आवेश 3
बुआजी का घर
कुंडपुर के सँकरे रास्तों से गुज़रते हुए शान, धृति और साहिल आख़िरकार उस घर तक पहुँचे, जिसके बारे में उन्होंने सिर्फ़ किस्सों में सुना था। चौड़ा-सा आँगन, मिट्टी की दीवारें, लाल टाइलों की छत और बीच में तुलसी का चौरा... घर देखकर ही लगा कि जैसे बरसों पुराने रिश्ते अचानक ज़िंदा हो गए हों।
दरवाज़े पर ही कमला बुआजी खड़ी थीं—पीली सूती साड़ी में, माथे पर बड़ी-सी बिंदी और आँखों में अपनापन। उनके बगल में थे गंगाधर फूफाजी—उम्र ढल चुकी थी, मगर उनकी आँखों में सादगी और चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान अब भी थी।
उनके बेटे किसन और बहू ममता ने भी गर्मजोशी से स्वागत किया। ममता ने झटपट आरती की थाली निकाल ली।
"शहर से आए हो, पहले आरती उतार लूँ, फिर अंदर आइए।"
पीछे से भागते हुए बच्चे आए—पिंकी (7 साल की, नटखट और हँसमुख) और गोलू (4 साल का, गोल-मटोल और मम्मी से चिपका हुआ)।
पिंकी ने ताली बजाकर कहा, "चाची!" फिर सीधे धृति के गले लग गई।
धृति ने उसे गोद में उठा लिया, "कितनी बड़ी हो गई हमारी पिंकी।"
(ज़्यादातर तो ये लोग ही शहर आया करते थे, क्योंकि श्रवण जी कभी उन्हें कुंडपुर के बारे में बताते ही नहीं थे और न ही शान और साहिल को जानने में कोई दिलचस्पी थी।)
वो लोग अंदर एक बड़े से कमरे में बैठ गए, जहाँ लकड़ी की अलमारी और पुरानी तस्वीरें दीवार पर टंगी थीं। कुर्सियों पर बैठते ही कमला बुआजी ने उन्हें ठंडा नींबू पानी पिलाया।
"कैसा लगा गाँव?" गंगाधर फूफाजी ने पूछा।
शान ने मुस्कुराकर कहा, "बहुत अलग है, फूफाजी। शहर में इतनी शांति कहाँ मिलती है?"
ममता ने बोला, "आप सब यहीं कुछ दिन रहिए, शहर की दौड़ से अच्छी है गाँव की हवा।"
कुछ देर बाद सब लोग साथ खाना खाने के लिए चटाई पर बैठ गए। ममता और कमला बुआजी ने दाल, बैंगन का भरता, पूरियाँ और खीर परोसी।
साहिल इतना उत्साहित था कि तीन पूरियाँ खाकर ही बोला, "भाभी, मुझे तो अब शहर का खाना फीका लगने लगेगा।" सब हँस पड़े।
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दोपहर को जब सब अपने-अपने कमरों में आराम करने चले गए, शान और धृति आँगन के कोने में ठंडी हवा खाने बैठ गए। साहिल भी एक कमरे में दोपहर की नींद ले रहा था।
शान ने धीरे से धृति का हाथ पकड़कर कहा, "तो मैडम, अब अगली ट्रिप कहाँ की सोच रही हैं?"
धृति ने मुस्कुराते हुए कहा, "पहले ये गाँव तो ठीक से देख लूँ... फिर सोचूँगी।"
शान ने शरारती अंदाज़ में उसकी ठोड़ी उठाई और झुककर धीरे से उसे एक किस कर लिया।
धृति ने हौले से कंधे पर धक्का दिया, "किसी ने देख लिया तो?"
शान हँसकर बोला, "देख लें... तुम मेरी पत्नी हो। और वैसे भी सब लोग आराम कर रहे हैं।"
उसकी बात पर धृति शरमा गई और सिर उसके कंधे पर रख दिया।
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गाँव की सैर
करीब आधे घंटे बाद ममता, धृति, शान और साहिल बच्चों के साथ गाँव घूमने निकले।
पिंकी रास्ते में दौड़ती-भागती बार-बार उन्हें नई-नई चीज़ें दिखा रही थी।
“ये देखो, तालाब! यहाँ हम नहाने आते हैं। और ये पीपल का पेड़, इसके नीचे भूत रहता है… सब कहते हैं।”
धृति हँस पड़ी: “भूत? तुम्हें डर नहीं लगता?”
