अध्याय 3
कबीर को इस तरह घूरते देखकर अंजलि का गुस्सा और भडक गया। उसने त्यौरियां चढ़ाकर कहा, "कहाँ देख रहे हो तुम? मैं पूछ रही हूँ, तुम्हारा नाम कबीर है?"
बोलते हुए वो आगे बढ़ी, लेकिन अचानक उसका पैर ज़मीन पर पडे एक खीरे के छिलके पर पडा।
स्लिप!
वो पीछे की तरफ गिरने लगी।
लेकिन ये लेडी इंस्पेक्टर सच में कमाल की थी। जैसे ही कबीर और काव्या की धडकनें रुकीं, अंजलि ने हवा में ही अपनी कमर मोडी, एक हाथ ज़मीन पर टिकाया और एक शानदार बैकफ्लिप मारते हुए सीधे खडी हो गई।
"क्या बात है! एकदम हॉलीवुड फिल्मों जैसा एक्शन!" कबीर के मुँह से तारीफ निकल गई।
अंजलि को भी खुद पर थोडा गर्व महसूस हुआ। उसने अपनी ठुड्डी थोडी ऊपर की, जैसे कोई हीरोइन अपना स्वैग दिखा रही हो।
लेकिन तभी...
'पॉप!'
एक हल्की सी आवाज़ हुई।
अंजलि की शर्ट का एक बटन टूटकर ज़मीन पर गिर गया।
और अंदर का नज़ारा... जो पहले से ही बेकाबू था, अब साफ़ दिखने लगा।
"पफ्फ्फ—!"
कबीर ये सब बर्दाश्त नहीं कर पाया। उसके मुँह में भरा चावल सीधा बाहर निकलकर अंजलि पर जा गिरा। कुछ दाने तो सीधे उसकी शर्ट के खुले हिस्से के अंदर चले गए।
"छी—!"
अंजलि को घिन आ गई। उसने हडबडाहट में उन दानों को झाडने की कोशिश की। लेकिन ऐसा करने से उसका शरीर और भी ज़्यादा हिलने लगा, जो कबीर के लिए किसी 3D फिल्म से कम नहीं था।
अंजलि ने जैसे-तैसे खुद को साफ़ किया और गुस्से से कबीर को गालियां देने के लिए मुंडी उठाई।
लेकिन उसने देखा कि कबीर की नाक से खून की धार बह रही थी। वो सन्न रह गई।
दरअसल, जवान खून इस ज़बरदस्त नज़ारे को झेल नहीं पाया था।
अंजलि का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने एक हाथ से अपनी शर्ट को पकडा और दूसरे हाथ से अपना पुलिस आईडी कार्ड मेज़ पर पटक दिया।
"मैं सिटी पुलिस स्टेशन से इंस्पेक्टर अंजलि हूँ! तुम्हारा नाम कबीर है ना? तुम पर जानलेवा हमला करने और तीन लोगों को अपाहिज बनाने का इल्ज़ाम है। सज़ा बहुत सख्त होगी। चुपचाप मेरे साथ थाने चलो।"
कबीर ने आईडी कार्ड देखा, भौंहें सिकोडीं और कुछ नहीं बोला।
लेकिन काव्या घबरा गई। वो तुरंत उठी और अपने भाई के सामने खडी हो गई।
"पुलिस... पुलिस दीदी, मेरा भाई कोई मुजरिम नहीं है। वो बहुत अच्छा है। प्लीज़ उसे मत ले जाइये। अभी-अभी... विक्रम नाम का एक लडका मेरे साथ... बदतमीजी करने की कोशिश कर रहा था। इसलिए मेरे भाई ने उसे मारा।"
'****' या 'बदतमीजी' जैसे शब्द बोलना किसी भी लडकी के लिए बहुत मुश्किल होता है।
अंजलि हैरान रह गई। "क्या? किसी ने तुम्हारे साथ बदतमीजी करने की कोशिश की?"
