राणा सा की दीवानी - Chapter 1
"राणा सा...!!! नहीं...!!!"
गले को चीरती हुई वो दर्दनाक, बेबस और चीत्कार भरी आवाज़, रात के सन्नाटे को चीरकर बंद कमरे की दीवारों से टकराई। गौरी के शरीर में एक बिजली सी कौंध गई और वह झटके से बिस्तर पर उठ बैठी। उसका पूरा बदन पसीने से लथपथ था, जैसे उसने अभी-अभी मौत को छुआ हो। छाती काँप रही थी, ऊपर-नीचे हो रही थी, और सांसें ऐसे उखड़ रही थीं मानो वह मीलों लंबी, जानलेवा दौड़ से भागी हो। उसका गला इतना सूख चुका था कि एक शब्द भी बाहर नहीं निकल पा रहा था।
रात के ठीक तीन बज चुके थे। कमरे की खिड़की से छानकर आ रही स्ट्रीट लाइट की पीली, फीकी रोशनी चारों तरफ एक अजीब सी शांति और गहरा डर फैला रही थी। परछाइयाँ नाच रही थीं, और सन्नाटा इतना घना था कि गौरी को अपनी धड़कनों का शोर साफ सुनाई दे रहा था।
गौरी ने काँपते हाथों से साइड टेबल पर रखा पानी का गिलास उठाया। उसकी उंगलियाँ इस कदर थरथरा रही थीं कि थोड़ा पानी बेडशीट पर ही छलक गया। उसने जल्दी-जल्दी में पूरा गिलास खाली कर दिया, लेकिन प्यास बुझने के बजाय, उसका दिल और भी तेज़ी से धड़कने लगा। उसने अपनी हथेलियों को देखा – वे अब भी बुरी तरह काँप रही थीं, जैसे किसी अनजाने भय से जकड़ी हुई हों।
"फिर वही सपना... आखिर क्यों? क्यों हर रात मुझे यही सब दिखाई देता है?" गौरी ने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया, उसकी आवाज़ थकी हुई, बेबस और हताश थी।
पिछले एक महीने से यह सिलसिला हर रात का हो चुका था। जैसे ही घड़ी की सुइयां रात के तीन पर पहुँचतीं, गौरी की आँखें बंद होते ही वह एक दूसरी ही दुनिया में खिंची चली जाती।
वही धुंधला सा, लेकिन दिल दहला देने वाला मंजर: एक आलीशान, विशाल किला जो चारों तरफ से धू-धू कर जल रहा था। काले, घने धुएं के गुबार के बीच तलवारों के टकराने की कर्कश झनझनाहट और तड़पते हुए सैनिकों की दर्दनाक चीखें कानों में गूँजतीं। चारों ओर खून से सनी हुई राजपूती मिट्टी का नज़ारा होता। और उस जलते हुए, तबाह होते मैदान के बिल्कुल बीचों-बीच खड़ा एक ऊंचे कद का, फौलादी बदन वाला शख्स।
उस शख्स की पीठ गौरी की तरफ होती थी, जिस पर तलवारों के अनगिनत गहरे, भयानक घाव थे, जिनसे लाल खून रिस रहा होता था। गौरी को उसका चेहरा कभी भी साफ़ नहीं दिखता था, लेकिन उसकी वो चौड़ी, बलिष्ठ पीठ, उसके कंधों पर सजी शाही ढाल और उसकी राजपूती पोशाक देखकर गौरी का दिल किसी अनजाने दर्द से तड़प उठता था।
उसकी आत्मा मानो चीख-चीख कर एक ही नाम पुकारती थी – 'राणा सा!' और जैसे ही वह वीर योद्धा घुटनों के बल ज़मीन पर गिरता, गौरी की आँखें खुल जातीं, और वह उस अधूरी चीख के साथ जाग पड़ती।
यह सब इतना अजीब और अविश्वसनीय था कि गौरी को यकीन ही नहीं होता था। वह आज के 2026 के ज़माने की, दिल्ली की एक चुलबुली, बिंदास और मॉडर्न लड़की थी। वह शॉर्ट्स पहनती, दोस्तों के साथ कैफे में घूमती, और रील्स बनाती थी।
