरज़ू थी? किसकी जुस्तजू थी?

रात आधी से ज़्यादा ढल चुकी थी।कमरे में हल्की पीली रोशनी थी,परदे हवा के साथ सांस ले रहे थे।लैला खिड़की के पास खड़ी थी।उसका आज रात का सहारा....

पीठ समर्थ की ओर थी।जैसे जानबूझकर दूरी रखी हो।समर्थ उसके पास आया,इतना क़रीब कि उसकी मौजूदगी महसूस हो।

पर स्पर्श अभी भी सवाल बना रहा था।

लैला ने धीमे से पूछा।तुम हर किसी के पास ऐसे ही आते हो?

समर्थ एक पल रुका।नहीं।कुछ लोगों के पास… मैं खुद को भूलने आता हूँ।

लैला मुड़ी।उनकी आँखें मिली।इस बार बिना खेल, बिना मुस्कान।लैला ने उसकी उँगलियों को थाम लिया।

वो पकड़ नहीं।एक इजाज़त थी।

समर्थ की सांसें गहरी हो गई।लैला ने उसके कंधे पर सिर रख दिया।नज़दीकी इतनी कि दिल की धड़कनें टकरा जाएँ।

लैला,आज रात…तुम भागना मत।समर्थ ने उसकी पेशानी से हल्का सा माथा टिकाया।

लैला अचंभित हो कर मुड़ी। इसका क्या मतलब?वो सोच रही थी।वो एक शरारती हंसी हंस दिया। लेकिन उसने कोई वादा नहीं किया बस वहीं रुक गया।

बाहर शहर जाग रहा था,अंदर दो लोग अपनी-अपनी तन्हाई के साथ एक ही पल में सिमट आए थे।

रात आगे बढ़ी,शब्द कम होते गए,खामोशी गहरी…और नज़दीकी, बिना कहे, अपनी जगह बना ले रही थी।

वो बस भागी नहीं थी।बाकी कोई कसर सैम ने नहीं छोड़ी थी।

सुबह की रोशनी कमरे में बिना इजाज़त घुस आई थी।

परदे आधे खुले थे,जैसे रात का राज़ छुपाना भूल गए हों।

समर्थ की आँख खुली।छत पर टिके उसके सवाल भी।

बगल में लैला जाग रही थी।पीठ उसकी तरफ़,दूरी अब शारीरिक नहीं, भावनात्मक भी थी।

लैला…उसने पुकारा।वो मुड़ी नहीं।

नाम मत लो अभी।

क्यों?सैम ने पूछा।

सुबह में नाम भारी लगते हैं।

समर्थ उठकर खिड़की के पास चला आया।शहर वही था,पर उसके भीतर कुछ बदल गया था।

हर बार लगता है,किसी के पास जाकर मैं खुद से बच जाऊँगा…

और हर सुबह खुद से ही सामना हो जाता है।

पीछे से लैला की आवाज़ आई।तुम रात में बहुत सच्चे लगते हो, समर्थ।सुबह… बहुत दूर।

समर्थ पलटा।मैं कभी वादा नहीं करता।

लैला कड़वी मुस्कान के साथ बोली।और हम हमेशा उम्मीद कर लेते हैं।

वो उठकर अपने कपड़े समेट रही थी।कोई शिकायत नहीं,कोई हंगामा नहीं,बस एक थकी हुई समझ।

दरवाज़े पर रुककर कहा।तुम बुरे नहीं हो…बस खाली हो।

दरवाज़ा बंद हो गया।कमरे में सन्नाटा लौट आया।समर्थ का फोन टेबल पर पड़ा था।स्क्रीन पर एक नाम चमक रहा था।अब उसे **** की नहीं दोस्त की जरूरत थी। और उसने फ़ोन उठा लिया। वैभव.....उसका राजदार, उसका जिगरी यार..... एक सच्ची सी मुस्कुराहट उसके होंठों पर खिल गई।

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