अध्याय 3
"सर वो..." सेक्रेटरी थोडा झिझका, "प्रेसिडेंट सर, उस लडके ने आपके लिए एक मैसेज दिया है। उसने कहा है कि वो रतन ओबेरॉय का दोस्त है।"
"मुझे लगा शायद आपके परिवार का कोई ख़ास इंसान हो... इसलिए मैंने आपको बताना ठीक समझा।"
रतन ओबेरॉय!
देवेन्द्र ओबेरॉय अचानक सुन्न पड गया और उसके माथे पर पसीना आ गया।
रतन ओबेरॉय दिल्ली के ओबेरॉय परिवार के सबसे बडे मुखिया थे। वो देवेन्द्र के सगे दादाजी थे!
दिल्ली में भी सिर्फ गिने-चुने लोगों को ही दादाजी का नाम पता था, बाहर के लोगों को तो दूर की बात है। इस छोटे से शहर में किसी को कैसे पता चल गया कि ओबेरॉय परिवार के बडे मुखिया का नाम रतन ओबेरॉय है?
"वो... वो इंसान कैसा दिखता है?" देवेन्द्र ने हडबडाते हुए पूछा।
सेक्रेटरी ने जवाब दिया, "वो कोई बीस-बाईस साल का लडका है।"
"उसे तुरंत... अभी के अभी मेरे ऑफिस में लेकर आओ।" देवेन्द्र का चेहरा सीरियस हो गया था। वो खुद से बुदबुदाया, "सिर्फ बीस साल का लडका?"
पाँच मिनट बाद, सेक्रेटरी शिवाय को 66वीं मंज़िल के प्रेसिडेंट ऑफिस में लेकर आ गया।
शिवाय आराम से सोफे पर बैठ गया।
सामने खडा वो रुतबेदार प्रेसिडेंट देवेन्द्र ओबेरॉय उसे बहुत ध्यान से घूर रहा था।
"आप कौन हैं?" देवेन्द्र ने डाउट के साथ पूछा। उसे इस साधारण से दिखने वाले लडके में कुछ समझ नहीं आ रहा था।
"क्या तुम इसे पहचानते हो?" शिवाय ने अपनी जेब से एक हरे रंग का जेड टोकन निकाला।
उस टोकन पर बहुत ही बारीक डिज़ाइन बना था और बिल्कुल बीच में 'रतन' नाम गुदा हुआ था।
"ये क्या है!" देवेन्द्र टोकन देखते ही सदमे में आ गया। उसका सिर चकराने लगा।
ये टोकन ओबेरॉय परिवार की सबसे बडी पावर का सिंबल था! पूरे इंडिया में ऐसे सिर्फ कुछ ही टोकन थे। देवेन्द्र खुद महाराष्ट्र का इतना बडा बॉस था, लेकिन उसके पास भी ऐसा कोई टोकन नहीं था!
बचपन में उसने अपने पिता के पास एक टोकन देखा था, लेकिन वो टोकन भी इस लडके के हाथ में रखे टोकन से एक लेवल नीचा था!
"आप... आप प्लीज़ एक मिनट रुकिए। मैं मैनेजर हरि देसाई को बुलाता हूँ।" देवेन्द्र की आवाज़ कांपने लगी और वो बहुत इज़्ज़त के साथ बात करने लगा। वो इस लडके को इग्नोर करने की भूल नहीं कर सकता था।
शिवाय ने धीरे से सिर हिलाया।
उसे अपने मास्टर की बातों पर पूरा यकीन था। बचपन में जब शिवाय ने मास्टर रतन ओबेरॉय को देखा था, तो रतन ओबेरॉय खुद उसके सामने हाथ बांधकर खडे होते थे। फिर उनका ये पोता किस खेत की मूली था?
थोडी देर में देवेन्द्र एक साठ साल के बुज़ुर्ग के साथ वापस लौटा। उस बुज़ुर्ग ने लाल रंग का कुर्त्ता पहना हुआ था और उसकी सफ़ेद दाढ़ी थी।
देवेन्द्र चुपचाप साइड में खडा हो गया। देवेन्द्र सिर्फ बिज़नेस संभालता था, लेकिन ओबेरॉय परिवार के जो डार्क और सीक्रेट काम थे, वो ये बुज़ुर्ग मैनेजर देखता था।
बुज़ुर्ग की चाल किसी शेर जैसी थी और उसकी आँखों में गज़ब की चमक थी।
बुज़ुर्ग ने शिवाय के हाथ में रखे टोकन को देखा और उसकी आँखें फटी रह गईं। उसने एक लंबी सांस ली और बोला, "मेरा नाम हरि देसाई है। मैं आपको क्या कहकर बुला सकता हूँ?"
