Bound by his lies Ch. 1

Bound by lies - Chapter 1

Posted by The Dark Quill • Aug 31, 2026 10:08 AM

मुंबई का आसमान आज जैसे किसी के खौफ से रो रहा था। मूसलाधार बारिश और कड़कती बिजली ने पूरी रात को एक भयानक अंधेरे में धकेल दिया था। शहर से दूर, एक सुनसान और हाई-सिक्योरिटी वाले प्राइवेट एयरस्ट्रिप पर सन्नाटा पसरा था, जिसे सिर्फ बारिश की बूंदों और तेज़ हवाओं की चीखें तोड़ रही थीं।

रनवे के दोनों तरफ दर्जनों डार्क, बुलेटप्रूफ एसयूवी (SUV) का काफिला कतार में खड़ा था। इन गाड़ियों के इर्द-गिर्द खड़े गार्ड्स, जिनके शरीर पर काले वाटरप्रूफ सूट और हाथों में ऑटोमैटिक हथियार थे, बारिश में भी बिना पलक झपकाए बुतों की तरह तैनात थे। कोई भी अपनी जगह से एक इंच हिलने की जुर्रत नहीं कर रहा था। हवा में एक अजीब सी घुटन थी— पानी की नहीं, बल्कि उस खौफ की, जो आसमान से उतरने वाला था।

काफिले के बिल्कुल बीचों-बीच खड़ी सबसे लंबी और आलीशान मेबैक के अंदर का नज़ारा बाहर की इस दहशत से बिल्कुल अलग था।

गाड़ी की पिछली सीट पर **वेदांत रघुवंशी** पूरे आराम से लेटा हुआ था। उसके एक हाथ में विंटेज वाइन का ग्लास था और दूसरे हाथ में उसका फोन, जिसे वह कान से लगाए हुए एक शैतानी मुस्कान के साथ किसी की बात सुन रहा था। वेदांत देखने में किसी ग्रीक गॉड की तरह आकर्षक था— बिखरे हुए बाल, चेहरे पर एक कातिलाना चार्म, और होंठों पर वह चिर-परिचित प्लेबॉय वाली मुस्कुराहट जो किसी भी लड़की का दिल चंद सेकंड में पिघला दे।

"ओह कम ऑन, नताशा..." वेदांत ने वाइन का एक घूंट लेते हुए गहरी, मखमली आवाज़ में कहा, "मैंने तुम्हें वो डायमंड नेकलेस इसलिए नहीं दिया था कि तुम हर रात मुझे कॉल करके अपना रोना सुनाओ। वो हमारी आखिरी रात की पेमेंट थी, डार्लिंग।"

फोन के दूसरी तरफ से लड़की के सिसकने और गिड़गिड़ाने की आवाज़ आ रही थी। वह वेदांत से एक और मुलाकात की भीख मांग रही थी।

अचानक वेदांत की आँखों की वह चार्मिंग चमक गायब हो गई और उसकी जगह एक बेरहम, ठंडी दरिंदगी ने ले ली। उसकी मुस्कान सिकुड़ गई। "नताशा," उसकी आवाज़ अब इतनी सर्द थी कि सुनने वाले का खून जम जाए। "अगर तुमने मेरे नंबर पर दोबारा कॉल करने की गलती की, तो तुम्हारा वो खूबसूरत चेहरा कल किसी मैगज़ीन के कवर पर नहीं, बल्कि न्यूज़पेपर के ओबिचुअरी (शोक संदेश) सेक्शन में नज़र आएगा। और यकीन मानो... तुम्हारा जनाज़ा उठाने वाला भी कोई नहीं बचेगा। गॉट इट?"

