राणा सा की दीवानी - Chapter 2
हमारे कॉलेज का जो हिस्टोरिकल डिपार्टमेंट का ट्रिप जा रहा था न... उसका डेस्टिनेशन ऐन वक्त पर बदल गया है। हम लोग अब उदयपुर नहीं जा रहे।"
"तो कहाँ जा रहे हैं?" गौरी ने बेमन से पूछा, उसकी आवाज़ में अब भी थकान थी।
"हम लोग राजस्थान के एक बहुत ही पुराने, अनछुए और रहस्यमयी किले में जा रहे हैं—गढ़ कुंदनपुर!" रिया ने बड़े उत्साह से बताया, जैसे कोई खज़ाना मिलने की खबर दे रही हो।
'गढ़ कुंदनपुर' – यह नाम सुनते ही जैसे वक्त थम गया। गौरी के हाथों से कॉफ़ी का मग छूटकर सीधे टेबल पर गिरा और पूरी कॉफ़ी फैल गई। लेकिन गौरी का ध्यान उस बिखरी हुई कॉफ़ी पर नहीं था। उसके दिमाग में अचानक बिजली की कड़कड़ाहट के साथ एक भारी, गूंजती हुई मर्दाना आवाज़ कौंधी – “हुकुम! कुंदनपुर के किले पर दुश्मनों ने घेरा डाल दिया है! आप गौरी हुकुम को लेकर गुप्त रास्ते से निकल जाइये!”
गौरी का चेहरा एकदम सफ़ेद पड़ गया। माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं। उसने काँपते हुए रिया का हाथ पकड़ा और इतनी ज़ोर से भींचा कि रिया की चीख निकल गई। "क... कहाँ जा रहे हैं हम? तुमने क्या नाम लिया अभी?"
"आउच! गौरी, क्या कर रही है यार? दर्द हो रहा है," रिया ने अपना हाथ छुड़ाया और अचरज से देखते हुए कहा, "गढ़ कुंदनपुर, राजस्थान। दिल्ली से करीब सात-आठ घंटे का रास्ता है। कहते हैं वहाँ के राजा 'राणा रणवीर सिंह' की कहानी आज भी उस किले की दीवारों में दफ़न है। इतिहास में उनका नाम बहुत बड़ा है, पर उनकी मौत कैसे हुई, ये आज तक एक राज़ है। क्यों, चलेगी न तू मेरे साथ?"
गौरी ने अपना हाथ अपने धड़कते हुए दिल पर रख लिया। उसका दिल इस वक्त इतनी तेज़ से सीने को पीट रहा था कि उसे डर था कि कहीं रिया को उसकी धड़कनें सुनाई न दे जाएँ। उसकी अंतरात्मा भीतर से चीख-चीख कर कह रही थी कि उसके सारे सवालों के जवाब, उस रात के तीन बजे वाले सपने का राज़... सब कुछ उसी गढ़ कुंदनपुर के खंडहरों में दफ़न है।
उसने बिना एक पल गंवाए, बेहद गंभीर और दृढ़ आवाज़ में कहा, "हाँ रिया... मैं चलूँगी। मुझे जाना ही होगा।"
तीन दिन बाद, राजस्थान की ओर
कॉलेज की मिनी बस राजस्थान की रेतीली और सुनसान सड़कों पर दौड़ रही थी। जैसे-जैसे बस दिल्ली की सीमा पार करके राजस्थान के गांवों और रेतीले टीलों के बीच पहुँच रही थी, गौरी के दिल की बेचैनी किसी तूफान की तरह बढ़ती जा रही थी। वह खिड़की से बाहर लगातार बदलते नज़ारों को देख रही थी – ऊँचे-ऊँचे कैक्टस, लाल मिट्टी, दूर तक फैले रेगिस्तान के टीले – लेकिन उसका दिमाग कहीं और था। वह किले के बारे में सोच रही थी, उस राज़ के बारे में, और उस अनजाने 'राणा सा' के बारे में।
शाम के धुंधलके में, जब सूरज ढल रहा था और आसमान का रंग गहरा नारंगी और लाल हो चुका था, तब बस एक सुनसान पहाड़ी के नीचे आकर रुकी। खिड़की से बाहर देखते ही गौरी की सांसें वहीं थम गईं।
सामने, पहाड़ी की चोटी पर काले और भूरे पत्थरों से बना वो विशाल, प्राचीन किला खड़ा था – गढ़ कुंदनपुर। सदियों पुराना होने के कारण उसका काफी हिस्सा खंडहर हो चुका था, उसकी दीवारें दरक चुकी थीं, लेकिन उसका शाही जलाल, उसकी भव्यता आज भी वैसी ही थी, जो किसी को भी भयभीत कर दे। ऐसा लग रहा था मानो वह किला सदियों से उसी पल का इंतज़ार कर रहा हो, जब गौरी वहाँ पहुँचगी।
"चलो बच्चों, सब लोग अपनी-अपनी पानी की बोतलें ले लो और लाइन से चलो। शाम ढलने वाली है, हमें एक घंटे में वापस आना है!" प्रोफेसर ने बस से उतरते हुए हिदायत दी, उनकी आवाज़ में थोड़ी हड़बड़ी थी।
जैसे ही गौरी ने बस के पायदान से नीचे उतरकर गढ़ कुंदनपुर की उस सूखी, रेतीली मिट्टी पर अपना पहला कदम रखा... अचानक पूरे इलाके में तेज़ हवा का एक ऐसा झोंका आया कि सबके कपड़े और बाल उड़ने लगे। लेकिन गौरी को लगा कि वह सिर्फ हवा नहीं थी। उस हवा में एक ऐसी गहरी सरसराहट थी, जैसे कोई सदियों से, पत्थरों के बीच बैठकर सिर्फ और सिर्फ उसी के आने का इंतज़ार कर रहा हो।
गौरी सम्मोहित सी होकर, बिना किसी की परवाह किए, सीधे किले के मुख्य बड़े दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगी। लोहे के बड़े-बड़े नुकीले तीरों से लैस वो दरवाज़ा किसी विशाल, प्राचीन राक्षस के मुँह जैसा लग रहा था, जो उसे निगलने को तैयार हो।
पीछे से गाइड ज़ोर से चिल्ला रहा था,
"ए लड़की! सुनो, अकेले अंदर मत जाओ! शाम के बाद किले का यह अंदरूनी हिस्सा बंद हो जाता है। यहाँ चमगादड़ और सांप भी हो सकते हैं!"
