अध्याय 2
सबने अपनी आँखें बंद कर लीं और सरेआम झूठ बोल दिया।
शिवाय ने अब कोई सफाई नहीं दी। सब बेकार था।
कमज़ोर इंसान की सच्चाई कोई नहीं सुनता। शर्मा परिवार में उसकी हैसियत एक कीडे से भी कम थी। अगर उसने कुछ नहीं भी किया था, और लोग कह रहे हैं कि उसने किया है... तो वही सच था!
"कितनी शर्म की बात है! दो घूंट पीकर अपनी औकात भूल गया!"
"शर्मा जी सच में सठिया गए थे, जो ऐसे सडकछाप को अपना दामाद बना लिया।"
आसपास खडे मेहमान मज़ाक उडाने लगे और शिवाय को बेज़्ज़त करने का कोई मौका नहीं छोड रहे थे।
"शिवाय, तुम सच में एक नंबर के लूज़र हो! तुमसे एक काम ढंग से नहीं होता, बस हर चीज़ बर्बाद करनी आती है!" काव्या गुस्से में शिवाय के पास आई। उसका चेहरा शर्म से लाल हो चुका था।
खासकर तब, जब वो अभी-अभी नेहा दीदी से अपने पापा की फैक्ट्री के लिए भीख मांग रही थी। और शिवाय ने ये तमाशा खडा कर दिया! अब वो किस मुँह से नेहा से मदद मांगेगी?
"तुम! अभी इसी वक्त दीदी और जीजाजी से माफ़ी मांगो!" काव्या की आँखों में गुस्सा और निराशा थी। शिवाय की वजह से आज वो पूरी दुनिया के सामने बेज़्ज़त हो रही थी।
काव्या की भीगी आँखों को देखकर शिवाय ने अपने दांत पीसे और धीरे से बोला, "दीदी, जीजाजी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मेरी ही गलती थी। मैंने आपकी शादी का मज़ा खराब कर दिया।"
रोहन अंदर ही अंदर पागलों की तरह हंस रहा था। उसका चेहरा साफ़ बता रहा था: देखा? मैंने तुझे फंसाया, बेज़्ज़त किया, और फिर भी कोई तेरी मदद करने नहीं आया!
"शिवाय, तुम नाम के मर्द हो। गलती करके भी उसे मानने की हिम्मत नहीं है तुममें। तुमने मेरे भाई पर इलज़ाम लगाने की कोशिश की। मुझे दुनिया में तुमसे ज़्यादा नफरत किसी से नहीं है!" नेहा ने बेहद नफरत भरी नज़रों से कहा।
कुणाल का चेहरा और भी भयानक हो गया था। उसकी शादी के दिन, वीआईपी मेहमानों के सामने ये सब हो रहा था। उसकी इज़्ज़त का तो कचरा हो गया था!
"शिवाय, मैं तुम्हारी माफ़ी एक्सेप्ट नहीं करता! आज मेरा अच्छा दिन है वरना मैं तुम्हें यहीं बहुत मारता। मैं तुमसे इन कीमती चीज़ों के पैसे भी नहीं मांगूंगा। बस अभी इसी वक्त यहाँ से दफा हो जाओ! और दोबारा मुझे कभी अपनी शक्ल मत दिखाना!" कुणाल ने सख्त आवाज़ में कहा।
शिवाय ने एक गहरी सांस ली। लोगों की गंदी नज़रों को इग्नोर किया और मुडकर हॉल से बाहर जाने लगा।
लेकिन जैसे ही वो मुडा, नेहा ने अचानक पीछे से कुछ कहा।
"काव्या, क्या तुम नहीं चाहती थी कि मैं तुम्हारे पापा की मदद करूँ? ठीक है! मेरी एक शर्त है। मैं इस शिवाय की शक्ल दोबारा नहीं देखना चाहती। घर जाते ही इस लूज़र को तलाक दे दो और इसे हमेशा के लिए शर्मा परिवार से बाहर निकाल फेंको! अगर तुम ऐसा करोगी, तो मैं अभी तुम्हारे पापा की फैक्ट्री को बचा लूँगी!"
