अध्याय 1
बारिश की उस भयानक काली रात में, दिल्ली के सबसे रईस 'रायचंद परिवार' के दरवाज़े एक बेबस औरत और उसके आठ साल के बच्चे के लिए हमेशा के लिए बंद कर दिए गए थे।
"शिवाय, आज के बाद हमारा इन पत्थर दिल लोगों से कोई रिश्ता नहीं है।"
माँ की आँखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन उनकी आवाज़ में एक अटूट हौसला था।
उस आठ साल के मासूम बच्चे ने रायचंद हवेली की तरफ एक आखिरी नफ़रत भरी नज़र डाली, अपनी माँ का हाथ कसकर पकडा और उस अंधेरे में हमेशा के लिए गुम हो गया।
दस साल बाद।
"छोटे मालिक, क्या आप सच में बडे साहब का बुलावा ठुकराना चाहते हैं?"
"मैं रायचंद नहीं हूँ। मेरा नाम शिवाय है।"
"लेकिन आपकी रगों में आख़िरकार खून तो रायचंद परिवार का ही दौड रहा है न।"
"जिस दिन उन्होंने मेरी माँ और मुझे धक्के मारकर उस घर से निकाला था, उसी दिन से मेरा रायचंद परिवार के उन लोगों से कोई वास्ता नहीं है।"
दोपहर का वक्त था। पुणे शहर के एमजी रोड की उस भीडभाड वाली सडक पर एक चमचमाती काले रंग की बेंटले कार खडी थी। यह आलीशान कार आते-जाते हर इंसान का ध्यान अपनी ओर खींच रही थी।
उसी सडक के किनारे, कबाब के एक ठेले पर खडा एक बेहद हैंडसम लडका चुपचाप अपना ठेला और बर्तन साफ कर रहा था।
बेंटले से एक सूट पहने हुए बुज़ुर्ग बाहर निकले और ठेले के पास आकर ऐसे खडे हो गए, जैसे उस नौजवान से कोई बडी गुज़ारिश कर रहे हों।
"छोटे मालिक, आप तो जानते हैं कि उस वक्त जो भी हुआ, वो हालात की मजबूरी थी। माना कि मालकिन के साथ नाइंसाफी हुई, लेकिन बडे साहब ने आपको कभी खुद से दूर नहीं किया..."
"एक साल पहले बडे साहब बहुत बीमार पड गए थे। उन्होंने हमें आपको ढूंढने का आदेश दिया था। अपना पूरा ज़ोर, पैसा और सारे कॉन्टेक्ट्स लगाकर हमने पूरे इंडिया में आपको ढूंढा और आख़िरकार आप मिल ही गए।"
"क्या आप सच में 'शर्मा परिवार' जैसे एक मामूली घर का घर-जमाई बनकर ये ज़िल्लत भरी ज़िंदगी जीना चाहते हैं? अब आप ही रायचंद परिवार की इस पीढ़ी के इकलौते वारिस हैं..."
शिवाय ने बिना किसी इमोशन के कहा, "मुझे किसी परिवार का वारिस नहीं बनना है। और ना ही मुझे रायचंद परिवार का कोई नाम सुनना है। मैं बस यही चाहता हूँ कि आप लोग मेरी ज़िंदगी में दोबारा दखल ना दें।"
अपना ठेला बंद करके शिवाय मुडा और एमजी रोड से बाहर की तरफ निकल गया।
शिवाय को जाते हुए देखकर उस बुज़ुर्ग ने उसका पीछा नहीं किया, बस एक गहरी आह भरी।
"रायचंद परिवार... हा..."
एमजी रोड से बाहर निकलते हुए शिवाय के चेहरे पर एक तंज़ भरी मुस्कान थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी खामोशी छा गई, जैसे वो किसी बहुत पुरानी याद में खो गया हो।
दिल्ली का रायचंद परिवार... पूरे देश का सबसे रईस और ताकतवर खानदान। हर कोई उनके साथ बस एक छोटा सा रिश्ता जोडने के लिए तरसता था, ताकि उनकी किस्मत चमक जाए।
लेकिन शिवाय के लिए, रायचंद परिवार उसके दिल का वो ज़ख्म था, जो कभी भर नहीं सकता था!
