अध्याय 2
हम वहाँ चिट्ठी भेजने और जवाब देनेवाले दोनों का कुछ परिचय देना चाहते हैं। शहर का नाम हम नहीं बतलावेंगे, न सन् न महीना या तारीख ही का पता देंगे। शहर का नाम अलकापुर कहेंगे। दिनों की बात हम कहते हैं, उन दिनों वहाँ सेवा समिति स्थापित हो गई थी। जो मेले-ठेले और समय-समय पर राजा-प्रजा दोनों को सहायता देती थी और लोगों के उसके काम पर बड़ी श्रद्धा-भक्ति थी। उसके मेंबरों की मुस्तैदी और परोपकार के कारण सब लोगों का उस समिति पर बड़ा विश्वास था। समिति में दो आदमी ऐसे थे, जो जासूसी का काम करते थे। इस कारण बड़े-बड़े लोग अपने संगीन मामले पुलिस में रपट करके उसी सेवा समिति के हाथ में सौंपते और सफलता पाकर जी से प्रसन्न होते और उनके काम करनेवालों को पुरस्कार देते थे। आज जो चिट्ठी आई वह भी इसी तरह की थी। उसमें इतना ही लिखा था कि आप अपने गेरुआ जासूस को फौरन भेजिए, बहुत ही जरूरी काम आ पड़ा है।
समिति में एक विकट जासूस थे जो ऐसे ही भेद भरे गूढ़ मामलों में छोड़े जाते थे। वह सदा गेरुआ पहने रहते थे। इससे सब लोग उनको गेरुआ बाबा कहा करते थे।
सुपरिंटेंडेंट ने गेरुआ बाबा को बुलाकर वह चिट्ठी दे दी और लड़के को जवाब देकर विदा किया।
इधर, गेरुआ बाबा भी रवाना हो गए। जब वह चिट्ठी भेजनेवाले मुरलीधर के दरवाजे पहुँचे, तब देखा कि मुरलीधर शहर से बाहर सदर में रहते हैं। पता मिला कि नौकरी से पेंशन लेकर उन्होंने बड़े लंबे-चौड़े मैदान में तीन महल का मकान बनाया है। मकान के चारों ओर कोई चार बीघे में एक सुंदर बाग लगवाया है। बड़े हॉल के बगलवाले कमरे में एक सफेद संगमरमर के टेबल के सामने कुरसी पर बैठे एक महाशय मानो किसी की राह देखते हैं। उज्ज्वल गोरा बदन देखने से ही जान पड़ता है कि कोई भाग्यवान आदमी हैं।
उन्होंने पूछा, “आप सेवा समिति से आए हैं?”
“जी हाँ।”
तब आदर से बिठाकर कहने लगे, “आपसे मैं एक अद्भुत घटना बयान करता हूँ। आप दया करके इसका पता लगाइए।”
“आप सब आदि से अंत तक कह जाइए।”
“मेरी एक लड़की है। नाम उसका प्यारी है। उसकी शादी दो साल बीते सेठ दुर्गाप्रसाद के लड़के मूलचंद से कर चुका हूँ। लड़की का वहाँ उसके गुणों से बड़ा आदर है। सास ने हीरे-मोती के जड़ाऊ गहने बहुत भेजे थे। हीरे का एक जड़ाऊ हार, एक सिरबिंदी, एक जोड़ा कान का और एक नाक का गहना था। एक बड़ा हीरा जड़ा जूड़े का चंदवा, एक चंपाकली सब मिलाकर तीस हजार का माल था। उस सनीचर को न जानें किस कुसाइत में यहाँ पहुँचा कि कल शुक्रवार को रात को सब गायब है।”
गेरुआ, “तो मुझे उन्हीं गहनों का पता लगाना होगा क्या?”
