अध्याय 1
रात का अँधेरा गहरा हो रहा था।
कबीर अपने छोटे से जर्जर कमरे में बैठा था।
उसके हाथ में एक मेडिकल रिपोर्ट थी।
"ब्लड कैंसर..."
उसकी उंगलियाँ कांप रही थीं।
सामने खटिया पर उसकी छोटी बहन, काव्या, गहरी नींद में सो रही थी। उसका चेहरा बीमारी से पीला पड चुका था।
कबीर ने अपनी आँखें बंद की। एक गहरी साँस ली।
"मैं तुझे कुछ नहीं होने दूंगा काव्या... कुछ भी नहीं।"
उसने रिपोर्ट को मोडकर अपनी जेब में रखा। अपना ठेला उठाया और रात के बाज़ार की तरफ निकल पडा। उसे अपनी बहन की दवाइयों के लिए पैसे चाहिए थे, और इसके लिए उसे दिन-रात एक करना था।
डी-नगर का नाईट मार्किट।
आज रात, सडक के किनारे एक डार्क ग्रीन बीएमडब्लू मिनी खडी थी।
कार के बोनट पर ही क्रिस्टल और पत्थरों के गहनों का एक छोटा सा स्टॉल लगा था।
स्टॉल लगाने वाली कोई और नहीं, बीस-बाईस साल की एक बेहद खूबसूरत लडकी थी।
इतनी खूबसूरत... कि उसे देखते ही लोगों की भीड जमा हो गई। कानाफूसी होने लगी।
कुछ नौजवान तो लग्जरी कार और उस लडकी को देखकर पागल ही हो गए। वो रुक कर तस्वीरें खींचने लगे।
सिर्फ कुछ हिम्मत वाले ही आगे बढ़े और गहनों का दाम पूछने का नाटक करने लगे। लेकिन उनका असली मक़सद गहने नहीं थे। उनकी नज़रें तो बस उस लडकी के खूबसूरत चेहरे और उसके शानदार फिगर पर टिकी थीं।
सफ़ेद पेंसिल स्कर्ट, स्किन कलर की स्टॉकिंग्स, नीली हाई हील्स।
उसका फिगर, वो अदाएं, वो लंबी खूबसूरत टांगें...
कोई भी उसे देखकर अपना दिल हार बैठे।
"कबीर, क्या तुम्हारा दिल नहीं फिसल रहा? मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में इतनी सुंदर लडकी नहीं देखी।"
लग्जरी कार से लगभग तीन मीटर दूर, चप्पल का स्टॉल लगाने वाले शर्मा जी ने अपने बगल में खडे बीस साल के लडके से मज़ाक करते हुए कहा।
"ठीक ही है, बस मेरी बहन से थोडी सी कम सुंदर है।"
उस लडके ने उस खूबसूरत लडकी को देखा और मुस्कुरा दिया। उसके सफ़ेद दाँत चमक उठे।
इस लडके का नाम कबीर था।
वो नाईट मार्किट में पैनकेक का स्टॉल लगाता था।
लंबाई करीब 5 फुट 9 इंच, जवान और हैंडसम। लेकिन उसके चेहरे पर दुनियादारी की समझ साफ़ दिखती थी।
शर्मा जी ने हँसते हुए कहा, "अरे ओ पागल, तेरी नज़रों में तो दुनिया की कोई लडकी तेरी बहन की बराबरी नहीं कर सकती। लेकिन सुन... ऐसी लडकियां, जो हीरोइनों जैसी खूबसूरत और अमीर होती हैं ना, वो हमारी दुनिया की नहीं होतीं। हम तो बस दूर से देखकर खुश हो सकते हैं। वैसे... सामने जो रामू काका की बेटी है ना, जो फिश बॉल बेचती है... वो तुझमें काफी दिलचस्पी ले रही है। कह तो मैं बात चलाऊं?"
