भूमिका
मेरी एक परम आत्मीय महिला ने मुझे एक पत्र लिखा । उसमें वे लिखती हैं --
आप सचमुच बड़े निर्दयी हैं । आप यदि मेरे कष्ट का कुछ भी अनुमान
कर पाते तो कदापि ऐसा न लिखते कि 'भाग' खड़ी हुई । कौन ऐसी अभागिन होगी,
जो अपने प्रिय बन्धुओं को तजकर'पर-घर',जहां स्वार्थ भावना को छोड़ और कुछ भी
नहीं,जाना पसन्द करे । हमारा'अपना घर'तो वही है,जहां हम स्वच्छन्दता से बिना
आडम्बर और मर्यादा के हंसते-खेलते रहते
और काम करते हैं । इस'पर-घर'नामक पिंजरे में कष्ट के सिवा कुछ नहीं, फिर मेरी
गिनती तो उन अभागिनियों में है, जो अन्नवस्त्र के मोल में किसीका दासत्व स्वीकार
करती हैं । आप विश्वास कीजिए,विवाह के पूर्व मैं इतनी सुन्दर थी कि आप विश्वास
नहीं कर सकते । अपना विवाह करके मैंने अपने को सब सुखों से रहित बना लिया ।
बड़ी-बड़ी भावनाएं लेकर मैं उत्पन्न हुई और बढ़ी । जीवन सयाना होता गया और मैं
सोने की लंका का स्वप्न अधिकाधिक निकट देखती गई । पर अन्त में वह सब मृग-मरीचिका
की भांति लोप हो गया । फिर भी मैंने सन्तोष किया, सोचा कि मेरे लिए सब सांसारिक
वस्तु अलभ्य हैं । फिर क्यों इनके पीछे जान खपाऊं । परन्तु ज्यों-ज्यों मैंने सन्तोष से
काम लिया,उनकी उछृखलता बढ़ती ही गई । कहिए तो -- क्या मैं पशु हूं ? मेरी
इच्छाएं क्या इच्छाएं नहीं हैं ? वे मुझसे ग्यारह वर्ष बड़े हैं । मैं क्या वृद्धा हूं ?
वे अपने रस-रंग में रहें और मैं सिपाहियों और चपरासियों से बातचीत करके दिन काटूं !
यदि मैं अयोग्य हूं तो इसमें मेरा क्या दोष है ? आपने मुझे देखा क्यों
नहीं ? समझा क्यों नहीं?
लोग तो पशु को भी मनुष्य बना लिया करते हैं। आप मनुष्य को
भी मनुष्य नहीं रहने दे सकते ? मैं प्रतिवर्ष प्रसूतिगृह में सड़ और
तुम निश्चिन्त हो विचरो ! बुद्धिमानी शायद यही है ! पुरषत्व भी
यही है ! सम्भव है, प्राकृतिक नियम भी यही है। स्त्रियां केवल
बच्चे पैदा करने की मशीनें हैं। मैंने आपको मन की बात बता दी,
शायद ठीक नहीं किया। मैं समझती हूं आप भी उसी कट्टरपंथी
धर्म के अनुगामी होंगे। मैं तो नवयुग की नवीन संस्कृति में पली
हू और उसे ही मानती हूं। मैं वह सर्प हूं जो चोट खाए पर बिना
काटे नहीं रहता। न में आईना हूं जो सिर्फ सामने चमकता है
और न मैं तोताचश्म हूं। फिर भी मैं सदा प्रसन्न-चित्त रहती
रही । वे कभी मेरे दुःख का अनुमान भी नहीं कर सके । मैं एकान्त
में रो लेती हूं, उनके सामने मैं रोना भूल जाती हूं। वे अपनी सब
भूलें भोले-भाले बालक की भांति स्वीकार कर लेते हैं और
विविध प्रतिज्ञा, कौल-करार करते हैं, पर ये सब बातें केवल उसी
समय तक। छोड़िए इन कहानियों को। आप तो पुरुष हैं न ?
'पर-घर' कभी रहे नहीं, पराये दिए टुकड़े और वस्त्र पाए नहीं,
फिर काहे को आपके आत्मसम्मान में ठोकर लगी होगी। खैर,
आप यह कहिए कि क्या आप मुझे नीरोग कर सकते हैं, और मैं
साहित्य-क्षेत्र में कैसे उतर सकती हूं? इन दो बातों में यदि आप
मेरी सहायता कर देंगे, तो मै क्लेशों से मुक्त हो जाऊंगी। आप
भी यश के भागी होंगे। के इसी अंक में 'अति प्रलाप' कविता
देखिए, कैसी है?