शिवाय उसी हवेली में पैदा हुआ था। वो रायचंद परिवार का बडा बेटा था। लेकिन जब वो महज़ आठ साल का था, तब उसके पिता, विक्रम रायचंद, किसी दूसरी औरत के चक्कर में पड गए। जायदाद के लालच और परिवार की सियासत के चलते, विक्रम ने शिवाय की माँ, मीरा मल्होत्रा, को तलाक दे दिया और एक और अमीर घराने की बेटी से शादी कर ली।
मीरा एक आम परिवार से थीं, लेकिन वो बहुत खुद्दार औरत थीं। उन्होंने रायचंद परिवार का एक पैसा भी लेने से इंकार कर दिया और खाली हाथ घर से निकल गईं। शिवाय भी अपनी माँ को छोडकर नहीं रहना चाहता था। परिवार की सारी बंदिशों को तोडकर, वो अपनी माँ के साथ दिल्ली से बहुत दूर आ गया। इसके बाद माँ-बेटे रायचंद परिवार की नज़रों से हमेशा के लिए दूर हो गए।
उसने अपनी माँ के सम्मान में अपना नाम बदलकर 'शिवाय मल्होत्रा' रख लिया।
दस साल बीत चुके थे। तीन साल पहले उसकी माँ भी एक बीमारी के चलते इस दुनिया से चल बसीं। शिवाय को लगा था कि ज़िंदगी के ये कडवे पन्ने अब कभी नहीं खुलेंगे। लेकिन उसे क्या पता था कि रायचंद परिवार उसे ढूंढ ही लेगा?
सडक के किनारे खडे होकर एक सिगरेट पीने के बाद, शिवाय ने टैक्सी रोकी और 'रॉयल ऑर्किड विला' की तरफ निकल पडा।
आज शर्मा परिवार के सबसे बडे बेटे, राजेंद्र शर्मा की बेटी नेहा शर्मा की शादी थी। राजेंद्र शर्मा पुणे के एक जाने-माने बिज़नेस मैन थे।
अगर शादी का ये मौका ना होता, तो शिवाय जैसे 'घर-जमाई' की हैसियत ही नहीं थी कि वो इस विला में कदम भी रख सके।
बीस मिनट बाद टैक्सी विला के बडे से गेट के बाहर रुकी।
वहां हलके नीले रंग की ड्रेस पहने एक बेहद खूबसूरत लडकी खडी थी। उसकी फिगर एकदम परफेक्ट थी और वो बिना किसी एक्सप्रेशन के शिवाय की तरफ ही देख रही थी।
ये कोई और नहीं, शिवाय की पत्नी, काव्या शर्मा थी।
दो साल पहले, 'शर्मा ज्वेलर्स ग्रुप' के मालिक और काव्या के दादा, दीनानाथ शर्मा के कहने पर शिवाय इस घर का दामाद बना था।
उस वक्त इस बात ने पुणे के अमीर घरानों में तहलका मचा दिया था। सब दादाजी का मज़ाक उडा रहे थे कि वो सठिया गए हैं, जो अपनी सबसे खूबसूरत पोती की शादी एक ऐसे अनाथ और गरीब लडके से कर रहे हैं जिसके पास ना पैसा है ना कोई नाम।
काव्या शर्मा पूरे पुणे शहर की जानी-मानी डिज़ाइनर और खूबसूरत लडकी थी। उसे चाहने वालों की कोई कमी नहीं थी।
लेकिन दादाजी ने उसकी शादी एक मामूली से लडके शिवाय से तय कर दी!
ये बात सिर्फ शिवाय और दादाजी जानते थे कि ऐसा क्यों हुआ...
एक साल पहले दादाजी गुज़र गए, और ये राज़ सिर्फ शिवाय के दिल में दफ़न रह गया।
जहां तक उसकी पत्नी काव्या की बात थी, वो इस शादी के लिए शुरू से राज़ी नहीं थी। हालांकि मजबूरी में उसे शादी करनी पडी, लेकिन आज भी उन दोनों के बीच पति-पत्नी जैसा कोई रिश्ता नहीं था।
दादाजी के मरने के बाद शर्मा ग्रुप में पावर को लेकर बहुत बडा गेम हुआ। शिवाय के ससुर को ग्रुप से बाहर निकाल दिया गया और उन्हें कोई शेयर भी नहीं मिला। उनका परिवार बर्बादी की कगार पर आ गया और उन्हें शर्मा परिवार के रहम-करम पर जीना पड रहा था।
उसके सास-ससुर इस सारी बर्बादी का ज़िम्मेदार शिवाय को मानते थे क्योंकि उसके पास ना तो कोई बैकग्राउंड था, ना पैसा और ना ही कोई काम। शर्मा परिवार के बाकी दामादों के सामने शिवाय की कोई औकात नहीं थी।
शर्मा परिवार में शिवाय को सब हिकारत की नज़र से देखते थे और उसका खूब मज़ाक उडाया जाता था।
"शिवाय, पार्टी में आज फालतू की कोई बात मत करना," काव्या ने सीरियस होकर कहा। "आज का दिन हमारे लिए बहुत ज़रूरी है। मैं नेहा दीदी के लिए एक बहुत बडा गिफ्ट लेकर आई हूँ ताकि उनसे मदद मांग सकूँ। मेरे पापा जिस फैक्ट्री को चलाते हैं, उसका बचना अब इसी बात पर टिका है कि बडे ताऊजी हमारी मदद करते हैं या नहीं।"
"मैं समझ गया," शिवाय ने सिर हिलाया।
रॉयल ऑर्किड विला के अंदर घुसते ही शानदार सजावट और गार्डन दिखाई दिए। ये सब शर्मा परिवार की दौलत का दिखावा था।
हॉल के बाहर मसेराटी, पोर्शे, ऑडी जैसी महंगी गाडियों की लाइन लगी थी।
"अरे काव्या बहन, क्या तुम लोग टैक्सी से आए हो? मुझे कॉल क्यों नहीं किया? मैं तुम्हारे लिए कोई कार भेज देता। इतने बडे दिन तुम लोग ये क्या तमाशा कर रहे हो? हमारे परिवार की बेज़्ज़ती करवाओगे क्या?"