कबीर ने फिश बॉल वाले स्टॉल की तरफ देखा।
एक मोटी सी लडकी, जिसका चेहरा तेल से चमक रहा था, अपने मुँह में ढेर सारे फिश बॉल ठूंस रही थी।
कबीर सिहर गया।
"रहने दो शर्मा जी! इससे अच्छा तो आप अपनी कॉलेज वाली बेटी से मेरी सेटिंग करा दो।"
"बदमाश कहीं का..."
शर्मा जी ने मज़ाक में उसे मारने के लिए एक चप्पल उठाई।
लेकिन तभी...
कुछ गुंडे टाइप के लडके दूर से आते दिखे। उनके शरीरों पर टैटू थे और वो सीधे उसी लग्जरी कार वाली लडकी की तरफ जा रहे थे।
"ए मैडम, यहाँ स्टॉल लगाने की इज़ाज़त किसने दी? हफ्ता निकाला?"
उनके लीडर ने लडकी की तरफ उंगली उठाते हुए चिल्लाकर कहा। उसकी गंदी नज़रें लगातार लडकी के **** पर घूम रही थीं।
ये आदमी शेरा था। यहाँ का लोकल गुंडा।
घमंडी और खतरनाक। उसके नीचे कई गुंडे काम करते थे और कोई भी उससे पंगा लेने की हिम्मत नहीं करता था। सब बस खून का घूंट पीकर रह जाते थे।
"कैसा हफ्ता? कौन हो तुम? मैं तुम्हें पैसे क्यों दूँ? मेरे पास पैसे नहीं हैं!" लडकी ने तल्ख आवाज़ में कहा।
"पैसे नहीं हैं? अरे खूबसूरत हसीना, इतनी महंगी कार चलाती हो और कहती हो पैसे नहीं हैं? कौन मानेगा ये बात? एक काम करते हैं... अगर तुम सच में पैसे नहीं देना चाहती, तो हम कहीं अकेले में चलकर बात कर लेते हैं। दोस्त बन जाते हैं। तुम जब तक चाहो मेरे साथ रह सकती हो... बोलो क्या खयाल है?"
शेरा समझ गया था कि ये लडकी अमीर है। लेकिन उसके ऊंचे कॉन्टैक्ट्स थे, इसलिए उसे कोई डर नहीं था। बोलते-बोलते उसकी नज़रें लडकी की टांगों पर ही अटकी हुई थीं। उसका बस चलता तो वो उसे वहीं दबोच लेता। वो सच में एक कयामत थी!
आसपास खडे लोग अंदर ही अंदर उबल रहे थे। सब मन ही मन शेरा को गालियां दे रहे थे कि वो हर खूबसूरत लडकी के पीछे पड जाता है।
लेकिन तभी...
लडकी ने बिजली की तेज़ी से अपना हाथ उठाया और शेरा के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड दिया!
"दफा हो जाओ यहाँ से!"
उस तमाचे ने शेरा का दिमाग सुन्न कर दिया। उसका आधा चेहरा तुरंत सूज गया।
लोग हैरान रह गए। फुसफुसाहट शुरू हो गई—
"अरे बाप रे, ये तो गज़ब हो गया। इसने शेरा पर हाथ उठा दिया, अब वो इसे ज़िंदा नहीं छोडेगा।"
"इतनी खूबसूरत लडकी है, इसे ऐसे बर्बाद नहीं होने दे सकते, चलो पुलिस को बुलाते हैं!"
"पुलिस को बुलाने का क्या फायदा? भूल गए शेरा कौन है?"
अपने बॉस को पिटता देख शेरा के एक गुंडे ने तुरंत कार के बोनट पर रखे स्टॉल पर हाथ मार दिया।
छन्न से आवाज़ हुई।
सारे क्रिस्टल और ब्रेसलेट ज़मीन पर गिर गए।
एक गोल पत्थर का पेंडेंट लुढ़कता हुआ कबीर के पैरों के पास आ गिरा।
जैसे ही कबीर उस पेंडेंट को उठाने के लिए झुका, उसने देखा कि वो खूबसूरत लडकी उस गुंडे से भिड चुकी थी।
ये नज़ारा हैरान करने वाला था।
लडकी ने एक हाथ से गुंडे के बाल पकडे और दूसरे हाथ से उसका आईफोन बार-बार उसके सिर पर दे मारा।
"धड... धड... धड..."