-शुभेच्छुका
यह सजीव और जाग्रत पत्र नारी-हृदय के विद्रोह और अहंकार से
ओत-प्रोत है। यह महिला संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी की अच्छी
पंडिता हैं। हिन्दी कविता सुन्दर करती हैं। पर पति महाशय हिन्द नहीं बोल सकते, उनकी मातृभाषा अंग्रेजी है। इसलिए
'पति-घर'-नहीं 'पर-घर'- मेंउन्हें अंग्रेजी ही बोलनी पड़ती
है। एक उच्चकोटि के पाश्चात्य शिक्षित और उच्च पदाधिकारी
युवक में जो दुर्बलताएं शिक्षा, संस्कृति तथा वातावरण के कारण
होती हैं, वे सब उनमें हैं । देवीजी का यह पत्र सिर्फ अकेली उनकी
आत्मा का स्वर नहीं, सहस्रों बेबस अबलाओं की विकल आत्मा
का सरोष रुदन है।
इसमें तो संदेह नहीं हो सकता कि मेरे साथ प्रत्येक सहृदय
पुरुष इस तेजस्विनी स्त्री के विद्रोह का अभिनन्दन करेगा, परंतु
इस संबंध में कुछ गम्भीर बातें भी विचारणीय हैं, जिन पर हमें
विचार करना ही चाहिए।
इस पत्र में सबसे जोरदार जो शब्द प्रयोग में लाया गया है,
वह 'पर-घर' है। मैंने किसी स्त्री के मुख से पति-घर को 'पर-घर'
प्रथम बार ही सुना है। प्रायः सभी जानते हैं कि स्त्री के लिए
पिता का ही घर 'पर-घर' होता है। कुमारी कन्याओं के लिए भी
यही कहा जाता है कि वे पराये घर की लक्ष्मी हैं। पति-घर को
अपना घर कहने में स्त्रियों को बड़ा गर्व और आनन्द का अनुभव
होता है। जो स्त्री पति-घर को 'पर-घर' कहे उसकी अन्तर्वेदना
का अन्त नहीं और वह सर्वाधिक अनाथा और निराश्रिता है।
भले ही वह पति और परिजनों से संयुक्त ही हो।
दूसरी बात जो इस पत्र में महत्त्वपूर्ण है, वह प्रसव-घटना के
प्रति घृणा और तिरस्कार के भाव हैं। भारतवर्ष की स्त्रियां पुत्र-
वती होना अपने नारी-जीवन को धन्य होना समझती हैं। यद्यपि
पति को पाकर सौभाग्यवती होना हिंदू-समाज में स्त्री का सबसे
बड़ा गौरव समझा जाता है, परंतु पुत्र पाकर माता बनना स्त्री का
सबसे बड़ा गौरव है। यह हिंदू ललना बड़ी ही विरक्ति और
ईर्ष्या से कहती है और मैं प्रति वर्ष सौर-गृह में सड़ूँ ?
तीसरी बात पत्र में पति पर लांछन है-वे मौज-बहार करते
हैं, मेरी चिंता नहीं करते, मैं नौकरों के साथ बातें करके समय
काटती हूं। उनकी चौथी बात मुझ पर चोट करती है। श्रद्धास्पद
देवी मुझे भी सिर्फ पुरुष होने के कारण स्त्री के प्रति एक कट्टर-
पंथी कहती हैं। ये चारों बातें ऐसी हैं, जिन पर मैं सार्वजनिक
दृष्टि से विचार करना चाहता हूं।
'पर-घर' पर ही विचार कीजिए। भारतीय संस्कृति में
हजारों वर्ष से ऐसा होता आया है कि कन्याएं न तो आजीवन
कुमारी ही रह सकती हैं, न स्वतंत्र होकर किसी भी प्रकार की
आजीविका ही पैदा कर सकती हैं। यद्यपि पाश्चात्य शिक्षा और
विचारों के प्रभाव से आज भारतीय उच्च शिक्षा प्राप्त युवतियां
कम-से-कम असाधारण देर तक अविवाहिता रहकर स्वतंत्र
जीविका के कार्य करने लगी हैं। मैंने यह गम्भीरतापूर्वक देखा है
कि इन स्त्रियों का पति और 'पति-घर' को छोड़कर पृथ्वी पर
कहीं भी अवलम्बन नहीं है।
हिंदू धर्मशास्त्र में मनु-वणित आठ विवाह-पद्धतियां हैं।
पहला सर्वोत्तम ब्राह्म-विवाह है, जिसमें पिता अपनी अलंकृता
कन्या को वर को दान देता है। दूसरा देव-विवाह है, जिसमें यज्ञ
कराने वाले पुरोहित को दक्षिणा के तौर पर कन्यादान दिया
दिया जाता है। तीसरा आर्ष-विवाह है, जिसमें कन्या का पिता
एक या दो जोड़ा गाय-बैल लेकर बदले में कन्या दे दे। चौथा
प्रजापत्य-विवाह है, जिसमें युवती कन्या और वर कहें कि हम
दोनों साथ रहे हैं, और धर्म से पति-पत्नी हैं, उन्हें माता-पिता
स्वीकार करें। पांचवां विवाह वर की जाति वालों तथा कन्याबों
को धन देकर विवाह करना आसुर है। छठा गान्धर्व है, जिसमें
युवती-युवक संगम करके प्रकट करें। सातवां राक्षस-जिसमें
रोती-कलपती लड़की को मारकाट करके उठा ले भागें। आठवां
पैशाच---जिसमें सोती हुई, बेहोश या पागल कन्या का कौमार्य
नष्ट किया जाए।
क्या आप खयाल कर सकते हैं कि यही स्त्रियों के प्रति मनुष्यता का व्यवहार है?