शिवाय के कदम रुक गए, लेकिन उसने पीछे मुडकर नहीं देखा और चुपचाप वीआईपी हॉल से बाहर निकल गया।
रॉयल ऑर्किड विला के बाहर आकर शिवाय ने एक सिगरेट जलाई। काव्या अब क्या फैसला लेगी?
"चलो, घर चलते हैं।"
पीछे से आई जानी-पहचानी आवाज़ सुनकर शिवाय चौंका। उसने मुडकर देखा तो काव्या खडी थी। उसकी आँखों में अभी भी आंसू थे।
शिवाय ने पूछा, "घर? और तुम्हारे पापा का क्या?"
काव्या ने गुस्से में कहा, "मैंने कहा था न कि हम एक ना एक दिन तलाक लेंगे। लेकिन वो फैसला मेरा होगा! इन लोगों के दबाव में आकर मैं कोई फैसला नहीं लूँगी!"
"हम पापा की फैक्ट्री के बारे में कुछ सोच लेंगे। चाहे जो भी हो, हम एक परिवार हैं। वो तुम्हें बेज़्ज़त करके मुझे नीचा दिखा रहे हैं। अब मैं उनसे कोई भीख नहीं मांगूंगी।"
शिवाय ने धीरे से खुद से कहा, "परिवार..."
दोनों कुछ देर तक खामोशी से चलते रहे।
"मुझे माफ़ कर देना शिवाय। मैंने अंदर जो भी कहा, मैं अपने शब्द वापस लेती हूँ," काव्या ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा। "मैं उस वक्त बहुत गुस्से में थी। लेकिन अगर शांति से सोचूँ, तो तुम कभी पहल करके रोहन से लडाई नहीं कर सकते। और तुम तो शराब पीते भी नहीं हो।"
शिवाय ने कहा, "क्या तुम्हें मुझ पर भरोसा है?"
"हाँ, मुझे भरोसा है," काव्या ने कहा।
"इस भरोसे के लिए शुक्रिया।"
शिवाय ने काव्या को देखा और अपने मन में एक बहुत बडा फैसला ले लिया। जो कोई भी उस पर भरोसा करेगा, वो उसका भरोसा कभी टूटने नहीं देगा!
काव्या का घर 'शांति नगर' सोसाइटी में था। ये एक पुरानी और खस्ताहाल बिल्डिंग थी। शर्मा परिवार के रुतबे के हिसाब से ये जगह बिल्कुल भी मैच नहीं करती थी।
घर पहुँचते ही, शिवाय के सास-ससुर, प्रकाश और सुधा शर्मा, सोफे पर बहुत सीरियस होकर बैठे थे।
"ओह!" सुधा ने ताना मारते हुए कहा, "शिवाय, तेरे पास अभी भी इस घर में घुसने का मुँह बाकी है?"
"हमें शादी में हुए तमाशे के बारे में सब पता चल गया है। शिवाय, तू सच में पनौती है! तूने फिर से सब कुछ गुड-गोबर कर दिया!" सुधा अपनी जगह से उठी और चिल्लाने लगी।
"रहने दो माँ। शिवाय की कोई गलती नहीं है। ताऊजी का परिवार हमारी कोई मदद नहीं करना चाहता था।" काव्या ने कहा।
ये सुनकर सुधा और भडक गई, "बेवकूफ लडकी! तू अभी भी इस आवारे का पक्ष ले रही है? इसने तेरा कम नुकसान किया है क्या? अगर ये ना होता, तो तू आज सडकों पर धक्के ना खा रही होती! तेरी शादी किसी बहुत अमीर घराने में होती!"
"माँ, आप हमेशा दूसरों के टुकडों पर पलने की क्यों सोचती हो? क्या हम खुद के दम पर कुछ नहीं कर सकते?" काव्या ने तंग आकर कहा।
"खुद के दम पर? हाँ, बिल्कुल!" सुधा ने कडवाहट से हंसते हुए प्रकाश की तरफ देखा। "मेरी बेटी तुम्हारे लिए दर-दर की ठोकरें खा रही है, बेज़्ज़त हो रही है। और तुम? तुम क्या कर रहे हो?"