“जी हाँ, मैं आपको अच्छी तरह खुश करूँगा। आप इन गहनों का पता लगा दीजिए। देखिए ये गहने चढ़ाव के हैं। इनके नहीं मिलने से मेरी कितनी बदनामी है, सो आप समझ सकते हैं।”
अब गेरुआ बाबा ने उन चोरी की गई चीजों का नाम, दाम, वजन, रंग सब अच्छी तरह ऐसा लिख लिया कि देखते ही पहचान सकें।
फिर मुरलीधर ने उनसे कहा, “एक बात बड़े अचरज की है कि चोर गहनों का बॉक्स यहीं फेंक गया है। उसके देखने से जान पड़ता है कि जोर करके वह खोला गया है। मैंने आदमियों को तो अच्छी तरह घुमा-फिराकर, हिला-डुलाकर जाँच लिया है। इनसे कुछ पता नहीं चलता।”
गेरुआ, “चिंता नहीं।”
मुरलीधर, “दो बात मैं आपसे कहना चाहता हूँ। किसी को मैंने अभी तक वह नहीं कहा।”
गेरुआ, “कहिए।”
मुरलीधर, “पहली बात तो यह है कि गहनों के बॉक्स के किनारे पर खून लगा था। मालूम हुआ कि जल्दी में खोलते समय बॉक्स का कोना खोलनेवाले की देह से लगने से खून निकला है और मेरी लड़की की एक लौंडी, जिसका नाम फेंकनी है, उसके हाथ में भी कट जाने का दाग है। यह लौंडी अभी हमारे यहाँ नई आई है। इसके ऊपर जरा खयाल रखता हूँ, लेकिन अगर उसी ने चुराया है, तो रंग-ढंग से कुछ भी पहचानी नहीं जाती। दूसरी बात यह है कि मेरी छोटी लड़की, जो नव बरस की है, आज यह एक हीरा मेरे पास लाई है।”
यही कहकर मुरलीधर ने एक हीरा जासूस के आगे निकालकर रख दिया।
गेरुआ बाबा ने देखा कि बड़ा चमकदार और दामी हीरा है। आकार में छोटा होने पर भी चमक-दमक से वह अँधियारे घर का उजियाला है।
मुरलीधर, “इसको वह कहती है कि लौंडी फेंकनी के कमरे में बॉक्स के नीचे मिला है। यह उन्हीं गहनों में से एक में जड़ा था। मालूम होता है, उससे उखाड़ लिया गया है।”
गेरुआ, “अच्छा जिस कमरे में यह सब गहने थे, उसको एक बार हम देखना चाहते हैं।”
अब मुरलीधर गेरुआ बाबा को प्यारी के कमरे में ले गए। उन्होंने कमरे को अच्छी तरह देखा। उनकी समझ में नहीं आया कि भीतर कैसे आदमी आया होगा, क्योंकि बाहर से ऊपर चढ़ने के लिए कुछ उपाय नहीं था। एक खिड़की से एक फव्वारा तीन-चार फीट की दूरी पर पानी फेंक रहा था, लेकिन वह बहुत पतला था। यहाँ तक कि बहुत बोझ भी नहीं ले सकता था। अगर कोई उस पर चढ़ता, तो सब लिये-दिए गिर जाता और कोई भी उपाय बाहर से ऊपर चढ़ने को नहीं था। सब देख-सुनकर गेरुआ बाबा ने एक बार उन सब लोगों को देखने का इरादा किया, जो उस घर में रहते थे। अब सब लोग बारी-बारी से आने लगे और जासूस उनको कुछ पूछ-पाछकर विदा करने लगे।
इससे मुरलीधर की लड़की प्यारी को भी आना पड़ा। दो-चार बात ही गेरुआ बाबा ने उससे पूछी, लेकिन उतने में प्यारी का चेहरा फक हो गया था। उसने जासूस से कहा, “मैं तो बहुत हैरान हूँ, कैसे क्या हुआ! देखिए इस कमरे में एक ही तो दरवाजा है, इसके सिवाय जिस चाबी से यह बंद था, वैसी चाबी भी किसी की नहीं थी। इसके जोड़ की चाबी नहीं है और चाबी मैं खास अपनी जेब में रखती हूँ।”
गेरुआ, “आप जब रात के आठ बजे पीछेवाली दालान में गईं, तब आपके गहनों का बॉक्स कपड़ों के बॉक्स के ऊपर ही था?”
प्यारी, “हाँ!”