"शिवाय।"
"शिवाय सर, आप ओबेरॉय परिवार का सबसे बडा टोकन लेकर आए हैं। गुस्ताखी माफ़, लेकिन क्या मैं आपकी असली पहचान चेक करने के लिए एक टेस्ट ले सकता हूँ?" हरि देसाई ने बहुत ही सीरियस होकर पूछा।
"हाँ, बिल्कुल।" शिवाय ने कहा।
शिवाय समझ गया था कि ये हरि देसाई कोई आम इंसान नहीं था। वो एक बहुत ही खतरनाक मार्शल आर्ट्स एक्सपर्ट था।
हरि देसाई ने सिर हिलाया और अचानक अपनी कलाई को एक झटका दिया। उसके हाथ से एक सख्त मार्बल की गेंद गोली की रफ़्तार से हवा को चीरते हुए सीधा शिवाय की तरफ आई!
शिवाय अपनी जगह से ज़रा भी नहीं हिला। उसने बस अपना हाथ आगे बढ़ाया और उस तेज़ रफ़्तार गेंद को आराम से कैच कर लिया।
फिर उसने अपनी मुट्ठी खोली... और वो सख्त मार्बल की गेंद पाउडर बन चुकी थी। वाइट पाउडर शिवाय की उंगलियों से नीचे ज़मीन पर गिरने लगा...
ये नज़ारा देखकर देवेन्द्र के पसीने छूट गए! उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
हरि देसाई का चेहरा भी सदमे से पीला पड गया था। वो खुद से बुदबुदाया, "आंतरिक शक्ति का मास्टर... और इतनी कम उम्र में! क्या ये सच में उसी इंसान का वारिस है..."
ओबेरॉय परिवार का चीफ मैनेजर होने के नाते उसे मार्शल आर्ट्स की छुपी हुई दुनिया के बहुत से राज़ पता थे। वो समझ गया था कि ये लडका कौन है!
हरि देसाई ने 90 डिग्री झुककर प्रणाम किया और इज़्ज़त से बोला: "ओबेरॉय परिवार का थर्ड हाउस मैनेजर, हरि देसाई, अपने सुप्रीम लीडर को प्रणाम करता है।"
"मैं भी अपने सुप्रीम लीडर को प्रणाम करता हूँ।" देवेन्द्र भी तुरंत झुक गया।
शिवाय के हाथ में जो टोकन था, वो ओबेरॉय परिवार के सुप्रीम लीडर का था। और ओबेरॉय परिवार के रूल्स बहुत सख्त थे, कोई भी उन्हें तोडने की हिम्मत नहीं कर सकता था।
जब उन्हें अपनी पहचान पर यकीन हो गया, तो शिवाय ने धीरे से सिर हिलाया।
"लीडर सर, आप पुणे ब्रांच में कैसे? हम आपके लिए क्या कर सकते हैं?" हरि देसाई ने पूछा।
डिंग... डिंग...
तभी शिवाय का फोन बजने लगा।
"शिवाय! तू कहाँ मर गया है? जल्दी से सिटी हॉस्पिटल आ! मैंने तलाक के पेपर्स तैयार करवा लिए हैं। आकर चुपचाप साइन कर दे।" फोन उठाते ही सुधा की चिल्लाती हुई आवाज़ आई।
"क्या हुआ?" शिवाय ने पूछा।
"काव्या के पापा आज अपनी फैक्ट्री गए थे! रोहन वहाँ फैक्ट्री कब्ज़ा करने आया था। दोनों में लडाई हो गई और तेरे ससुर को बहुत मारा गया है। वो हॉस्पिटल में हैं! काव्या भी रोहन की धमकियां सुनकर बेहोश हो गई है! रोहन ने हमारा घर भी कब्ज़ा कर लिया है! वो कह रहा है कि अगर तूने काव्या को तलाक दे दिया, तो वो हमें छोड देगा! ये सब तेरी वजह से हो रहा है! मैं तुझसे हाथ जोडकर भीख मांगती हूँ, मेरी बेटी की ज़िंदगी से निकल जा! इस परिवार को बख़्श दे!"
फोन पर सुधा रो-रोकर चिल्ला रही थी। हालात बहुत ख़राब लग रहे थे।
"मैं समझ गया। मैं अभी आ रहा हूँ।" शिवाय ने फोन काट दिया। उसका चेहरा एकदम खूंखार और ठंडा पड चुका था।
काव्या बेहोश हो गई?