कन्या एक गाय-बैल के जोड़े के बदले में दे दी जाए? यही उसका मूल्य है? अथवा पुरोहितों को
दक्षिणा में दे डाली जाए? यह तो गुलामी से भी बढ़कर बात हुई। फिर
राक्षस विवाह? इस विवाह को तो राक्षस लोग ही कर सकते
हैं—--मनुष्य-समाज की दृष्टि में तो यह घोर अमानुषी अपराध है।
आप कह सकते हैं कि गान्धर्व विवाह में वर-वधू को स्वतन्त्रता
है, परन्तु यदि आप गान्धर्व विवाह की व्याख्या वात्स्यायन काम-
सूत्र में देखें तो आप समझ जाएंगे कि वह पाप और अनाचार है, विवाह नहीं।
क्या आपने कभी दुष्यन्त-शकुन्तला के गान्धर्व
विवाह पर भी गौर किया है, जिसे कालिदास की कोमल काव्य-
कल्पना ने अमर बना दिया है। आप महाभारत में मूल आख्यान
को पढ़िए। आप देखेंगे कि राजा शिकार खेलता ऋषि के आश्रम
में जा निकला है। वहां ऋषि को गैरहाजिरी में ऋषि-कन्या
शकुन्तला उसका आतिथ्य करती है और वह अपनी अनेक स्त्रियों
के रहते भी उस कुमारी को फुसलाकर वहीं उससे व्यभिचार भी
करता है और भांति-भांति के सब्ज बाग दिखाकर, जैसा बहुधा
ऐसी दशा में लोग किया करते हैं, चला जाता है। पीछे जब कण्व आकर सब
बात सुनते तथा लड़की को गर्भवती पाते हैं तो उसे दुष्यन्त के पास भेज देते हैं,
जिसे देखकर वह घोर लम्पट की भांति उसे पहचानने से इन्कार कर देता है कि
मैं तो तुझे जानता ही नहीं। पीछे वह बेचारी अपनी माता के यहां आश्रय पाती है
और अन्त में जब वृध्दावस्था में राजा के कोई सन्तान नहीं होती तो वह उसे ले आता है।
आप क्या इसे पवित्र विवाह कहना चाहते हैं? स्वयम्वरों के
विधान हमें प्राचीन इतिहास में देखने को मिलते हैं। परंतु ये नाम
के स्वयंवर हैं। इनमें कन्या को पति को चुनने ज़रा भी स्वातन्त्र्य
नहीं, पिता एक शर्त लगाता है और जो कोई भी इस शर्त को पूरी करे,
वही कन्या को वर सकता है। जयचन्द की पुत्री संयोगिता ने स्वयम्वर
में पिता का विरोध कर स्वाधीनता से काम लिया था। इसके लिए स्वयंवर
भंग किया गया। कन्या को कैद होना पड़ा और लहू की नदियां बहीं।
हिन्दू कानून के अनुसार जब तक कन्या का विवाह नहीं हो
जाता, कन्या के माता-पिता पर एक शनीचर सवार रहता है। ये
लोग इस भांति वर ढूंढ़ते फिरते हैं जैसे भैंस खरीदने को लोग
फिरा करते हैं। विवाह से प्रथम कन्या पराई चीज़ की भांति घर
में पालन की जाती है। वह बहुत कम स्वतंत्रता पाती है। बचपन
ही से उसे पति-घर की स्मृति दिलाकर त्रास दिया जाता है और
विवाह होने पर फिर वह दुःखी-सुखी चाहे भी जिस तरह रहे,
माता-पिता बेफ़िक्र हो जाते हैं। माता-पिता जब तक घर के
अधिकारी रहते हैं, लड़की के प्रति ममता रहती है, पर भाई-
भावज का राज्य होने पर फिर लड़की पिता के घर में एक बाहरी
मेहमान के तौर पर आती है। उसे अपने पास से खर्च करना
पड़ता है, वह आवश्यकता होने पर पति से खर्च मंगाती है, पति
की अपेक्षा पिता-माता, भाई से अपनी आवश्यकता जताना
संकोच की बात समझती है। बहरहाल, पति के जीते जी, पति के
घर को छोड़ कर उसे कहीं ठिकाना नहीं है। बहुधा स्त्रियां पतिघर
में सास से लड़कर बाप के घर जाने को धमकी देती हैं, परन्तु यह
उनकी अत्यन्त असहायावस्था का द्योतक है। वे दुःखी तथा
अपमानित होकर, लाचार होकर ही ऐसा करती हैं। यद्यपि पिता के
घर वह अधिक पराई हैं, यह वह जानती हैं। अब आप सोच सकते हैं
कि जो स्त्री पति-घर को पर-घर समझे तो समझिए कि
वास्तव में उसका अपना तो कोई घर है ही नहीं, और वह बुरी-से-बुरी दशा में है।
