सियासत-ए-इश्क़ (His political bride) - Chapter 1
राजस्थान के गृहमंत्री का निज निवास आज के दिन किसी दुल्हन की तरह सजा हुआ था। हवा में फूलों की खुशबू घुल रही थी। घर के प्रवेश द्वार से लेकर आगे तक, सजावट से लेकर सुरक्षा तक का खास इंतजाम किया गया था। सुरक्षाकर्मी वायरलेस पर धीमी आवाज में बात कर रहे थे। अंदर नेता, व्यापारी, पत्रकार और शहर के जाने-माने लोग जयपुर के गृहमंत्री मानवेंद्र सिंह शेखावत के 50वें जन्मदिन की पार्टी में पहुंचे थे।
अंदर-बाहर हर जगह अच्छी-खासी रौनक लगी हुई थी। पार्टी की भीड़भाड़ से दूर सेकंड फ्लोर की सीढ़ियों के मोड़ पर ऊपर एक लड़की चेहरे पर मुस्कुराहट लिए नीचे की तरफ देख रही थी।
सुर्ख लाल रंग के अनारकली डिजाइनर सूट में उसका गोरा रंग और भी खिलकर उभर रहा था। चेहरे पर मासूम-सी खुशी और आंखों में गर्व की भावना थी। लोगों के लिए मानवेंद्र सिंह शेखावत शहर के गृहमंत्री और एक ताकतवर नेता थे, लेकिन उसके लिए वह उसके पापा थे;वह इंसान, जिस पर वह अपनी जिंदगी में सबसे ज्यादा भरोसा करती थी।
इतनी भीड़ के बीच वह नीचे जाने से हिचकिचा रही थी कि तभी उसे पीछे से मानवेंद्र की नर्म आवाज सुनाई दी, “आज भी नर्वस हो रही हो? हमें तो लगा था कि विदेश में पढ़ने वाले बच्चे ज्यादा कॉन्फिडेंट होते हैं। हमें आज हमारी सिया बिटिया में वही छोटी बच्ची क्यों दिखाई दे रही है, जो भीड़ के बीच जाने से घबराती थी?” उन्होंने सफेद कुर्ता-पायजामा पहना था और उसके ऊपर गहरे नीले रंग की नेहरू जैकेट पहनी थी। उनके चेहरे पर घनी दाढ़ी-मूंछ थी और आंखों में नर्मी झलक रही थी। धीमे कदमों से चलते हुए वह सिया के पास आए।
मानवेंद्र की आवाज सुनते ही सिया तुरंत उनकी तरफ पलटी और मुस्कुराकर बोली, “नर्वस नहीं हो रही... उम्म... ऑनेस्टली थोड़ी हो रही हूं। आई डोंट अंडरस्टैंड कि इतने लोगों के बीच में यह स्पीच दे पाऊंगी या नहीं? क्या इस मोमेंट को हम प्राइवेट रखें?”
“बिल्कुल नहीं... हम सबके सामने यह लम्हा चाहते हैं। लोग भी तो देखें, हमारी बेटी हमें कितना सपोर्ट करती है।” मानवेंद्र ने हल्के अंदाज में कहा। यह बस सिया के कॉन्फिडेंस को बढ़ाने के लिए था, जो विदेश में पढ़ते हुए भी आज भी उसी मासूमियत से भरी हुई थी।
“आप मेरे हीरो हो। जिस तरह जनता आप पर विश्वास करती है, पापा, उसी तरह मुझे आप पर विश्वास है। एक बार के लिए भगवान से गलती हो सकती है, लेकिन आपसे नहीं।” सिया ने मुस्कुराकर कहा। उसकी आंखों में हल्की नमी उतर आई थी, जो इस बात का सबूत था कि वह अपने पापा से कितना प्यार करती है।
“हमें उससे ज्यादा और कुछ नहीं चाहिए। दुनिया भले ही कुछ भी कहे, लेकिन तुम्हें अपने पापा पर भरोसा है ना? जानती हो ना, यह पॉलिटिक्स की दुनिया वैसे भी काफी अजीब होती है। यहां लोग अपने फायदे के लिए हर सही-गलत चीज का इस्तेमाल करते हैं। उम्मीद है कि कुछ लोगों की बात सुनकर तुम्हारी राय नहीं बदली होगी।” इस बार मानवेंद्र ने गंभीर आवाज में कहा।
“मुझे हमेशा आप पर भरोसा रहेगा।” सिया ने मानवेंद्र के गले लगकर कहा।