शिवाय की आँखों में मौत का सन्नाटा था। उसने हरि देसाई और देवेन्द्र की तरफ देखा।
"मुझे एक दिन के अंदर 'शर्मा ज्वेलर्स ग्रुप' पूरी तरह से दिवालिया चाहिए। उनका नामो-निशान मिटा दो।" शिवाय ने एक ठंडी और खतरनाक आवाज़ में कहा।
"यस लीडर सर! आपका हुक्म सिर आँखों पर।" देवेन्द्र ने इज़्ज़त से कहा।
देवेन्द्र ने मन ही मन एक चैन की सांस ली। उसे लगा था कि ये नया सुप्रीम लीडर कोई बहुत बडा और नामुमकिन काम बताएगा।
लेकिन एक छोटी सी 'शर्मा कंपनी' को बर्बाद करना? ये तो उनके लिए चुटकी बजाने जितना आसान था!
...
पुणे सिटी हॉस्पिटल।
शिवाय वार्ड नंबर 608 के बाहर पहुँचा।
"शिवाय! तू आ गया? घर में इतनी बडी आग लग गई और तू कहाँ गायब था?" सुधा उसे देखते ही भडक गई।
"देख लिया तूने? तेरे पंगे लेने की वजह से आज हमारा ये हाल हुआ है!" सुधा रोते हुए उसे ताने मारने लगी।
शिवाय ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अंदर बेड की तरफ देखा। उसके ससुर प्रकाश शर्मा के चेहरे पर नीले और लाल निशान थे, उनकी आँख सूजी हुई थी और हाथ पर पट्टी बंधी थी।
बेड के पास ही काव्या बैठी थी। उसका चेहरा उतरा हुआ था और वो बहुत कमज़ोर लग रही थी।
"पापा, काव्या... आपको कहाँ चोट लगी है?" शिवाय ने पूछा।
"बस थोडी खरोंचे हैं, मैं ठीक हूँ," प्रकाश शर्मा ने कहा।
काव्या ने कहा: "मुझे कुछ नहीं हुआ है। पापा की मज़दूरों से लडाई हो गई थी। अभी डॉक्टर ने चेक किया है, हड्डी नहीं टूटी है, बस बाहर से चोट आई है।"
शिवाय के अंदर गुस्से का ज्वालामुखी उबलने लगा, लेकिन उसने खुद को शांत रखते हुए पूछा, "आज क्या हुआ था?"
काव्या कुछ नहीं बोलना चाहती थी, उसने बस एक गहरी सांस ली।
"आज काव्या के पापा फैक्ट्री का मामला सुलझाने गए थे। पता नहीं उस रोहन ने क्या गेम खेला, उसने फैक्ट्री के सारे कर्ज़ अपने नाम कर लिए हैं और अब वो सबसे बडा मालिक बन गया है। रोहन ने मज़दूरों को भडकाया कि वो फैक्ट्री की सारी मशीनें उखाड ले जाएं। जब काव्या के पापा ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो मज़दूरों ने उन्हें पीट दिया।" सुधा ने रोते हुए बताया। "मैं और काव्या जब रोहन से बात करने गए तो उसने हमारी बहुत बेज़्ज़ती की। अब फैक्ट्री का सारा सामान उन्होंने ज़बरदस्ती उठवा लिया है!"
"फैक्ट्री तो गई! अब वो हमारा घर भी छीन रहे हैं!" सुधा अब पागलों की तरह रो रही थी, "वो बहुत जालिम हैं! शिवाय, ये सब तेरी वजह से हुआ है! तूने ही हमारे परिवार को बर्बाद किया है!"
शिवाय की आँखें एकदम सर्द हो गईं। साफ़ था कि रोहन पूरी प्लानिंग के साथ आया था। वो सिर्फ फैक्ट्री ही नहीं, बल्कि इनका घर छीनकर इन्हें पूरी तरह सडक पर लाना चाहता था।
"फैक्ट्री और घर के कागज़ात अब रोहन के पास हैं। रोहन ने कहा है कि अगर तू और काव्या तलाक ले लो, तो वो हमें छोड देगा। मैंने हाँ कर दी है। अगर तेरे अंदर थोडी सी भी शर्म बाकी है, तो इन पेपर्स पर साइन कर दे।" सुधा ने बिना किसी रहम के कहा।
"रहने दो ये सब!" बेड पर लेटे प्रकाश शर्मा ने भारी आवाज़ में कहा, "सुधा, मैं ही किसी काम का नहीं हूँ। मैं अपने परिवार को नहीं संभाल पा रहा हूँ। अब किसी और को दोष मत दो।"
"तीसरे भाई (सुरेंद्र) का बेटा बहुत शातिर है। वो लोग बस हमारा तमाशा देखना चाहते हैं," प्रकाश ने एक लंबी सांस लेते हुए कहा, "इस बार मैं वही करूँगा जो मेरी बेटी चाहेगी। ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा? वो हमारी फैक्ट्री और घर ले लेंगे न? हम पुणे छोडकर कहीं और चले जाएंगे। कम से कम हमें इन लोगों की शक्ल तो नहीं देखनी पडेगी।"
ये सुनकर सुधा भी चुप हो गई।
"ओह हो! पूरा परिवार एक ही जगह मिल गया! क्या बात है! शिवाय... तू आख़िरकार अपनी चूहों की बिल से बाहर आ ही गया?"