इतिहास (History) से उसका वास्ता तो बस स्कूल की किताबों तक ही सीमित था, और उसने कभी राजस्थान के महलों या पुराने किलों के बारे में जानने की कोशिश भी नहीं की थी। लेकिन सपने में उस शख्स को इस तरह मरते देखना, उसकी आत्मा को जकड़ लेता था। उसे ऐसा महसूस होता था जैसे उसका कोई बहुत बड़ा हिस्सा, कोई अनमोल टुकड़ा, सदियों पहले उसी जलती हुई आग में हमेशा के लिए छूट गया हो।
सुबह के 11 बजे, दिल्ली यूनिवर्सिटी की कैंटीन
चारों तरफ कॉलेज के स्टूडेंट्स का शोरगुल था। हँसी, बातें, असाइनमेंट की चिंताएँ, भविष्य की योजनाएँ – सब कुछ हवा में तैर रहा था। लेकिन गौरी इन सब से बेखबर, अपनी कॉफी का मग कसकर पकड़े, शून्य में ताक रही थी। उसकी आँखों के नीचे उभरे हल्के काले घेरे साफ गवाही दे रहे थे कि वह कितनी रातों से सोई नहीं थी।
"ओह हैलो! मिस दीवानी... कहाँ खोई हो?"
उसकी सबसे पक्की सहेली, रिया ने अचानक उसके सामने ज़ोर से चुटकी बजाकर उसे चौंकाया।
गौरी ने एक लंबी, गहरी साँस ली, जैसे वह अपनी यादों के गहरे भंवर से बाहर आने की कोशिश कर रही हो। उसने कॉफी का मग टेबल पर रखा और हताशा से कहा, "यार रिया, मैं सच में पागल हो जाऊँगी। मुझे आज रात फिर वही 'राणा सा' वाला सपना आया। लेकिन इस बार... इस बार वो दर्द इतना असली था कि जब मैं जागी, तो मुझे अपनी छाती में सचमुच का दर्द महसूस हो रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने मेरे ही सीने के पार तलवार उतार दी हो।"
रिया ने गौरी की बात सुनी और हमेशा की तरह, अपने अंदाज़ में हवा में हाथ लहराते हुए, हँसी के साथ कहा, "यार गौरी, तूने न टीवी पर वो ऐतिहासिक सीरियल देखना ज़्यादा शुरू कर दिया है। थोड़ा ब्रेक ले! ये 2026 चल रहा है बॉस! यहाँ दिल्ली में कोई राणा सा या राजा-महाराजा घोड़ों पर बैठकर नहीं घूम रहे। सब मेट्रो से चलते हैं। चिल कर और अपनी कॉफी पी!"
"नहीं रिया, तू नहीं समझ रही है," गौरी की आवाज़ में एक गहरी तड़प और शिद्दत थी, जिसने रिया की हँसी को थोड़ा कम कर दिया। "यह कोई आम सपना नहीं है जो आए और चला जाए। वो दर्द, वो आग, वो रोने की आवाज़ें... सब इतनी रियल होती हैं कि मैं चाहकर भी उन्हें भूल नहीं पाती। वो शख्स... वो मुझे बुला रहा है रिया। मुझे अंदर से महसूस होता है कि मेरा वहाँ जाना ज़रूरी है।"
तभी, रिया के फोन पर एक ज़ोरदार नोटिफिकेशन की ट्यून बजी। उसने स्क्रीन स्क्रॉल करते हुए देखा और अचानक उसकी आँखें चमक उठीं। उसने टेबल पर झुकते हुए, गौरी की ओर शरारत से देखते हुए कहा, "वैसे, तेरे इन सपनों का परमानेंट इलाज मेरे पास आ गया है। हमारे कॉलेज का जो हिस्टोरिकल डिपार्टमेंट का ट्रिप जा रहा था न... उसका डेस्टिनेशन ऐन वक्त पर बदल गया है। हम लोग अब उदयपुर नहीं जा रहे।"
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