सोने का पिंजरा और खौफनाक साया - Chapter 2
चैप्टर २: सोने का पिंजरा और खौफनाक साया
मुंबई के एक प्रतिष्ठित आर्ट कॉलेज के शांत गलियारे में, जहाँ दीवारों पर कैनवस और रंगों की महक तैर रही थी, बाईस साल की इनायत एक बड़ी सी खिड़की के पास खड़ी थी। उसके हाथ में एक पेंटब्रश था और उसके सामने रखे ईज़ल पर एक खूबसूरत सी अधूरी पेंटिंग थी— एक खुला आसमान, जहाँ कुछ परिंदे आज़ाद उड़ रहे थे। इनायत ने एक सादा सा पेस्टल पिंक रंग का सूती कुर्ता पहना था, उसके लंबे, घने काले बाल एक ढीली चोटी में बंधे थे, और उसकी बड़ी-बड़ी कत्थई आँखों में एक ऐसी गहरी खामोशी थी जो किसी भी देखने वाले को उसमें डूब जाने पर मजबूर कर दे।
"तू फिर से इन परिंदों को बना रही है, इनायत?" पीछे से उसकी सबसे पक्की सहेली, रिया ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।
इनायत के होठों पर एक बहुत ही हल्की, सहमी सी मुस्कान तैर गई। "परिंदे ही तो हैं, रिया... जिन्हें कोई रोक नहीं सकता। मेरा बस चले तो मैं अपनी पूरी ज़िंदगी इन रंगों और बच्चों के बीच गुज़ार दूँ। मेरा सपना है कि मैं अनाथ बच्चों के लिए एक आर्ट स्कूल खोलूँ, जहाँ उन्हें कभी ये महसूस न हो कि वो अकेले हैं।"
रिया ने गहरी सांस ली और इनायत के मासूम चेहरे को देखा। "तेरा दिल बहुत साफ है, इनू। लेकिन मुझे तेरे घर वालों से डर लगता है। वो लोग तुझे एक इंसान नहीं, बल्कि एक एहसान की तरह ट्रीट करते हैं। तूने उन्हें अपने असली माता-पिता मान लिया है, लेकिन वो..."
"रिया, प्लीज," इनायत ने डरते हुए रिया को बीच में टोक दिया। उसकी उंगलियां ब्रश को कस कर पकड़ने लगीं। "पापा (राघवेंद्र) और माँ (पल्लवी) ने मुझे तब अपनाया था जब मेरा इस दुनिया में कोई नहीं था। अगर वो कभी मुझ पर गुस्सा भी करते हैं, तो मुझे बुरा नहीं लगता। उनका घर मेरे लिए किसी मंदिर से कम नहीं है।"
रिया सिर्फ सिर हिलाकर रह गई। वह जानती थी कि इनायत दुनिया की चालाकियों को समझने के लिए बहुत मासूम थी। उसे यह भी नहीं पता था कि जिस घर को वह मंदिर मानती है, वह असल में एक सोने का पिंजरा है, जहाँ हर रोज़ उसकी रूह के पंख काटे जाते हैं।
दोपहर ढलने के बाद इनायत अपने घर— 'राघवेंद्र मैंशन' पहुँची। यह घर बाहर से जितना आलीशान और खूबसूरत था, अंदर से उतना ही ठंडा और दमघोंटू था। जैसे ही इनायत ने भारी लकड़ी का दरवाज़ा खोलकर अंदर कदम रखा, उसकी नज़र हॉल के बीचों-बीच रखे मखमली सोफे पर पड़ी।
वहाँ लावण्या बैठी थी।
लावण्या, इनायत की मुँहबोली बहन। उसने किसी महंगे इंटरनेशनल ब्रांड की शॉर्ट ड्रेस पहन रखी थी, उसके बाल परफेक्टली सेट थे, और उसकी उंगलियों में फंसा वाइन का ग्लास उसके घमंड की गवाही दे रहा था। लावण्या दिखने में बेहद खूबसूरत थी, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी चुभने वाली जलन और नफरत थी जो हमेशा इनायत को देखकर बाहर आ जाती थी। लावण्या को इस बात से सख्त नफरत थी कि उसके लाखों रुपये के मेकअप और डिज़ाइनर कपड़ों के बावजूद, लोग इनायत की उस सादगी और प्राकृतिक खूबसूरती की तरफ खिंचे चले जाते थे। लावण्या के लिए इनायत घर में पड़ी एक ऐसी धूल थी, जिसे वह रोज़ अपने जूतों से कुचलना चाहती थी।
"आ गई महारानी?" लावण्या ने एक तिरछी, ज़हरीली मुस्कान के साथ कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा तीखापन था। "दिन भर कॉलेज में रंगों से खेलती रहती हो। तुम्हें क्या लगता है, डैड की चैरिटी पर तुम ज़िंदगी भर ऐश करोगी?"
इनायत की नज़रें तुरंत ज़मीन पर झुक गईं। उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। "मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा, दीदी... मैं तो बस..."