और साथ में वो चिल्ला रही थी, "मैं सिखाती हूँ तुझे मेरा स्टॉल तोडना! मैं सिखाती हूँ मेरे गहने तोडना! ले... और तोड... और तोड!"
"आह... आह... बचाओ..."
गुंडा हर वार पर दर्द से चीख रहा था। कुछ ही सेकंड में उसके चेहरे और नाक से खून बहने लगा। उसकी हालत खराब हो चुकी थी।
देखने वाले सन्न रह गए। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि ये कोमल सी दिखने वाली लडकी इतनी खतरनाक होगी। पर अंदर ही अंदर सबको मज़ा आ रहा था।
उसी पल, लडकी ने उस गुंडे को लात मारकर ज़मीन पर गिरा दिया।
लेकिन उसे अंदाज़ा नहीं था कि शेरा बगल से आ चुका था। उसने पूरी ताकत से लडकी को धक्का दे दिया।
लडकी खुद को संभाल नहीं पाई और पीछे की तरफ लडखडाई।
उसकी हाई हील टूट गई।
वो चीखते हुए पीछे गिरी... और सीधे कबीर की बाहों में आ गिरी।
कबीर एकदम से चौंक गया। अचानक हुए इस धक्के से वो भी थोडा पीछे हुआ, लेकिन आदतन उसने लडकी को अपनी बाहों में थाम लिया।
उसने घबराकर पूछा, "आप ठीक हैं? आपको चोट तो नहीं लगी?"
लेकिन तभी आसपास से लोगों के मुँह से आवाज़ें निकलने लगीं—
"अरे भाईसाहब!"
"ये क्या बवाल है? ये लडका... क्या इसने जानबूझकर ऐसा किया?"
कबीर की बाहों में गिरी वो लडकी बुरी तरह कांपी।
उसने अपना सिर ऊपर उठाया। उसकी चमकदार आँखें कबीर पर टिक गईं। उसके खूबसूरत चेहरे पर गुस्सा और एक हल्की सी झेंप साफ दिख रही थी।
उसने दाँत पीसते हुए कहा, "कमीने, छोड मुझे! और कितनी देर तक मुझे ऐसे ही छूता रहेगा?"
छूता रहेगा...?
कबीर झिझका। उसकी उंगलियां आदतन थोडी कस गईं।
"ओह माय गॉड..."
भीड फिर से चौंक गई। शेरा की आँखें भी फटी की फटी रह गईं। उसने थूक गटकते हुए सोचा, "इस लडके में तो मुझसे भी ज़्यादा हिम्मत है!"
लेकिन फिर उसके अंदर गुस्सा खौलने लगा। "जिस लडकी पर मैंने हाथ रखा है, तू उसे छूने की हिम्मत कर रहा है?"
अब जाकर कबीर को एहसास हुआ कि गडबड हो गई है।
उसके हाथों के नीचे का एहसास कुछ ज़्यादा ही नरम और अलग था। जब उसने थोडा दबाव डाला, तो उसकी उंगलियां गहराई तक धंस गईं।
नीचे देखते ही उसके मुँह से निकला, "हे भगवान! पूरी दुनिया में मुझे यहीं हाथ रखना था? ये... कुछ ज़्यादा ही..."
साथ ही, जिस एंगल से वो खडा था, उसे लडकी का आधा बदन साफ़ दिखाई दे रहा था। वो सच में बेहद खूबसूरत थी!
लेकिन जैसे ही उसकी नज़रें उस लडकी की आग उगलती आँखों से मिलीं, कबीर ने झटके से उसे छोड दिया और आधा कदम पीछे हट गया।
पर लडकी की हील टूटी हुई थी। वो अपना बैलेंस खो बैठी और फिर से गिरने लगी।
कबीर घबराया और उसने फिर से उसे पकडने के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया...
