नागमणी का रहस्य Ch. 3

Chapter 3 - मंदिर के नीचे छिपा रास्ता

Posted by sonu28 • Sep 21, 2026 10:58 PM

अध्याय 3: मंदिर के नीचे छिपा रास्ता

रात गहरी हो चुकी थी।

जंगल के चारों ओर फैली खामोशी इतनी घनी थी कि पत्तों के हल्के-से हिलने की आवाज भी किसी रहस्यमयी संकेत जैसी लग रही थी।

पुराने मंदिर के सामने खड़ी नैना उस चमकते हुए नाग-चिह्न को लगातार देख रही थी।

कुछ ही क्षण पहले मंदिर की पत्थर की दीवार पर बना वह चिह्न अचानक चमक उठा था।

नैना ने धीरे से अपना हाथ उस चिह्न के पास ले जाकर रोक दिया।

उसके भीतर एक अजीब-सी बेचैनी उठ रही थी।

उसे लग रहा था जैसे यह जगह उसे पहचानती हो।

जैसे वह पहली बार यहां नहीं आई थी।

“तुम्हें भी महसूस हो रहा है न?”

पीछे से अर्जुन की आवाज आई।

नैना ने पलटकर उसकी ओर देखा।

“क्या?”

“ये जगह…”

अर्जुन ने मंदिर की ओर देखते हुए कहा, “ऐसा लग रहा है जैसे कोई हमें यहां बुलाकर लाया है।”

नैना कुछ नहीं बोली।

उसी समय मंदिर के भीतर से बहुत धीमी-सी आवाज सुनाई दी।

छन्न…

दोनों चौंक गए।

आवाज किसी धातु के गिरने जैसी थी।

अर्जुन ने अपनी टॉर्च जलाई।

“अंदर चलते हैं।”

नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“रुको।”

“क्यों?”

“मुझे नहीं लगता कि हमें अंदर जाना चाहिए।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“और अगर अंदर ही उस रहस्य का जवाब हो तो?”

नैना ने मंदिर की ओर देखा।

उसकी आंखों के सामने अचानक एक धुंधली-सी तस्वीर उभरी।

एक विशाल नाग…

उसकी आंखों में नीली रोशनी…

और उसके सामने रखी एक चमकती हुई मणि।

नैना ने तुरंत आंखें बंद कर लीं।

“नैना!”

अर्जुन ने उसे संभाला।

“क्या हुआ?”

नैना ने माथे पर हाथ रखा।

“मैंने… कुछ देखा।”

“क्या?”

“एक नाग।”

अर्जुन चुप हो गया।

“और?”

“उसके सामने एक मणि थी… बिल्कुल वैसी ही रोशनी जैसी मैंने अभी मंदिर में देखी।”

अर्जुन ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि मंदिर का दरवाजा अपने आप खुल गया।

कर्रर्र…

दोनों कुछ पल तक दरवाजे को देखते रहे।

अंदर पूर्ण अंधेरा था।

फिर अचानक मंदिर के अंदर रखे पुराने दीपक एक-एक करके जलने लगे।

पहला दीपक…

फिर दूसरा…

फिर तीसरा…

और देखते ही देखते पूरा मंदिर हल्की नीली रोशनी से भर गया।

अर्जुन ने धीरे से कहा, “अब तो लगता है कि मंदिर खुद हमें अंदर बुला रहा है।”

नैना ने कोई जवाब नहीं दिया।

दोनों अंदर चले गए।

मंदिर के बीचोंबीच एक विशाल पत्थर की मूर्ति थी।

वह किसी देवी की मूर्ति थी, लेकिन उसके चारों ओर नागों की आकृतियां बनी थीं।

मूर्ति के नीचे एक शिलालेख था।

अर्जुन ने धूल साफ की।

कुछ शब्द दिखाई देने लगे।

“जिसे नागमणि चाहिए, उसे पहले अपने अतीत का द्वार खोलना होगा।”

नैना का दिल तेजी से धड़कने लगा।

“अतीत का द्वार…”

उसने धीरे से शब्द दोहराए।

अचानक मूर्ति की आंखों में नीली रोशनी चमकी।

और फर्श पर एक गोल निशान उभर आया।

अर्जुन पीछे हट गया।

“ये क्या है?”

नैना उस निशान को ध्यान से देखने लगी।

उसके बीचोंबीच वही नाग का चिन्ह बना था जो मंदिर की बाहरी दीवार पर था।

नैना ने जैसे ही उस निशान को छुआ, जमीन हल्के से कांप उठी।

धड़ाम!

