Secret Billionaire Ch. 2

अध्याय 2

Posted by Aarvi Nair • Sep 02, 2026 07:31 PM

हाँ?

रास्ते चलते लोग चौंक कर मुडे।

कबीर ने बिना सोचे तुरंत हाँ में सिर हिला दिया, और फिर घबराकर तेज़ी से ना में सिर हिलाने लगा।

"मज़ा नहीं आया?" लडकी की आँखों में ठंडक आ गई।

कबीर को रोना आ रहा था। वो इस बात का क्या जवाब दे?

लडकी की घूरती नज़रों के सामने... उसने आख़िरकार हाँ में सिर हिला दिया। हाँ, बहुत ज़ोर से हाँ।

ये देखकर लडकी मुस्कुरा उठी। उसकी मुस्कान जानलेवा थी। उसने प्यार से कबीर का गाल थपथपाया, "एक अच्छे और सच्चे लडके बनना, समझे? तुम्हारी एक बहन है? उसका नाम क्या है?"

"का... काव्या। और मेरा नाम कबीर है, मैडम!" कबीर ने डरते हुए हकलाकर कहा।

"हम्म... कबीर। अच्छा नाम है। डरो मत, मुझे पता है तुमने जानबूझकर नहीं किया। तुम अकेले थे जिसने उस गुंडे को भगाने में मेरी मदद की। ये लकी स्टोन पेंडेंट तुम्हारे लिए है। ये तुम्हारे लिए गुडलक लेकर आएगा। और याद रखना, मेरा नाम सुहाना है।"

सुहाना ने वो पेंडेंट लिया और वापस कबीर की शर्ट की जेब में डाल दिया। उसे थपथपाते हुए एक अजीब सी उदासी के साथ कहा, "आजकल इस दुनिया में अच्छे भाई बहुत कम बचे हैं। अपनी बहन का ख्याल रखना।"

आख़िर में, उसने हैरान खडे लोगों की तरफ एक नज़र डाली। एक हल्की सी सांस छोडी। अपनी दूसरी सही-सलामत हील को उतारा, उसे भी तोड दिया ताकि दोनों बराबर हो जाएं, और उन्हें पहनकर शान से अपनी कार में बैठ गई।

कार वहां से निकल गई।

"साला! दो बार छुआ और एक थप्पड तक नहीं पडा? उल्टा पेंडेंट भी दे गई! इस लडके की तो किस्मत ही चमक गई!"

"क्या मस्त लडकी थी! मुझे भी आगे जाना चाहिए था। एक बार छूने को मिल जाता तो मार खाना भी मंजूर था!"

लोग इस अंत से खुश नहीं थे। वो कबीर को पिटते हुए देखना चाहते थे।

शर्मा जी भी थोडा जल-भुन गए: "कबीर, सच-सच बता... क्या तूने जानबूझकर किया था? क्या सच में बहुत मज़ा आया?"

कबीर ने अपनी नाक खुजाई। उसे हँसी भी आ रही थी और रोना भी। "शर्मा जी, आपकी तो पत्नी है ना? आप तो रात भर..."

"अबे जा! कहाँ वो अप्सरा और कहाँ मेरी वो चुडैल... कोई मुकाबला है?" शर्मा जी ने आँखें घुमाईं।

लेकिन कबीर मन ही मन शर्मा जी का शुक्रगुज़ार था कि उन्होंने उसके लिए आवाज़ उठाई।

...

कबीर अपनी टूटी हुई ठेला-गाडी को धकेलते हुए जल्दी घर लौट रहा था।

पहिए टेढ़े हो गए थे, इसलिए गाडी खडखड कर रही थी। लोग मुड-मुड कर देख रहे थे।

उसका घर शिपिंग कंटेनर से बना एक साधारण सा, बहुत ही खस्ताहाल कमरा था।

लेकिन जैसे ही कबीर दरवाज़े पर पहुँचा... उसने देखा कि दो लंबे-चौडे आदमी बाहर खडे सिगरेट पी रहे हैं।

उन्हें देखते ही कबीर का दिल बैठ गया। वो समझ गया कि कुछ बहुत बुरा हुआ है।

ये दोनों अय्याश और बिगडैल बॉडीगार्ड थे। अगर ये दरवाज़े पर पहरा दे रहे हैं, तो अंदर उसकी बहन के साथ...?