पोर्शे कार से काले चश्मे पहने एक लडका बाहर निकला। उसने अपना चश्मा उतारा और मज़ाकिया अंदाज़ में काव्या और शिवाय को देखने लगा।
काव्या ने अपने होंठ चबाए लेकिन कुछ नहीं बोली।
शिवाय के ससुर, प्रकाश शर्मा, शर्मा परिवार के सबसे अनलकी इंसान थे। पहले उनके भाइयों ने उन्हें ग्रुप से साइड किया और फिर एक दिवालिया होने वाली छोटी सी ज्वेलरी फैक्ट्री पकडा दी, जो किसी तरह पिछले एक साल से चल रही थी।
उनकी हालत ऐसी नहीं थी कि वो काव्या के लिए कोई कार खरीद सकें।
"काव्या बहन, मैंने तुमसे कहा था न... जब बडे ताऊजी ने कहा था कि इस आवारा को तलाक दे दो और वर्मा परिवार के छोटे बेटे से शादी कर लो, तो तुमने बात क्यों नहीं मानी? अगर मानी होती तो आज ये दिन नहीं देखने पडते।" चश्मे वाला लडका और ज़्यादा मज़े लेते हुए बोला। उसने शिवाय को तो पूरी तरह से इग्नोर कर दिया था। "खैर, अभी भी कुछ नहीं बिगडा है। अगर अमीर बनना है तो मेरे पास आना, मैं तुम्हारे लिए कोई अच्छा लडका ढूंढ दूँगा।"
एक पति के सामने उसकी पत्नी से ऐसी बातें करना... ये सीधे-सीधे उसकी बेज़्ज़ती थी!
"रोहन शर्मा, तुम्हारी बकवास ख़त्म हुई या कुछ और भी कहना है?" काव्या ने गुस्से में कहा, उसका चेहरा पीला पड गया था।
"अरे, मैं तो भाई होने के नाते कह रहा हूँ। मुझे तुम पर तरस आता है जो तुम इस कबाड के साथ रह रही हो। अगर मेरी बात नहीं मानोगी, तो पूरी ज़िंदगी ऐसे ही सडती रहोगी!" रोहन ने ताना मारा।
ये कहते हुए रोहन ने शिवाय की तरफ एक बहुत ही घमंडी नज़रों से देखा।
"शिवाय, तुम किस मुँह से नेहा दीदी की शादी में आ गए?" रोहन ने हँसते हुए कहा, "ओह! समझ गया। सुना है तुम्हारे ससुर की फैक्ट्री बंद होने वाली है, मज़दूरों को पैसे देने की औकात नहीं बची है। तो क्या तुम यहाँ बडे ताऊजी के तलवे चाटने आए हो ताकि वो तुम्हें कुछ भीख दे सकें?"