यही उसकी सबसे बड़ी सच्चाई थी। राजनीति की चालें उसे समझ नहीं आती थीं। वह बस इतना जानती थी कि यहां लोग अपने फायदे के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। कुछ लोग उसके पिता को खतरनाक कहते थे, लेकिन उसके लिए उसके पिता वह आदमी थे, जो गरीबों की मदद करते थे, मंदिर में दान देते थे और हर त्यौहार पर अनाथ बच्चों को खुशियां देने की कोशिश करते थे। आज भी जन्मदिन की सुबह वे लोग काफी सारे अनाथ बच्चों की मदद के लिए पहुंचे थे।
मानवेंद्र सिया से कुछ कहते, इससे पहले किसी ने उन्हें आवाज दी और वह सिया के बालों को सहलाकर चले गए। सिया कुछ पल वहीं खड़ी रही। उसे भी नीचे जाना ही था।
“मुझे कॉन्फिडेंट दिखना होगा।” सिया ने खुद से कहा। उसने तीन-चार बार गहरी सांस लेकर छोड़ी।
वह नीचे जा ही रही थी कि तभी उसे याद आया कि मानवेंद्र और उसकी एक पुरानी फोटो उनके स्टडी रूम में रखी हुई थी। सिया चाहती थी कि स्पीच देते वक्त वह फोटो मंच पर रहे। वह फोटो तब की थी, जब सिया पैदा हुई थी। सबसे पहले मानवेंद्र ने उसे अपनी गोद में लिया था। मानवेंद्र से जुड़ी हर छोटी-सी चीज सिया के इमोशंस से जुड़ी हुई थी।
वह तेजी से गलियारे की तरफ बढ़ते हुए आगे जा रही थी। मानवेंद्र का स्टडी रूम दूसरी तरफ जाकर एक अलग ही हिस्से में बना हुआ था। वहां मेहमानों और आम लोगों का जाना मना था। जरूरी डॉक्यूमेंट और काम से जुड़ी चीजें होने की वजह से वहां घर के लोग भी नहीं जाते थे।
सिया मुस्कुराते हुए आगे बढ़ी। आस-पास कोई नजर नहीं आ रहा था। दीवारों पर पुराने राजस्थानी चित्र लगे हुए थे। कमरे में काफी सारी अलमारियां थीं, जिनमें फाइल्स और किताबें रखी हुई थीं।
सिया जब अंदर गई तो उसे वहां कोई नजर नहीं आया। वह बस तस्वीर लेकर वहां से जाने वाली थी। सिया ने इधर-उधर नजरें दौड़ाईं। फोटो दीवार पर लगी थी, जिसे देखकर वह मुस्कुरा दी।
सिया उसके पास गई और काफी संभलकर उसे उतारा। जैसे ही उसने दीवार से फोटो उतारी, उसकी भौंहें सिकुड़ गईं। उसके पीछे एक अलमारी थी। ऐसा लग रहा था जैसे उस अलमारी को छिपाने के लिए वह फोटो वहां लगाया गया था।
“यह सीक्रेट शेल्फ है क्या?” सिया खुद से बड़बड़ाई और जिज्ञासावश उसने वह खोल ली।
उसमें कुछ फाइल्स रखी थीं। उसने कभी अपने पिता के कागजों में रुचि नहीं ली थी। राजनीति उसे समझ नहीं आती थी और वह अपनी छोटी-सी खुशहाल दुनिया में खुश थी। पर आज वह खुद को उन कागजों को देखने से रोक नहीं पाई। सिया ने फाइल उठाई तो उसमें से कुछ फोटोज नीचे गिर गईं।
“अरे नहीं, यह क्या हो गया?” सिया ने घबराकर कहा।
उसने आसपास देखा तो कोई नहीं था। वह जल्दी से झुककर फोटोज उठाने लगी। उन्हें उठाते वक्त, ना चाहते हुए भी सिया का ध्यान उनकी तरफ चला गया। उनमें कुछ जली हुई झोपड़ियां, भीड़ और लोगों के इधर-उधर भागने की फोटोज थीं। सिया को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर इस तरह की फोटोज कोई क्यों खींचेगा। आखिरी तस्वीर देखते हुए सिया का हाथ वहीं रुक गया। एक औरत जमीन पर गिरी हुई थी। उसके हाथ में बच्चा था। पीछे की तरफ भीषण आग लगी हुई थी। उसे देखकर सिया के सीने में एक अजीब-सा दर्द महसूस हुआ। उसने आंखें बंद कीं। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसने यह दृश्य पहले भी कभी देखा हो।
“इतना अजीब क्यों लग रहा है? और यह सब क्या है?” सिया ने परेशान स्वर में कहा। उसने जल्दी-जल्दी बाकी के पेपर्स उठाए।
