Chapter 1 - नागवन की पुकार
नागमणि का रहस्य
अध्याय 1 — नागवन की पुकार
शहरों की चकाचौंध से बहुत दूर, पहाड़ों और घने जंगलों के बीच एक छोटा-सा गाँव बसा था—नागवन।
नाम सुनने में जितना साधारण था, उसकी कहानी उतनी ही रहस्यमयी थी।
गाँव के चारों तरफ फैला जंगल दिन में भी अजीब-सा शांत रहता था। ऊँचे पेड़ों की शाखाएँ इतनी घनी थीं कि कई जगह सूर्य की रोशनी जमीन तक नहीं पहुँचती थी। जंगल के बीच एक पुराना मंदिर था, जिसके बारे में गाँव में कोई खुलकर बात नहीं करता था।
कहा जाता था कि सैकड़ों वर्ष पहले वहाँ नागवंश का एक प्राचीन राज्य हुआ करता था।
उस राज्य की रक्षा एक रहस्यमयी नागमणि करती थी।
नागमणि के बारे में कहा जाता था कि वह साधारण रत्न नहीं थी। उसके भीतर ऐसी शक्ति थी जो नागलोक और मनुष्यलोक के बीच संतुलन बनाए रखती थी।
लेकिन एक रात नागमणि गायब हो गई।
उस रात के बाद नागवंश का राजमहल भी रहस्यमय तरीके से धरती के नीचे छिप गया।
तब से गाँव के बुज़ुर्ग एक ही बात कहते थे—
“जिस दिन नागमणि फिर जागेगी, नागवंश की खोई हुई राजकुमारी भी वापस आएगी।”
लोग इसे केवल पुरानी कहानी समझते थे।
लेकिन उस रात कहानी सच होने वाली थी।
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आधी रात का समय था।
आसमान पर काले बादल छाए हुए थे। तेज़ हवाएँ पेड़ों को झकझोर रही थीं।
अचानक बिजली चमकी।
और जंगल के बीच एक पल के लिए नीली रोशनी दिखाई दी।
फिर सब कुछ शांत हो गया।
पुराने मंदिर के अंदर रखी पत्थर की नाग-मूर्ति की आँखों में हल्की नीली चमक पैदा हुई।
मूर्ति के सामने वर्षों से बुझा पड़ा दीपक अपने आप जल उठा।
दीवारों पर बनी नागों की आकृतियाँ जैसे जीवित हो उठीं।
तभी मंदिर के नीचे से एक धीमी आवाज़ सुनाई दी—
“वह लौट आई है…”
कुछ क्षण बाद दूसरी आवाज़ गूँजी—
“लेकिन उसे अपनी पहचान याद नहीं।”
मंदिर की जमीन हल्की-सी काँपी।
और फिर सब शांत हो गया।
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उसी रात गाँव के बाहर एक लड़की सड़क के किनारे खड़ी थी।
उसका नाम था नैना।
उसकी उम्र करीब बीस वर्ष थी। वह कई वर्षों से शहर में रह रही थी और उस रात अचानक उसे एक अजीब सपना आया था।
सपने में उसने एक विशाल महल देखा था।
महल के चारों तरफ चाँदी जैसे चमकते पेड़ थे। बीच में एक बड़ा सिंहासन था और उसके पीछे सात फन वाला एक विशाल नाग बना हुआ था।
सिंहासन के सामने एक चमकता हुआ नीला रत्न रखा था।
नैना उस रत्न की ओर बढ़ी ही थी कि किसी ने पीछे से उसका नाम पुकारा—
“नैना…”
वह पलटी।
सामने एक स्त्री खड़ी थी।
उसके चेहरे पर चिंता थी।
उसने नैना से कहा—
“तुम्हें वापस जाना होगा।”
“कहाँ?”