उसे ये बात नहीं पता थी। डिप्टी डायरेक्टर ने तो बस इतना कहा था कि कबीर बहुत खतरनाक गुंडा है और उसे तुरंत पकडना है।
उसने काव्या को देखा। बीमार और कमज़ोर, लेकिन फिर भी अपने भाई को बचाने के लिए सामने खडी थी।
अंजलि ने सिर हिलाते हुए कहा, "ठीक है, तुम दोनों मेरे साथ थाने चलो। मैं पूरी तफ्तीश करूँगी।"
कहते हुए उसने हथकडी निकाल ली।
काव्या डर गई।
कबीर अपनी बहन को थाने जैसी जगह नहीं ले जाना चाहता था। उसने उठकर कहा, "मेरी बहन छोटी है, उसे मत डराइये। क्या आप यहाँ पूछताछ नहीं कर सकतीं? मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ। मेरी बहन शिकार है, उसे थाने जाने की क्या ज़रूरत?"
अंजलि ने काव्या को देखा, फिर कबीर की तरफ घूरकर आख़िरकार मान गई।
"काव्या, तू घर पर ही रहना। दरवाज़े-खिडकियां अंदर से लॉक कर लेना। मुझे कुछ नहीं होगा।"
कबीर ने काव्या को समझाया और अंजलि के पीछे बाहर आ गया।
बाहर लाल रंग की पोर्श 911 खडी थी।
कबीर हैरान रह गया। आजकल के पुलिस वाले इतने अमीर कब से हो गए? उसने पूछा, "क्या आप सच में पुलिस वाली हैं?"
अंजलि ने खटाक से उसके हाथों में हथकडी पहनाई और गुस्से से बोली, "मैं पागल हूँ जो पुलिस की वर्दी पहनकर घूमूंगी! तुमने मेरी पार्टी खराब की है। अगर तुमने मुझसे झूठ बोला है, तो तुम्हें बहुत भारी पडेगा!"
कबीर को पोर्श में धकेल दिया गया। ज़िंदगी में पहली बार वो इतनी महंगी कार में बैठा था, लेकिन किस्मत देखो, एक मुजरिम बनकर।
उसने शीशे से अपनी बहन को देखा। काव्या दरवाज़े के सहारे खडी रो रही थी। कबीर का दिल कट सा गया। उसने ज़बरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की।
काव्या को रोता देख अंजलि ने कहा, "परेशान मत हो, अगर तुमने कोई जुर्म नहीं किया है, तो तुम जल्दी घर लौट आओगे।"
थाने में पहुँचकर अभी पूछताछ शुरू ही हुई थी कि एक अधेड उम्र का, मोटा सा पुलिस वाला अंदर आया।
उसने अंजलि के **** को बुरी नियत से देखा, फिर मेज़ पर तीन मेडिकल रिपोर्ट पटक दीं। कबीर की तरफ उंगली उठाते हुए बोला, "अंजलि, ये लडका बहुत खतरनाक है। इसने एक को अपाहिज कर दिया, दूसरे को गंभीर चोटें दीं और तीसरे का सिर फोड दिया। ऐसे गुंडे को सख्त से सख्त सज़ा मिलनी चाहिए।"
फिर उसने दरवाज़े की तरफ चिल्लाकर कहा, "ओए शर्मा! अंदर आ। इस गुंडे को काला पहाड जेल के सेल A06 में डाल दे। कल सुबह इसके कागज़ात तैयार करेंगे।"
अंजलि ने भौंहें सिकोडीं, "डिप्टी चीफ वर्मा जी, A06 सेल तो खतरनाक मुजरिमों के लिए है। वहाँ इसे डालना ठीक नहीं होगा।"
ये वर्मा जी कोई और नहीं, विक्रम के सगे चाचा थे: "क्यों नहीं? इसने लोगों को अपाहिज किया है, क्या ये छोटा जुर्म है?"
"लेकिन मैंने सुना है कि विक्रम नाम के एक लडके ने इसकी बहन के साथ बदतमीजी करने की कोशिश की थी। इसने जो किया वो अपनी बहन को बचाने के लिए किया।" अंजलि को वर्मा और विक्रम के रिश्ते के बारे में नहीं पता था।
"क्या तुम्हारे पास कोई सबूत है? अंजलि, हम सबूतों पर काम करते हैं। मुजरिमों की झूठी कहानियों पर नहीं। शर्मा, इसे ले जा यहाँ से। फैसला जज साहब करेंगे।"
अंजलि बेबस खडी रह गई।
"धडाम!"