तभी कमरे के बाहर से एक बहुत ही मज़ाकिया और घमंडी आवाज़ आई।
रोहन शर्मा अंदर आया। उसने डिज़ाइनर सूट और चश्मा पहना था। उसके पीछे दो तगडे बॉडीगार्ड खडे थे।
"तो मेरे ऑफर के बारे में क्या सोचा तुम लोगों ने?" रोहन ने हंसते हुए पूछा।
"तुम तो जानते हो, मैं जो भी कर रहा हूँ तुम्हारे परिवार की भलाई के लिए कर रहा हूँ। खुद ही देख लो, ये शिवाय कितना बडा डरपोक है। तुम्हारे साथ इतना सब कुछ हो गया और ये अब जाकर अपनी शक्ल दिखा रहा है।" रोहन ने सीना चौडा करते हुए कहा, "अगर आज मैं सही टाइम पर फैक्ट्री नहीं पहुँचता, तो क्या वो मज़दूर तुम्हें ज़िंदा छोडते?"
"बकवास बंद करो! ये सब तुम्हारे ही इशारों पर हुआ है। यहाँ आकर नाटक मत करो!" काव्या ने नफरत से कहा। उसे रोहन की शक्ल से भी चिढ़ हो रही थी।
"अरे, मैं तो भलाई कर रहा था।" रोहन ने लंबी सांस लेते हुए एक्टिंग की, "मैंने तुम्हारे पापा के सारे कर्ज़ अपने नाम कर लिए ताकि उन्हें कोई बाहर वाला परेशान ना करे। अगर कोई बाहर वाला गुंडा आता, तो तुम्हारे पापा को जान से मार देता!"
"काव्या, तुम टेंशन मत लो। मेरे दोस्त को तुम बहुत पसंद हो, मैं तुम्हारी उससे शादी फिक्स करवा दूँगा।"
"दफा हो जाओ यहाँ से!" काव्या गुस्से से कांपने लगी। वो ये बेज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।
"दफा हो जाऊं?" रोहन कमीनी हंसी हँसा, "मैंने तुम्हें एक मौका दिया था, लेकिन तुम लोगों को इज़्ज़त रास नहीं आती। कल मैं सारे कर्ज़े की डिटेल मार्केट में डाल दूँगा। उसके बाद तुम्हारा ये घर भी बिक जाएगा और तुम लोग सडकों पर भीख मांगोगे!"
"तुम क्या बकवास कर रहे हो? मेरे पापा ने सिर्फ फैक्ट्री और घर गिरवी रखा था। अब और कैसा कर्ज़?" काव्या ने पूछा।
"तुम बहुत भोली हो काव्या।" रोहन ने बहुत ही शातिर स्माइल दी, "उस कबाडखाने जैसी फैक्ट्री में जो टूटी-फूटी मशीनें थीं, वो तो कौडियों के भाव बिकी हैं। कर्ज़ चुकाने के लिए वो काफी नहीं थीं। इसके अलावा फैक्ट्री का रेंट भी बाकी है। अगर मामला कोर्ट में गया, तो तुम्हारे पापा को फ्रॉड के केस में जेल भी हो सकती है।"
"तुम...!" काव्या ने अपने होंठ भींच लिए। उसका बस चलता तो वो रोहन का खून कर देती।
बिज़नेस में ये सब बहुत आम बात थी। शर्मा परिवार के पास पैसा था, वो किसी भी कमज़ोर इंसान को आराम से फंसा सकते थे...