मैं कहूंगा कि भारत में ऐसी असहाय स्त्रियां लाखों नहीं करोड़ों हैं।
खासकर शिक्षित और उच्च परिवारों में यह अधिक हैं। उन्हें गहना, कपड़ा, धन
सब कुछ मिलता है, पर प्रायः पति नहीं मिलता। मेरा अभिप्राय यह है कि पति को पत्नी के जितना
निकट होना चाहिए, वह उतना निकट नहीं होता। इसीका यह
परिणाम होता है कि सब कुछ पाकर भी पत्नी अपने को असहाय
तथा गैर समझती है।
यह समझने की बात है कि पति को पत्नी और पत्नी को पति
ये दो चीजें एक-दूसरे के लिए परम दुर्लभ और महामूल्यवान हैं।
लाखों में एक भी पुरुष यथार्थनाम पुरुष नहीं और लाखों में एक
भी स्त्री यथार्थनाम स्त्री नहीं। जो कोई भी स्त्री-पुरुष यथार्थनाम
पति-पत्नी हैं, वे अपने जन्म को सफल कर चुके, उन्हें सब कुछ
इहलोक और परलोक में मिल गया। पति-पत्नी परस्पर एक-
दूसरे को प्राप्त करके फिर किसी वस्तु की चाह नहीं रख सकते।
उन्हें तो जगत् का सब कुछ मिल गया। धन-सम्पदा क्या चीज है।
"टूट टाट घर, टपकत खटियो टूट।
पिय की बांह उसिसवा सुख के लूट।"
सीता, राम के साथ वन के विकराल कष्ट सहन करती है। वह समझती है---
"जिय बिनु देह, नदी बिनु बारी।
तैसेहि नाथ पुरुष बिनु नारी।"
परन्तु जो स्त्री-पुरुष पति-पत्नी के गहन आध्यात्मिक सम्बन्ध
को उत्पन्न नहीं कर सकें, उनके लिए 'पति-घर' ही 'पर-घर' नहीं, 'पति' भी 'पर-पति' है और
इसी भांति पति के लिए वह स्त्री पत्नी नहीं, जी का जंजाल या पैर की बेड़ी है।
अब मैं यहां और विस्तार से इस गम्भीर विषय की व्याख्या
करूंगा। स्त्री और पुरुष के शरीर की बनावट इस प्रकार की है कि दोनों को प्रतिक्षण
एक-दूसरे का अभाव रहता है। स्त्री-शरीर में पुरुष का और पुरुष-शरीर में स्त्री का अभाव है।
पुरुष का पुरुषत्व ही पुरुष-चिह्न है और उसका उदय स्त्री है। इसी प्रकार स्त्री का स्त्रीत्व ही
स्त्री-चिह्न है और उसका उदय पुरुष है। इसका अभिप्राय यह है कि यदि जगत् में स्त्री न
हो तो समझिए कि किसी पुरुष में पुरुषत्व ही न रहे। इसी भांति पुरुष न हो तो स्त्री में स्त्रीत्व न रहे।
यह स्त्रीत्व और पुरुषत्व केवल शरीर ही में नहीं, अपितु जिस
शरीर में आत्मा रमकर बैठी है उसमें भी स्त्रीभाव और पुरुषभाव
उत्पन्न हो गया है। इसलिए जो भी स्त्री-पुरुष शरीर और आत्मा
से इस प्रकार गुथकर एक हो गए हैं कि यथार्थ में अभिन्न हैं, वही पत्नी-पति हैं और ऐसी
पत्नी कभी 'पति-घर' को 'पर-घर' नहीं कह सकती, न वह बिना पति के क्षणभर पृथक्
रह सकती है। यही दशा पति की भी आप समझ सकते हैं।
परन्तु मैं प्रथम कह चुका हूं कि लाखों में विरले ही ऐसे स्त्री-
पुरुष हैं, जो पत्नी-पति यथार्थ हैं। पृथ्वी में सच्चे प्रेमी का दर्जा
सबसे ऊपर है। कहा जाता है कि सच्चा प्रेमी प्रेम-पात्र से अभिन्न
रहता है, परन्तु मेरा कहना यह है कि दम्पति का दर्जा प्रेमी से
बहुत बढ़कर है।
यहां मैं विवाह के गम्भीर अर्थ की थोड़ी व्याख्या करूंगा। विवाह---वि-वाह---विशेष सम्बन्ध।
यह इसका शब्दार्थ है। यह विशेष सम्बन्ध स्त्रीत्व और पुरुषत्व का सम्बन्ध है, हृदय और मस्तिष्क
का सम्बन्ध है। दो स्त्री-पुरुष परस्पर मिलते हैं, वे मिलते ही चले जाते हैं, अन्त में एक हो जाते हैं।
स्त्री जाति में माता सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण वस्तु है, इसलिए
कि वह अपने शरीर में से एक नया जीवित शरीर निकालती है,
जिसमें परिपूर्ण जाग्रत आत्मा का सतत निवास है। परन्तु जिस
