गेरुआ बाबा Ch. 1

अध्याय 1

Posted by Storymania Classic Hindi • Sep 02, 2026 01:44 PM

“सुपरिंटेंडेंट साहब हैं?”

“ऑफिस में जा ऑफिस में।”

हाथ में एक लिफाफा लिये हुए एक लड़के ने पूछा, फिर भीतर से दाई का जवाब पाकर कहने लगा, “किधर, ऑफिस है किधर?”

“आमर! बौड़दा! ऑफिस नहीं जानता। कैसा आदमी है?” कहती हुई एक दाई निकल आई।

दाई आई तो थी अनखायी हुई, लेकिन सामने एक सुंदर लड़के को हाथ में चिट्ठी लिये देखकर हँसती हुई बोली, “लाओ देखें तो किसका है?”

पढ़कर उसने लड़के को लिफाफा लौटा दिया। कहा, “हाँ, सुपरडंट साहब का है। ले जाव! वह देखो फाटक दिखलाई देता है। उसी में ऑफिस है, जाव।”

लड़का ब्वॉय मेसेंजर था। दौड़ता हुआ ऑफिस में गया। एक महाशय कुरसी पर बैठे रजिस्टर उलट रहे थे। नमस्ते कहकर उसने चिट्ठी दी। जवाब में जो निकला, उनके कंठ से बाहर नहीं हुआ था कि लड़के ने कहा, “यहाँ अभिवादन लेने का दस्तूर नहीं है क्या?”

इस छोटे से लड़के का वज्र सा उलाहना कुरसीवाले को बेध गया। कहा, “नमस्ते के जवाब से अधिक जरूरी तो तुझको चिट्ठी का जवाब चाहिए। जाव उस कमरे में।”

लड़का चिट्ठी उठाकर यह कहता हुआ चला, “हाँ! तभी न! मैंने तो समझा था कि आप ही सुपरिंटेंडेंट हैं। जो सुपरिंटेंडेंट होगा, वह अभिवादन को इस तरह लात नहीं मारेगा, न तुम ताम ही करेगा।”

बात यह है कि वह कुरसी पर का बैठा हुआ ऑफिस का आदमी नहीं शहर का था, जिसका कोई पहचान का आदमी उसी कुरसी पर बैठकर काम करता था। लेकिन अभी तक वह आदमी नहीं आया था। इसी से वह अपनी पहचानवाले की कुरसी पर बैठ उसकी राह देखता था। इस आदमी का अनोखा स्वभाव था। जब इसको कोई सलाम करता, आपसी सलाम करता था। जब कोई आदाब कहता तो आदाब आप भी कहता। कोई गुडबाई करता तो आप गुडबाई करता था, लेकिन जब कोई नमस्ते कहता, तब यह कहता था कि हम नहीं समझते।

लेकिन लड़के के नमस्ते कहने पर अपनी वह बात भी भूल गया। और भीतर जाने का इशारा करके आप वहाँ से उठ खड़ा हुआ।

जब लड़का भीतर जाकर एक बड़े कमरे में पहुँचा। सामने ही बैठे एक गंभीर पुरुष को देखकर पूछा, “सुपरिंटेंडेंट साहब कहाँ हैं?”

“क्या काम है?”

लड़का, “चिट्ठी लाया हूँ।”

“किसकी है लाओ।”

माथ नवाकर उसने चिट्ठी दी। झट उन्होंने खोलकर पढ़ा। और उसी दम जवाब लिखा, “आपको आदमी भेजा गया है।”

लड़का जवाब लेकर चला गया।

100%