प्रकाश ने एक गहरी सांस ली और अपना सिर झुका लिया।
शिवाय को पता था कि घर में यही ड्रामा होने वाला है। वो चुपचाप किचन की तरफ चला गया।
...
"खाना तैयार है।"
शिवाय ने खाना बनाया और टेबल पर लगा दिया। पूरा परिवार चुपचाप खाना खा रहा था।
"शिवाय, तूने तो सुना ही होगा कि नेहा ने आज क्या कहा था..." सुधा ने शिवाय की तरफ घूरते हुए कहा।
"माँ!" काव्या ने अपने चॉपस्टिक्स पटक दिए, "मैं दूसरों के दबाव में आकर शिवाय को तलाक नहीं देने वाली।"
"क्या? क्या तू सच में इससे प्यार करने लगी है?" सुधा ने अपनी बेटी को घूरा। "तुझे अपने पापा की फैक्ट्री का हाल नहीं पता? कितने महीनों से मज़दूरों को पैसा नहीं मिला है? फैक्ट्री बंद होने वाली है! क्या तू चाहती है कि हम सब सडक पर कटोरा लेकर बैठ जाएं?"
"और तुझे क्या लगता है ये इतना आसान है? शिवाय ने नेहा और उसके पति को नाराज़ किया है और रोहन पर हाथ उठाया है!" सुधा गुस्से से फुफकार रही थी, "वो लोग हमें ज़िंदा नहीं छोडेंगे! तलाक ही आख़िरी रास्ता है। इस पनौती को अपनी ज़िंदगी से निकाल फेंक!"
काव्या ने अपने होंठ काटे और कुछ नहीं बोली।
अपनी बेटी को चुप देखकर सुधा ने प्रकाश से कहा, "तुम बुत बनकर क्यों बैठे हो? समझाओ अपनी बेटी को!"
प्रकाश कुछ नहीं बोला, वो पूरी तरह से बेबस था।
शिवाय ने अपनी प्लेट का खाना खत्म किया, बर्तन उठाए और अपने कमरे में चला गया।
उसने अपने दोनों पैर मोडे और ज़मीन पर पलथी मारकर बैठ गया।
ध्यान लगाना उसकी दस साल पुरानी आदत थी।
चाहे कैसी भी आंधी आए, चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए। उसका मन कभी नहीं भटकता था।
ध्यान लगाना एक पानी से भरे कटोरे की तरह था। दुनियादारी और मुश्किलें उस पानी में पडी गंदगी की तरह थीं, जो आख़िरकार नीचे बैठ ही जाती हैं।
पंद्रह मिनट बाद।
शिवाय ने अचानक अपने हाथ बढ़ाकर बिस्तर के पास रखा एक छोटा सा काला पत्थर उठाया। उसकी उंगलियाँ हल्की सी हिलीं, और वो सख्त पत्थर पल भर में पाउडर बनकर उसकी उंगलियों से फिसल गया...
"ये मेरी आंतरिक शक्ति है," शिवाय ने खुद से बुदबुदाते हुए कहा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और ख़ुशी थी।
मास्टर ने एक बार कहा था कि जब वो अपनी इस 'आंतरिक शक्ति' को कंट्रोल करना सीख जाएगा, तभी वो 'रुद्र पीठ' का असली वारिस कहलाएगा।
तभी वो इस दुनिया के सामने आ सकता है और अपने मास्टर का वो हरा टोकन इस्तेमाल करके दिल्ली के उस ताकतवर 'ओबेरॉय परिवार' की दौलत और ताकत का इस्तेमाल कर सकता है। मार्शल आर्ट्स की दुनिया बहुत बडी है।
रुद्र पीठ के बहुत से दुश्मन थे। इसलिए वो अब तक अपनी पहचान छुपाकर जी रहा था ताकि उसकी जान को कोई खतरा ना हो!