पिंकी गर्व से बोली: “अरे नहीं, मैं तो बहादुर हूँ। लेकिन रात को मम्मी के पास सोती हूँ।”
गोलू अपनी मम्मी की गोद में मुँह छुपाए बैठा था।
ममता हँसते हुए बोली: “इसको तो अँधेरे से ही डर लगता है, भूत-वूत तो छोड़ो।”
रास्तों पर मिट्टी की महक, हवा में धान की गंध और दूर बजती ढोलक की आवाज़… धृति को लगा जैसे सचमुच किसी दूसरी ही दुनिया में आ गई हो।
लेकिन जब वो सब गाँव के तालाब के पास से गुज़रे— पीपल के नीचे चबूतरे पर बैठे दो-तीन बुज़ुर्ग उन्हें गहरी नज़रों से देख रहे थे। उनकी आँखों में सवाल भी था… और डर भी।
गाँव की सँकरी गलियों से निकलकर सब खेतों के किनारे बने कच्चे रास्ते से आगे बढ़े। चारों ओर हरी फसलें झूम रही थीं और हवा में मिट्टी की गंध थी।
थोड़ी दूर पर अचानक एक विशाल मंदिर दिखाई दिया। ऊँचा गोपुरम, पत्थर पर बनी नक्काशी, और दरवाज़े पर पीतल की बड़ी घंटी। मंदिर पुराना था, लेकिन उसकी देखभाल साफ़ झलक रही थी—बिलकुल वैसे जैसे भारत के प्राचीन मंदिर होते हैं।
धृति ने आश्चर्य से कहा, “वाह! इतना बड़ा मंदिर… और कितना सुंदर भी।”
पिंकी की आँखें चमक उठीं। उसने उत्साहित होकर कहा, “यही है वो मंदिर जहाँ भूत रहता है।”
शान और साहिल ठिठक गए और हँस पड़े। साहिल ने चुटकी ली: "अरे वाह, पिंकी! दिन-दहाड़े भी भूत नज़र आता है क्या?”
लेकिन पिंकी गंभीर थी।
ममता ने तुरंत पिंकी का हाथ दबा दिया: “चुप रहो पिंकी! क्या बोल रही हो? भैया.. भाभी, ये तो ऐसे ही कुछ भी बोल रही है।” लेकिन उसके चेहरे पर साफ़-साफ़ बेचैनी और डर था।
लेकिन धृति ने पिंकी से कहानी सुनाने को कहा।
पिंकी ने धीमी आवाज़ में कहना शुरू किया: “बहुत साल पहले मुँदीर नाम का आदमी हमारे गाँव में रहता था। साधारण इंसान था… पर उसके घर में आग लग गई और वो उसमे जल कर मर गया। लोग कहते हैं कि उसकी आत्मा गाँव वालों को डराने लगी। कभी किसी की साँस रुक जाती, कभी कोई छत से गिर पड़ता… लगता था जैसे मुँदीर की आत्मा धीरे-धीरे सबको ख़त्म कर देगी।”
धृति ने सिहरकर पूछा: “फिर गाँव वालों ने क्या किया?”
पिंकी ने मंदिर के बगल में फैले बरगद के झुरमुट की ओर उंगली दिखाई। “वहाँ… उस बड़े बरगद के नीचे उसे कैद किया गया। गाँव के पंडितों और तांत्रिकों ने मिलकर मंत्र पढ़े और एक भारी पत्थर को अभिमंत्रित कर उसके ऊपर रख दिया। कहा जाता है कि वही पत्थर मुँदीर की आत्मा को बाँधे हुए है।”
धृति ने गौर किया कि जैसे-जैसे पिंकी बोल रही थी, ममता की साँसें तेज़ हो रही थीं।
धृति ने धीरे से पूछा: “ममता… क्या ये सब सच है?”
ममता ने गोलू को गोद में कसकर पकड़ा और आँखें झुका लीं: “कहानियाँ ही तो हैं… लेकिन गाँव में आज भी कोई भी उस बरगद के पास रात में नहीं जाता, यहाँ तक की अब तो कोई उस मन्दिर में ही नहीं जाता। लोग कहते हैं कि अगर वो पत्थर कभी हिला… तो मुँदीर की आत्मा फिर आज़ाद हो जाएगी।”
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क्या पिंकी सच कह रही है?
क्यों डर गई ममता पिंकी की बात से?
जानने के लिए पढ़ते रहिए ✨आवेश✨!
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