आवेश 2
दो हफ़्ते बाद
हल्की-सी ठंडी, लेकिन खिली-खिली धूप में, शान, धृति और साहिल हल्का सामान लेकर निकल पड़े।
साहिल — 23 साल का, दुबला-पतला लेकिन एथलेटिक, गेहुँआ रंग, चेहरे पर हमेशा हल्की दाढ़ी और शरारती मुस्कान रहती थी। कॉलेज के स्पोर्ट्स क्लब में होने की वजह से उसका हाव-भाव फुर्तीला था। उसकी गहरी आँखों में हमेशा कोई न कोई मज़ाक पलता रहता था, और बाल हल्के बिखरे रहते, जैसे समय ही न मिला हो उन्हें सँवारने का।
धृति और साहिल पूरे रास्ते उत्साह से भरे रहे। कभी खिड़की से झुककर खेतों को देखना, कभी पीतल के घड़े उठाए औरतों को हाथ हिलाना, और बार-बार फोटोज़ क्लिक करना।
“ये तो कमाल है,” धृति ने दसवीं बार कहा।
“भाभी, अब मेरी इतनी भी तारीफ़ मत करो।” — साहिल ने हँसते हुए कहा, जिस पर धृति ने नकली गुस्से में आँखें घुमाईं। शान बस मुस्कुरा रहा था।
लेकिन जैसे-जैसे वे कुंडपुर के क़रीब पहुँचे, सड़क सँकरी होती गई। खेतों की जगह जंगली पेड़ों के झुरमुट आ गए। हवा में एक अजीब-सी ख़ामोशी घुल गई — न पत्तों की सरसराहट, न पंछियों की आवाज़।
गाँव में पहुँचते ही लगा जैसे किसी तस्वीर में क़दम रख दिया हो — जमा हुआ, शांत। चाय की दुकान पर बैठे कुछ बुज़ुर्ग उनकी कार को देखते रहे। शान उतरा, शरीर थोड़ा स्ट्रेच किया, और उनकी नज़रों को अपने ऊपर महसूस किया।
कुएँ से पानी भरती एक दुबली औरत बीच में ही रुक गई, मटका डगमगाने लगा। उसने फुसफुसाकर पास वाली औरत से कुछ कहा, और दूसरी ने भी सिर हिलाया।
धृति ने भौंहें सिकोड़ लीं। “ये लोग तुम्हें ऐसे क्यों देख रहे हैं?”
शान ने हँसते हुए कहा, “शायद मैं इस जगह के लिए ज़्यादा ही हैंडसम हूँ।”
साहिल शान का मज़ाक उड़ाते हुए — “वेरी फनी भाई… वो तो मेरी सुंदर भाभी आपके प्यार में पड़ गई, वरना कौन ही देखता आपको।”
उसकी इस बात पर शान ने उसे आँखें दिखाई, जबकि धृति और साहिल ने हँसते हुए हाई-फाइव किया।
दूर, विशाल बरगद के नीचे, ज़मीन ने हल्की-सी साँस ली। और गहराई में… उसकी जड़ों के नीचे… कुछ जाग उठा।
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कुंडपुर गाँव की हवा में एक अजीब-सी सरसराहट थी। दोपहर का सूरज ऊँचा था, लेकिन सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ था।
बस दो-चार बच्चे धूल उड़ाते भाग रहे थे और कुछ औरतें कुएँ से पानी खींच रही थीं।
जैसे ही शान, धृति और साहिल ने अपनी कार गाँव की चौपाल के पास रोकी, और थोड़ी बातचीत ही की थी। लोगों की फुसफुसाहट तेज़ हो गई।
“कौन हैं ये?”
“शहर से आए लगते हैं।”
ये खबर गाँव में आग की तरह फैल गई। और ज़्यादा देर नहीं लगी कि धूल उड़ाती हुई एक सफेद जीप चौपाल के सामने आकर रुकी।
जीप से उतरे भूपेन्द्र सिंह — गाँव का ज़मींदार और राजनीति में भी जिसका दबदबा था। ऊँची कद-काठी, हल्के सफेद होते बाल, धोती-कुर्ते के ऊपर मटमैली जैकेट और आँखों में ऐसा रौब, जैसे पूरे गाँव की बागडोर उसकी मुट्ठी में हो।
उसके साथ था उसका छोटा भाई शक्ति सिंह — दबंग किस्म का, मोटा चेहरा और तावदार मूँछें।
उनके पीछे-पीछे आए उनके तीन दोस्त — जसवंत (तगड़े शरीर वाला, हर बात में हाँ-हाँ करने वाला), लालचंद (पतला, चालाक आँखों वाला), और गुरुनाथ (धार्मिक रूप-रंग लिए, लेकिन असल में चालाक)।
उन सबके कदमों से ही गाँव वाले किनारे हटने लगे। भूपेन्द्र सिंह ने शान की तरफ़ नज़र डाली।
“तो… हमारे कुंडपुर में शहरी मेहमान आए हैं?” उसकी आवाज़ गहरी थी, मगर उसमें तंज़ छुपा था।
शान ने हल्की मुस्कान के साथ हाथ जोड़े। “नमस्ते। जी… हम यहाँ अपना गाँव देखने आए हैं।”
शक्ति सिंह ने आँखें सिकोड़ते हुए पूछा, “कौन-सा घर? किसके बेटे हो?”
