The unwritten deal - Chapter 3
"तुम... तुम जाओ सुनीता," अरविन्द जी ने खिड़की की तरफ मुँह फेरते हुए कहा, "मैं बस पाँच मिनट में गाड़ी तैयार करने को कहता हूँ। तुम अनाया के पास जाओ।"
सुनीता जी के जाने के बाद अरविन्द जी ने अपनी मेज़ पर रखी भगवान कृष्ण की छोटी सी पीतल की मूर्ति की तरफ देखा। उनके हाथ खुद-ब-खुद जुड़ गए। "हे ईश्वर... मेरी मासूम बच्ची ने किसी का क्या बिगाड़ा है? उसकी सादगी की सज़ा उसे मत देना। विक्रांत जो चाहे मेरी जान ले ले, लेकिन मेरी अनाया की आबरू और उसकी ज़िंदगी बचा लेना..."
दूसरी तरफ, पहली मंज़िल पर बने अनाया के विशाल कमरे का माहौल बिल्कुल अलग था। कमरे में मोगरे, गुलाब और महंगे इत्र की महक हवा में घुली हुई थी।
अनाया बड़े से शीशे (Dressing Mirror) के सामने एक महोगनी की कुर्सी पर बैठी थी। उसकी तीन सहेलियाँ—रिया, स्नेहा और तान्या—उसके चारों तरफ घेरा बनाए खड़ी थीं और ब्यूटीशियन की पूरी टीम उसे सजाने में जुटी हुई थी।
अनाया ने हल्के लाल और सुनहरे ज़री के काम वाला एक बेहद खूबसूरत ट्रेडिशनल राजस्थानी लहंगा पहना हुआ था। भारी होने के बावजूद उस लहंगे में अनाया का सादा सा रूप किसी परी जैसा खिलकर सामने आ रहा था। उसके गले में पोल्की का एक बारीक हार था, कानों में भारी झुमके, और माथे पर एक छोटी सी लाल रंग की बिंदिया।
"अरे यार अनाया! ज़रा सीधा बैठो न!" तान्या ने उसके बालों में आफ़ताब का माँग-टीका सेट करते हुए चिढ़कर कहा, "तुम्हारी इस मासूमियत ने तो रोहन को पहले ही मार रखा है, आज तो वो मंडप में ही बेहोश हो जाएगा!"
"तान्या! चुप करो!" अनाया का चेहरा मारे शर्म के अनार की तरह लाल हो गया। उसने अपनी पलकें झुका लीं, जहाँ उसकी घनी बरौनियों के पीछे एक अनोखी सी घबराहट और खुशी तैर रही थी।
"वैसे अनाया... सच-सच बताना," रिया ने अनाया की ठुड्डी को ऊपर उठाते हुए शरारत से पूछा, "जब रोहन पहली बार तुम्हें इस दुल्हन के जोड़े में देखेगा, तो तुम उससे क्या सुनना चाहोगी?"
अनाया ने शीशे में अपनी परछाईं को देखा। उसकी मासूम, बड़ी-बड़ी आँखों में कोई बड़ा अरमान नहीं था। वो उन लड़कियों में से नहीं थी जो बड़ी-बड़ी गाड़ियों या महंगे हीरों के सपने देखती हों। उसकी सादगी ही उसकी ताकत थी।
उसने एक हल्की सी सांस ली और मुस्कुराते हुए कहा, "मैं उससे बस इतना सुनना चाहूँगी कि... 'अनाया, तुम जैसी हो, मेरे लिए वैसी ही पूरी हो।' मुझे कोई बनावटी तारीफ़ नहीं चाहिए रिया। बस एक ऐसा इंसान चाहिए जो मेरे स्वाभिमान की कद्र करे और मेरे पापा की तरह मुझे समझे।"
"उफ़्फ़! हमारी पोएट्री क्वीन!" तान्या ने उसके गालों को धीरे से खींचा, "रोहन बहुत खुशकिस्मत है अनाया, जिसे तुम जैसी सीधी और साफ़ दिल लड़की मिल रही है। आज के ज़माने में ऐसी सादगी कहाँ मिलती है!"
तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और सुनीता जी अंदर आईं। अनाया को दुल्हन के लिबास में देखकर उनके कदम वहीं रुक गए। उनकी आँखों में पल भर में आँसू भर आए।
"मम्मी?" अनाया कुर्सी से उठने लगी।
"नहीं-नहीं, बैठो मेरी बच्ची," सुनीता जी तेज़ी से आगे बढ़ीं और अनाया का सिर अपने सीने से लगा लिया। "नज़र न लगे मेरी गुड़िया को... आज तुम बिल्कुल अपनी दादी जैसी लग रही हो—वही सादगी, वही नूर।"
अनाया ने अपनी माँ की साड़ी का पल्लू पकड़ लिया, "मम्मी, मुझे डर लग रहा है। अचानक ऐसा लग रहा है जैसे सब बहुत जल्दी-जल्दी हो रहा है। मेरा दिल बहुत तेज़ धड़क रहा है।"
सुनीता जी ने हंसते हुए उसकी नज़र उतारी और एक काला टीका उसके कान के पीछे लगा दिया, "हर लड़की को अपनी शादी के दिन ऐसा ही लगता है बेटा। यह कोई डर नहीं है, यह अपनी माँ का घर छोड़कर एक नए सफर पर जाने की घबराहट है। लेकिन मुझे पता है, मेरी अनाया जहाँ भी जाएगी, अपने संस्कारों और सादगी से उस घर को स्वर्ग बना देगी।"
लेकिन अनाया के दिल के किसी कोने में एक अजीब सी बैचैनी थी। एक ऐसी अनहोनी की आहट, जिसे उसका मासूम दिल समझ नहीं पा रहा था। जब भी वो खिड़की की तरफ देखती, उसे लगता जैसे बाहर का आसमान ज़रूरत से ज़्यादा काला हो रहा है।
समय: शाम के 5:30 बजे
स्थान: मुंबई की सड़कें (लोअर परेल की तरफ)
धवन विला से फूलों से सजी हुई गाड़ियाँ सेंट रेजिस होटल की तरफ निकल चुकी थीं। सबसे आगे वाली रोल्स रॉयस कार में अरविन्द जी, सुनीता जी और अनाया बैठे थे।
अनाया कार की खिड़की के शीशे पर अपनी उंगलियाँ फेर रही थी। बाहर मुंबई की तेज़ भागती ज़िंदगी, गाड़ियों की कतारें और जगमगाती लाइटें दिख रही थीं।
अरविन्द जी ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठे थे। वो बार-बार कार के रियर-व्यू मिरर (Rear-view mirror) में अनाया का चेहरा देख रहे थे। उनके हाथ में पकड़ा हुआ रुमाल पसीने से पूरी तरह भीग चुका था। हर लाल सिग्नल पर जब गाड़ी रुकती, तो अरविन्द जी का दिल धड़कना बंद कर देता था। उन्हें लगता था कि अभी किसी काली गाड़ी से निकलकर विक्रांत के आदमी बाहर आ जाएंगे।
तभी अरविन्द जी के फोन पर एक मैसेज की बीप बजी।
उन्होंने डरते-डरते जेब से फोन निकाला और स्क्रीन ऑन की। मैसेज किसी अनजान नंबर से था। उसमें कोई शब्द नहीं लिखा था, सिर्फ एक तस्वीर थी।
अरविन्द जी ने कांपती उंगलियों से तस्वीर को ज़ूम किया।
तस्वीर सेंट रेजिस होटल के बाहर की थी। होटल के मुख्य दरवाज़े पर धवन परिवार के स्वागत के लिए लगे पोस्टर्स साफ दिख रहे थे, और उन पोस्टर्स के ठीक सामने खड़ी थी—एक काले रंग की अभेद्य बुलेटप्रूफ लेक्सस (Lexus) कार।
कार के बोनट पर एक जलती हुई सिगार रखी हुई थी, और कार की नंबर प्लेट पर बड़े अक्षरों में लिखा था: VR-01।
चित्र के नीचे एक छोटा सा टेक्स्ट आया:
"मेहमान पहुँच चुके हैं धवन साहब... अब दुल्हन का इंतज़ार है।"
मैसेज पढ़ते ही अरविन्द जी का फोन उनके हाथ से छूटकर कार के कालीन पर गिर गया। उनके मुँह से एक हल्की सी चीख निकलते-निकलते रह गई।
"क्या हुआ पापा? किसका मैसेज है?" पीछे बैठी अनाया ने अपने पापा के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।
अरविन्द जी ने तुरंत अपनी गर्दन सीधी की और फर्श से फोन उठाकर जेब में ठूँस लिया। उनकी आवाज़ कांप रही थी, लेकिन उन्होंने मुस्कुराने का भयानक नाटक किया, "क-कुछ नहीं मेरी बच्ची... वो होटल वालों का मैसेज था। सब तैयारियाँ पूरी हो गई हैं। हम बस पहुँचने ही वाले हैं।"