The unwritten deal Ch. 2

The unwritten deal - Chapter 2

Posted by Riya Sharma • Sep 25, 2026 10:52 AM

तभी नीचे से अरविन्द जी के फोन की रिंगटोन बजी।

वो अपने स्टडी रूम में खड़े होकर शादी के बाकी पेमेंट के चेक साइन कर रहे थे। उन्होंने जेब से फोन निकाला। स्क्रीन पर कोई नाम नहीं था, सिर्फ एक 'Unknown Private Number' चमक रहा था।

अरविन्द जी ने सोचा कि शायद कोई दूर का रिश्तेदार होगा जो रास्ते का पता पूछने के लिए फोन कर रहा है। उन्होंने फोन कान से लगाया, "हैलो? अरविन्द धवन हियर।"

दूसरी तरफ से कोई आवाज़ नहीं आई। सिर्फ एक ठंडी, भारी और धीमी सांसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

"हैलो? कौन बोल रहा है?" अरविन्द जी ने थोड़ा गंभीर होकर पूछा।

तभी फोन के स्पीकर से एक ऐसी आवाज़ गूँजी, जिसे सुनकर मई की तपती गर्मी में भी अरविन्द जी के शरीर में एक बर्फीली सिहरन दौड़ गई। आवाज़ में इतना एटीट्यूड, कड़वाहट और खौफ था कि अरविन्द जी के हाथ से पेन नीचे गिर गया।

"बधाई हो, मिस्टर अरविन्द धवन..." दूसरी तरफ से वो भारी, सख्त आवाज़ आई, "सुना है आज आपकी इकलौती, लाडली बेटी अनाया के हाथ पीले होने वाले हैं?"

अरविन्द जी का गला सूख गया, "क-कौन हो तुम? और तुम्हें मेरी बेटी का नाम किसने दिया? यह क्या बदतमीज़ी है?"

दूसरी तरफ से एक ठंडी, बेपरवाह हँसी गूँजी, "पहचाना नहीं धवन साहब? पाँच साल बहुत लंबा वक्त होता है न? इतनी जल्दी भूल गए कि तुमने किसकी पीठ में छुरा घोंपा था?"

अरविन्द जी के चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ गया। उनके माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं। उनका दिल तेज़ी से धड़कने लगा, "वी-विक्रांत...? विक्रांत राठौड़?!"

कॉल पर एक पल का गहरा सन्नाटा छा गया। फिर विक्रांत की वो खौफनाक आवाज़ दोबारा गूँजी, "गुड... याददाश्त अभी मरी नहीं है तुम्हारी। तो सुनो मिस्टर धवन, आज मंडप सजेगा, शहनाई भी बजेगी... लेकिन दूल्हा वो नहीं होगा जिसे तुमने चुना है। आज तुम्हारी बेटी के सिर का सेहरा और उसकी मांग का सिंदूर... मेरी नफ़रत तय करेगी।"

"विक्रांत! पागल मत बनो!" अरविन्द जी की आवाज़ डर के मारे कांपने लगी, "मेरी बेटी बेकसूर है! उसका इस सबसे कोई लेना-देना नहीं है! तुम्हें जो बदला लेना है मुझसे लो, मेरी अनाया को बख्श दो!"

"बख्श देना?" विक्रांत की आवाज़ में नफ़रत का उबाल आ गया, "तुमने मुझे क्या बख्शा था धवन? आज शाम 8:00 बजे... सेंट रेजिस होटल का वेडिंग हॉल। अपनी बेटी को सबसे खूबसूरत दुल्हन बनाकर लाना... क्योंकि आज रात मैं तुम्हें तुम्हारी सबसे कीमती चीज़ की कीमत चुकाते हुए देखूँगा।"

इससे पहले कि अरविन्द जी कुछ बोल पाते, दूसरी तरफ से फोन कट गया। 'बीप... बीप... बीप...' की आवाज़ सन्नाटे में गूँजने लगी।

अरविन्द जी का फोन हाथ से छूटकर सीधे कालीन पर गिर पड़ा। उनके पैर कांपने लगे और वो वहीं अपनी कुर्सी पर ढह गए। बाहर हॉल से अनाया के खिलखिलाकर हंसने की आवाज़ आ रही थी, और यहाँ स्टडी रूम में अरविन्द जी का पूरा वजूद खौफ से कांप रहा था।

उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस विक्रांत राठौड़ के नाम से पूरा मुंबई कांपता है, वो उनकी मासूम बेटी अनाया की ज़िंदगी को एक ऐसे मोड़ पर लाने वाला था, जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।

समय: दोपहर के 2:30 बजे

स्टडी रूम की खिड़की के शीशे पर बाहर लगे विशाल बरगद के पेड़ के पत्तों की परछाईं हिल रही थी। कमरे के अंदर फैला सन्नाटा इतना भारी था कि अरविन्द धवन की तेज़ी से चलती साँसों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। टेबल पर पड़ा उनका फोन अब भी शांत था, लेकिन उस पर आई विक्रांत राठौड़ की वो ठंडी, बर्फीली आवाज़ अरविन्द जी के कानों में किसी खौफनाक हथौड़े की तरह गूँज रही थी।

“आज तुम्हारी बेटी के सिर का सेहरा और उसकी मांग का सिंदूर... मेरी नफ़रत तय करेगी।”

अरविन्द जी ने अपने कांपते हाथों से चेहरा ढक लिया। उनके माथे से पसीने की ठंडी बूंदें ढलककर उनके चश्मे के शीशे पर गिर गईं। पाँच साल पहले की वो एक रात... एक गलत फैसला, जिसने उनकी ज़िंदगी के सारे पन्नों को ढँक दिया था। उन्होंने सोचा था कि वक्त के साथ वो काली रात बीत चुकी है, लेकिन आज उन्हें अहसास हुआ कि अतीत कभी मरता नहीं, वो बस सही मौके के इंतज़ार में साये की तरह पीछे चलता रहता है।

तभी स्टडी रूम का लकड़ी का भारी दरवाज़ा हल्का सा खटका।

"अरविन्द जी? आप यहाँ अंधेरे में क्यों बैठे हैं?"

सुनीता जी हाथ में ताज़े मोगरे के फूलों की माला लिए अंदर आईं। कमरे का सन्नाटा और अपने पति के चेहरे का उड़ा हुआ रंग देखकर उनके कदम वहीं ठिठक गए। फूलों की टोकरी उनके हाथ में हल्की सी कांप गई।

"क्या हुआ अरविन्द जी? आपकी तबीयत तो ठीक है न? चेहरा इतना पीला क्यों पड़ गया है?" सुनीता जी ने घबराकर पास आते हुए पूछा। उन्होंने अरविन्द जी के माथे पर हाथ रखा, "हे भगवान! आपका शरीर तो बर्फ की तरह ठंडा पड़ा है! मैं अभी डॉक्टर को..."

"नहीं! सुनीता... कुछ नहीं हुआ है," अरविन्द जी ने खुद को संभालने की नाकाम कोशिश करते हुए अपनी आवाज़ को सामान्य बनाने की कोशिश की। उन्होंने जल्दी से फर्श पर गिरा अपना फोन उठाया और जेब में रख लिया। "बस... थोड़ा सा सिरदर्द हो रहा था। इतने सालों बाद घर में इतना बड़ा काम हो रहा है, तो शायद थकान हो गई है।"

सुनीता जी ने शक भरी नज़रों से अपने पति को देखा, लेकिन फिर अपने हाथ के फूलों की माला को देखकर मुस्कुरा दीं, "आप भी ना... हमेशा काम का तनाव सिर पर ले लेते हैं। चलिए नीचे, समधी जी यानी कपूर साहब का फोन आया था। रोहन बारात लेकर ठीक शाम छह बजे होटल सेंट रेजिस पहुँच जाएगा। हमें भी अब निकलना चाहिए। अनाया का मेक-अप लगभग पूरा हो चुका है।"

'रोहन'... 'बारात'... 'सेंट रेजिस'... ये शब्द सुनते ही अरविन्द जी के दिल में एक तीखा दर्द उठा। वो अपनी पत्नी से आँखें नहीं मिला पा रहे थे। उन्हें लग रहा था कि अगर उन्होंने सुनीता की आँखों में देखा, तो उनका डर आँसू बनकर बह निकलेगा।

"तुम... तुम जाओ सुनीता," अरविन्द जी ने खिड़की की तरफ मुँह फेरते हुए कहा, "मैं बस पाँच मिनट में गाड़ी तैयार करने को कहता हूँ। तुम अनाया के पास जाओ।"

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