तभी, उसे अंदर से अपनी बहन के रोने और चिल्लाने की आवाज़ आई:

"कमीने, छोड मुझे! छोडो मुझे! विक्रम, तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझे छूने की! मेरा भाई तुझे ज़िंदा नहीं छोडेगा! भैया... भैया मुझे बचाओ... बचाओ!"

"तेरा वो गरीब भाई अभी ठेला लगा रहा होगा। काव्या, मेरी बात मान ले। अगर तू मेरी हो जाएगी, तो मैं तुझे बहुत खुश रखूँगा। वैसे भी तू अपनी इस बीमारी के साथ ज़्यादा दिन तो जी नहीं पाएगी। अगर तू मेरे साथ सोएगी, तो मैं तुझे रोज़ पैसे दूँगा।"

"बचाओ! आह... भैया!"

ये सुनते ही कबीर की आँखें खून की तरह लाल हो गईं। उसका दिल लगा जैसे सीने से बाहर आ जाएगा। वो जानवर उसकी बहन की इज़्ज़त लूटने की कोशिश कर रहा था।

उसने तुरंत अपना ठेला वहीं छोडा और पागलों की तरह अंदर की तरफ भागा।

"आआआआह... विक्रम, साले कुत्ते! छोड मेरी बहन को!!"

लेकिन इससे पहले कि वो अंदर घुस पाता, दोनों बॉडीगार्ड्स ने उसका रास्ता रोक लिया।

एक ने कबीर के सीने पर ज़ोरदार लात मारी।

कबीर तीन मीटर दूर जाकर गिरा। वो ज़मीन पर पडा तडप रहा था। उठने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

"हे हे हे... कबीर बाबू, हमारे मालिक को तुम्हारी बहन पसंद आ गई है। ये तो तुम्हारी बहन की किस्मत है जो उसे हमारा मालिक मिल रहा है। तुम्हें तो खुश होना चाहिए!"

"हाँ भाई, तू दिन-रात मेहनत करके पैसे कमाता है, किसलिए? दवाइयों के लिए ना? हमारे मालिक के आने के बाद तुझे दवाइयां नहीं खरीदनी पडेंगी। है ना फायदे का सौदा?"

दोनों बॉडीगार्ड्स कबीर को देखकर कमीनी हँसी हँस रहे थे। और अंदर से काव्या अपने भाई को पुकार रही थी।

कबीर गुस्से और दर्द से तडप रहा था। उसने उठने की कोशिश की, लेकिन सीने में भयानक दर्द हुआ। उसने सीने पर हाथ लगाया तो वहाँ खून लगा था।

उसे इस बात का अंदाज़ा ही नहीं था कि जो लकी स्टोन पेंडेंट उसने अपनी जेब में रखा था, वो गायब हो चुका था, और एक सफ़ेद रोशनी उसके शरीर के अंदर समा गई थी।

कुछ ही पल बाद... एक ठंडी, ताज़गी भरी ऊर्जा उसके शरीर में दौडने लगी। वो ऊर्जा उसके रोम-रोम में फैल गई, उसकी नसों में बहने लगी, और आख़िर में जाकर उसकी आँखों में बस गई।

पलक झपकते ही कबीर के सीने का दर्द कम हो गया। उसका पूरा शरीर एक नई ताकत से भर गया। बस उसकी आँखों में थोडी जलन हो रही थी।

हालाँकि वो हैरान था, लेकिन इस वक्त अपनी बहन को बचाना सबसे ज़रूरी था। सोचने का समय नहीं था।

वो तुरंत खडा हुआ और फिर से उनकी तरफ दौडा: "विक्रम, छोड दे मेरी बहन को! तुम दोनों जानवर, मेरे रास्ते से हट जाओ!!"

"हाहा, साले कुत्ते, चुपचाप वहीं पडा रह। तेरी औकात नहीं है कि तू हमें पार कर सके। चुपचाप साला बनने की तैयारी कर!" एक बॉडीगार्ड ने ज़ोर से हँसते हुए कबीर के चेहरे पर मुक्का मारा।

बॉडीगार्ड के चेहरे पर मज़ाक का भाव था। उसे पता था कि इस मुक्के के बाद कबीर की नाक टूट जाएगी और वो घंटों तक ज़मीन से उठ नहीं पाएगा। उसे अपनी ताकत पर पूरा भरोसा था; उसने अपनी आधी ताकत ही लगाई थी, ताकि लडका मर ना जाए।

लेकिन क्या सच में ऐसा होने वाला था?