लोहे का भारी दरवाज़ा खुला और कबीर को सेल A06 में धकेल दिया गया।
अंदर पाँच कैदी थे। चार के शरीरों पर भयानक टैटू बने थे, और पाँचवां कोने में डरा हुआ बैठा था।
"अरे वाह! एक और नया बकरा। इतना जवान... क्या जुर्म करके आया है रे तू? बता हमें।"
एक आँख वाले टैटू वाले आदमी ने गंदी सी हँसी हँसते हुए कहा।
कबीर ने उसे इग्नोर किया और सीधे एक खाली बिस्तर पर जाकर बैठ गया। उसके दिमाग में बस दो ही बातें चल रही थीं:
पहली, वो कब तक यहाँ बंद रहेगा? अगर इंस्पेक्टर अंजलि ने सच में उसकी मदद की, तो शायद जल्दी छूट जाए। वरना काव्या का क्या होगा?
दूसरी, उसके अंदर इतनी ताकत अचानक कहाँ से आ गई? विक्रम के वो बॉडीगार्ड्स तो मार्शल आर्ट्स के मास्टर थे, फिर भी उसने उन्हें एक मुक्के में कैसे तोड दिया? और उसकी आँखों में वो स्लो-मोशन वाला नज़ारा... ये सब क्या था?
"ओए छपरी! मैं तुझसे कुछ पूछ रहा हूँ। गूंगा है क्या? तुझे बैठने को किसने कहा? खडा हो! इधर आ, घुटनों के बल बैठ और माथा टेक!"
एक दूसरे टैटू वाले कैदी ने कबीर की नाक पर उंगली रखते हुए चिल्लाकर कहा। उसका रवैया बहुत आक्रामक था। ऐसा लग रहा था जैसे वो अभी कबीर को पीटना शुरू कर देगा।
"क्या?"
कबीर हैरान रह गया। अपनी बहन की खातिर वो कोई पंगा नहीं लेना चाहता था, लेकिन वो बिना किसी बात के किसी के पैरों में गिरने वाला भी नहीं था। वो बचपन से ही सडकों पर पला-बढ़ा था, इसलिए उसे लोगों से निपटना आता था।
वो खडा हुआ और मुस्कुरा कर बोला, "भाई साहब, मैं नया हूँ। मुझे यहाँ के नियम नहीं पता। माफ़ कर दीजिए।"
काने आदमी ने कमीनी हँसी हँसते हुए कहा, "ठीक है, तो सुन यहाँ का नियम। जब भी कोई नया अंदर आता है, तो उसे सबसे पहले बॉस के पैर चूमने पडते हैं। घुटनों के बल बैठ और बॉस के पैर चाट।"
ये कहते हुए उसने अपना जूता निकाला और अपना गंदा, काला, बदबूदार पैर कबीर के सामने कर दिया। "साले, मैं यहाँ का बॉस हूँ। जल्दी चाट इसे।"
कबीर को वो पैर देखकर ही उल्टी आने लगी। बाकी कैदी भी मज़े ले रहे थे। कबीर का खून खौलने लगा। ये सीधा-सीधा उसकी इज़्ज़त पर हमला था। अगर उसने आज ये पैर चाट लिया, तो वो पूरी ज़िंदगी खुद से नज़रें नहीं मिला पाएगा। रातों को उसे घिन आएगी।
उसने अपने गुस्से को दबाते हुए कहा: "बडे भाई... मज़ाक मत करो।"
काना कैदी गुर्राया: "तुझसे मज़ाक कौन कर रहा है बे? सुन ले, तूने विक्रम बाबू पर हाथ उठाने की जुर्रत की है, तो अब सज़ा भुगतने को तैयार रह। चुपचाप मेरे पैर चाट ले, तो शायद तू कम पिटेगा। वरना तेरी दोनों बांहें और टांगें तोड दूंगा।"
"क्या? तुम विक्रम के आदमी हो? उसने तुम्हें मुझे मारने के लिए पैसे दिए हैं?" कबीर चौंक गया। उसका दिमाग तेज़ी से चलने लगा।
"ज़्यादा बकवास मत कर और पैर चाट!"