स्त्री ने उत्तर नहीं दिया।
बस उसकी आँखों में आँसू आ गए।
“जहाँ से तुम आई हो।”
अचानक पूरा महल आग की रोशनी से भर गया।
नैना चीखते हुए उठ बैठी।
उसकी साँस तेज़ चल रही थी।
कमरे में अँधेरा था।
घड़ी में रात के बारह बज रहे थे।
नैना ने पानी पीने के लिए हाथ बढ़ाया, तभी उसकी नजर खिड़की पर गई।
खिड़की खुली हुई थी।
और बाहर एक काला नाग बैठा था।
नैना कुछ पल उसे देखती रही।
अजीब बात यह थी कि उसे उस साँप से डर नहीं लगा।
साँप की आँखों में हल्की नीली चमक थी।
उसने अपना फन उठाया और कुछ क्षण नैना को देखा।
फिर धीरे-धीरे जंगल की दिशा में बढ़ गया।
नैना के भीतर अचानक एक अजीब खिंचाव महसूस हुआ।
जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे उसके पीछे आने के लिए कह रही हो।
वह बिना सोचे घर से बाहर निकल आई।
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जंगल की सीमा तक पहुँचते ही नैना रुक गई।
बचपन से उसने सुना था कि रात में इस जंगल में जाना मना है।
लेकिन उस समय उसके दिमाग में सिर्फ वही काला नाग था।
वह आगे बढ़ती गई।
कुछ दूर जाने के बाद उसे जमीन पर एक अजीब निशान दिखाई दिया।
वह नाग के फन जैसा था।
जैसे ही नैना ने उस निशान को छुआ, उसके हाथ में हल्की नीली रोशनी फैल गई।
वह घबरा गई और पीछे हट गई।
लेकिन तभी सामने पेड़ों के बीच एक रास्ता दिखाई दिया।
वह रास्ता पहले वहाँ नहीं था।
नैना धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
कुछ ही मिनटों में उसके सामने एक विशाल पत्थर का मंदिर आ गया।
उसका दरवाज़ा बंद था।
लेकिन नैना के पास पहुँचते ही दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर घना अँधेरा था।
दीवारों पर प्राचीन चित्र बने थे।
नैना ने मोबाइल की रोशनी से दीवार को देखा।
एक चित्र में एक राजा था।
उसके बगल में एक रानी।
और उनके सामने एक छोटी बच्ची।
बच्ची के गले में वही चाँदी का लॉकेट था जो नैना के गले में था।
नैना के कदम वहीं रुक गए।
उसने अपने लॉकेट को हाथ में लिया।
“ये कैसे हो सकता है?”
चित्र के नीचे कुछ शब्द लिखे थे।
पुरानी भाषा होने के बावजूद नैना को उनका अर्थ समझ में आ रहा था।
“राजकुमारी लौटेगी तो नागमणि जागेगी।”
अचानक मंदिर के भीतर घंटी बज उठी।
नैना डरकर पीछे मुड़ी।
कोई नहीं था।
फिर किसी ने धीमे स्वर में कहा—
“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”
नैना ने चारों ओर देखा।
“कौन है?”
अँधेरे से एक बूढ़ा व्यक्ति बाहर आया।
उसके हाथ में लकड़ी की छड़ी थी और माथे पर नाग के आकार का एक पुराना निशान बना था।
नैना ने उसे पहचान लिया।
वह गाँव का सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति देवराज बाबा था।
“आप यहाँ?”
बाबा ने उसकी ओर देखा।
उनकी आँखों में आश्चर्य और भय दोनों थे।
“तुम्हारा यहाँ आना तय था…”
“आप क्या कह रहे हैं?”
बाबा ने उसके गले के लॉकेट की ओर देखा।
उनका चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
“ये लॉकेट तुम्हें कहाँ मिला?”
“मेरे पास बचपन से है। मेरी माँ ने दिया था।”
“तुम्हारी माँ?”
नैना ने सिर हिलाया।
बाबा कुछ क्षण चुप रहे।
फिर बोले—
“तुम्हें अपनी माँ के बारे में कितना याद है?”
नैना की आँखें नम हो गईं।
“बहुत कम। मुझे बस इतना याद है कि मैं छोटी थी… और एक रात हम कहीं जा रहे थे। उसके बाद मेरी याददाश्त में कुछ नहीं है।”
देवराज बाबा ने गहरी साँस ली।
“क्योंकि उस रात तुम्हें तुम्हारी माँ से अलग किया गया था।”
नैना के चेहरे पर हैरानी छा गई।
“किसने?”
बाबा ने मंदिर की ओर देखा।
“नागवंश के दुश्मनों ने।”
नैना हँसने की कोशिश करते हुए बोली—
“बाबा, ये सब कोई कहानी है क्या?”
