सियासत-ए-इश्क़ (His political bride) Ch. 2

सियासत-ए-इश्क़ (His political bride) - Chapter 2

Posted by Jahnavi Sharma • Aug 31, 2026 08:01 PM

सिया ने हाथ में अभी भी पेन ड्राइव कसकर पकड़ा हुआ था। उसके सूट का टुकड़ा बाहर रेलिंग में अटक गया था। वह नहीं जानती थी कि उसने ऐसा क्या किया था, जिसके बाद वे दो लोग उसे मारने तक के बारे में सोच रहे थे। सिया बस वहां से जान बचाकर भागना चाहती थी कि तभी वे दोनों बाहर आ गए थे और उन्होंने सिया को देख लिया था।

“सिया बिटिया... रुकिए।” दूसरे आदमी ने नरम आवाज में कहा।

सिया ने अपना थूक निगला, सामने खड़ा आदमी रंजीत था। वह उसके पापा का भरोसेमंद आदमी और उनका पर्सनल असिस्टेंट था। शायद यही वजह थी कि जिस कमरे में जाने की इजाजत घर वालों तक को नहीं थी, वहां रंजीत बेझिझक जा सकता था।

सिया उसकी तरफ देखती हुई अभी भी अपनी ड्रेस निकालने की कोशिश कर रही थी। वह इस बात का खास ध्यान रख रही थी कि उसके हाथ से पेन ड्राइव गिर न जाए। हां, बाहर खुशियों का माहौल था, कौन जानता था कि इस घर की बेटी घर से चोरों की तरह भाग रही थी।

रंजीत और वह आदमी उसके पास आ गए थे। सिया ने कांपती आवाज में पूछा, “रंजीत अंकल, आप मुझे क्यों रोक रहे हैं?”

रंजीत ने अपने चेहरे के भाव नर्म किए और हमेशा की तरह प्यार से कहा, “बेटा, आप इस तरह छुपकर क्यों भाग रही हैं? मंत्री जी ने कहा है कि आपको कमरे में ले चलें, बाहर खतरा है।”

“मेरे लिए खतरा बाहर है या घर के अंदर?” सिया के मुंह से खुद-ब-खुद निकल गया था।

रंजीत के चेहरे के भाव बदलने लगे थे और इस एक पल में सिया समझ गई थी कि वह सच में खतरे में है। जोर लगाने की वजह से उसका ड्रेस फट गया था। सिया ने अपना पूरा जोर लगाया और पिछले बगीचे की तरफ भागने लगी थी। वहां की दीवार अंदर की तरफ से तो ज्यादा ऊंची नहीं थी, लेकिन बाहर की तरफ से थोड़ी ऊंची थी।

सिया को अच्छे से याद था कि जब भी वह उस दीवार पर चढ़ने की कोशिश करती थी, तो मानवेंद्र उसे रोक लिया करते थे। वह उसे समझाते थे कि अगर वह दूसरी तरफ गई तो उसे चोट लग सकती है।

आज वही दीवार उसे बचाने वाली थी। आज उसे गिरने से ज्यादा पकड़े जाने का डर था। सिया ने अपने सैंडल उतार दिए थे। उसने अपने कपड़ों को समेटा और उस दीवार पर चढ़ गई थी। पास में पेड़ होने की वजह से उसके हाथ छिल गए थे और कंधे से ड्रेस फट गई थी। सिया की आंखों में आंसू थे, उसे कुछ भी करके वहां से बाहर निकलना था।

“सिया बिटिया, बचपना मत कीजिए। नीचे आइए, कोई देख लेगा।” रंजीत ने सख्त आवाज में कहा।

आज सिया को उसकी आवाज में अपनेपन के बजाय कुछ और ही महसूस हो रहा था, उसने उसकी तरफ देखा तक नहीं। उसने एक नजर बाहर की तरफ झांककर देखा, ऊंचाई काफी ज्यादा थी और दूर कुछ गाड़ियां खड़ी हुई थीं। सिया ने आंखें बंद कीं और कूद गई थी। जमीन पर गिरते ही उसके घुटने छिल गए थे, कपड़े मिट्टी में सन गए थे। उसने सबसे पहले अपने दुपट्टे में पेन ड्राइव को कसकर बांध लिया था।

सिया ने तुरंत खुद को संभाला और अपनी पूरी ताकत लगाकर दौड़ रही थी। वह थोड़ा ही आगे पहुंची थी कि तभी सड़क पर खड़ी काली गाड़ी की लाइट जली। उसे देखकर सिया का दिल डर के मारे फिर से रुक गया था। गाड़ी का दरवाजा खुला और अंदर से एक आदमी लड़खड़ाते हुए बाहर गिर गया था। उसका सफेद कुर्ता खून से सना हुआ था। ज्यादा रोशनी नहीं थी, इसलिए सिया को उसे पहचानने में थोड़ा वक्त लगा था, लेकिन वह उसे पहचान गई थी।

“रमेश काका...” सिया जल्दी से दौड़ते हुए उनके पास गई और घुटनों के बल बैठ गई थी। वह उसके पुराने ड्राइवर थे।

इस वक्त उनके पेट में किसी ने छूरा घोंप दिया था। उनकी हालत ठीक नहीं लग रही थी, उन्हें देखकर सिया की घबराहट और भी बढ़ गई थी।