धृति और साहिल थोड़े असहज हो गए। गाँव के बीच सबकी नज़र उन पर थी। शान ने सहजता से जवाब दिया, “मेरे पिताजी का गाँव यही है। हम श्रवण शर्मा के बेटे हैं।"
भूपेन्द्र की आँखों में हल्की पहचान की चमक आई, फिर भी उसने हँसकर कहा, “अच्छा-अच्छा… श्रवण! याद आया। तुम्हारे बाबूजी सालों पहले शहर चले गए थे… गाँव से रिश्ता तोड़कर।”
लालचंद ने नकली मुस्कान के साथ जोड़ा, “तो अब शहर के लोग गाँव की हवा खाने आए हैं? थोड़ा बदलने का मन हुआ क्या?”
साहिल ने ठंडी साँस भरकर कहा, “हम बस मिलने आए हैं… अपनी बुआजी से। उनका घर यहीं है।”
गुरुनाथ ने बीच में टोका, “बुआजी? कौन-सी?”
धृति ने धीरे से कहा, “पापाजी की ममेरी बहन… उनका परिवार यहाँ रहता है।”
इस पर भूपेन्द्र ने ठहाका लगाया।
“अरे वाह! तो तुम लोग कमला के खानदान से हो! अच्छा किया, शहर से गाँव की मिट्टी याद आई। लेकिन याद रखना—ये गाँव है। यहाँ सबकी नज़र सब पर रहती है।”
शक्ति सिंह आगे बढ़ा, “और यहाँ राज चलता है भूपेन्द्र सिंह का। कोई चीज़ छुपकर नहीं होती।”
उनके पीछे खड़े जसवंत ने गर्दन ऊँची करके कहा: “गाँव का हर कोना, हर खेत, हर रास्ता इन्हीं के इशारे पर चलता है।”
धृति ने असहज नज़रें मिलाईं, लेकिन शान ने शांति से जवाब दिया: “हम यहाँ किसी को परेशान करने नहीं आए हैं। बस परिवार से मिलने, गाँव घूमने और पुराना घर देखने।”
भूपेन्द्र कुछ पल तक उसे घूरता रहा। फिर अचानक मुस्कुराया और अपने आदमी से कहा: “अच्छा, इन्हें कमला देवी के घर पहुँचा दो। रास्ता थोड़ा मुश्किल है।”
जब वो लोग अपनी कार में लौटे, तो साहिल ने धीमे स्वर में कहा: “भाई… ये लोग ज़्यादा ही रौब झाड़ रहे थे। मुझे तो लगा जैसे हम कोई क्रिमिनल्स (अपराधी) हों।”
शान ने गंभीरता से जवाब दिया: “ये लोग ऐसे ही पावर दिखाते हैं, साहिल। वैसे भी यहाँ इस ज़मींदार का राज है।”
धृति, जो अब भी भूपेन्द्र की पैनी नज़रों को याद कर रही थी, धीमे से बोली: “लेकिन… बिल्कुल भी अच्छे लोग नहीं थे शान। बहुत गंदी नज़र से घूर रहे थे।”
शान और साहिल दोनों ने एक साथ धृति को देखा।
साहिल बोला: “भाभी, इन लोगों की तो मैं चटनी बना दूंगा।”
धृति उसकी बात पर हँस पड़ी।
कार में बैठ चुके शान ने धृति का हाथ पकड़ते हुए कहा: “तुम ज़्यादा मत सोचो और वैसे भी हम लोग आज रात से पहले यहाँ से निकल जाएंगे। तुम बस गाँव घूमने पर ध्यान दो।”
साहिल ने कार आगे बढ़ा दी। कार बढ़ती चली गई… और कुंडपुर के बीच से बहती हवा और भारी होती गई।
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क्यों देख रहे हैं सब लोग शान को?
क्या कुंडपुर सच में शापित है?
क्या जाग उठा बरगद के नीचे?
आगे जानने के लिए पढ़ते रहिए हमारी कहानी - ✨आवेश✨!
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