बाबा ने गंभीर स्वर में कहा—
“काश यह कहानी होती।”
उसी क्षण मंदिर के भीतर से तेज़ आवाज़ आई।
दोनों ने पलटकर देखा।
मंदिर की पिछली दीवार धीरे-धीरे खुल रही थी।
दीवार के पीछे एक सीढ़ी दिखाई दी जो नीचे जा रही थी।
नीचे से नीली रोशनी आ रही थी।
नैना उस ओर बढ़ने लगी।
देवराज बाबा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“रुको!”
“क्यों?”
“क्योंकि नीचे वही चीज़ है जिसकी वजह से तुम्हारी पूरी जिंदगी बदली है।”
नैना ने अपना हाथ छुड़ाया।
“मुझे सच जानना है।”
बाबा कुछ नहीं बोले।
दोनों सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।
सीढ़ियाँ बहुत गहरी थीं।
जितना नीचे जाते, हवा उतनी ठंडी होती जाती।
अचानक नीचे एक विशाल कक्ष दिखाई दिया।
कक्ष के बीचोंबीच पत्थर का एक सिंहासन था।
सिंहासन के ऊपर एक पारदर्शी नीला रत्न हवा में तैर रहा था।
उसके चारों ओर सुनहरी रोशनी घूम रही थी।
नैना उसे देखते ही ठिठक गई।
उसके सपने में भी वही रत्न था।
“ये…”
देवराज बाबा ने धीरे से कहा—
“नागमणि।”
नैना की आँखें फैल गईं।
“लेकिन आपने कहा था कि नागमणि सदियों पहले गायब हो गई थी।”
“मैंने कहा था कि वह गायब हो गई थी।”
बाबा ने उसकी ओर देखा।
“मैंने यह नहीं कहा था कि वह नष्ट हो गई।”
नैना धीरे-धीरे नागमणि के करीब जाने लगी।
जैसे ही वह उसके पास पहुँची, रत्न की चमक बढ़ गई।
पूरे कक्ष में एक आवाज़ गूँजी—
“राजकुमारी…”
नैना अचानक रुक गई।
“कौन?”
दीवार पर एक विशाल नाग की आकृति चमकने लगी।
फिर आवाज़ आई—
“नागवंश की अंतिम उत्तराधिकारी… तुम्हारा समय आ गया है।”
नैना के हाथ में अचानक तेज़ गर्मी महसूस हुई।
उसके लॉकेट से नीली रोशनी निकलने लगी।
देवराज बाबा घुटनों के बल बैठ गए।
“राजकुमारी नैना…”
नैना ने अविश्वास से उन्हें देखा।
“मैं… राजकुमारी हूँ?”
बाबा ने सिर झुका दिया।
“हाँ।”
उसी पल मंदिर के बाहर किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई दी।
देवराज बाबा तुरंत उठ खड़े हुए।
“कोई यहाँ आ गया है।”
“कौन?”
बाबा ने भयभीत होकर कहा—
“वह व्यक्ति जिसका इंतजार तुम्हारे दुश्मन वर्षों से कर रहे थे।”
कक्ष की रोशनी अचानक बुझ गई।
अँधेरे में किसी की आवाज़ सुनाई दी—
“आखिरकार… नागमणि की वारिस मिल ही गई।”
नैना ने पीछे मुड़कर देखा।
दरवाज़े पर एक रहस्यमयी आकृति खड़ी थी।
उसके हाथ में काले पत्थर का एक छोटा-सा ताबीज था।
उसने मुस्कुराकर कहा—
“अब नागलोक का सिंहासन मेरा होगा।”
नैना के लॉकेट से अचानक तेज़ नीली रोशनी निकली।
और उसी क्षण मंदिर की पूरी जमीन काँप उठी।
दूर जंगल में सैकड़ों साँपों की फुफकार सुनाई देने लगी।
नैना ने पहली बार महसूस किया—
वह इस दुनिया की साधारण लड़की नहीं थी।
उसकी असली पहचान अब जाग चुकी थी।
और उसके साथ जाग चुका था—
नागमणि का सबसे बड़ा रहस्य।
क्रमशः…