“आपके साथ यह किसने किया? मैं अभी पापा को बुलाकर लेकर आती हूं, हम हॉस्पिटल चलेंगे, आपको कुछ नहीं होगा।” सिया जल्दी से बोली और उठकर जाने ही वाली थी कि तभी रमेश ने उसका हाथ पकड़ लिया था।

“नहीं... नहीं... पापा को नहीं...” रमेश ने अटकती आवाज में कहा।

सिया की आंखें डर से फैल गई थीं। रमेश की आंखों में भी डर नजर आ रहा था और वह इस वक्त मानवेंद्र को बुलाने से रोक रहा था। कुछ मिनट पहले खुद उसके पापा का पर्सनल असिस्टेंट रंजीत अजीब बर्ताव कर रहा था, वह उसके पीछे आ रहा था और उसे धमकाने की कोशिश कर रहा था।

रमेश ने बहुत मुश्किल से अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ टुकड़ा निकाला। उसने कांपते हाथों से वह सिया के हाथ में थमा दिया था। सिया ने उसे खोलकर देखा तो उसमें एक नाम और एक जगह का एड्रेस लिखा हुआ था।

“पृथक सिंह राठौड़... जोधपुर रोड, पुरानी पत्थर फैक्टरी के पास, राठौड़ हवेली।”

उसे पढ़ते ही सिया का पूरा शरीर ठंडा पड़ गया था। सिया को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर रमेश काका उसे पृथक के घर का एड्रेस क्यों दे रहे हैं।

रमेश की आवाज धीरे-धीरे धीमी होती जा रही थी, उसने कहा, “बिटिया, अगर जिंदा रहना है तो उसी के पास जाओ। वही मानवेंद्र साहब को रोक सकता है।”

सिया ने जल्दी से ना में सिर हिलाया और रोते हुए बोली, “प्लीज ऐसा मत बोलिए, पापा ऐसे नहीं हैं।”

रमेश की आंखों में दया के भाव उभर आए थे। सिया की मासूमियत को वहां काम करने वाले लोग तक जानते थे। वे उस बच्ची को आखिरी बार देख रहे थे जो अभी भी अपने पिता को भगवान समझती थी।

“बिटिया, भगवान और नेता में फर्क होता है, यह देर से समझ आता है।” इन्हीं आखिरी शब्दों के साथ रमेश काका ने अपना दम तोड़ दिया था। उनकी पकड़ सिया के हाथ से पूरी तरह ढीली पड़ गई थी।

सिया की आंखों से आंसू बह रहे थे, वह खुलकर रो भी नहीं पा रही थी। उसे अपने पीछे हलचल सुनाई दी, किसी ने टॉर्च चलाई थी और उसका नाम पुकार रहे थे।

“सिया मैडम कहां हैं आप? आपको मंत्री जी के बर्थडे पार्टी में नहीं आना?”

“सिया बिटिया, बैठकर बात करते हैं। बाहर आइए, आपके पापा को पता चला तो उन्हें अच्छा नहीं लगेगा।” अगली आवाज रंजीत की थी।

सिया कांपते हुए उठी, उसके कपड़ों और हाथों में खून लग गया था। दुपट्टे में पेन ड्राइव थी और मुट्ठी में पृथक सिंह राठौड़ के घर का पता। एक रास्ता जो उसके घर तक जाता था और दूसरा रास्ता पृथक के पास। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कौन से रास्ते की तरफ बढ़े;अपने पापा की प्यार भरी मुस्कुराहट को सच माने या फिर रमेश काका की आखिरी बातों को।

सिया के लिए फैसला लेना मुश्किल था लेकिन उसके पास समय नहीं था। सड़क के मोड़ पर गाड़ियों की आवाज सुनाई देने लगी, उसे ढूंढने के लिए कोई आ रहा था। सिया ने एक आखिरी बार अपने घर की तरफ देखा।

वह नहीं जानती थी कि उसके फैसले का आज क्या नतीजा होने वाला है, बस उसे खुद की जान बचानी थी और उस सच का पता लगाना था जो पेन ड्राइव में छुपा हुआ था।

सिया ने अपनी पूरी ताकत लगाई और दौड़ना शुरू कर दिया था। वह मन ही मन बोली, “मुझे नहीं पता कि तुम हमारे दुश्मन हो या मेरे बचाव का रास्ता, पर इतना जानती हूं कि मुझे तुम्हारे पास पहुंचना ही होगा, पृथक सिंह राठौड़।”

सिया ने अपना रास्ता चुन लिया था जो सीधा उसके पापा के दुश्मन पृथक सिंह राठौड़ की तरफ जाता था।

°°°°°°°°°°°°°°°°

क्या सिया ने सही चुनाव किया है? आखिर क्या है मानवेंद्र सिंह शेखावत की सच्चाई? क्या सिया एक मुसीबत निकल कर दूसरी मुसीबत में फंसने वाली है या सच में उसका यह चुनाव उसे एक नई राह दिखाएगा? कहानी के साथ बने रहिएगा। उम्मीद है आपको पसंद आएगी। पढ़कर समीक्षा जरूर कीजिएगा।

100%