जवाब का इंतज़ार किए बिना वेदांत ने कॉल काट दिया और फोन को बगल की सीट पर फेंक दिया। उसके चेहरे पर अब रत्ती भर भी कोई भाव नहीं था। वह लड़कियों को अपने महंगे शौक और टाइमपास से ज्यादा कुछ नहीं समझता था। उसके लिए इंसान की जान और जज़्बात, दोनों की कोई कीमत नहीं थी।

तभी आसमान का सीना चीरते हुए एक गगनभेदी आवाज़ गूंजी।

वेदांत की नज़रें गाड़ी के डार्क शीशे से बाहर आसमान की तरफ उठीं। बादलों को चीरता हुआ एक फुल-ब्लैक प्राइवेट जेट रनवे की तरफ तेज़ी से उतर रहा था। जेट के पिछले हिस्से पर 'रघुवंशी सिं****ेट' का गोल्डेन प्रतीक चमक रहा था।

वेदांत ने वाइन का ग्लास साइड में रखा और अपने सूट का बटन लगाते हुए सीधा बैठ गया। उसके चेहरे से प्लेबॉय और बेपरवाह वाला हर भाव गायब हो चुका था। अब वहां सिर्फ एक वफादार सिपाही और माफिया के सेकंड-इन-कमांड का रुतबा था। "द डेविल इज़ हियर," उसने धीरे से बुदबुदाया।

जेट के रनवे पर लैंड करते ही गाड़ियों का काफिला हरकत में आ गया। इंजन की तेज़ गर्जना शांत हुई और जेट का हाइड्रोलिक दरवाज़ा धीरे-धीरे नीचे आने लगा।

दरवाज़ा खुलते ही वहां जो शख्स खड़ा था, उसकी सिर्फ एक झलक ने रनवे पर खड़े हर गार्ड की सांसें रोक दीं।

**आधिराज रघुवंशी।**

डार्क चारकोल इटैलियन थ्री-पीस सूट में कसा हुआ उसका चौड़ा, मस्कुलर शरीर किसी लोहे की चट्टान जैसा लग रहा था। तेज़ हवा से उसके माथे पर बिखरे हल्के बाल और चेहरे पर पसरा वह खौफनाक, जमा देने वाला सन्नाटा— वह इंसान नहीं, साक्षात मौत का दूसरा नाम लग रहा था। सालों बाद वह भारत की ज़मीन पर कदम रख रहा था, और उसकी गहरी, काली आँखों में सिर्फ और सिर्फ एक खूनी आग सुलग रही थी।

आधिराज ने भारी बूट्स के साथ सीढ़ियों से नीचे कदम रखा। बारिश की मोटी बूंदें उसके सूट और बालों को भिगोने लगीं। एक गार्ड घबराहट में कांपते हाथों से आगे बढ़ा और आधिराज के सिर पर छाता तानने की कोशिश की।

आधिराज के कदम ठिठके। उसने अपनी गर्दन हल्की सी घुमाई और उस गार्ड की आँखों में सीधा देखा। उन आँखों में इतनी खौफनाक और सर्द मौत लिखी थी कि गार्ड का खून वहीं जम गया। आधिराज ने कुछ नहीं कहा, बस उसकी वह शिकारी घूरती हुई नज़र काफी थी। गार्ड के हाथ से छाता छूटकर नीचे गिर गया और वह अपनी जान की भीख मांगता हुआ बुरी तरह कांपते हुए दो कदम पीछे हट गया।

आधिराज ने अपनी उंगलियों के बीच दबा एक महंगा रशियन सिगार होंठों से लगाया। बारिश में भी सिगार का लाल सिरा सुलग उठा, और उसने धुएं का एक गहरा कश हवा में छोड़ दिया। उसकी भारी, खुरदरी और खतरनाक आवाज़ गूंजी—

"वेदांत।"

वेदांत अपनी गाड़ी से बाहर निकला। बारिश की परवाह किए बिना वह आधिराज की तरफ बढ़ा और मेबैक का दरवाज़ा खोलकर सिर झुका लिया। "वेलकम बैक, भाई।"

आधिराज बिना कोई जवाब दिए गाड़ी के अंदर बैठ गया। वेदांत भी दूसरी तरफ से अंदर आ गया और दरवाज़ा बंद होते ही बाहर की सारी आवाज़ें कट गईं। गाड़ी के अंदर का माहौल किसी कब्रिस्तान से भी ज्यादा सर्द था।

वेदांत ने बिना एक सेकंड बर्बाद किए, बगल की सीट से एक ब्लैक लेदर फाइल उठाई और आधिराज की तरफ बढ़ा दी।