"मेरी शक्ति आ चुकी है। अब मेरा दुनिया के सामने आने का वक्त आ गया है।" शिवाय ने अपनी मुट्ठी में वो हरे रंग का जेड टोकन पकडा और उसकी आँखों में एक खतरनाक आग जलने लगी।
...
अगला दिन।
जैसे ही शिवाय शांति नगर सोसाइटी से बाहर निकला, एक काली बेंटले कार ने उसका रास्ता रोक लिया।
"क्या जब तक मैं खुद चलकर नहीं आऊंगा, तुम रायचंद परिवार से बात नहीं करोगे?"
डार्क ब्लू सूट पहने एक मिडिल ऐज का आदमी कार से बाहर निकला और बिना किसी एक्सप्रेशन के शिवाय को देखने लगा।
ये आदमी लंबा और मज़बूत था। इसके चेहरे के कट्स शार्प थे, नाक खडी और आँखें बेहद तेज़ थीं। इसके अंदर से एक अजीब सा रुतबा और पावर झलक रही थी।
इसकी शक्ल शिवाय से बहुत मिलती-जुलती थी।
"ओह, मुझे लगा नहीं था कि आप खुद मुझसे मिलने यहाँ आएंगे।" शिवाय के होंठों पर एक तंज़ भरी मुस्कराहट थी।
दस साल बीत जाने के बाद भी, उसने अपने सामने खडे इस इंसान को पहचान लिया था। ये उसका सगा बाप था, विक्रम रायचंद।
"मैं जानता हूँ तुम मेरी शक्ल नहीं देखना चाहते, ठीक है। लेकिन क्या तुम अपने दादाजी को आख़िरी बार भी नहीं देखना चाहते?" विक्रम ने पूछा।
शिवाय कुछ देर चुप रहा। पूरे रायचंद परिवार में सिर्फ उसके दादाजी ही थे जिन्होंने उसे प्यार किया था। उसे आज भी अपने दादाजी का वो मुस्कुराता हुआ चेहरा याद था।
"कोई जगह ढूंढो, आराम से बात करते हैं," शिवाय ने कहा।
...
बीस मिनट बाद, पुणे के सबसे महंगे होटल की 26वीं मंज़िल।
इतने बडे कॉन्फ्रेंस हॉल में सिर्फ विक्रम रायचंद और शिवाय आमने-सामने बैठे थे।
"तुम्हारे दादाजी पिछले दो साल से बिस्तर पर हैं। उनकी हालत दिन-ब-दिन ख़राब होती जा रही है। वो बिस्तर पर पडे-पडे बस तुम्हारा ही नाम रटते रहते हैं। वो बस तुम्हें वापस देखना चाहते हैं," विक्रम ने धीरे-धीरे कहा। "तुम्हारे चाचा और ताऊ की सिर्फ बेटियां हैं, जिनकी शादी हो चुकी है। अब पूरे रायचंद परिवार में अगली पीढ़ी का सिर्फ तू ही इकलौता खून बचा है।"
"रायचंद परिवार का इकलौता खून..." शिवाय खुद का मज़ाक उडाते हुए हंसा, "तो मतलब, आप मुझे अपनी जायदाद बचाने का एक मोहरा बनाना चाहते हैं?"
"तू चीज़ों को बहुत हल्के में ले रहा है।" विक्रम ने ठंडी सांस भरते हुए कहा, "दिल्ली का रायचंद परिवार बहुत बडा है। इसके बहुत सारे हिस्से हैं। खानदान के नियमों के हिसाब से, अगर परिवार का मुखिया मर जाता है और तीसरी पीढ़ी में कोई बेटा वारिस नहीं होता, तो परिवार की पावर किसी और रिश्तेदार के हाथ में चली जाएगी! और अगर ऐसा हुआ, तो हम रायचंद परिवार के मालिक नहीं रहेंगे!"