कबीर ने अपनी तरफ आते उस मुक्के को देखा। वो पूरी तरह सतर्क था।

अचानक, उसे लगा जैसे वो मुक्का बहुत धीमा हो गया है। जैसे टीवी में स्लो-मोशन सीन चल रहा हो।

वो थोडा चौंका, लेकिन बिना झिझके उसने उस बॉडीगार्ड की कलाई पर अपना मुक्का दे मारा।

"क्रैक!"

कबीर ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। उसे नहीं पता था कि वो "ताज़गी भरी ऊर्जा" क्या थी, या बॉडीगार्ड का मुक्का अचानक स्लो-मोशन में कैसे हो गया।

मुक्का और कलाई आपस में टकराए। कबीर को साफ़ महसूस हुआ कि उसने सामने वाले की हड्डी तोड दी है।

कलाई टूटकर उल्टी लटक गई। टूटी हुई हड्डी चमडी चीरकर बाहर आ गई और खून का फव्वारा फूट पडा। नज़ारा खौफनाक था।

कबीर खुद हैरान था। वो अपनी ही आँखों पर यकीन नहीं कर पा रहा था।

बॉडीगार्ड अपना टूटा हुआ हाथ पकडकर कांपने लगा और बुरी तरह चीख पडा: "आआआह— मेरा हाथ! मेरा हाथ टूट गया!!"

इस अंजाम ने दूसरे बॉडीगार्ड को भी सुन्न कर दिया।

उसकी आँखें फटी रह गईं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अचानक पासा कैसे पलट गया।

शक होने के बावजूद, वो आगे बढ़ा और कबीर पर टूट पडा।

"राआआह!"

उसने मिलिट्री स्टाइल में एक ज़ोरदार हवा में लात मारी।

लेकिन, कबीर की नज़रों में... वो लात फिर से बहुत धीमी हो गई।

"ये क्या हो रहा है? क्या ये मुझे जानबूझकर जीतने दे रहा है?" कबीर के दिमाग में यही खयाल आया।

उसी पल, कबीर ने भी एक लात चला दी। वो चाहता तो उस आदमी के पैरों के बीच मार सकता था, लेकिन ये सोचकर कि शायद ये आदमी जानबूझकर कमज़ोर पड रहा है, उसने अपनी लात की दिशा थोडी बदल दी और सीधा उसके पेट पर दे मारी।

"धड—!"

बॉडीगार्ड को लगा जैसे उसे किसी तेज़ रफ़्तार कार ने टक्कर मार दी हो।

लात लगते ही वो हवा में उडा और पाँच मीटर दूर जाकर ज़मीन पर ज़ोर से गिरा। उसका पेट ऐसे दर्द कर रहा था जैसे अभी फट जाएगा। वो अपनी जगह से हिल भी नहीं पा रहा था।

कबीर ने हैरानी से उन दोनों को देखा। उसे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था कि उसने इन खूंखार लोगों को इतनी आसानी से हरा दिया।

लेकिन अगले ही सेकंड, अपनी बहन का खयाल आते ही वो तेज़ी से अंदर घुसा।

उसने देखा विक्रम उसकी बहन के कपडे फाडने की कोशिश कर रहा था।

कबीर ने उसे बालों से पकडा और उस पर मुक्कों और लातों की बारिश कर दी।

"कमीने! तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी बहन को छूने की! मेरी बहन को छुएगा तू!"

"धड! धड! धड!"

कबीर लगातार विक्रम के शरीर और सिर पर वार कर रहा था। हर मुक्का मौत बनकर बरस रहा था।

कुछ ही सेकंड में विक्रम का गोरा चेहरा खून से सन गया। उसके कई दाँत टूट गए।

"आह... उफ़... तू मुझे मार डालेगा! भाई... कबीर भाई, मुझसे गलती हो गई..." विक्रम रोते हुए रहम की भीख मांगने लगा। वो घुटनों के बल गिर पडा।

"भैया, बस करो! भैया, वो मर जाएगा!" ऐन मौके पर काव्या ने कबीर को पीछे खींच लिया।

इसी मौके का फायदा उठाकर विक्रम वहाँ से अपनी जान बचाकर भाग खडा हुआ।

"काव्या, तू ठीक है? उस कमीने ने तेरे साथ कुछ किया तो नहीं?" कबीर ने विक्रम का पीछा नहीं किया। उसने अपनी बहन को गले लगा लिया।