"आराम से सोच लो। और फिर मेरे पैरों में आकर गिर जाना।" ये नज़ारा देखकर रोहन को बहुत सुकून मिल रहा था।
"बकवास ख़त्म हो गई? हो गई हो तो अब दफा हो जा।"
शिवाय ने बिल्कुल बिना किसी एक्सप्रेशन के रोहन को देखा।
"तेरी मुझे दफा होने की कहने की हिम्मत कैसे हुई?" रोहन का चेहरा एकदम लाल हो गया और वो शिवाय की तरफ घूरने लगा।
शिवाय हमेशा शर्मा परिवार में एक कुत्ते की तरह सिर झुकाकर रहता था। रोहन ने सपने में भी नहीं सोचा था कि आज शिवाय उसकी आँखों में आँखें डालकर बात करेगा।
"तेरी तो!" रोहन गुस्से से पागल हो गया और उसने शिवाय को थप्पड मारने के लिए हाथ उठाया।
कडक!
शिवाय ने अपना हाथ उठाया और हवा में ही रोहन की कलाई पकड ली। एक भयानक आवाज़ आई जैसे कोई हड्डी टूट कर चूर-चूर हो गई हो!
"आहहहहहह!"
रोहन किसी सूअर की तरह चीखने लगा। उसके माथे से पसीने की धार बह निकली। वो अपनी टूटी हुई कलाई को देखकर सदमे में था।
वो शिवाय के सामने घुटनों के बल ज़मीन पर गिर पडा। उसका पूरा शरीर दर्द से बुरी तरह कांप रहा था।
शिवाय ने एक ठंडी सांस ली और उसका हाथ छोड दिया।
धडाम।
रोहन का शरीर ज़मीन पर गिर पडा। उसका पूरा हाथ पागलों की तरह फडक रहा था। दर्द की वजह से उसकी आँखें बाहर आ गई थीं।
"नहीं! शिवाय! तूने मुझ पर हाथ उठाने की हिम्मत की!" रोहन ज़मीन से ही शिवाय को मौत की नज़रों से घूर रहा था, "मैं तुझे ज़िंदा गाड दूँगा! तू पछताएगा कि तू पैदा ही क्यों हुआ!"
"तेरा पूरा परिवार खत्म हो जाएगा! कोई तुझे बचाने नहीं आएगा!"
रोहन अपने बॉडीगार्ड्स के सहारे खडा हुआ और धमकी देते हुए वहाँ से भाग गया।
"शिवाय! तूने ये क्या कर दिया? तूने रोहन का हाथ तोड दिया!" सुधा रोते हुए चिल्लाई, "अब वो हमें ज़िंदा नहीं छोडेंगे! मैं तेरे हाथों मारी जाऊंगी!"
"तुमने बहुत जल्दबाज़ी की। मारपीट करने से मसले हल नहीं होते," काव्या ने भी सीरियस होकर कहा।
"मैं सब संभाल लूँगा। तुम्हें टेंशन लेने की कोई ज़रूरत नहीं है," शिवाय ने बहुत ही शांत आवाज़ में कहा, "ये रोहन अब कुछ नहीं उखाड पाएगा।"
"ओह! तू क्या संभाल लेगा? तू है ही क्या..." सुधा चिल्लाते हुए बोली।
शिवाय ने सुधा को एक बहुत ही ठंडी और खतरनाक नज़र से देखा।
सुधा की आवाज़ एकदम से गले में अटक गई। उसे अचानक लगा जैसे आज शिवाय पहले जैसा नहीं है। उसकी आँखों में एक खौफनाक आग थी। सुधा डर के मारे चुप हो गई।
शिवाय ने काव्या को देखा, उसकी आँखों में काव्या के लिए एक अजीब सा प्यार और सुकून था।
"तुम चिंता मत करो, मैं हूँ न।"
काव्या को समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है, लेकिन शिवाय की आवाज़ सुनकर उसके दिल को एक अजीब सा सुकून मिला। आज पहली बार उसे शिवाय के अंदर एक ऐसा इंसान दिखा, जिस पर वो भरोसा कर सकती थी।
"ठीक है।" काव्या ने चुपचाप सिर हिलाया।
...
उसी वक्त, दूसरी तरफ।
शर्मा ज्वेलर्स ग्रुप, डायमंड टावर।
ये बिल्डिंग 20 मंज़िल से भी ऊंची थी। आज पूरी बिल्डिंग में अफरा-तफरी मची हुई थी। सारे कर्मचारी पागलों की तरह इधर-उधर भाग रहे थे, जैसे कोई बहुत बडा तूफान आ गया हो।
23वीं मंज़िल, बडा सा कॉन्फ्रेंस हॉल।
शर्मा ग्रुप के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई थी।
लंबी सी टेबल के चारों तरफ 20 से ज़्यादा लोग बैठे थे।
ये सब पुणे के शर्मा परिवार के सबसे अमीर और पावरफुल लोग थे।
"क्या हो रहा है ये सब? हमारी कंपनी अचानक इतनी बडी मुसीबत में कैसे फंस गई?"