बैरी पिया (हर एनिमी हसबैंड) - Chapter 1
चौहान पैलेस आज एक सितारे की तरह चमक रहा था। रात का वक्त होने की वजह से वहां की लाइट्स बेहद खूबसूरत लग रही थीं। पूरे पैलेस में शादी की रौनक साफ नजर आ रही थी।
मुंबई शहर के बीचों-बीच बना पांच मंजिला पैलेस आज उस घर की इकलौती बेटी, सिद्धि चौहान की शादी के लिए सजा हुआ था।
मंडप में दूल्हा अपने होठों पर बड़ी-सी स्माइल लिए बैठा था। वह यहां का एक नामी बिजनेसमैन था, वीर बजाज।
उसके चेहरे की चमक बता रही थी कि सिद्धि चौहान से शादी करके वह कितना ज्यादा खुश है, क्योंकि सिद्धि मुंबई की सबसे रईस फैमिली की इकलौती वारिस थी।
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थोड़ी देर बाद ही पंडित जी दुल्हन को लाने के लिए बोलते हैं, जिसके बाद एक औरत, जिसने लाल रंग की बनारसी साड़ी पहनी थी, वह तेज कदमों से दुल्हन के कमरे की तरफ बढ़ जाती है। उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी, बल्कि वह बेहद गुस्से में दुल्हन के दरवाजे के पास जाती है और फिर दरवाजा पीटते हुए बोलती है,
"सिद्धि, दरवाजा खोलो। बाहर पंडित जी तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं, पर तुम्हें बुलाने के लिए दो बार पहले ही सर्वेंट को भेज चुकी हूं। यह क्या नाटक लगा रखा है?"
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अंदर दुल्हन के लिबास में सजी 22 वर्षीय सिद्धि बहुत दुखी नजर आ रही थी। उसका पूरा चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था। उसकी आंखें लगातार रोने की वजह से लाल हो चुकी थीं। उसने कोई मेकअप नहीं किया था, लेकिन जबरदस्ती उसे दुल्हन के कपड़े जरूर पहना दिए गए थे। ऐसा नहीं था कि उसे दूल्हा पसंद नहीं था या फिर दूल्हे में कोई कमी थी, पर उसे अपनी पूरी जिंदगी में शादी ही नहीं करनी थी, क्योंकि इसके साथ उसने शादी के सपने सजाए थे। वह इंसान फिलहाल जेल में था और उसने उसके साथ इतना बुरा किया था कि अब सिद्धि को शादी के नाम से ही नफरत हो चुकी थी और अब वह किसी लड़के की जिंदगी में जाकर उसकी जिंदगी खराब नहीं करना चाहती थी, क्योंकि उसे पता था, वह किसी को भी एक पत्नी के रूप में खुश नहीं रख सकती है। पर उसके घर वालों को यह बिल्कुल भी समझ नहीं आ रहा था। वे उस पर शादी के लिए दबाव बनाए जा रहे थे और अब बात इस हद तक आ गई थी कि कुछ मिनट में वह किसी और की पत्नी बनने ही वाली थी। इस ख्याल से ही उसका दिल बुरी तरह घबरा रहा था।
बाहर सिद्धि की मां दामिनी बढ़ते गुस्से के साथ और भी ज्यादा तेजी से दरवाजे को पीट रही थी और ऐसा लग रहा था, वह किसी भी पल दरवाजे को तोड़कर ही अंदर आ जाएगी।
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ना चाहते हुए सिद्धि ने अपने आंसू पोंछे और फिर धीमे कदमों से जाकर दरवाजा खोला। उसके दरवाजा खोलते ही दामिनी ने उसके चेहरे को देखा, जिसकी रंगत फीकी पड़ चुकी थी। उसने जल्दी से उसके चेहरे पर घूंघट लगाते हुए उसकी कलाई पकड़ ली और फिर उसे सीढ़ियों की तरफ ले जाते हुए बोली,
"शादी में सुंदर दिखना इतना भी जरूरी नहीं होता। अगर तुम सुंदर नहीं दिखोगी, तब भी तुम्हारी शादी तो आज होकर रहेगी। मैं भी देखती हूं, कब तक तुम एक क्रिमिनल के पीछे अपनी जिंदगी बर्बाद करती हो।"
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अपनी मां की ऐसी बातें सुनकर सिद्धि के आंसू और भी ज्यादा तेज हो चुके थे, जो लगातार उसके नरम गालों को भिगो रहे थे। पर उसके इन आंसुओं की शायद आज किसी को परवाह नहीं थी। उसके घर वाले उसे बहुत प्यार करते थे। हमेशा उसे पलकों पर बैठाकर रखा था। यहां तक कि उसकी लव मैरिज के लिए भी मान गए थे, लेकिन उस लड़के ने जो उसके साथ किया, उसके बाद सिद्धि को अपनी ही पसंद से नफरत हो चुकी थी। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि जिस शादी के लिए कभी उसने सपने देखे थे, आज उसी शादी के नाम से उसका दिल क्यों कांप रहा था।
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दामिनी उसे खींचते हुए मंडप तक लेकर गई। उसे देखकर वीर ने एक लंबी सांस भरी, क्योंकि वह बहुत ज्यादा नर्वस फील कर रहा था। सिद्धि उसकी कॉलेज की भी क्रश थी, पर उसने कभी हिम्मत ही नहीं की सिद्धि जैसी बोल्ड लड़की को कन्फेशन करने की और उसका एकतरफा प्यार हमेशा बिना इजहार के ही रह गया। पर आज उसे अपनी दुल्हन के रूप में देखकर वीर की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उसके चेहरे पर खुशी साफ झलक रही थी।