काव्या बुरी तरह रो रही थी। उसके बाल और कपडे अस्त-व्यस्त थे। लेकिन शुक्र है कि कोई अनहोनी नहीं हुई थी।

"भैया... मुझे बहुत डर लग रहा था भैया..." काव्या कबीर के सीने से लगकर फूट-फूट कर रोने लगी।

"डर मत, तेरा भाई है ना... डरने की ज़रूरत नहीं है। उस कुत्ते विक्रम को मैं ज़िंदा नहीं छोडूंगा।"

कबीर ने काव्या को कसकर पकड लिया। उसका दिल अभी भी कांप रहा था। अगर उस कमीने ने उसकी बहन को... तो कबीर उसे वहीं जान से मार देता।

लेकिन फिर कबीर सोच में पड गया। विक्रम का परिवार बहुत ताकतवर था। उसके वो दोनों बॉडीगार्ड्स बहुत ट्रेंड थे। सुना था कि वो रिटायर मिलिट्री वाले थे। कबीर ने खुद उन दोनों को दस-पंद्रह गुंडों को अकेले मारते देखा था।

तो आज वो इतने कमज़ोर कैसे पड गए? क्या सच में वो कबीर पर तरस खा रहे थे?

ऐसा तो नहीं लग रहा था।

और उसके शरीर में वो अजीब सी गर्मी और ताकत कहाँ से आई? क्या गुस्से की वजह से ऐसा हुआ था?

उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था!

...

"तुम दोनों किसी काम के नहीं हो! एक मामूली से लडके को नहीं रोक पाए? तुम बॉडीगार्ड हो या मिट्टी के माधव?"

विक्रम, जिसका चेहरा और सिर खून से लथपथ था, गुस्से में अपने दोनों घायल बॉडीगार्ड्स पर चिल्ला रहा था।

टूटे हाथ वाले बॉडीगार्ड ने दर्द से कराहते हुए कहा, "मालिक, हमें नहीं पता उस लडके में अचानक इतनी ताकत कहाँ से आ गई। शुक्र है कि आपकी जान बच गई।"

चटाक!

"इसे जान बचना कहते हैं? अंधे हो क्या? मेरा पूरा चेहरा खून से लाल हो गया है!" विक्रम ने उस बॉडीगार्ड को ज़ोरदार थप्पड मारा और गालियां देने लगा।

फिर उसने अपना फोन निकाला: "हैलो... चाचा! मुझे किसी ने बहुत बुरी तरह मारा है! मेरा पूरा शरीर खून से भर गया है! मेरे बॉडीगार्ड्स का हाथ तोड दिया है! आप पुलिस में हैं, आपको मुझे इंसाफ दिलाना होगा... कौन है? एक कमीना लडका है कबीर नाम का। सूरज रोड वाले कंटेनर घर में रहता है। आपको उसे अभी गिरफ्तार करना होगा और थर्ड डिग्री टॉर्चर देना होगा! मेरी शक्ल ऐसी हो गई है कि मेरी माँ भी मुझे नहीं पहचान पाएगी..."

...

कंटेनर वाले घर में।

काव्या धीरे-धीरे अपने भाई के सीने का घाव साफ़ कर रही थी। उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। "भैया, बहुत दर्द हो रहा है ना? कितना खून बह गया है!"

कबीर मुस्कुराया: "कुछ दर्द नहीं है, तेरे भाई की चमडी बहुत मोटी है।"

लेकिन जैसे ही काव्या ने घाव पर स्पिरिट वाला रुई लगाया, कबीर के मुँह से सिसकारी निकल गई। सच में बहुत दर्द था।

घाव गोल आकार का था। दरअसल, जब बॉडीगार्ड ने लात मारी थी, तो कबीर की जेब में रखा वो लकी स्टोन पेंडेंट टूटकर उसकी चमडी में धंस गया था। लेकिन अब वो पत्थर वहाँ नहीं था, और उसका धागा भी गायब था।

"भैया, ये सब मेरी वजह से हुआ है। मैं ही आप पर बोझ हूँ। अगर मैं नहीं होती, तो आप कितनी अच्छी ज़िंदगी जी रहे होते... शायद आपकी कोई गर्लफ्रेंड भी होती। कभी-कभी मेरा मन करता है कि मैं मर जाऊँ।"