इतना सुनने पर गेरुआ बाबा ने दीवार को अच्छी तरह नीचे-ऊपर देखा कि क्या जाने कोई चोर दरवाजा हो, लेकिन कहीं कुछ भी पता नहीं चला। न छत में ही ऐसा कहीं रोशनदान या छेद मिला, जिससे बाहर का आदमी भीतर आ सके।
यह सब अच्छी तरह देख चुकने पर फेंकनी लौंडी उनके सामने आई। वह पश्चिमी हिंदुस्तान की रहनेवाली थी। उसका चेहरा घूरकर जासूस ने कहा, “यह तो बतलाओ लौंडी कि जब रात को गहनों का बॉक्स चोरी गया, उससे पहले ही तुम्हारे हाथ में यह जख्म था या पीछे हुआ?”
सुनते ही फेंकनी का रंग उतर गया। वह कुछ सेकेंड तक गेरुआ का मुँह ताकती रह गई। फिर उन्होंने पूछा, “जख्म होने और खून गिरने की बात याद है या नहीं?”
लौंडी, “याद क्यों नहीं है साहब?”
गेरुआ, “और गहनों के बॉक्स पर भी खून गिरा है। अच्छा बतलाओ तुम्हारे हाथ पर यह खून कैसे लगा?”
लौंडी, “एक आलपिन के गड़ जाने से यह खून निकला है।”
इतने में मुरलीधर के मुँह से निकला, “बेतहाशा, अरे तू निकल गया।” गेरुआ बाबा ने रोक दिया। और आप लौंडी का हाथ उलट-पुलटकर देखने लगे। मालूम हुआ कि एक जख्म है और वह आलपिन या सूई सी पतली चीज से नहीं हो सकता।
अब गेरुआ बाबा ने वह हीरा दिखाकर पूछा, “अच्छा, तुम्हारे कमरे में तुम्हारे बॉक्स के नीचे यह कैसे गया?”
लौंडी अचकचाकर कई सेकंड तक वह हीरा देखती रही। फिर चकित होकर कहने लगी, “आपने इसको मेरी कोठरी में पाया है क्या?”
इस समय उसका चेहरा देखकर कुछ और अटकल तो नहीं हो सका। उन्होंने जवाब में कहा, “हाँ, हाँ।”
अब तो लौंडी हाथ जोड़कर आँखों में आँसू भरकर जासूस से विनती करने लगी, “देखिए साहब! आपकी बातों से मालूम देता है कि मुझे ही आप चोर समझ रहे हैं, लेकिन मैं इस मामले में बिल्कुल बेकसूर हूँ। जिसकी कहिए, उसकी कसम खाकर मैं कह सकती हूँ कि मैं बिल्कुल बेगुनाह हूँ। बबुई का गहना किस बॉक्स में वहाँ रहता है, मुझे कुछ भी मालूम नहीं था। अगर मुझे मालूम हो तो उसे बचाऊँगी कि ऐसी नमकहरामी करूँगी। हमारी दोनों आँखें फूट जाएँ, जो हमको कुछ भी मालूम हो तो!”
प्यारीबाई भी उसी कमरे में मौजूद थी। लौंडी की ओर होकर बोली, “नहीं, लौंडी पर मेरा पूरा विश्वास है। और वह उस घर में जाएगी कैसे? ताला बंद था। यह कहें कि चाबी की नकल उसने बनवा ली थी, तो वह बात भी नहीं है।”
जासूस ने चाबी माँगकर देखी, तो वह एक नए ढंग की थी। जब तक उसकी छाप मोम से लेकर दूसरी नकल न तैयार की जाए, तक तब ताला हरगिज नहीं खुल सकता।
जब लौंडी की पूछताछ हो चुकी, उस कमरे से और सब लोग विदा कर दिए गए। जासूस ने कहा, “गहनों को बरामद करना और चोर को पकड़ना दो काम हैं और दोनों के लिए समय दरकार है। और यह घटना ऐसी है कि जल्दी पता लगने का ढंग नहीं है। मैं चाहता हूँ कि घर का कोई आदमी घटना का हाल कहीं किसी पर जाहिर न करे। अखबार वगैरह में भी खबर न छपे। आप इन सब बातों पर ध्यान रखिए।”
मुरलीधर, “अच्छा, फेंकनी को आपने कैसा पाया?”
गेरुआ, “वह तो हमको बेगुनाह मालूम देती है।”
मुरलीधर, “आप ऐसा क्यों समझते हैं?”