"और इससे मेरा क्या लेना-देना?" शिवाय ने बहुत ही नॉर्मल तरीके से कहा।
"तेरे दादाजी मौत के मुँह में हैं। पिछले कुछ सालों से तेरे तीसरे और पांचवें चाचा पावर हथियाने के लिए घर में महाभारत कर रहे हैं। क्या तू चाहता है कि तेरे दादाजी की खडी की हुई ये पूरी सल्तनत कोई और लूट ले जाए? क्या तू उन्हें शांति से मरने भी नहीं देगा?" विक्रम ने ऐसे कहा जैसे उसे शिवाय की बेवकूफी पर गुस्सा आ रहा हो।
शिवाय ने अपनी भवें सिकोडीं और हंसा।
उसे बहुत अच्छे से पता था कि विक्रम रायचंद कैसा इंसान था। पावर और दौलत के लिए वो कुछ भी कर सकता था। उसके अंदर कोई इमोशन नहीं था।
अगर इस बार दादाजी की बीमारी की वजह से विक्रम की कुर्सी खतरे में ना होती, तो दिल्ली का ये इतना बडा रईस कभी पुणे के इस छोटे से शहर में शिवाय को ढूंढने नहीं आता।
"शिवाय, क्या तू अपनी पूरी ज़िंदगी इसी शर्मा परिवार के जूतों तले बिताना चाहता है?" विक्रम ने बहुत ही शातिर अंदाज़ में कहा। साफ़ था कि उसने शिवाय की पूरी छानबीन करवा ली थी।
"कल शर्मा परिवार की उस शादी में तेरी इतनी बेज़्ज़ती हुई, लेकिन तेरे अंदर विरोध करने की हिम्मत भी नहीं थी," विक्रम ने कहा। "क्या तुझे खुद पावरफुल नहीं बनना? क्या तुझे उन लोगों से बदला नहीं लेना?"
"अगर तू चाहे, तो तू पूरे शर्मा परिवार को अपने पैरों में गिराकर उनसे नाक रगडवा सकता है!" विक्रम उसे लालच दे रहा था।
शिवाय ने बस अपना सिर हिलाया और कुछ नहीं बोला।
विक्रम ने चिढ़कर कहा, "तू अभी जवान है। सिर्फ अपने इस फालतू के गुस्से और ईगो के चक्कर में अपनी पूरी ज़िंदगी बर्बाद मत कर। तूने अभी तक 'पावर' का नशा चखा ही नहीं है। जिस दिन शर्मा परिवार के लोग तेरे सामने घुटने टेक कर रहम की भीख मांगेंगे, तब तुझे पता चलेगा कि पावर का असली मज़ा क्या होता है!"
"मुझे पता है तू मुझसे नफरत करता है। तू चाहे तो पूरी ज़िंदगी मुझसे नफरत कर। मुझे अपना बाप मत मान।" विक्रम ने सीरियस होकर कहा, "तुझे बस इतना करना है कि रायचंद परिवार में वापस लौट जा। अपने दादाजी से मिल, और फिर वो सब हासिल कर जो तेरा हक़ है। उसके बाद तुझे जो करना है कर। बस।"
"क्या तू इतने छोटे से काम के लिए आसमान की बुलंदियों को छूने का मौका छोड देगा?"
शिवाय ने शांत आवाज़ में कहा: "मुझे तुम्हारी किसी मदद की ज़रूरत नहीं है।"
विक्रम के माथे पर सिलवटें आ गईं। उसने एक लंबी सांस ली और बोला: "उस वक्त मैंने तेरे और तेरी माँ के साथ जो किया, वो गलत था। मैं मानता हूँ। लेकिन अगर तू भी मेरी जगह होता, तो तू भी वही करता जो मैंने किया।"
"एक असली मर्द सब कुछ हार सकता है, लेकिन अपने हाथ से अपनी पावर कभी नहीं जाने दे सकता!"