एक खूंखार से दिखने वाले कैदी ने कबीर के सिर पर पूरी ताकत से थप्पड मारने के लिए हाथ उठाया। ये थप्पड किसी को भी बेहोश कर सकता था।
कबीर तुरंत पीछे हटा। उसने देखा कि सामने वाले का हाथ फिर से स्लो-मोशन में आ रहा था। उसे पक्का यकीन हो गया कि उसके शरीर में कुछ बहुत अजीब और जादुई बदलाव हुआ है, जो उसके लिए एक वरदान था।
कबीर को बचता देख वो कैदी और भडक गया: "साले, तू बचेगा?"
उसने दोबारा थप्पड चलाया।
इस बार कबीर पीछे नहीं हटा। जब उसे पता चल गया था कि ये लोग विक्रम के भेजे हुए हैं, तो बात करने का कोई मतलब नहीं था। अब तो लडाई ही तय थी।
वो जानता था कि जो पहले मारता है, वही जीतता है। उसने अपनी कमर घुमाई, मुट्ठी भींची और पूरी ताकत से वार किया।
"बूम!"
कबीर को महसूस हुआ कि उसके शरीर की वो अजीब सी गर्मी उसकी मुट्ठी में आ गई है। उसका मुक्का सीधा उस कैदी के चेहरे पर पडा।
"आआआह!"
कैदी की चीख निकल गई। उसकी नाक की हड्डी टूट गई, खून के छींटे हवा में उड गए। वो हवा में उछलता हुआ पीछे जाकर गिरा। उसके कई दाँत ज़मीन पर बिखर गए।
ये सब इतनी तेज़ी से हुआ कि बाकी कैदी जो कबीर का मज़ाक उडने का इंतज़ार कर रहे थे, उनके चेहरों की हँसी वहीं जम गई। किसी ने नहीं सोचा था कि ये नया लडका इतना खतरनाक होगा।
काने ने चिल्लाकर कहा: "मारो साले को! जान से मार दो!"
"तेरी तो!"
कबीर अपने इस मुक्के की ताकत देखकर अंदर ही अंदर खुश हो गया। उसे नहीं पता था कि ये गर्मी क्या है, लेकिन इस वक़्त यही उसकी सबसे बडी ढाल थी।
उसने तुरंत दूसरा मुक्का चलाया। फिर से वही गर्मी का एहसास! एक और कैदी खून थूकता हुआ हवा में उछला और सीधे लोहे के बेड से जा टकराया। बेड ज़ोरदार आवाज़ के साथ टेढ़ा हो गया। कैदी ज़मीन पर पडा तडप रहा था। उठने की हिम्मत नहीं बची थी।
"ये... ये कैसे हो सकता है? इतना ताकतवर?"
काना फटी हुई आँखों से कबीर को देख रहा था।
कबीर ने बिना कुछ कहे एक ज़ोरदार तमाचा काने के मुँह पर जड दिया। चटाक! बिना किसी चेतावनी के। काना ज़मीन पर गिर पडा और उसका आधा चेहरा सुअर की तरह सूज गया।
आखिरी बचा हुआ टैटू वाला कैदी डर के मारे कोने में दुबक गया। उसने घुटनों के बल गिरकर हाथ जोड लिए: "भाई साहब! मुझे छोड दो... मेरी कोई गलती नहीं है।"
कबीर को एक अजीब सा सुकून मिल रहा था, जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। उसे लग रहा था जैसे वो कोई सुपरहीरो बन गया है। सडकों पर लडाइयां तो उसने बहुत लडी थीं, लेकिन एक साथ इतने सारे खूंखार गुंडों को बिना एक खरोंच खाए धूल चटा देना... ये उसके लिए बिल्कुल नया था।
जो भी ताकत उसके अंदर आई थी, वो उसके लिए भगवान का आशीर्वाद थी।
कबीर ने आगे बढ़कर काने के चेहरे पर अपना पैर रख दिया। वो एक विजेता की तरह उसे नीचे देख रहा था: "कहाँ गई तेरी वो अकड? अभी तो तू मुझे अपने पैर चाटने को कह रहा था ना? सोच रहा था कि मेरी हड्डियां तोड देगा? और तू..." कबीर ने घुटनों पर बैठे कैदी की तरफ देखा, "...तू भी तो मज़े ले रहा था ना? अब कह रहा है कि तेरी गलती नहीं है? इतनी आसानी से नहीं छूटेगा। आ यहाँ... और इसके पैर चाट।"
"हाँ... हाँ जी... मैं अभी चाटता हूँ।" टैटू वाला कैदी रेंगता हुआ कबीर के पैरों की तरफ बढ़ा, लेकिन कबीर ने उसे लात मारकर काने की तरफ धकेल दिया: "मेरे नहीं बे! इसके पैर चाट!"