गेरुआ, “मुझे तो ऐसा ही मालूम देता है। खैर, अब मैं जाता हूँ। जब जरूरत होगी, आपसे मिलूँगा या खबर दूँगा।”
यही कहकर जब गेरुआ बाबा बाहर निकले, तो बगल के एक कमरे से एक बुढ़िया सामने आई। और जासूस को इशारे से बुला ले गई। उसके घर जब गेरुआ बाबा जाकर बैठे तो उसने पूछा, “आपने फेंकनी से बातचीत की है?”
गेरुआ, “हाँ, जो कुछ पूछना था, सो तो पूछ लिया।”
बुढ़िया, “तो जवाब पाकर आपने उसको कैसा समझा है?”
गेरुआ, “मुझे तो लौंडी बेकसूर मालूम हुई।”
बुढ़िया, “तब गहने से वह हीरा कैसे गिरकर उसकी कोठरी में जा पड़ा?”
गेरुआ, “आपको हीरा की बात पहले से ही मालूम है क्या?”
बुढ़िया, “मैं इसी हीरे की बात नहीं, साहब बहुत सी बातें जानती हूँ। किसी से कहा नहीं, आपको गंभीर आदमी देखकर कहती हूँ, क्योंकि यह सब बातें पहले से जाहिर हो जाने पर असल चोर खबरदार हो जाएगा और माल भी न मिलेगा। उस सनीचर की रात बड़ी भयावनी थी। फेंकनी उस अँधेरे में किसी मर्द से बात करती थी। जरा दूर थी, इससे मैं सब बातें तो नहीं समझ सकी, लेकिन मर्द की दो-एक बातें सुनने में आईं। वह कहता रहा कि प्यारी की कौन खिड़की बगीचे की ओर खुली है।”
इसके बाद कुछ देर तक बुढ़िया चुप रही। गेरुआ बाबा ने कहा, “सब बातें कह जाव, रुकती क्यों हो?”
बुढ़िया बोली, “उसके बाद की बातें समझ में ठीक से नहीं आईं। लेकिन एक और मामला मैं बतलाती हूँ, जिससे मालूम होगा कि दोनों किस गरज से वहाँ अँधेरे में मिले थे। वह बात यह है कि कल जब पहर रात बाकी थी तो बगीचे के किनारे किसी की आहट मिली। मालूम हुआ कोई तेजी से दौड़ा जाता है। फिर साँय-साँय, फुस-फुस सुनाई दिया। इतना मैंने बहुत धीरे-धीरे सुना, ‘तब अंत में यही हुआ कि जान नहीं बचेगी।’
“उसके बाद ही मैंने देखा कि एक आदमी किनारे-किनारे दौड़ा जाता है। बादल हट गए थे, अँधियारे पाख की दशमी का चाँद निकल आया था। उसी उजियाली में मैंने उस मर्द को दौड़ते हुए अपनी आँखों देखा था। वह बगीचे के फाटक की ओर गया था। उसका एक हाथ छाती पर था, जिसमें एक चमकता हुआ जड़ाऊ जेवर था। मैंने चाँदनी में उसकी चमक देखी थी, गहना बड़ा कीमती था। इसमें संदेह नहीं है।”
गेरुआ, “अच्छा, उस आदमी को आप पहचानती हैं या नहीं?”
बुढ़िया, “पहचानती क्यों नहीं, वह थे तो मूलचंद मुरली ही बाबू के दामाद।”
गेरुआ, “ऐं! प्यारी के मालिक ही थे?”
बुढ़िया, “हाँ, वही थे।”
गेरुआ, “वही गहना लिये जा रहे थे?”
बुढ़िया, “हाँ, और गहना प्यारीबाई का ही था। मैं सब गहना उनका पहचानती हूँ।”
गेरुआ, “तो क्या आप समझती हैं कि दामाद ही ने यह काम किया है?”
“मोको समझने-वमझने से कुछ मतलब नहीं। न मैं कभी उसको जानती हूँ कि ऐसा है। लेकिन जो आँखों से देखने में आया, वही आपसे कह दिया है। चोर-साहु आप जानें!”