लेकिन गौरी को अब कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसके कानों में एक अजीब सी गूँज थी, एक अनजानी धुन। वह कदम-दर-कदम अंदर चलती गई। किले के भीतर का तापमान बाहर से कहीं ज़्यादा ठंडा था। हवा में पुरानी लकड़ी, ठंडे पत्थरों और नमी की एक अजीब सी महक थी, जो किसी दबी हुई कहानी की तरह महसूस हो रही थी। चलते-चलते वह किले के मुख्य दरबार यानी 'राज सभा' के विशाल हॉल में पहुँच गई।
सामने की मुख्य दीवार पर एक बहुत बड़ी, धूल से सनी हुई राजा की आदमकद पेंटिंग (तस्वीर) टंगी थी। सालों से किसी ने उसे छुआ तक नहीं था, इसलिए उस पर धूल और जालों की एक मोटी परत जमी हुई थी, जिससे पेंटिंग वाले का चेहरा साफ़ नज़र नहीं आ रहा था।
गौरी के पैर खुद-ब-खुद उस पेंटिंग के सामने जाकर रुक गए। उसका पूरा शरीर काँप रहा था, लेकिन एक अज्ञात, अनवरत आकर्षण उसे उस तस्वीर की ओर खींच रहा था। उसने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया और काँपती हुई उंगलियों से उस पेंटिंग पर जमी बरसों पुरानी धूल को एक झटके में हटा दिया।
...जैसे ही धूल हटी और टॉर्च की हल्की रोशनी उस पेंटिंग पर पड़ी, गौरी के पैरों तले से ज़मीन सचमुच खिसक गई।
चौड़ी, फौलादी छाती, रौबीली और झुकी हुई राजपूती आँखें, घनी मूंछें, माथे पर शाही तिलक और गले में मोतियों और पन्ने का भारी हार... वह हू-ब-हू वही शख्स था जो हर रात उसके सपनों में उसकी रूह को तड़पाता था! अंतर बस इतना था कि सपने में उसकी पीठ दिखती थी, और यहाँ उसका साक्षात, रौबीला चेहरा था।
नीचे तांबे की एक पुरानी, जंग लगी पट्टी पर उभरे हुए अक्षरों में लिखा था – "राणा रणवीर सिंह • गढ़ कुंदनपुर के अंतिम शासक"।
गौरी के सूखे होठों से बेहद धीमी, तड़पभरी आवाज़ निकली,
"राणा सा..."
धड़ाक!!!
तभी अचानक एक ज़ोरदार धमाका हुआ और पूरे किले की बची-कुची बिजली एक पल में चली गई। चारों तरफ घना, डरावना अंधेरा छा गया। बाहर हो रही हवा की सरसराहट अब एक खौफनाक चीख में बदल चुकी थी। हवा का एक ऐसा प्रचंड झोंका हॉल के भीतर आया कि गौरी का संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया। वह पीछे की तरफ गिरने लगी।
गौरी ने डर के मारे अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और चीखने ही वाली थी कि... वह ज़मीन के ठंडे, कठोर पत्थरों पर नहीं गिरी।
अंधेरे में, दो बेहद मजबूत, गर्म और फौलादी बाहों ने उसे ज़मीन पर गिरने से पहले ही हवा में थाम लिया। वह पकड़ इतनी मज़बूत और सुरक्षित थी कि गौरी सीधे उस शख्स की चौड़ी छाती से जा चिपकी। उस छुआन में एक अजीब सी गरमाहट थी, एक ऐसी जानी-पहचानी खुशबू थी जो चंदन और केतकी की थी – वही खुशबू जो गौरी को हमेशा अपने सपनों में महसूस होती थी।
तभी, गौरी के कानों के बिल्कुल पास, एक भारी, गूँजती और खनकती हुई मर्दाना आवाज़ सुनाई दी, जिसने गौरी के रोंगटे खड़े कर दिए और उसकी रूह तक को कंपा दिया –
"आखिरकार... तुम लौट आईं, मेरी दीवानी!"
गौरी ने डर, हैरानी और बेइंतहा जज्बात के साथ झटके से अपनी आँखें खोलीं। उसी पल आसमान में बिजली कड़की और उस एक सेकंड की रोशनी में... वहाँ कोई नहीं था। चारों तरफ सिर्फ वही सूना, घना अंधेरा था... और गौरी के दिल की वो तेज़ धड़कनें, जो अब कभी शांत नहीं होने वाली थीं।
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