"कमीने, तूने... दो बार छुआ!" भीड से एक आवाज़ आई।
कबीर खुद हैरान था। उसने जानबूझकर ऐसा नहीं किया था।
उसने एक अजीब सी मुस्कान के साथ कहा, "मैडम, वो... मुझे माफ़ कर दीजिए, मेरा वो मतलब नहीं था!"
कबीर बहुत घबराया हुआ लग रहा था और हकला रहा था।
अगर ये रामू काका की बेटी होती, तो शायद इतना डर नहीं लगता। लेकिन ये लडकी... जिसकी इतनी महंगी कार थी और जो इतनी खूबसूरत थी, उसे तो वो दूर से देखने में भी हिचकिचाता। और यहाँ उसने दो बार उसे गलत तरीके से छू लिया था। वो डरेगा क्यों नहीं?
ऊपर से, इस लडकी ने अभी-अभी एक गुंडे को खून से नहला दिया था। अगर इसने गुस्सा किया, तो क्या वो उसकी हड्डियां नहीं तोड देगी?
उसे लगा कि उसे अपनी गलती सुधारने के लिए कुछ करना चाहिए।
वो तुरंत लडकी के आगे आकर खडा हो गया और शेरा से बोला, "शेरा भाई, ये मैडम पहली बार स्टॉल लगा रही हैं। इन्हें यहाँ के नियम नहीं पता। इनका हफ्ता मैं दे दूँगा।"
शेरा की आँखें फडकने लगीं। उसका गुस्सा सातवें आसमान पर था।
कबीर को उस लडकी को बाहों में पकडे देखकर उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसने कोई कडवी चीज़ खा ली हो।
"अबे साले, किसे चाहिए तेरा हफ्ता? तू अपनी बीमार बहन को तो पाल नहीं पा रहा, और यहाँ हीरो बन रहा है? तेरे पास खुद ढंग के कपडे पहनने के पैसे नहीं हैं! तू बीच बाज़ार में एक लडकी के साथ छेडखानी कर रहा है? मारो साले को और इसका स्टॉल तोड दो!"
शेरा की बात सुनकर, वो लडकी जो कबीर को गुस्से से घूर रही थी, उसकी आँखों में एक अजीब सा भाव आ गया।
तभी, शेरा का एक गुंडा कबीर पर टूट पडा और दूसरे ने उसका स्टॉल तोडना शुरू कर दिया।
छन्न! धाड!
उसकी वो ठेला-गाडी जिस पर वो पैनकेक बनाता था, पलट दी गई।
कबीर की आँखें तुरंत लाल हो गईं।
ये स्टॉल ही उसकी रोज़ी-रोटी था। उसकी बहन बीमार थी। उसकी दवाइयों का खर्च बहुत ज़्यादा था। ये सब इसी स्टॉल से चलता था।
"कमीने, तूने मेरा स्टॉल तोडा? मैं तुझे जान से मार दूँगा!"
कबीर का स्टॉल टूट चुका था। उसके होंठ कट गए थे। वो पागल हो उठा।
गरीब की जान सस्ती होती है, लेकिन पैसा बहुत महंगा।
उसने ज़मीन पर गिरा हुआ चाकू उठाया और सीधा गुंडों पर झपट पडा।
"अरे, ये लडका तो पागल हो गया है! चाकू चला रहा है! शेरा भाई, भागो!"