"शट अप, इनायत!" सीढ़ियों से उतरते हुए पल्लवी (इनायत की नकली माँ) की सख्त और ठंडी आवाज़ गूंजी। उनके साथ राघवेंद्र भी थे, जिनके चेहरे पर एक शातिर बिज़नेसमैन वाली कठोरता थी। "तुम्हारी दीदी सही कह रही है। हमने तुम्हें सड़क से उठाकर इस घर में पनाह दी, तुम्हें अपना नाम दिया, ताकि तुम हमारे काम आ सको। और अब वक्त आ गया है कि तुम हमारा वो कर्ज़ चुकाओ।"
इनायत कांप उठी। "कर्ज़? पापा... मैंने क्या किया है?"
राघवेंद्र सोफे पर बैठ गए और उन्होंने एक फाइल टेबल पर फेंक दी। "मैंने तुम्हारी शादी तय कर दी है। रंजीत सिंघानिया के साथ।"
यह नाम सुनते ही इनायत के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। रंजीत सिंघानिया शहर का एक कुख्यात, अड़तालीस साल का बिज़नेसमैन था, जो अपनी अय्याशियों और क्रूरता के लिए मशहूर था। उसकी पहले भी दो शादियां हो चुकी थीं और दोनों ही पत्नियाँ रहस्यमयी तरीके से गायब हो गई थीं।
"पापा... नहीं..." इनायत की आँखों से आँसू छलक पड़े। वह घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गई। "वो... वो मेरी उम्र से दोगुने बड़े हैं। उनके बारे में बहुत बुरी बातें सुनी हैं मैंने। प्लीज, मुझे इस घर से मत निकालिए। मैं घर का सारा काम करूंगी, मैं आपके हर हुक्म को मानूंगी, लेकिन प्लीज मुझे उस इंसान के हवाले मत कीजिए।"
लावण्या सोफे से उठी और इनायत के पास आकर उसके गाल को अपनी नुकीली नाखूनों वाली उंगलियों से थपथपाया। उसके चेहरे पर एक साइकोपैथ वाली क्रूर मुस्कान थी। "अरे मेरी भोली बहन। सिंघानिया जी को डैड की कंपनी में पचास करोड़ का इन्वेस्टमेंट करना है। और बदले में उन्हें एक खूबसूरत, जवान और... 'अनटच्ड' खिलौना चाहिए। तुम तो किस्मत वाली हो कि तुम्हें इतने बड़े महल में रानी बनकर रहने का मौका मिल रहा है।"
लावण्या की जलन ही इस फैसले की असली वजह थी। वह जानती थी कि रंजीत एक जानवर था, और वह इनायत को तिल-तिल कर मरते हुए देखना चाहती थी।
"माँ..." इनायत ने रोते हुए पल्लवी की तरफ देखा, "प्लीज माँ, मुझे बचा लीजिए।"
"ड्रामा बंद करो, इनायत!" पल्लवी ने नफरत से मुँह फेर लिया। "अगले हफ्ते तुम्हारी सगाई है। चुपचाप तैयार रहना, वरना इस घर के दरवाज़े तुम्हारे लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे और तुम सड़क पर भीख मांगती फिरोगी।"
इनायत अपने चेहरे को हाथों में छिपाकर फूट-फूट कर रोने लगी। इस घर में उसकी चीखें सुनने वाला कोई नहीं था। उसे लग रहा था जैसे उसकी ज़िंदगी का हर रंग किसी ने छीन कर वहां सिर्फ गाढ़ा, काला अंधेरा पोत दिया हो।
लेकिन उसे नहीं पता था कि असली अंधेरा अभी उसकी तरफ बढ़ रहा था। एक ऐसा अंधेरा, जिसके सामने रंजीत सिंघानिया जैसे लोग सिर्फ मामूली कीड़े थे।
शहर के दूसरे छोर पर, जहाँ बादल शहर की सबसे ऊँची गगनचुंबी इमारत को छू रहे थे, आधिराज रघुवंशी अपने आलीशान पेंटहाउस की कांच की दीवार के सामने खड़ा था। बाहर हो रही मूसलाधार बारिश कांच पर फिसल रही थी, और कमरे में सिर्फ आधिराज की उंगलियों में सुलगते रशियन सिगार के धुएं की गंध थी। उसने अपनी जैकेट उतार कर फेंक दी थी और उसकी सफेद शर्ट के स्लीव्स कोहनी तक मुड़े हुए थे, जिससे उसके मजबूत, नसों से भरे हाथ और कलाई पर गुदा हुआ एक डार्क माफिया टैटू साफ नज़र आ रहा था।
कमरे का भारी महोगनी का दरवाज़ा बिना आवाज़ किए खुला।
अंदर आने वाले शख्स की आहट इतनी खामोश थी कि कोई आम इंसान उसे महसूस भी न कर पाए। वह छह फुट तीन इंच लंबा, एक बेहद खूंखार और पत्थर के चेहरे वाला इंसान था। उसके चेहरे पर एक गहरा कट का निशान था जो उसकी बायीं आँख से लेकर उसके जबड़े तक जाता था। उसने पूरे काले रंग के लेदर के कपड़े पहने हुए थे। यह 'रुद्रा' था। आधिराज का राइट हैंड, उसका सबसे खूंखार हत्यारा (Executioner) और उसका वो साया जो आधिराज के सिर्फ एक इशारे पर किसी भी शहर को कब्रिस्तान में बदल सकता था। रुद्रा कभी फालतू बात नहीं करता था; उसकी खामोशी ही उसका सबसे बड़ा हथियार थी।
"बॉस," रुद्रा की भारी और मशीनी आवाज़ गूंजी।
आधिराज ने बिना मुड़े सिगार का धुआं कांच पर छोड़ा। "क्या रिपोर्ट है, रुद्रा?"