क्षण से वह शरीर माता के शरीर से पृथक् होता है---बस पृथक्
ही होता जाता है। सर्वप्रथम वह एक अति सूक्ष्म रजकण है, फिर
वह माता के रक्त को पान करके वृद्धिगत होता है। वह पिता की
मेधा-प्रतिभा और ओज तथा स्थैर्य पाता है और माता का स्वभाव, हृदय
और भाव। जब वह परिपूर्ण हो जाता है, उसका हृदय स्पन्दित
होने लगता है और प्रसव के बाद उसका एक अलग
अस्तित्व हो जाता है। ज्यों-ज्यों वह बालक बड़ा होता है, वह
बाह्य संसार में प्रविष्ट होता जाता है। माता से प्रतिक्षण वह दूर
ही रहता है। अन्त में केवल श्रद्धा और आदरही माता की सम्पत्ति
रह जाती है, परन्तु जब वह अपने जीवन के पूर्ण ओज को पहुंचता है
अर्थात् युवक होता है, तब एक स्त्री उसे पत्नी के रूप में मिलती है।
वह बिल्कुल अपरिचित है, भिन्न कुल और गोत्र की है। परन्तु पत्नी
होने के बाद वह प्रतिक्षण उसके निकट आती है। और वह निकट ही
नहीं, प्रत्युत दोनों परस्पर एक-दूसरे में प्रविष्ट होते हैं---न केवल शरीर
से, प्रत्युत आत्मा से भी। आज जगत् में ऐसे करोड़ों उदाहरण हैं कि
पति-पत्नी के सम्बन्ध के आगे माता-पिता तक त्यागे जाते हैं, सब
कोई गैर बन जाते हैं। इस मिथुन सहयोग में जो वैज्ञानिक और
प्राकृतिक आकर्षण है और उसका मध्यस्थ जो चरम श्रेणी के आनन्द
का परस्पर संयुक्त आदान-प्रदान है, वह उन्हें बाह्य संसार से लगभग
अन्धा बना देता है। अब तक वे एक होने पर भी दो थे। उनके प्राण
एक थे, पर शरीर दो थे। अब दोनों जब गर्भ-स्थापनाकरते हैं, तो वे
अन्तिम श्रेणी में पुत्र के रूप में एकीभूत होते हैं, उस सन्तान के
रूप में दोनों संयुक्त हैं, जिसमें दोनों का एक प्राण, एक शरीर है।
यह दम्पति का महत्त्व है। इसी कारण विवाह की मर्यादा
तथा धूमधाम पृथ्वी की सब जातियों में सब उत्सवों की अपेक्षा
ज़्यादा प्रधान है।
अब मैं फिर उस पत्र के विषय पर आता हूं। पत्र
लिखने वाली महिला जहां 'पति-घर' को विरक्ति से 'पर-घर' कहती हैं,
वहां वे प्रसव-घटना के प्रति घृणा ओर रोष का भाव भी रखती हैं।
यद्यपि हमारा देश दरिद्र है और जितना कम हम संतान
उत्पन्न करें उतना ही अच्छा है, परन्तु मैं दृढ़तापूर्वक यह कहूंगा कि
स्त्री का स्त्रीत्व, सौभाग्य-शोभा एवं जीवन का साफल्य प्रसव ही में है।
स्त्रीत्व के नाते पत्नी बनना तो उसकी चरम स्वार्थ-सिद्धि है। माता
बनना परम पुरुषार्थ कहना चाहिए। यदि स्त्रियां मातृ-पद से घृणा करने
लगें तो मैं कहूंगा कि स्त्रियां फिर अपनी सब श्रद्धा और पवित्रता तथा
गौरव खो देंगी। मैं इस बात पर बहस नहीं करता कि फिर सृष्टि कैसे
चलेगी। कल्पना कर लीजिए कि बच्चे मशीनों से विज्ञान द्वारा बनने
लगेंगे। परन्तु मेरा कहना तो यह है कि मातृत्व, स्त्री जाति का एक
ऐसा अस्तित्व है कि जिसके बल पर स्त्री जाति सदैव पूजी जाती रहेगी।
यदि स्त्री में से मातृत्व निकाल दिया जाए, तो फिर समझिए कि वह
स्वर्ग से च्युत हो गई। बिना सन्तान पुरुष अपने गौरव की रक्षा कर
सकता है, स्त्री नहीं। मैं आपको वेश्याओं की मिसाल दूंगा। वेश्या जाति
की स्त्रियां मातृ-पद से वंचित अभागिनी स्त्रियां हैं। यद्यपि वे भी सन्तान
प्रसव करती हैं। पर उन्हें माता पद प्राप्त नहीं है। माता पद उन्हीं को
प्राप्त होगा, जिन्हें पति प्राप्त है और धर्मतः दम्पति हैं। वेश्याएं दम्पति
नहीं, पत्नी नहीं। उनका स्त्रीत्व और पुरुषत्व से मुक्त **** है। वह