शिवाय ने रोहन को देखा लेकिन कुछ नहीं कहा।
रोहन के पिता, सुरेंद्र शर्मा, शर्मा परिवार के तीसरे बेटे थे और प्रकाश शर्मा की ये हालत उन्हीं की वजह से हुई थी।
काव्या ने एक लंबी सांस ली और अपना गुस्सा कंट्रोल करते हुए शिवाय से कहा, "बर्दाश्त करो। इसकी बातों पर ध्यान मत दो। मैं यहाँ अपने काम से आई हूँ।"
शिवाय ने सिर हिलाया और दोनों विला के हॉल की तरफ बढ़ गए।
"देखता हूँ कब तक बर्दाश्त करते हो," शिवाय की पीठ घूरते हुए रोहन ने अपनी गर्दन चटकाई और मुस्कुराने लगा।
अंदर का हॉल बहुत बडा था। महंगी सजावट और ज़मीन पर बिछी रेड कार्पेट इसे किसी महल जैसा दिखा रही थी।
शर्मा परिवार के वीआईपी मेहमान आ चुके थे।
हाथ में एक खूबसूरत गिफ्ट बॉक्स लिए काव्या दुल्हन के पास गई और प्यार से बोली, "नेहा दीदी, आपको शादी की बहुत-बहुत बधाई।"
नेहा के फीचर्स अच्छे थे और वो सुंदर थी, लेकिन काव्या की खूबसूरती के सामने वो कुछ भी नहीं थी।
उसने काव्या को एक घमंडी नज़र से देखा और रूखेपन से बोली, "गिफ्ट वहाँ रख दो।"
"दीदी, चलिए मैं आपके साथ चलती हूँ," काव्या ने मुस्कुराते हुए कहा।
"कोई ज़रूरत नहीं है। मुझे मक्खन लगाने की कोशिश मत करो। मुझे पता है तुम यहाँ क्यों आई हो। मैं तुम्हारे पापा की उस फटीचर फैक्ट्री के लिए कोई मदद नहीं करने वाली।" नेहा ने बिना किसी लिहाज़ के सीधा मुँह पर कह दिया।
काव्या की मुस्कान वहीं जम गई। उसकी आँखों में एक अजीब सी बेबसी और दुःख आ गया।
उसने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं, उसका शरीर हल्का सा कांपने लगा।
शिवाय से शादी करने से पहले, दादाजी काव्या को सबसे ज़्यादा प्यार करते थे और वो घर की लाडली थी। नेहा दीदी भी पहले उससे बहुत अच्छे से बात करती थीं, लेकिन अब... अब वो इतनी पत्थर दिल कैसे हो गईं?
नेहा दीदी की शादी पुणे के एक बहुत अमीर वर्मा परिवार के बडे बेटे कुणाल वर्मा से हो रही थी। शादी बहुत ग्रैंड थी और पूरा शहर जश्न मना रहा था।
और वो...
काव्या कुछ देर चुप रही। अपने पिता की मजबूरी को याद करके, उसने चेहरे पर एक झूठी मुस्कान सजाई और नेहा के पीछे-पीछे चलने लगी।
टेबल पर बैठे शिवाय ने जब ये सब देखा, तो उसके अंदर एक अजीब सी बेचैनी होने लगी।
शिवाय जिस टेबल पर बैठा था, वहाँ शर्मा परिवार के सारे दामाद बैठे हुए थे।
ये सारे दामाद अमीर और पावरफुल थे। शिवाय की उनके सामने कोई औकात नहीं थी।
इसलिए किसी ने उसे हेलो तक नहीं बोला। वो आपस में बातें कर रहे थे, जाम टकरा रहे थे, एक-दूसरे को बिज़नेस कार्ड दे रहे थे, और शिवाय को पूरी तरह इग्नोर कर रहे थे।
"अरे सब लोग आ गए? चलो, एक ड्रिंक हो जाए।"
"रोहन भाई, आप रहने दीजिए, हम आपके लिए जाम बनाते हैं।"
रोहन पूरे स्वैग के साथ टेबल पर आया और उसके हाथ में शराब का ग्लास था। वहाँ बैठे सभी दामाद झट से खडे हो गए और उसे मक्खन लगाने लगे।
रोहन शर्मा, शर्मा ग्रुप के तीसरे मालिक सुरेंद्र शर्मा का बेटा और उनका इकलौता वारिस था।
सुरेंद्र शर्मा का ग्रुप में उतना ही रुतबा था जितना बडे भाई राजेंद्र शर्मा का।
रोहन की दौलत और पावर उन सारे दामादों से कहीं ज़्यादा थी।
"क्या हुआ? शिवाय, क्या तुम मुझे अपने लायक नहीं समझते जो मेरे साथ ड्रिंक नहीं पी रहे?" रोहन ने शिवाय को घूरते हुए सख्त आवाज़ में पूछा।
सिर्फ शिवाय ही अपनी जगह से नहीं उठा था। वो एक सेकंड के लिए झिझका।
छपाक!