मंदिर के पीछे की दीवार खिसक गई।

उसके पीछे एक संकरा रास्ता दिखाई दिया।

अर्जुन ने टॉर्च अंदर की ओर की।

रास्ता बहुत पुराना था।

दीवारों पर नागों और राजाओं की आकृतियां बनी थीं।

“हमें अंदर जाना होगा,” नैना ने कहा।

अर्जुन ने उसे देखा।

“तुम डर नहीं रही?”

नैना ने हल्की मुस्कान दी।

“डर तो लग रहा है… लेकिन उससे ज्यादा मुझे जानना है कि मेरा अतीत इस जगह से क्यों जुड़ा है।”

दोनों उस सुरंग में प्रवेश कर गए।

कुछ दूर चलने के बाद उन्हें दीवार पर एक चित्र दिखाई दिया।

चित्र में एक राजमहल था।

महल के सामने एक युवती खड़ी थी।

उसके माथे पर वही नाग-चिह्न था।

नैना की सांस रुक गई।

“ये…”

अर्जुन ने चित्र को देखा।

“क्या हुआ?”

नैना ने कांपती आवाज में कहा—

“ये लड़की… बिल्कुल मेरे जैसी दिखती है।”

अर्जुन ने चित्र को गौर से देखा।

वास्तव में उस युवती का चेहरा नैना से बहुत मिलता था।

लेकिन चित्र के नीचे लिखे शब्द उससे भी ज्यादा डरावने थे।

“नागवंश की अंतिम रक्षक — राजकुमारी नायरा।”

नैना कुछ कदम पीछे हट गई।

“राजकुमारी…”

उसके मन में अचानक कई आवाजें गूंजने लगीं।

किसी स्त्री की आवाज—

“नायरा, नागमणि की रक्षा करना…”

फिर दूसरी आवाज—

“अगर नागमणि गलत हाथों में चली गई, तो पूरा राज्य विनाश के रास्ते पर चला जाएगा।”

नैना ने दोनों कानों पर हाथ रख लिए।

“बस…”

अर्जुन ने उसे संभाला।

“नैना, क्या सुनाई दे रहा है?”

“मुझे नहीं पता…”

उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

“लेकिन मुझे लगता है कि मैं इस जगह को जानती हूं।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

उसी समय सुरंग के दूसरे छोर से किसी के कदमों की आवाज आई।

ठक… ठक… ठक…

दोनों चुप हो गए।

अर्जुन ने टॉर्च बंद कर दी।

कदमों की आवाज धीरे-धीरे करीब आ रही थी।

नैना ने फुसफुसाकर पूछा—

“कोई हमारे पीछे आया है?”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

कुछ क्षण बाद एक परछाई सुरंग की दीवार पर दिखाई दी।

कोई व्यक्ति धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रहा था।

अर्जुन ने नैना को पीछे कर दिया।

“कौन है?”

कोई जवाब नहीं आया।

परछाई अचानक रुक गई।

फिर एक भारी आवाज गूंजी—

“तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

नैना के चेहरे का रंग उड़ गया।

“कौन हो तुम?”

अंधेरे से एक वृद्ध व्यक्ति बाहर आया।

उसके हाथ में पुरानी लकड़ी की छड़ी थी और गले में नाग के आकार का एक लॉकेट।

उसने नैना को देखा और कुछ क्षण तक बिल्कुल स्थिर रहा।

फिर उसकी आंखें फैल गईं।

“नायरा…”

नैना के पैरों तले जमीन खिसक गई।

“मेरा नाम नैना है।”

वृद्ध ने सिर हिलाया।

“इस जन्म में।”

अर्जुन ने तुरंत पूछा—

“आप क्या कहना चाहते हैं?”

वृद्ध ने उसकी तरफ देखा।

“तुम दोनों को अभी बहुत कुछ नहीं पता।”

“तो बताइए।”

वृद्ध ने नैना के माथे की ओर देखा।

वहां एक हल्का-सा नीला निशान चमक रहा था।

“नागमणि ने तुम्हें फिर चुन लिया है।”

नैना स्तब्ध रह गई।

“नागमणि… अभी भी मौजूद है?”