सिया उन्हें दोबारा रखना चाहती थी। उसे यह सब नहीं देखना चाहिए था। फाइल को बंद करते टाइम उसकी नज़र उस पर लिखे मोटे अक्षरों पर गई;
जैसलमेर दंगा केस - निजी रिकॉर्ड
उसे देखकर सिया की सांस अटक गई। उसे अच्छे से याद था कि 15 साल पहले राजस्थान के जैसलमेर इलाके में दंगा हुआ था। उसके पापा ने बताया था कि वह बहुत ही दुखद घटना थी और उन्होंने राहत कार्य में बहुत मदद की थी। उस समय सिया मुश्किल से 6 साल की रही होगी, इसलिए उसे कुछ याद नहीं था। बस हां, उसे कभी-कभी आग और धुएं के सपने आते थे।
“क्या यह उन दंगों से जुड़ी फाइल है?” सिया खुद से बोली।
उसने उसे खोला। सिया आज वह कर रही थी, जो उसे गलती से भी नहीं करना चाहिए था। फाइल के पहले पेज पर कुछ नामों की एक सूची बनाई हुई थी। कुछ नामों पर निशान लगे हुए थे। अगला पेज बदलने पर वहां लिखा नाम देखकर उसकी आंखें बड़ी हो गई थीं;
“पृथक सिंह राठौड़।” सिया ने धीरे से पढ़ा।
वह नाम उसने पहले भी सुना था। पिछले कुछ महीनों से हर समाचार चैनल पर वह आदमी उसके पिता के खिलाफ बोल रहा था। विपक्ष का सबसे तेज चेहरा। उम्र सिर्फ 28 साल, लेकिन फिर भी उसके बारे में एक बात प्रचलित थी कि उसकी मुस्कुराहट और बातें अच्छों-अच्छों का मुंह बंद करवा देती हैं। सिया को वह आदमी बिल्कुल पसंद नहीं था। उसे यही लगता था कि पृथक उसके पिता की छवि खराब करना चाहता है।
“इस आदमी का नाम यहां क्यों लिखा हुआ है? क्या यह उसमें इन्वॉल्व था? पर उस टाइम यह भी बच्चा रहा होगा? जो भी हो, यह शख्स किसी लायक नहीं है। जरूरी नहीं कि इंसान की शक्ल अच्छी हो तो उसके काम भी अच्छे हों। जब देखो जहर उगलता रहता है।” सिया गुस्से में बोली।
सिया ने जल्दी से उन सबको समेटकर वहां रख दिया था, लेकिन तभी उसकी नजर फाइलों के नीचे रखे एक बॉक्स पर गई। वह चांदी का बॉक्स था, जिसे काफी छिपाकर रखा गया था। सिया ने उसे खोलकर देखा तो उसके अंदर एक पेन ड्राइव थी। वह उसे देख ही रही थी कि तभी बाहर से आवाज आई।
“गृहमंत्री जी ने कहा है कि सिक्योरिटी का ध्यान रखना है। गलती से भी कोई इस तरफ नहीं आना चाहिए।” बाहर से एक आदमी की आवाज आई। उसे सुनकर सिया अपनी जगह पर जम गई।
“ओह नो... पापा को बिल्कुल पसंद नहीं है, अगर कोई उनकी परमिशन के बिना इस एरिया में आ जाए।” सिया ने हड़बड़ाकर कहा।
वे दोनों आगे पहुंचे तो कमरे का दरवाजा खुला था। इसका मतलब साफ था कि कोई अंदर है। वे दोनों सतर्क हो गए थे।
“अंदर कोई है।” दूसरा आदमी बोला।
“तुम्हारा ध्यान कहां रहता है? तुम्हें बोला था यहां से एक मिनट के लिए भी नहीं हटना है। जाकर चेक करो। मेहमानों के साथ कोई आ सकता है। अगर कोई अंदर गया भी है, तो उसे बाहर नहीं निकलने देना है। गृहमंत्री जी को तुम्हारी लापरवाही का पता चला तो अच्छा नहीं होगा।” पहली आवाज ने गुस्से में कहा।
उनकी बातें सुनकर सिया के हाथ से पेन ड्राइव नीचे गिरते-गिरते बची, लेकिन उसने तुरंत ही उसे अपनी मुट्ठी में कसकर बंद कर लिया।
जैसे-जैसे वे बोल रहे थे, सिया के दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी। वह किसी गलत काम के लिए अंदर नहीं आई थी, लेकिन इस वक्त वह एक सीक्रेट शेल्फ को खोलकर फाइल्स के साथ खड़ी थी; उसे कोई भी गलत समझ सकता था।