उसी एक सेकंड में, रोहन ने अपने ग्लास की पूरी शराब शिवाय के मुँह पर फेंक दी।
"तेरी औकात क्या है? मैं तुझे इज़्ज़त दे रहा हूँ और तू नखरे दिखा रहा है? हैं? मेरी ड्रिंक को इग्नोर करने की तेरी हिम्मत कैसे हुई?" रोहन ने चिल्लाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में घमंड कूट-कूट कर भरा था।
शराब शिवाय के पूरे चेहरे पर फैल गई। उसके कपडे भीग गए और उसकी आँखों में जलन होने लगी।
वहाँ खडे किसी भी इंसान ने शिवाय का साथ नहीं दिया, बल्कि सब उसके इस अपमान पर हंसने लगे।
शिवाय की आँखें एकदम से खतरनाक हो गईं। लेकिन उसे याद आया कि काव्या अपने पापा के लिए यहाँ कितनी बेज़्ज़त हो रही है। वो उसके लिए और मुसीबत खडी नहीं करना चाहता था। उसने खुद को कंट्रोल किया।
"ठीक है, मैं तुम्हारे साथ ड्रिंक पीता हूँ।" शिवाय ने अपने चेहरे से शराब पोंछी और धीरे से खडा हो गया।
रोहन को उम्मीद नहीं थी कि शिवाय इतना कुछ होने के बाद भी चुप रहेगा। उसके चेहरे पर एक कमीनी मुस्कराहट आ गई। उसे लगा कि शिवाय डर गया है।
जैसे ही शिवाय खडा हुआ, रोहन अचानक पीछे की तरफ हटा, जानबूझकर लडखडाने की एक्टिंग की, और उसने टेबल को ज़ोर से धक्का दे दिया। टेबल पर रखी सारी महंगी शराब और वीआईपी गिफ्ट्स धडाम से नीचे गिर गए!
क्रैश!
टेबल पलटने से दसों महंगी शराब की बोतलें, सोने-चांदी के गिफ्ट और कीमती मूर्तियाँ टूटकर ज़मीन पर बिखर गईं। पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया और सबकी नज़रें उनकी तरफ मुड गईं।
"शिवाय! तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझे मारने की!" रोहन ने बात का बतंगड बनाते हुए ज़ोर से चिल्लाना शुरू कर दिया।
"ये सब क्या हो रहा है यहाँ?"
नेहा वहाँ आ गई, उसके पीछे काव्या भी थी। दूल्हा कुणाल वर्मा भी गुस्से में वहाँ पहुँच गया।
सारे वीआईपी मेहमान उनके चारों तरफ जमा हो गए।
"नेहा दीदी, जीजाजी, आज आपकी शादी का दिन है, और ये भिखारी शिवाय मुझे शादी में मार रहा है! आप ही बताइए, क्या ये पागल हो गया है?" रोहन ने गुस्से से लाल होते हुए कहा, जैसे उसके साथ सच में बहुत बुरा हुआ हो।
"शिवाय, ये सब क्या बदतमीज़ी है?" कुणाल ने अपना गुस्सा कंट्रोल करते हुए कडक आवाज़ में पूछा।
"रोहन खुद जानबूझकर गिरा है। मैंने उसे छुआ तक नहीं।" शिवाय ने सच बताते हुए कहा।
"वो खुद गिर गया? तो फिर वो ऐसा क्यों कह रहा है कि तुमने उसे मारा?" कुणाल ने पूछा।
शिवाय ने कहा, "यहाँ मौजूद सब लोगों ने देखा है। अगर आपको यकीन नहीं है तो आप इनसे पूछ सकते हैं।"
"जीजाजी, ये शिवाय झूठ बोल रहा है। मैं तो बस इसे ड्रिंक ऑफर करने गया था और इसने मुझ पर हमला कर दिया। इन सबने देखा है।" रोहन ने चिल्लाकर कहा, "सच कहूँ तो जीजाजी, अगर आज आपकी शादी ना होती, तो मैं इस कुत्ते को यहीं जान से मार देता!"
"आप लोगों ने क्या देखा अभी?" कुणाल ने बाकी दामादों की तरफ देखकर पूछा।
"जैसा रोहन भाई कह रहे हैं, वैसा ही हुआ। शिवाय ने शायद बहुत ज़्यादा पी ली है।"
"हाँ, ये नशे में धुत है। इसने खुद पर भी शराब गिरा ली है। रोहन भाई तो बस बात करने आए थे, और इसने सीधा हमला कर दिया।"
"हाँ-हाँ, हमने भी यही देखा।"
बाकी सारे दामादों ने एक सुर में झूठ बोल दिया।
शिवाय उन्हें देखकर हैरान रह गया।
फिर उसके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई। रोहन शर्मा परिवार का वारिस था और पावरफुल था। कोई भी घर-जमाई रोहन से दुश्मनी मोल क्यों लेगा?