अस्थायी है और धन उसका प्रधान माध्यम है। इसलिए वेश्या जब अपने
यौवन को समाप्त कर चुकती है, तब वह सब प्रतिष्ठा और गौरव से
पतित हो जाती है, उसे कुटनी पद मिलता है और उसकी वृद्धा-
वस्था उसकी युवावस्था की अपेक्षा अधिक पापमय हो जाती है।
परन्तु दम्पति-धर्म में दीक्षा प्राप्त स्त्री ज्यों-ज्यों यौवन
से ढलती है, पुत्र, पौत्र, परिजनों से संयुक्त रहती है। पवित्रता, श्रद्धा,
सम्मान और गौरव की पद-पद पर वृद्धि पाती है, पुरुषों से
कहीं अधिक स्त्रियों का आदर होता है। कुपुत्र भी माता की ओर
सदा झुकता है। माता बनकर ही स्त्रियां जीवन का ध्येय पाती
हैं। इसलिए जो स्त्री मातृपद से घृणा करे, उस स्त्री के दुर्भाग्य
पर हमें दया करनी ही चाहिए। जो सौभाग्यवती स्त्री कोखवती
नहीं, प्रसव की अधिकारिणी नहीं---वह स्त्री नहीं, स्त्रीत्व से हीन
एक मांस-पिण्ड है। प्रत्येक स्त्री को जानना चाहिए कि उसके
विवाह का उद्देश्य ****-विलास नहीं। मैं कह चुका हूं, यह सब
तो उस मूल आवश्यकता का आकर्षण है, मूल वस्तु पुत्र प्रसव है।
स्त्री जाति पुत्र प्रसव करके ही पत्नी, माता, स्वामिनी सब कुछ
बनती है और इसीसे उसका स्त्रीत्व धन्य होता है।
अब प्रश्न यह रह जाता है कि क्या कारण है कि कोई
सुशिक्षिता, पुत्रवती, कोमल-हृदया नारी पति से और 'पति-घर' से तथा
मातृपद से इतनी घृणा करे, पुरुष तक से प्रतिस्पर्धा रक्खे। यह तो है
ही कि स्त्रियां स्त्रियां रहेंगी, पुरुष नहीं बन सकतीं, और पुरुष पुरुष ही
रहेंगे, स्त्रियां नहीं बन सकते। इन महिला ने मुझे भी कट्टरपन्थी बताया
है, सो तो सही है। मैं स्त्रियों को पुरुषोचित कामों में लाना बेवकूफी
समझता हूं। मैं तो स्त्रियों को स्त्री ही रखना चाहता हूं। पुरुष और
स्त्रियों के काम, स्वभाव, शरीर, सम्पत्ति, सब कुछ अलग है और उसीके
अनुकूल दोनों को संसार-यात्रा करनी चाहिए। कलम लिखने के लिए है,
और सूई सीने के लिए। यदि सूई से लिखेंगे और कलम से सीएंगे तो
बन नहीं सकेगा। आप कह सकते हैं कि स्त्री-पुरुष समान हैं,
दोनों के शरीर और आत्मा समान हैं, मैं कहूंगा हरगिज़ नहीं।
स्त्री-पुरुष कभी समान नहीं। दोनों सदा असमान रहेंगे। और उनके
समान बनने की चेष्टा करना संसार में आफत लाने का कारण होगा।
यहां मैं यह नहीं कहता कि स्त्री छोटी और पुरुष बड़ा है। स्त्री तुच्छ
और पुरुष श्रेष्ठ है। मैं तो केवल यह कहता हूं कि दोनों पृथक् वस्तु
हैं---अपने-अपने स्थान पर प्रत्येक का महत्त्व है। उसी स्थान पर
प्रत्येक को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
उपर्युक्त पत्र में दो बातें मुझे मालूम पड़ीं। एक यह कि
ये आदरणीय महिला अपने दिमाग में उस पश्चिमी जहरीली हवा को
थोड़ा-बहुत भरे हुए हैं जो स्त्री जाति को असहाय बना रही है। हम
क्यों पुरुष के अधीन रहें, क्यों प्रसव करें, इससे स्वास्थ्य
और यौवन नष्ट होता है, चैं-पैं पल्ले बंधती है। हमारा विवाह
का उद्देश्य यह है कि पति रुपये का ढेर कमाकर हमें दे। मोटर
हो, बंगला हो, पति प्रतिक्षण पालतू कुत्ते की भांति दुम हिलाता
हमारे चारों तरफ जिमनास्टिक के जैसी कसरत करता रहे, रंग-बिरंगी
साड़ी लाए, पहनाकर देखे। इसके बाद सब दरवाजे बन्द करके गड़प
अन्धकारपूर्ण कमरे में दोनों परस्पर के शरीर और प्रेम को खूब खाएं
और जो बचे, सो बिखेरें। स्त्रियां समझती हैं कि पति के रत्ती-रत्ती
प्रेम पर, शरीर पर, सम्पत्ति पर, सर्वस्व पर, सिर्फ हमारा ही अधिकार है।