जब गेरुआ बाबा ने बुढ़िया से यह सुना कि घटना आधी रात के बाद हुई है, तब दो-चार जरूरी बातें पूछने के लिए फिर प्यारी के पास लौट आए। देखा तो पीछे-पीछे वह बुढ़िया भी धीरे-धीरे चली आ रही है।
जब प्यारी के सामने पहुँचे, देखा तो वह उदास आँखों से ताक रही है। चेहरा सकपकाया हुआ है। गेरुआ बाबा ने पूछा, “अच्छा! पाहुन मूलचंदजी कब यहाँ आए थे?”
प्यारी, “कल सूरज डूबने पर।”
गेरुआ बाबा, “वह कब तक यहाँ रहे। रात भर तो ठहरे रहे न?”
प्यारी, “ना, ना! कल ही रात के दस बजे चले गए। कहते थे जल्दी विदेश जाने की साइत है।”
गेरुआ, “उनके जाने पर कितनी देर पीछे आपके गहने चोरी गए?”
प्यारी, “जब वह चले गए, तब मैं नीचे आई और थोड़ी देर पीछे ऊपर गई, देखा तो गहने नहीं हैं।”
गेरुआ बाबा, “जब आप संध्या को कल नीचे गई थीं, तब गहना था, इसमें तो कुछ संदेह नहीं है न?”
प्यारी, “नहीं, इसमें कुछ संदेह की बात नहीं है।”
गेरुआ, “आपने अपने कमरे से खिड़की की राह बगीचे में देखा था, कोई आदमी था?”
प्यारी, “मैं तो साहब खिड़की की ओर नहीं गई, न किसी को देखा ही था।”
गेरुआ, “अच्छा, आपके गहने मूलचंद ने देखे थे?”
प्यारी, “हाँ, देखे थे। और यह भी कहा था कि बहुत दामी हैं।” अब गेरुआ बाबा वहाँ से बाहर निकले, लेकिन आस-पास अच्छी तरह उन्होंने जाँचा। चारों ओर बगीचे में भी घूमे। यह भी देखा कि चहारदीवारी में किधर-किधर को दरवाजे हैं, लेकिन किसी को उनकी जाँच की कुछ खबर नहीं हुई।
यह सब देखकर गेरुआ जासूस सदर सड़क पर जब पहुँचे तो देखा फेंकनी बगीचे के फाटक से निकलकर तेजी से सड़क पार कर गई। मालूम हुआ कोई चीज छाती पर रखे है, लेकिन बड़ी ही सावधानी से छिपाए जा रही है। एक बार उसने वहाँ हाथ रखकर देखा कि है या नहीं। फिर बेफिक्र होकर चलने लगी।
गेरुआ बाबा भी झपटकर उसके पास पहुँचे और रोककर कहा, “सुन तो फेंकनी! सुन तो।”
“अरे! आप हैं। इधर कहाँ से?” कहकर फेंकनी खड़ी हो गई।
जासूस ने कहा, “यह चोली के नीचे चिट्ठी किसकी रखे है रे?”
फेंकनी, “कहाँ, चिट्ठी कहाँ? मैं चिट्ठी काहे रखूँगी? मोको कौन काम है?”
गेरुआ, “चलाकी मत कर फेंकनी। दिखा चिट्ठी किसकी है। ये दिखाए जाने नहीं पावेगी।”
फेंकनी फिर धीरे से बोली, “अरे कोऊ की छिपी चिट्ठी हो तब?”
गेरुआ, “अच्छा लिखा किसने है?”
फेंकनी, “कोऊ तो लिखे ही होगा न?”
गेरुआ, “बता तो कौन ने भेजा है?”
फेंकनी, “अरे, यह सब तो घरू बातें।”
गेरुआ, “अरे, बतलाती है सीधी तरह से कि नहीं?”
फेंकनी, “बबुई की तो है।”
गेरुआ, “किसको लिखा है?”
फेंकनी, “आप सब पूछ लेंगे?”
गेरुआ, “बोल! बोल किसको देने जाती है?”
फेंकनी, “अपनी सासरे को लिखिन हैं।”
गेरुआ, “अच्छा, देखें तो क्या लिखा है?”