"तुम सही थे, भाई," वेदांत की आवाज़ में अब वो बेरहमी थी जो रघुवंशी खानदान के खून में दौड़ती थी। "हम सालों से गलत दिशा में ढूंढ रहे थे। उस रात मॉम-डैड की गाड़ी के सिस्टम को जिसने हैक किया था, जो बैंक ट्रांसफर्स हुए थे, और जिस डिवाइस से वो आखिरी कमांड दी गई थी... उन सबके डिजिटल फुटप्रिंट्स, आई.पी. एड्रेस और सारे सुराग अब सुलझ गए हैं। वो सब एक ही इंसान की तरफ इशारा कर रहे हैं।"

आधिराज ने अपने होंठों से सिगार हटाया। उसकी मजबूत, नसों से भरी उंगलियों ने फाइल को खोला। उसकी नज़रें उन पन्नों पर लिखे एक-एक सबूत को किसी भूखे भेड़िए की तरह स्कैन कर रही थीं। हर पन्ना उसके माता-पिता की दर्दनाक चीखों की याद दिला रहा था।

जैसे ही उसने फाइल का आखिरी पन्ना पलटा, उसकी उंगलियां रुक गईं।

वहां एक लड़की की तस्वीर लगी थी।

तस्वीर में वह किसी अनाथालय या मंदिर के बाहर कुछ बच्चों को खाना खिला रही थी। उसने एक साधारण सा सफेद सूती सूट पहना था, चेहरे पर कोई मेकअप नहीं था, और उसकी बड़ी, गहरी आँखों में एक अजीब सी निश्छल और पवित्र मासूमियत छलक रही थी। वह दुनिया के हर फरेब और चालाकी से बिल्कुल अनजान लग रही थी।

आधिराज ने उस तस्वीर को घूरा। उसकी आँखों में एक खतरनाक बवंडर उठने लगा। उसका जबड़ा इतनी सख्ती से तन गया कि चेहरे की नसें उभर आईं। वह मासूमियत, वह भोलापन— आधिराज के लिए यह सब एक भद्दा मज़ाक, एक धोखा था।

"इनायत..." वेदांत ने उस लड़की का नाम लेते हुए कहा, "यही है वो। भारत के एक छोटे से शहर की एक साधारण सी लड़की। देखने में ऐसी लगती है जैसे किसी चींटी को भी नुकसान न पहुंचा सके। पर सारा डेटा बता रहा है कि इसी ने वो खेल खेला था।"

आधिराज की आँखों में खून उतर आया। उसके होंठों पर एक बहुत ही खौफनाक, शैतानी मुस्कान रेंग गई, जिसे देखकर वेदांत भी अंदर तक सिहर गया। आधिराज ने अपना मजबूत हाथ उठाया और उस तस्वीर को अपनी मुट्ठी में इस कदर बेदर्दी से क्रश किया, जैसे वह तस्वीर नहीं, उस लड़की की गर्दन हो।

गाड़ी के शीशे पर बारिश की बूंदें ज़ोर-ज़ोर से टकरा रही थीं। आधिराज ने अपनी मुट्ठी में कुचली हुई उस तस्वीर को ज़मीन पर फेंका और अपने भारी बूट से उसे कुचलते हुए वेदांत की तरफ देखा।

**"इस मासूमियत का नकाब मैं अपने हाथों से नोचूंगा, वेदांत।"** आधिराज की आवाज़ में एक ऐसा ज़हरीला और खतरनाक गुरूर था जो किसी की भी रूह कंपा दे। **"इसने मौत का खेल खेला था ना... अब यह ज़िंदगी की भीख मांगेगी। कल का सूरज इसके लिए कोई सवेरा नहीं, बल्कि एक ऐसा अंधेरा लेकर आएगा, जिसकी इसने अपने सबसे बुरे खौफ में भी कल्पना नहीं की होगी। कल रात, यह मेरी कैद में होगी।"**

गाड़ियों का वह काला काफिला एक झटके में शहर के अंधेरे में गायब हो गया, अपने पीछे सिर्फ खौफ और एक खूनी बदले की आहट छोड़ते हुए। इनायत की ज़िंदगी का सबसे खौफनाक तूफान उसकी तरफ बढ़ चुका था, और उसे इस बात की भनक तक नहीं थी।

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