रुद्रा दो कदम आगे बढ़ा। "राघवेंद्र और पल्लवी ने इनायत का सौदा कर दिया है। रंजीत सिंघानिया नाम के एक लोकल बिज़नेसमैन के साथ। वे उसे एक बिजनेस मर्जर के लिए बेच रहे हैं। अगले हफ्ते उनकी सगाई की रस्म तय की गई है। लावण्या ने खुद इस सौदे को पक्का करवाया है ताकि इनायत की ज़िंदगी बर्बाद हो सके।"
यह सुनते ही कमरे का तापमान जैसे शून्य से भी नीचे गिर गया। आधिराज की उंगलियां, जिनमें उसने सिगार पकड़ रखा था, इतनी सख्ती से कसीं कि सिगार बीच से टूट गया और सुलगती हुई राख ज़मीन पर गिर पड़ी।
आधिराज धीरे से पलटा। उसकी आँखों में एक ऐसी खूनी, शैतानी आग थी जिसे देखकर रुद्रा जैसा खूंखार इंसान भी अपनी नज़रें झुका लेने पर मजबूर हो गया।
"रंजीत सिंघानिया..." आधिराज के होठों से यह नाम एक ज़हरीले सांप की फुफकार की तरह निकला। उसके चेहरे पर एक बेहद खौफनाक, बर्फीली मुस्कान फैल गई, जो उसके गुस्से का सबसे खतरनाक रूप थी।
"मेरी ज़िंदगी तबाह करने वाली लड़की को कोई और कैसे बर्बाद कर सकता है, रुद्रा?" आधिराज भारी कदमों से चलते हुए सेंटर टेबल तक आया। उसने टेबल पर रखी अपनी बंदूक उठाई और उसकी मैगज़ीन चेक की। "वो लड़की मेरी शिकार है। उसकी एक-एक सांस, उसका एक-एक आंसू, और उसकी ज़िंदगी का हर एक पल मेरी जागीर है। किसी और की इतनी हिम्मत कैसे हुई कि वो मेरी मौत की मल्लिका पर नज़र डाले?"
"क्या आदेश है, बॉस? रंजीत सिंघानिया को कल सुबह का सूरज देखने से रोक दूँ?" रुद्रा ने अपनी जैकेट के अंदर रखे चाकू के हैंडल पर हाथ रखते हुए पूछा।
"नहीं," आधिराज ने अपनी बंदूक को वापस टेबल पर पटकते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक गहरा, जुनूनी पागलपन (Obsession) गूंज रहा था। "उन्हें सगाई की तैयारी करने दो, रुद्रा। मैं उस मासूमियत की देवी को तब उसके पिंजरे से खींच कर निकालूंगा, जब उसे लगेगा कि उसकी किस्मत तय हो चुकी है। मैं उसके उस नकली परिवार के सामने से उसे उठाऊंगा। उन्हें पता चलना चाहिए कि आधिराज रघुवंशी का खौफ क्या होता है।"
आधिराज ने कांच की दीवार के पार शहर की रोशनियों को घूरा। इनायत की वह रोती, बेबस और मासूम शक्ल उसके ज़हन में एक जुनूनी नशे की तरह हावी हो रही थी। वह इनायत से इंतहा की नफरत करता था, लेकिन उसे किसी और के साथ देखने का ख्याल ही उसके अंदर एक ऐसी अजीब सी आग लगा रहा था, जिसे वह खुद भी नहीं समझ पा रहा था।
"तैयारी करो, रुद्रा," आधिराज की खुरदरी आवाज़ गड़गड़ाहट की तरह गूंजी। "अगले हफ्ते, राघवेंद्र के उस आलीशान महल में मौत का जश्न मनेगा। और इनायत... वो मेरी हवेली के उस अंधेरे तहखाने में होगी, जहाँ से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। उसकी सगाई रंजीत से नहीं, उसके खौफनाक अंजाम से होगी।"
रुद्रा ने हल्का सा सिर झुकाया और बिना कोई आवाज़ किए कमरे से गायब हो गया।
पेंटहाउस की उस गहरी खामोशी में आधिराज की शैतानी मुस्कान और भी गहरी हो गई। इनायत की मासूम दुनिया अब पूरी तरह से तबाह होने वाली थी। उसे इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था कि जिस रंजीत सिंघानिया से वह इतना डर रही थी, उससे हज़ारों गुना ज्यादा खतरनाक और खूंखार शैतान उसकी ज़िंदगी को हमेशा के लिए अपने काले पंजों में जकड़ने के लिए निकल चुका है।