मैं स्त्रियों के इस पागलपन के दावे को कतई खारिज
करता हूं। पहली बात तो यह है कि पति-पत्नी को अपनासम्पूर्ण प्रेम एक-
दूसरे ही में नही खर्च करना होगा, उसके दावेदार, हिस्सा बटाने
वाले और भी हैं। गृहस्थ एक वृक्ष है, जिसमें सैकड़ों शाखाएं और
फल हैं, दम्पति सबका केन्द्र है। स्त्री और पुरुष को मिलकर अपना
सर्वस्व का भाग परिजनों को भी देना है, देश और मनुष्य
जाति का भी उसमें हिस्सा है। उदार भाव और उदार जीवन यदि स्त्री न बना
सके तो वह दम्पति-धर्म से च्युत हो जाती है। स्त्रियों का जीवन-संसार घर है।
पुरुषों का बाह्य संसार है। पुरुष बाह्य संसार से सम्पदा हरण करके घर में
लाता है। स्त्री का काम उसका संचय और सदुपयोग करना है। हिटलर ने अपने
देश की स्त्रियों से कहा था कि---विज्ञान और मशीनरी ने १०० पुरुषों का काम
१० आदमियों द्वारा होना सम्भव कर दिया है। इससे हमारे ९० आदमी बेकारी
में फंस रहे हैं, जो हमारे राष्ट्र की बड़ी भारी चिन्ता का विषय है। अब यदि
स्त्रियां भी पुरुषोचित कामों को करके उन १० में हिस्सा बटाएंगी तो हम किसी
भी हालत में सार्वजनिक बेकारी का मुक़ाबला नहीं कर सकेंगे। इस- लिए मैं
अपनी माताओं और बहनों को सलाह देता हूं कि वे दफ्तरों, कार्यालयों और
बाज़ारों से हट जाएं। वे अपने घरों को संभालें, बच्चों की परवरिश करें, थके और
चिन्तित पतियों पर आराम और प्रेम की वर्षा करें, जिससे यह संसार हम पुरुषों
के लिए, जो सदैव विपरीत भाग्य से युद्ध करने के लिए बने हैं, आनन्द
और आशा का संसार बन जाए।
मैं कहूंगा कि ये स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने वाले शब्द यूरोप की
एक बड़ी भारी ग़लती को सुधारने वाले हैं, जिसके कारण यूरोप
का दाम्पत्य जीवन अविश्वस्त, असुखी तथा अस्त-व्यस्त बन गया है।
पाश्चात्य स्वाधीनता की यह लहर शिक्षा के साथ हमारी बहन-बेटियों
के मस्तिष्क में घर कर गई है। इससे वे प्रायः पतियों से विद्रोह करने लगती हैं।
मेरा कहना है कि कोई स्त्री पुरुष के
अधीन नहीं, पति के अधीन है। पर सोचना चाहिए कि क्या पति उसके अधीन नहीं है।
यह तो प्रेम की अधीनता है। यह अधीनता गुलामी नहीं, यह तो हृदय की सर्वाधिक कोमलता है।
अब रही अन्तिम बात। वह यह कि पति मर्यादा से बाहर मौज-बहार करता है,
तथा पत्नी को घर में कैदी बनाकर डाल दिया है। वह नौकर-चाकरों में दिन काटती है। मैं तसलीम
करता हूं कि पुरुष ऐसे आवारागर्द हो जाते हैं और उनके लिए स्त्रियों को दृढ़तापूर्वक मुकाबले को
तैयार हो जाना चाहिए। जिस प्रकार जमीन-जायदाद पर अधिकार पाने के लिए लोग खूब लड़ते हैं,
स्त्रियों को भी खूब लड़ना चाहिए। पर 'पर-घर' तो नहीं कहना चाहिए। जो स्त्री 'पति-घर' को 'पर-घर'
कहेगी, वह लड़ेगी किस अधिकार से? प्रथम उसे 'अपना घर' 'अपना पति' बनाना, पीछे यदि अनाचार
दीखे तो युद्ध ठान देना। पर प्रश्न यह है कि---प्रथम उसे अपना लेना---यह स्त्री जाति के लिए बड़ी
भारी तपस्या है। प्रायः पढ़ी-लिखी स्त्रियां ऐसा नहीं कर सकतीं। वे न पति की सेवा करती हैं, न
बच्चों की। पति को वश में करने के लिए वे केवल शृंगार-पिटार काफी समझती हैं और बच्चों को
नौकरों के सुपुर्द करना। बहुधा ऐसी ही स्त्रियों के पति आवारागर्द होते हैं। वास्तव में पत्नी का
सबसे बड़ा गुण विनय और सेवा है। पुरुष तो क्या, हिंसक जन्तु भी उससे वश में होते हैं। महर्षि
वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र में पत्नी के गुण इस भांति लिखे हैं---
पति को देव-समान आदरणीय समझे, उसकी सम्पति से परिवार और गृहस्थ का
संचालन करे, सदा पवित्र वेश धारण करे। घर को फुलवारी और विविध वस्तुओं से सजाए,
परिजन, अतिथि, पति के मित्र आदि का यथावत् सत्कार करे, घर के आंगन में तरकारी बो दे,
फल के वृक्ष लगाए, फलों का सदुपयोग करे। ऋतु, देश, काल और घर के मनुष्यों की मरजी के
अनुकूल भांति-भांति के स्वादिष्ट भोजन बनाए। पति को बाहर से आया
जान, प्रेम और आदर से घर में सत्कार करे। सेवकों और दासियों के रहते भी स्वयं पति की
सेवा करे। पिता के घर या सम्बन्धियों के यहां उत्सव आदि में बड़ी-बूढ़ियों के साथ जाए। पति के प्रथम
जागे और पीछे सोए। बिना खास काम के सोते पति को न जगाए। भण्डार आदि को खूब सजाए,
पशु-पक्षी आदि का प्रेम से पालन करे, पर-पुरुष सम्बन्धी से भी एकान्त में बातचीत न करे। शरीर
को दुर्गन्धित न होने दे, आभूषण, फूल आदि उपयुक्त ही धारण करे, अधिक नहीं। घर-गृहस्थ की
सब चीजों को फसल में संग्रह करके रख ले, किसी चीज को खराब न जाने दे। हिसाब-किताब
आदि ठीक-ठीक रखे। सेवकों को समय पर वेतन, भोजन देकर संतुष्ट रखे। अचार, मुरब्बे, सिरका,
आसव आदि सब कुछ निर्माण करे। इन गुणों से स्त्री पति की अनुरक्ता हो जाती है।
संक्षेप में निष्कर्ष यह है कि स्त्रियों को पति और पति-घर से
पूरी ममता, प्रेम और आत्मीयता रहनी चाहिए। उस घर और
घर से सम्बन्ध रखने वाली प्रत्येक वस्तु की रक्षा और पालन का
ध्यान रखना चाहिए। जिस प्रकार बीज गलकर वृक्ष उगता है, उसी भांति गृहस्थ के खेत में
स्त्री को गल जाना चाहिए उस गृहस्थ से भिन्न उसका कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं रहना चाहिए।
स्त्री को सब परिस्थितियों को युक्ति और अध्यवसाय से अनुकूल और सौम्य बनाकर अपना जन्म धन्य करना चाहिए।
पति या घर का कोई भी व्यक्ति, चाहे वे सास-ससुर, गुरुजन
ही क्यों न हों, कोई अनाचार करे तो तुरन्त वीरतापूर्वक अन्त-
युद्ध छेड़ देना चाहिए और वह उस समय तक बन्द न किया जाना चाहिए,
जब तक कि विरोध के कारण जड़मूल से नष्ट न हो जाएं।
अपने प्रियजनों से युद्ध करना शत्रु से युद्ध करने की अपेक्षा भिन्न वस्तु है।
शत्रु से युद्ध तो शत्रु को नष्ट करने के विचार से किया जाता है, परन्तु अपने प्रियजनों से
युद्ध का अभिप्राय यह होता है कि दोनों में जो भिन्नता या विरोध है---जिससे विश्वास
और प्रेम की लता सूखती है---वह नष्ट हो जाए, दोनों एक हो
जाएं। एक रस, एक प्राण, एकीभूत। इस अन्तर्युद्ध में जो कायर
बने, जो तरह दे, जो ढील छोड़े, वह अपने ही घरका---जीवन की शान्ति का---शत्रु है।
हां, मैं कहूंगा कि यदि अपराध करने पर पति को डांटना पड़े
तो अवश्य डांटना चाहिए। यद्यपि डांटना घृणास्पद चीज है, पर
लोग स्त्रियों को डांटते हैं। बच्चों को भी डांटते हैं---जब तक
डांटना दण्ड के विधान में जारी है। घोर अपराध---जैसे शराब,
जुआ, व्यभिचार, धूर्तता, क्रूरता आदि---के बदले पति को
डांटना, भोजन बन्द कर देना, आवश्यक है। सुखी परिवार में
पति-पत्नी दोनों परस्पर विश्वास, प्रेम और आदर भाव रखें। दोनों अपने कर्त्तव्य में दृढ़ रहें।
आवश्यकता पड़ने पर दोनों, दोनों को सीमित-संयमित रखने में समर्थ रहें। यही दाम्पत्य जीवन
में सुख-शांति देने वाली बात है, अपने घर को 'पर-घर' बनाने से काम नहीं चलेगा।
---चतुरसेन