अब फेंकनी बड़ी सकपकाई। गेरुआ ने कहा, “इधर-उधर मत कर, दे दे सीधे तरह से। जानती है हमको कि नहीं?”
फेंकनी, “जानने की बात नहीं, लेकिन कोऊ के भीतर की बात आप काहे वास्ते देखने को चाहत हैं?”
गेरुआ, “बस सीधे देती है कि हवालात जाएगी बोल।”
हाथ जोड़कर फेंकनी बोली, “न हुजूर? बबुई से कसम करके आई नहीं तो दिखा देती।”
गेरुआ, “अरे, सीधे देती है या हवालात में चलकर देगी? अच्छा चल तेरे कपड़े उतारे जाएँगे तब देगी। भलमनसाहत का जमाना नहीं है।”
जब फेंकनी ने देखा कि इन देवता से नहीं बच सकती, तब लाचार होकर दे दिया।
जासूस ने देखा उस पर मूलचंद का नाम लिखा है। झट उसे जेब में रखा और कहा, “देख, फेंकनी किसी से यह बात कहना मत। थोड़ी देर बाद ठीक समय पर जाना और कह आना कि चिट्ठी दे आई हूँ।”
अकचकाकर फेंकनी बोली, “अरे! इतना झूठ! बबुई से सब झूठ जाकर कहूँगी।”
गेरुआ, “नहीं कहेगी तो हवालात ही पसंद है?”
फेंकनी, “बाप रे बाप! हवालात।” कहकर फेंकनी चौंक उठी।
गेरुआ बाबा ने कहा, “नहीं, तो कहता हूँ सो सुन और जा जैसा कहता हूँ वैसा कर। नहीं तो जेल में भर दूँगा। तू समझती है कि नहीं?”
यही कहकर जासूस ने लिफाफा खोला। उसमें यों लिखा था—
“प्यारे! आप तो विदेश जानेवाले हैं, उसमें देर न कीजिए। चल दीजिए। जिन चीजों को देखकर आपने खुशी जाहिर की थी, उनकी बात क्या कहूँ, मेरा तो सर्वनाश हो गया। आपको बगीचे से जाती बेर देखा था। सब जानती हूँ। लेकिन अपने अभाग्य की बात क्या लिखूँ, जो होना था सो हो गया।
आप ही की
प्यारी”
चिट्ठी पढ़कर जासूस ने समझ लिया कि जिसको प्यारे लिखा गया है, उसको बड़ी चालाकी से खबरदार किया गया है। तो क्या मूलचंद ने ही यह कुकर्म किया है? क्या बात है? मूलचंद भले घर का लड़का है। चाल-चलन में खराबी की बात अभी तक नहीं सुनी गई। फिर ऐसा आदमी अपनी स्त्री के गहने क्यों चुरा लेगा, लेकिन परदेश जाना है, इसके खर्च के लिए कुछ दरकार हो तो इतना दामी माल की क्या जरूरत है? इसके सिवाय प्यारी ने उनको बगीचे से होकर जाते देखा है। जानती सब है, लेकिन कुछ किसी से जाहिर नहीं करती। जान पड़ता है पति की फजीहत और बेइज्जती से डरती है। सोचती है, जिसको पति के सिवाय जगत् में दूसरी गति ही नहीं, वह स्वामी का दोष कैसे जाहिर करेगी। खैर, अब देखना है आगे कौन कैसा उतरता है। ऐसी लिखावट को पाकर हाथ से खोना ठीक नहीं।
अब वहाँ से गेरुआ बाबा अपने ऑफिस की ओर चले। वहाँ पहुँचते ही सेवा समिति के सुपरिंटेंडेंट अवधेश नारायण से भेंट हो गई। अलग एकांत में ले जाकर सब हाल उनसे आदि से अंत तक कह दिया।
अवधेश नारायण ने देखा कि मामला साधारण है। चोर पकड़ने का काम है। इस कारण इसमें गेरुआ बाबा का ही अकेले काम है। यही सोचकर उन्होंने कहा, “तो इसमें तो आप ही सब कर डालेंगे। कहिए, आपको संदेह किस पर आता है?”
गेरुआ, “ढंग से तो जान पड़ता है कि उसी मूलचंद का यह सब काम है।”
सुपरिंटेंडेंट, “और फेंकनी को आप इसमें नहीं समझते?”