"ओह..." शिवाय ने अपना सिर हिलाया। इतने सालों बाद भी इस इंसान के अंदर कोई पछतावा या गिल्ट नहीं था।
उसे अभी भी लगता था कि उसने कुछ गलत नहीं किया। ऐसे लोगों के लिए ज़िंदगी में रिश्तों की कोई अहमियत नहीं होती, सिर्फ 'पावर' ही सब कुछ होती है।
"मैं खुद कोई वक्त निकालकर दादाजी से मिलने आ जाऊंगा। लेकिन तुम्हारे परिवार की इस गंदी राजनीति से मेरा कोई वास्ता नहीं है।" शिवाय ने कहा और जाने के लिए उठ खडा हुआ।
"तू!" विक्रम ने अपनी तेज़ आँखों से शिवाय को घूरा।
"ठीक है, जा तू। मैंने अपने पत्ते खोल दिए हैं। मैं इंतज़ार करूँगा। मुझे पूरा यकीन है कि तू खुद घुटनों के बल रेंगता हुआ मेरे पास आएगा और मुझसे भीख मांगेगा," विक्रम ने बहुत ही ओवर-कॉन्फिडेंस के साथ कहा।
वो शिवाय की हालत जानता था। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि एक लडका जो पिछले दो साल से ससुराल के ताने सुनकर टुकडों पर पल रहा है, वो इतनी बडी दौलत को लात मार सकता है!
कौन अमीर नहीं बनना चाहता?
"हाँ ठीक है, तुम बैठकर इंतज़ार करते रहो।"
शिवाय ने एक तंज़ भरी मुस्कान के साथ कहा और बिना पीछे मुडे होटल से बाहर निकल गया।
...
पुणे का पॉश इलाका, ओबेरॉय ग्रुप की बिल्डिंग।
ये बिल्डिंग सत्तर मंज़िला ऊँची थी और शहर के बिल्कुल बीचों-बीच खडी थी। ये पूरे शहर की सबसे शानदार इमारत थी।
कुछ साल पहले जब ओबेरॉय ग्रुप ने पुणे में एंट्री ली थी, तो पूरे महाराष्ट्र में तहलका मच गया था।
ये कंपनी दिल्ली के टॉप परिवार 'ओबेरॉय परिवार' का हिस्सा थी।
शिवाय बिल्डिंग के अंदर रिसेप्शन पर पहुंचा।
"एक्सक्यूज़ मी सर, आपको किससे मिलना है?" रिसेप्शनिस्ट ने बहुत ही पोलाइट तरीके से पूछा।
"मुझे तुम्हारे प्रेसिडेंट देवेन्द्र ओबेरॉय से मिलना है," शिवाय ने बहुत ही नॉर्मल तरीके से कहा।
"प्रेसिडेंट ओबेरॉय से? क्या आपकी कोई अपॉइंटमेंट है?" लडकी ने पूछा।
ये लडका एकदम सस्ते कपडों में था और दूर-दूर तक ऐसा नहीं लग रहा था कि इसकी औकात प्रेसिडेंट ओबेरॉय से मिलने की है।
प्रेसिडेंट देवेन्द्र ओबेरॉय महाराष्ट्र में ओबेरॉय परिवार का चेहरा थे। वो बहुत ही पावरफुल इंसान थे। पूरे पुणे में ऐसे कुछ ही लोग थे जो उनसे बात करने की हैसियत रखते थे।
शिवाय ने कहा, "उनसे जाकर बस इतना कहना कि मैं रतन ओबेरॉय का एक दोस्त हूँ।"
"ठीक है सर, एक मिनट रुकिए।" रिसेप्शनिस्ट थोडी कन्फ्यूज़ हो गई और उसने ऊपर कॉल किया। उसे नहीं पता था कि रतन ओबेरॉय कौन हैं।
दूसरी तरफ, एक बहुत ही वीआईपी और शानदार ऑफिस में, एक रुतबेदार मिडिल-ऐज आदमी कुछ फाइल्स चेक कर रहा था।
ठक! ठक!
"अंदर आओ।"
एक यंग सेक्रेटरी ने दरवाज़ा खोला और इज़्ज़त से बोला, "प्रेसिडेंट सर, रिसेप्शन से कॉल था। कोई आपसे मिलने आया है।"
"रिसेप्शन से? लेकिन आज के लिए मेरी सारी अपॉइंटमेंट्स कैंसल हैं न?" उस आदमी ने भवें सिकोडते हुए कडक आवाज़ में कहा। "मुझे फालतू बातों के लिए डिस्टर्ब मत किया करो, समझ गए?"