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दामिनी ने सिद्धि को वीर के बगल में बैठाया और फिर मुस्कुराते हुए पंडित जी की तरफ देखकर दो बार अपनी पलकें झपकाईं, जिसके बाद पंडित जी ने मंत्र उच्चारण करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते उनकी शादी की विधियां शुरू हो चुकी थीं।
आसपास ज्यादा लोग नहीं थे। सिर्फ सिद्धि के पिता, धर्मेंद्र और उनके कुछ खास दोस्त थे, क्योंकि सिद्धि शादी नहीं करना चाहती थी, तो उसके माता-पिता ने भी ज्यादा लोगों को इनवाइट नहीं किया था।
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पर वह इतनी रईस खानदान की शादी थी कि वहां हिडन मीडिया रिपोर्टर्स ट्विटर की ड्रेस में, तो कोई सर्वेंट की ड्रेस में मौजूद थे। उन्हें एक्सक्लूसिव न्यूज चाहिए थी, सिद्धि चौहान की शादी की।
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पंडित जी ने मुस्कुराते हुए सिद्धि और वीर को देखा और फिर शांत आवाज में कहा,
"दोनों अपने हाथ आगे करिए।"
वीर ने जल्दी से अपना हाथ आगे कर दिया था, तो वहीं सिद्धि का हाथ अपने लहंगे पर कसा हुआ था। उसकी उंगलियां घबराहट में बुरी तरह कांप रही थीं।
दामिनी ने अपना पल्लू सही करते हुए कहा,
"सिद्धि, पंडित जी कुछ कह रहे हैं तुम्हें।"
ना चाहते हुए भी सिद्धि ने अपना कांपता हाथ उठाया और फिर वीर के हाथ पर रखना चाहा, लेकिन वह उसके हाथ पर अपना हाथ रख पाती, उससे पहले ही वहां एक गन चलने की आवाज आई और सब लोग एकदम से डर गए। वीर का हाथ, जो आगे था, वह भी अपने आप ही पीछे हो गया था और सब लोग गर्दन घुमाकर दरवाजे की तरफ देखने लगे, जहां से गोली चलने की आवाज आई थी।
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सिद्धि ने जैसे ही दरवाजे की तरफ देखा, उसके होठों से कांपते हुए शब्दों में निकला,
"संकल्प।"
उस एक नाम के साथ ही उसके दिल की धड़कन जैसे अचानक तेज हो गई थी।
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संकल्प मित्तल, करीब 26 साल का नौजवान, अकेले ही इतने लोगों की भीड़ में गन चलाने की हिम्मत रखता था। उसके होठों पर तिरछी स्माइल थी। वह कदमों से चलता हुआ मंडप तक आया और वहां आते ही उसने गर्दन टेढ़ी करके वीर को अजीब नजरों से घूरा, जिससे वीर बेचारा अंदर तक डर चुका था। उसने अपना गला तर करते हुए कहा,
"संकल्प, तुम यहां? तुम जेल से कब छूटे?"
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डरते हुए वीर के मुंह से लड़खड़ाती जुबान में बस यही कुछ शब्द निकले थे। उसकी आवाज में डर साफ महसूस किया जा सकता था।
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संकल्प कुछ पल मुस्कुराया और फिर सिद्धि की तरफ अपनी बेताब नजरों को करते हुए बोला,
"जैसे ही मुझे पता चला कि तुम मेरे इश्क से शादी करना चाहती हो, मैं खुद को जेल के अंदर रोक नहीं पाया और देखो, सीधा अपनी होने वाली दुल्हन के सामने पहुंच गया। मुझे भी नहीं पता चला, मैं इतनी स्पीड से कब यहां पहुंच गया।"
और फिर वह झुककर सिद्धि के चेहरे को गौर से देखते हुए बोला,
"कैसा लग रहा है मुझे खुद के सामने देखकर? और यह इतना बड़ा घूंघट क्यों ले रखा है? मुझे तुम्हें देखना है।"
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संकल्प की गहरी आवाज और उसकी वह नीली नजरें अपने चेहरे पर महसूस करके सिद्धि के पूरे शरीर के रोंगटे खड़े हो चुके थे। उसे ऐसा लग रहा था कि घूंघट होने के बावजूद संकल्प उसकी आंखों को पढ़ पा रहा है और उसे पूरी तरीके से देख पा रहा है। डर के मारे उसका पूरा चेहरा पसीने से भीग चुका था। उसकी सांसें तक जैसे उलझने लगी थीं। उसे नहीं समझ आ रहा था कि यह सब कुछ उसके साथ क्या हो रहा है। कुछ देर पहले तो वह यह शादी नहीं करना चाहती थी, लेकिन अब संकल्प को अपनी आंखों के सामने देखकर वह बस यही सोच रही थी कि यह उसका एक बुरा सपना हो। संकल्प यहां असलियत में मौजूद ही ना हो और उसकी शादी वीर बजाज के साथ हो जाए।