कबीर ने चाकू से एक गुंडे के हाथ पर वार किया। खून का फव्वारा फूट पडा। गुंडे डर गए। वो चीखते हुए पीछे भागे।
"ये नाम के लडके, तू इंतज़ार कर! मैं तुझे छोडूंगा नहीं!" शेरा ने धमकी दी और वहाँ से भाग खडा हुआ।
"कबीर, तू ठीक तो है?" चप्पल वाले शर्मा जी ने घबराकर पूछा। दोनों काफी समय से साथ काम कर रहे थे और उनका अच्छा रिश्ता था।
"कुछ नहीं हुआ।" कबीर ने कहा।
फिर वो पलटकर उस खूबसूरत लडकी की तरफ मुडा। उसके चेहरे पर शर्मिंदगी थी। उसने अपना सिर खुजाते हुए कहा, "खूबसूरत मैडम, मैंने आपके लिए गुंडों को भगा दिया है। और इस चक्कर में उनसे दुश्मनी भी मोल ले ली। अब... आप मुझसे नाराज़ तो नहीं हैं ना? अभी जो हुआ... मैंने सच में जानबूझकर नहीं किया था।"
मीठा बोलना हमेशा काम आता है। कबीर उसे बार-बार 'खूबसूरत मैडम' कह रहा था। उसे डर था कि कहीं वो फोन से उसका भी सिर ना फोड दे। गुंडों पर वो चाकू चला सकता था, लेकिन एक खूबसूरत लडकी पर हाथ उठाना उसके बस की बात नहीं थी।
लडकी कुछ पल के लिए उसे घूरती रही। जैसे कुछ सोच रही हो।
फिर उसने ज़मीन पर गिरे गहनों की तरफ इशारा किया: "पहले इन्हें उठाने में मेरी मदद करो।"
गहने उठाने के बाद, कबीर को उस पत्थर वाले पेंडेंट की याद आई जो उसके पैरों के पास गिरा था। लडाई के दौरान उसने उसे अपनी जेब में डाल लिया था।
उसने तुरंत पेंडेंट निकाला: "मैडम, ये भी आपका है... मेरा मतलब इसे चुराने का नहीं था, बस लडाई में..."
वो अपनी बात पूरी करता, उससे पहले ही लडकी ने हाथ का इशारा किया: "पास आओ।"
"हाँ?"
कबीर को लगा अब थप्पड पडने वाला है। उसका शरीर सुन्न पड गया। वो हिल नहीं पाया।
आसपास खडे लोगों के चेहरों पर अलग-अलग भाव थे। किसी को मज़ा आ रहा था, कोई तरस खा रहा था। सबको लग रहा था अब कबीर की खैर नहीं।
शर्मा जी ने हिम्मत जुटाई और बोले, "मैडम जी, कबीर ने सच में ऐसा जानबूझकर नहीं किया। वो आपका पेंडेंट भी लौटा रहा है। मैं इसकी गारंटी लेता हूँ। ये बहुत अच्छा लडका है। घर पर इसकी बीमार बहन है, ये उसी की देखभाल करता है। क्या आप इसे जाने देंगी?"
सफ़ेद ड्रेस वाली उस लडकी ने पलकें झपकाईं। उसके होंठों पर एक अजीब सी मुस्कान आ गई।
वो एक कदम आगे बढ़ी, अपना नाज़ुक हाथ आगे बढ़ाया... और कबीर का गाल खींच लिया।
कबीर सिर्फ उन्नीस साल का था। उसके नैन-नक्श तीखे थे। गाल खींचे जाने पर उसका चेहरा बडा अजीब सा हो गया।
तमाशबीन आदमियों के चेहरे पर ख़ुशी आ गई। देवी जैसी लडकी को छेडा और लगा आसानी से बच जाएगा? बिल्कुल नहीं!
"अब ये इसे मारेगी! पक्का मारेगी! इसने दो बार उसे गलत जगह छुआ है, सज़ा तो मिलेगी!"
"हाँ-हाँ, इस लडके ने जानबूझकर किया था! एक बार से मन नहीं भरा तो दो बार हाथ लगाया! इतनी खूबसूरत लडकी और ये ठेले वाला... इसका तो एक हाथ तोड ही देना चाहिए!"
लोग बातें बना रहे थे। ज़्यादातर मज़े ले रहे थे।
लडकी ने चारों तरफ देखा। उसका चेहरा सख्त था। लेकिन जब उसने कबीर को देखा, तो उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान आ गई।
उसने कबीर का गाल खींचते हुए पूछा, "अभी जो किया... उसमें मज़ा आया?"