वृद्ध ने जवाब नहीं दिया।

वह सुरंग के अंतिम हिस्से की ओर बढ़ा।

“अगर सच जानना है, तो मेरे पीछे आओ।”

तीनों आगे बढ़े।

कुछ देर बाद सुरंग एक विशाल भूमिगत कक्ष में खुल गई।

कक्ष के बीचोंबीच पत्थर का एक गोल मंच था।

उसके ऊपर एक खाली स्थान बना हुआ था।

ऐसा लग रहा था जैसे वहां कभी कोई बहुत मूल्यवान वस्तु रखी गई हो।

अर्जुन ने पूछा—

“क्या यही नागमणि रखने की जगह थी?”

वृद्ध ने गंभीर आवाज में कहा—

“नहीं।”

“तो?”

“नागमणि कभी यहां रखी ही नहीं गई।”

नैना ने आश्चर्य से पूछा—

“फिर यहां क्यों?”

वृद्ध ने धीरे से कहा—

“क्योंकि यह सिर्फ उसका रास्ता है।”

अचानक कक्ष की दीवारों पर नीली रोशनी फैल गई।

सैकड़ों नाग-आकृतियां चमकने लगीं।

फिर बीच में एक विशाल दरवाजा दिखाई दिया।

दरवाजे पर तीन शब्द लिखे थे—

“रक्त। राज़। विश्वास।”

वृद्ध ने नैना की ओर देखा।

“इन तीनों के बिना नागमणि तक पहुंचना असंभव है।”

अर्जुन ने पूछा—

“और अगर कोई जबरदस्ती रास्ता खोलने की कोशिश करे?”

वृद्ध की आंखों में डर उतर आया।

“तो नागमणि उसे नहीं… उसके पूरे वंश को अपना शत्रु मान लेगी।”

नैना ने धीरे से पूछा—

“मेरे अतीत में क्या हुआ था?”

वृद्ध कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

“तुम्हारी मृत्यु के साथ कहानी खत्म नहीं हुई थी।”

नैना की आंखें फैल गईं।

“क्या?”

“तुमने नागमणि को बचाने के लिए अपना जीवन त्याग दिया था। लेकिन उससे पहले तुमने एक वचन लिया था।”

“कौन-सा वचन?”

वृद्ध ने उसकी ओर देखते हुए कहा—

“कि जब नागमणि को सबसे बड़ा खतरा होगा… तुम वापस लौटोगी।”

उसी क्षण जमीन जोर से कांपी।

कक्ष की छत से धूल गिरने लगी।

अर्जुन ने नैना को पकड़ लिया।

“हमें यहां से निकलना होगा!”

लेकिन वृद्ध शांत खड़ा रहा।

उसने अंधेरे की ओर देखा।

“बहुत देर हो चुकी है।”

दूर से किसी के हंसने की आवाज आई।

एक ऐसी हंसी, जिसमें ठंडापन था।

वृद्ध ने फुसफुसाकर कहा—

“वह आ गया है।”

नैना ने पूछा—

“कौन?”

वृद्ध ने सिर्फ एक नाम लिया—

“कालकेतु।”

नैना का चेहरा अचानक बदल गया।

उसे एक पुरानी याद दिखाई दी।

एक काला महल…

आग की लपटें…

और एक आदमी जिसकी आंखों में लाल चमक थी।

फिर वही आवाज उसके कानों में गूंजी—

“नायरा… इस बार नागमणि मेरी होगी।”

नैना ने आंखें खोल दीं।

उसकी आंखों में अब डर नहीं था।

बल्कि एक अजीब-सी चमक थी।

वृद्ध ने उसे देखकर कहा—

“तुम्हें अपनी शक्ति याद आने लगी है।”

अर्जुन ने नैना की ओर देखा।

“नैना… तुम्हारी आंखें…”

नैना ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आंखों में कुछ क्षण के लिए हल्की नीली चमक थी।

फिर उसने दरवाजे की ओर देखा।

“अगर कालकेतु वापस आ गया है…”

उसने धीमी लेकिन दृढ़ आवाज में कहा—

“तो इस बार मैं भी तैयार हूं।”

और उसी पल भूमिगत कक्ष के बाहर किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी।

ठक… ठक… ठक…

तीसरी दस्तक के साथ पूरा मंदिर हिल उठा।

और पत्थर के दरवाजे पर अपने आप एक नया वाक्य उभर आया—

“नागमणि का पहला रहस्य खुल चुका है… लेकिन असली विश्वासघाती अभी सामने नहीं आया।”

नैना और अर्जुन ने एक-दूसरे की ओर देखा।

रहस्य अब शुरू हुआ था।

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