“मुझे उनके आने से पहले जाना होगा।” सिया ने खुद से बड़बड़ाकर कहा और इधर-उधर देखा।
उसका पूरा बचपन इसी घर में बीता था, इसलिए सिया अच्छे से जानती थी कि उसे वहां से बाहर निकलने के लिए क्या करना था। दूसरी तरफ पीछे का दरवाजा बना हुआ था, जो उसे सीधे वहां से बरामदे की तरफ ले जाने वाला था। सिया ने हड़बड़ाहट में अलमारी को वैसे ही छोड़ दिया था और उसका ध्यान तक नहीं गया कि पेन ड्राइव अभी भी उसकी मुट्ठी में कैद है। वह काफी घबरा गई थी। सिया अपने पापा की नजरों में यह साबित नहीं करना चाहती थी कि उसे उन पर यकीन नहीं है। इससे पहले कि कोई आता, वह जल्दी से दूसरे दरवाजे की तरफ बढ़ गई थी। उसका दिल डर के मारे जोरों से धड़क रहा था।
वहीं तुरंत ही वे दोनों आदमी अंदर आ गए थे। उनकी नजर सबसे पहले टेबल पर रखी फोटो पर गई और फिर उस अलमारी पर। पहला आदमी जल्दी से अलमारी की तरफ गया, उसने उस चांदी की डिब्बी को देखा जो खाली थी। उस खाली डिब्बी को देखकर उसके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आई थीं।
“पेन ड्राइव गायब है। कोई यहां आया है। वह यहीं कहीं होगा। ढूंढो उसे!” वह जोर से चिल्लाया।
इसी बीच उन्हें किसी के पायल और चूड़ियों की खनखनाहट सुनाई दी। दौड़ते हुए सिया का दुपट्टा अटक गया था, और उसे निकालने की कोशिश में वह पकड़ी गई थी।
“पीछे के दरवाजे की तरफ...” दूसरे आदमी ने इशारा किया।
घबराहट के मारे सिया उसे खुला छोड़ गई थी। उसने अपने साथी को उस दरवाजे की तरफ इशारा किया और कहा, “वह यहीं थी। वह यहां से गई है। उसे पकड़ो! किसी भी हाल में वह लड़की यहां से बाहर नहीं निकलनी चाहिए। उस लड़की से ज्यादा उसने जो लिया है, वह कीमती है। और जिस तरह से वह भागी है, जाहिर-सी बात है कि वह इस सबूत को मंत्री जी के खिलाफ इस्तेमाल करने वाली है। चाहे तो जान ले लेना, लेकिन पेन ड्राइव हमारे पास होनी चाहिए।”
इतना कहते ही उन दोनों ने अपनी रिवॉल्वर बाहर निकाल ली थीं। चारों तरफ जहां रौनक लगी थी, वहां किसी को अंदाजा भी नहीं था कि सिया इस वक्त अपनी जान बचाकर अपने ही घर से चोरों की तरह भागने की कोशिश कर रही थी। उनकी बातें सुनकर सिया को सदमा-सा लग गया था। वे लोग किसी सबूत और पेन ड्राइव की बात कर रहे थे। क्या वह इतना कीमती था कि वे उसके लिए किसी की जान तक लेने के लिए तैयार थे? क्या इसी वजह से उसे इस तरह छिपाकर रखा गया था और इसके पीछे मानवेंद्र का हाथ था? यह ख्याल ही सिया के रोंगटे खड़े कर रहा था।
सिया डरते हुए जल्दी-जल्दी अपना दुपट्टा निकालने की कोशिश कर रही थी कि इस बीच वह लोग बाहर पीछे दरवाजे से बाहर आ गए थे। उनकी नजर सामने सिया की तरफ गई।
“सिया मैडम।”
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क्या होगा सिया के साथ और कौन है यह पृथक सिंह राठौड़? क्या सच में सिया अपने पिता के बारे में जो सोचती है, वह सच है या फिर सच पेन ड्राइव में छिपा हुआ है? जानने के लिए पढ़ते रहिए। यह पहला चैप्टर है, तो प्लीज सारे रिव्यूज देकर जाना। उमीद है, आपको ये नया कॉन्सेप्ट और ये प्यारी सी लव स्टोरी पसंद आएगी, वैसे भी पिंजर के बाद मुझे किसी ने पॉलिटीशियन पर लव स्टोरी लिखने को कहा था।