गेरुआ, “हाँ, उसको तो मैं बेदाग देखता हूँ, लेकिन उसके हाथ का जख्म देखकर मैंने उस पर भी नजर रखने का ठीक प्रबंध कर दिया है।”
सुपरिंटेंडेंट, “ठीक है, आप जो कार्रवाई उचित समझते हैं, कीजिए। इसके लिए और किसी की कुछ जरूरत नहीं है। अगर कभी काम पड़े, तो फौरन कहिएगा। लेकिन एक बात मैं आपसे कह देना चाहता हूँ। मुरलीधर के पहले का हाल इस मामले में दरकार होगा। इस कारण याद रखिए कि दस बरस हुए उनकी स्त्री मर चुकी है। वह उनकी प्यारी स्त्री थी। उनको यह बहुत मानते थे। यहाँ तक कि दुलार का फल बुरा हुआ। और इनके मित्रों में से एक के साथ वह निकल गई। उस समय वह गर्भिणी थी। नाम उनका देवीबाला था। कुछ दिन तक देवीबाला का पता नहीं लगा। एक बार अपने पेट से जन्मे हुए एक लड़के की बात उन्होंने मुरली बाबू को लिखी थी। मुरली ने उस लड़के को लानेवाले के लिए बहुत इनाम देने का लोभ देकर ढिंढोरा पिटवाया था, लेकिन कहीं उसके लड़के या उसकी माँ का फिर पता नहीं चला। यहाँ भी उन्होंने अपना निवेदन-पत्र भेजा था। उसके बाद दो साल हुए उन्होंने अपनी लड़की प्यारीबाई का विवाह किया। ब्याह किसी भले घर के पात्रा से किया है, लेकिन ब्याह के थोड़े ही दिन पीछे उनकी समधिन का देहांत हो गया। अब घर का वही लड़का बेमाथे का मालिक हुआ।
बाप ने रुपया पैदा किया था, लेकिन एक तो एकलौता लकड़ा पिता के आदर-दुलार ने दिमाग आसमान पर चढ़ा दिया था। इस कारण जो कुछ बाप छोड़ गए थे, उससे उसका चलना कठिन हुआ। खाली खाना, पहनना तो किसी तरह चल भी सकता था, लेकिन बेटा अपना विलास घटाता नहीं। यह सुना था, इधर का हाल नहीं जानता। इतना और मालूम हुआ कि उसकी कोई नौकरी लगी है या लगनेवाली है। मुरलीधर भले आदमी हैं। बतछोड़ धनिकों में उनकी गिनती नहीं है। लेकिन मिजाज उनका कड़ुवा है। और वह कड़ुवाहट इसलिए कि उनका हाथ तंग हो चला है। इतनी बातें जानने लायक हैं, इसलिए कह दिया।”
ऑफिस से बाहर आकर गेरुआ बाबा ने यह मन में ठीक किया कि कैसे कौन सूत धरकर चलना चाहिए।
इधर-उधर खोज-पूछ करके गेरुआ बाबा ने पता पाया कि मूलचंद फिशिंग रिक्वेसिटीज कंपनी के यहाँ नौकरी करते हैं, लेकिन तलब कम है। काम नहीं चलता। इस कारण दूसरी अच्छी नौकरी की खोज में हैं। लाहौर में एक नातेदार अच्छे दर्जे पर हैं। उनके वसीले में उन्हें एक नौकरी मिलनेवाली है। इसी से जल्द लाहौर जानेवाले हैं। अपने शहर में थोड़ी तलब से भी इसीलिए नौकरी कबूल की थी कि घर पर रहेंगे। दिन भर काम करके थके-माँदे घर तो पहुँचेंगे, लेकिन जब संग के चुहेड़े और चिबिल्लों के साथ उतने रुपए से निबाह नहीं देखा, तब बाहर जाने की सूझी। पहले यह भी समझा था कि धन-कुबेर के यहाँ ब्याह हुआ है। वहाँ से भी कुछ मिला करेगा, लेकिन उधर तो आप ही हाथ तंग हो रहा था। इसी कारण सब ओर से निराश होकर नातेदार के जरिए पश्चिम जाने की तैयारी करने लगे।