"चुप कर! पागल हो गई है क्या? मरने की बात दोबारा मत करना। तेरा भाई तेरा इलाज करवाएगा, देखना तू बिल्कुल ठीक हो जाएगी।"

काव्या 17 साल की थी। कबीर से दो साल छोटी।

उसे बचपन से ही ब्लड कैंसर था। हालाँकि बीमारी कंट्रोल में थी, लेकिन उसे रोज़ दवाइयां लेनी पडती थीं। अगर दवा ना मिले, तो उसकी जान जा सकती थी। और ये दवाइयां बहुत महंगी आती थीं, महीने का पाँच-छह हज़ार का खर्च। अगर कबीर दिन-रात मेहनत ना करे, तो वो ये खर्च नहीं उठा सकता था।

उनके पिता बचपन में ही गुज़र गए थे। और माँ... एक बीमार बेटी का बोझ नहीं उठाना चाहती थी। घर में खाने को दाने नहीं थे। जब कबीर 15 साल का था, तो उसकी माँ उन दोनों को लावारिस छोडकर भाग गई।

पिछले चार सालों से कबीर हर तरह के काम कर रहा था। ईंटें उठाना, रिक्शा चलाना, कबाड बेचना... उसने सब किया था। और अब पिछले दो सालों से वो पैनकेक का ठेला लगा रहा था, जिससे ठीक-ठाक पैसे मिल जाते थे।

दोनों भाई-बहन एक-दूसरे की जान थे। ज़िंदगी भले ही कठिन थी, लेकिन दोनों के बीच का प्यार उनकी सबसे बडी ताकत था।

रात के नौ बज रहे थे।

दोनों भाई-बहन एक टूटी हुई मेज़ पर खाना खा रहे थे। खाने में मछली और मीट था। काव्या को प्रोटीन की बहुत ज़रूरत थी, इसलिए कबीर हमेशा उसके लिए अच्छा खाना लाता था।

तभी... बाहर एक पुलिस सायरन की आवाज़ आई।

एक गाडी ठीक उनके घर के बाहर आकर रुकी।

कुछ ही पल बाद, लाल और सफ़ेद चेक शर्ट, सफ़ेद पैंट और नीली हील्स पहने एक लडकी अंदर आई।

कंटेनर घर में काफी गर्मी रहती थी, इसलिए कबीर सोते वक़्त छोडकर हमेशा दरवाज़ा खुला रखता था।

"कबीर?" लडकी ने कमरे में नज़र घुमाते हुए पूछा।

"ये... बाप रे, क्या गज़ब की लडकी है!"

कबीर के मुँह में खाना था, लेकिन उसकी आँखें फटी रह गईं।

लडकी बीस-बाईस साल की थी। भूरे बाल पोनीटेल में बंधे थे। चेहरा बेहद खूबसूरत था। लेकिन जिस चीज़ ने कबीर को सुन्न कर दिया, वो था उसका फिगर। उसकी शर्ट के बटन ऐसे खिंचे हुए थे जैसे अभी टूट कर गिर जाएंगे।

कबीर ने अंदाज़ा लगाया कि उसका साइज़ कम से कम 36F होगा। ऐसा मासूम चेहरा और इतना खतरनाक फिगर... ये कॉम्बिनेशन जानलेवा था!

कबीर की नज़रें उस लडकी पर ही अटकी थीं।

काव्या ने धीरे से कहा, "भैया... ये पुलिस वाली दीदी... क्या ये मेरी भाभी बनने वाली हैं?"

वो भी उस लडकी को देखकर हैरान थी।

इस लडकी का नाम अंजलि था। वो पास के ही सिटी पुलिस स्टेशन में इंस्पेक्टर थी। आज उसकी एक दोस्त का जन्मदिन था। बीस मिनट पहले वो एक रिसोर्ट के पूल में मज़े कर रही थी, तभी उसे डिप्टी चीफ का फोन आ गया।

आदेश था कि एक गुंडे को गिरफ्तार करना है जिसने तीन लोगों को बुरी तरह मारा है और उन्हें अपाहिज कर दिया है। ज़ाहिर है, अंजलि का मूड बहुत खराब था। वो चाहती तो अपने किसी जूनियर को भेज सकती थी, लेकिन सभी ड्यूटी पर थे। इसलिए उसे अपनी पार्टी छोडकर बिना यूनिफॉर्म के ही आना पडा।

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