अध्याय 3
पहनाव-पोशाक से सोलहो आने नई रोशनी के जेंटिलमैन होकर एक महाशय तीसरे पहर को मूलचंद के दरवाजे पर पहुँचे। कोई है, कोई है, कहके पुकारने पर भीतर से एक खिदमतगार हाथ का कारिख झाड़न में पोंछता हुआ बाहर आया। उससे पूछने लगे, “बाबू हैं?”
नौकर बोला, “जी नहीं, ऑफिस गए हैं।”
“कब आएँगे?”
नौकर, “आते तो पाँच बजे हैं, लेकिन आज कुछ ठीक नहीं है।”
“क्यों, ठीक क्यों नहीं?”
नौकर, “आज उधर से ही बाजार करने जाएँगे। बाहर जानेवाले हैं?”
“बाहर जानेवाले हैं सो तो मालूम है, इसीलिए हम आए हैं। उनसे भेंट करना बड़ा जरूरी है।”
नौकर, “कहाँ से आए हैं आप?”
“आता तो हूँ यहीं से। बाजार कितनी देर में करेंगे, क्या मालूम नहीं है? तुमको कह नहीं गए कि कोई आएगा?”
नौकर, “नहीं साहब! यह तो नहीं कह गए हैं।”
“यह क्या हुआ! इतनी जल्दी भूल गए। खैर, जल्दी में हैं। लेकिन मुझको तो उनसे भेंट करनी ही होगी।”
नौकर, “तो आप आइए, बैठिए।”
“हाँ, यही ठीक है।” कहकर वह महाशय भीतर गए। वहाँ बैठक में आसन देकर नौकर चला गया। अब तो वह महाशय बिजली की तेजी से अपना काम करने लगे। कमरे की सजावट, पयंदाज के बाद वाले कालीन की कारीगरी, मखमली कौच की शोभा, दीवारों पर लटकती हुई तस्वीरों की सुंदरता, किसी ने उनको अपनी ओर नहीं फेरा। वह कुरसी के पास वाले टेबल के पास जाकर खड़े हुए और जेब से स्क्रू ड्राइवर निकाल, उसके पेंदे का ताला खोल डाला। जब दराज बाहर खींचा तब उसके भीतर की सब चीजें सामने आईं। सोने का एक ठोस पछुआ मिला, जिसके मुँह बाघ के थे और हर मुँह पर असल नीलम की आँखें लगी थीं। एक चंद्रहार देखा, जिसके बीच का चंद्रमा मानो निकल जाने से जगह खाली हो गई थी, लेकिन आस-पास और बहुत से हीरे-मोती, नीलम-पुखराज करीने से जड़े थे। देखने पर वह महाशय मन में कहने लगे, ‘फिहरिस्त में जो बयान जेवरों में दिए गए हैं, वे इन्हीं के जरूर हैं। जब इसी का उखाड़ा हुआ फेंकनी की कोठरी में मिला है, तब क्या यही समझें कि वह भी इसमें शामिल है। लेकिन मुरलीधर तो कहते हैं, फेंकनी के किसी काम में अभी कुछ पकड़ नहीं मिली है। इसके सिवाय प्यारीबाई का भी फेंकनी पर बड़ा विश्वास है। जान पड़ता है कि बड़ी खबरदारी से इसने गहने चुराए और नीचे फेंक दिए। मूलचंद उनको लेकर चलता बना। फेंकनी के हाथ में घाव है, वह बॉक्स खोलने में ही लगा जान पड़ता है। ऐसा नहीं हो सकता कि बाहर का चोर इस तरह बंद मकान में आकर चोरी करेगा। घर में फव्वारे के ऊपर से गए बिना और कोई उपाय ऊपर चढ़ने का नहीं। खैर, है चाहे जो हो। कुछ तो पता चला। गहना जहाँ का तहाँ ही रहना ठीक है। और गहने कहीं
बेचने या बंधक देने का सुभीता तो है ही नहीं। मैं सब सुनार और सर्राफों को खबरदार कर चुका हूँ। बंधक माल रखनेवालों से बंदोबस्त कर ही दिया है। इसको यहाँ से हटाने में ठीक नहीं है। वह खबरदार हो जाएगा।’
यहाँ यह बतलाना दरकार नहीं होगा कि यह महाशय जो मूलचंद के बैठक में हैं, खुद गेरुआ बाबा जासूस ही हैं। उन्होंने यही सब सोच-विचारकर जहाँ का माल तहाँ रहने दिया और टेबल का दराज ज्यों-का-त्यों बंद करके स्क्रू चढ़ाकर बाहर आए। नौकर से कहा, “देरी तो बहुत हुई यार! अभी आए नहीं।”
नौकर, “हाँ, यह तो कही दिया था कि कुछ ठीक नहीं कि कब आएँगे।”
“अच्छा मैं जाता हूँ, एक चिट्ठी टेबल पर लिखकर रख दी है। उनसे कह देना एक जरूरी काम के वास्ते गए हैं। चिट्ठी दे गए हैं। होगा तो लौटती बेर मैं मिलता जाऊँगा, तब तक तो वह आ ही जाएँगे।” यही कहकर वह देवता वहाँ से चल दिए।