टैटू वाले की हालत खराब हो गई। काने के पैर पूरी जेल में सबसे बदबूदार थे।
लेकिन मार खाने के डर से, वो रोते हुए काने के पैर चाटने लगा।
उसे इस घिनौने काम में लगा देखकर कबीर ने काने के मुँह पर थोडा और दबाव डालते हुए पूछा: "सच-सच बता, विक्रम ने तुम्हें क्या लालच दिया था? वो मेरे साथ क्या करना चाहता था? बोल!"
काने ने दर्द से कराहते हुए कहा: "भाई साहब... मैं सब सच बताता हूँ... विक्रम बाबू ने कहा था कि हम तुम्हें तडपा-तडपा कर मारें। तुम्हारी बांहें और टांगें तोड दें, और तुम्हें पागल कर दें। इसके लिए उसने हमें बीस-बीस हज़ार रुपये दिए थे।"
"क्या? मुझे पागल करना चाहता था? विक्रम, तू सच में बहुत बडा कमीना है। ठीक है, तो पहले मैं तुझे ही पागल बनाता हूँ!" कबीर दहाडा और उसने अपना पैर पूरी ताकत से काने के चेहरे पर दे मारा।
काना दर्द से चीखने लगा: "भाई साहब, मुझे छोड दो! मैं तुम्हें एक और बहुत बडी बात बताता हूँ... विक्रम ने कहा था कि आज रात वो तुम्हारी बहन के पास जाएगा।"
"क्या कहा तूने? साले कुत्ते!"
ये सुनते ही कबीर का दिमाग फट पडा। उसे भयंकर गुस्सा भी आया और डर भी लगा। उसने काने के चेहरे पर इतनी ज़ोर से लात मारी कि वो तुरंत बेहोश हो गया। उसके बचे-खुचे दाँत भी बाहर आ गए।
"धडाम! धडाम! धडाम!"
कबीर पागलों की तरह लोहे के दरवाज़े पर मुक्के मारने लगा। "कोई है? दरवाज़ा खोलो! जल्दी आओ!"
थोडी देर बाद एक पुलिस वाला गुस्से में वहां आया: "क्या चिल्ला रहा है बे? एक और लात मारी तो तुझे काल कोठरी में डाल दूंगा। सारी हेकडी निकल जाएगी।"
कबीर घबराया हुआ था। उसकी बहन घर पर अकेली थी। अगर वो दरिंदा विक्रम वहाँ पहुँच गया, तो कुछ भी हो सकता है।
उसने हाथ जोडकर कहा: "सर, मेरी बात सुनिए! मुझे तुरंत घर जाना है। मेरी बहन की जान खतरे में है। एक गुंडा उसके पीछे पडा है। प्लीज़, मेरी मदद कीजिए! या आप किसी को मेरे घर भेज दीजिए!"
पुलिस वाले ने मुँह बनाते हुए कहा: "पागल हो गया है क्या? चुपचाप अंदर बैठ। ये सब ड्रामे यहाँ नहीं चलेंगे।"
"मैं सच कह रहा हूँ सर!"
"अबे बकवास बंद कर अपनी।"
पुलिस वाले को जाता देख कबीर का खून खौल उठा। उसने एक कदम पीछे लिया और पूरी ताकत से लोहे के दरवाज़े पर एक जोरदार किक मारी।
धडाम!
एक कान फाड देने वाली आवाज़ हुई और लोहे का भारी दरवाज़ा टूटकर खुल गया।
कबीर बिजली की रफ़्तार से बाहर निकला। पुलिस वाले ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन कबीर ने एक ही मुक्के में उसे बेहोश कर दिया।
आसपास के सेल्स के कैदी ये नज़ारा देखकर सन्न रह गए।
ये लडका इंसान है या कोई मॉन्स्टर?