कमरे में एक अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी... इतनी खामोशी कि दीवार पर लगी बड़ी-सी घड़ी की टिक-टिक भी किसी धमकी जैसी महसूस हो रही थी। कमरे के बीचों-बीच लाल जोड़े में एक लड़की खड़ी थी। सर पर लाल दुपट्टा था, जिसके किनारे पर सुनहरी कढ़ाई चमक रही थी। हाथों में भरी-भरी चूड़ियाँ थीं, पैरों में पायल... लेकिन उस खूबसूरत दुल्हन के चेहरे पर शादी की खुशी का नाम तक नहीं था। उसकी उंगलियाँ लगातार काँप रही थीं। वो बार-बार अपने दुपट्टे का कोना मुट्ठी में दबा रही थी। सामने... एक बेहद ऊँची कुर्सी के पास खड़ा वो आदमी उसे घूर रहा था। काला सूट, चेहरे पर सख़्ती, आँखों में ऐसी ठंडक कि सामने वाला अपनी बात कहने से पहले ही डर जाए। शहर की अंडरवर्ल्ड दुनिया में उसका नाम लेना भी लोग पसंद नहीं करते थे। आरिज़ खान। एक ऐसा नाम, जिसके आगे बड़े-बड़े लोग भी आवाज़ धीमी कर लेते थे। उसने अपनी घड़ी पर नज़र डाली और फिर धीरे-धीरे लड़की की तरफ कदम बढ़ाने लगा। लड़की ने उसे अपनी तरफ आते देखा तो अनजाने में एक कदम पीछे कर लिया। आरिज़ वहीं रुक गया। उसकी आँखें सिकुड़ गईं। "पीछे क्यों हटी?" लड़की ने कुछ नहीं कहा। उसकी नजरें जमीन पर थीं। आरिज़ ने दोबारा पूछा। "मैंने कुछ पूछा है।" लड़की के होंठ हल्के से काँपे। "म... मुझे डर लग रहा है।" आरिज़ के चेहरे पर कोई नरमी नहीं आई। "डर?" वो हल्का-सा हँसा। लेकिन उस हँसी में मज़ाक नहीं था। "तुम्हें अब डर लग रहा है?" लड़की ने धीरे से सिर उठाया। आँखों में आँसू जमा थे। "मैंने... मैंने आपका कुछ नहीं बिगाड़ा। फिर आप मुझसे इतनी नफ़रत क्यों करते हैं?" आरिज़ कुछ पल उसे देखता रहा। फिर बहुत ठंडे लहजे में बोला— "क्योंकि तुम उस इंसान के घर से आई हो, जिसने मेरी ज़िंदगी बर्बाद की थी।" लड़की की आँखें फैल गईं। "लेकिन मेरे अब्बू ने..." "अपने अब्बू का नाम मत लेना मेरे सामने।" उसकी आवाज़ अचानक इतनी सख़्त हुई कि लड़की सहमकर चुप हो गई। आरिज़ उसके करीब आया। "आज से तुम्हारी ज़िंदगी का हर फैसला मैं करूँगा।" लड़की ने काँपती आवाज़ में पूछा— "और... अगर मैं आपकी बात न मानूँ तो?" आरिज़ कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा। फिर बोला— "तो तुम सीख जाओगी कि आरिज़ खान की बात न मानने की कीमत क्या होती है।" लड़की की आँखों से एक आँसू निकलकर गाल पर आ गया। उसने जल्दी से उसे पोंछ लिया। "आप मुझे इतना क्यों डरा रहे हैं?" आरिज़ ने बेरुखी से कहा— "क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तुम मुझसे हमेशा डरती रहो।" "क्यों?" "ताकि तुम्हें कभी ये गलतफहमी न हो कि तुम्हारे लिए मेरे दिल में कोई जगह है।" लड़की ने अपने काँपते हाथों को आपस में कस लिया। "तो फिर... ये शादी क्यों?" कमरे में अचानक खामोशी छा गई। आरिज़ की आँखों में एक पल के लिए अजीब-सी चमक आई। वो लड़की के सामने आकर रुक गया। "क्योंकि ये शादी मोहब्बत के लिए नहीं है।" लड़की ने धीरे से पूछा— "फिर किसलिए है?" आरिज़ ने ठंडी आवाज़ में कहा— "बदले के लिए।" लड़की का चेहरा उतर गया। "बदला... मुझसे?" "हाँ।" "लेकिन मैंने तो कुछ किया ही नहीं..." "मुझे फर्क नहीं पड़ता।" "पर मैं बेगुनाह हूँ।" "मेरी दुनिया में बेगुनाही की कोई कीमत नहीं।" लड़की ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसकी पलकों पर आँसू ठहर गए। "मैं आपसे नफ़रत करने लगूँगी।" आरिज़ के चेहरे पर कोई असर नहीं हुआ। "कर लेना।" लड़की ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। आरिज़ ने आगे कहा— "मुझे तुम्हारी मोहब्बत नहीं चाहिए।" "और अगर मैं कभी आपसे प्यार कर बैठी तो?" आरिज़ की आँखें एक पल को उसके चेहरे पर ठहर गईं। फिर उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया। "तो वो तुम्हारी सबसे बड़ी गलती होगी।" लड़की ने धीमे से कहा— "आप बहुत बुरे हैं।" आरिज़ वापस उसकी तरफ मुड़ा। "ये बात याद रखना।" "क्यों?" "क्योंकि जिस दिन तुम्हें लगेगा कि मैं बदल गया हूँ..." वो उसके पास से गुजरते हुए रुक गया। फिर बिना उसकी तरफ देखे बोला— "उस दिन खुद को समझा देना कि आरिज़ खान किसी के लिए नहीं बदलता।" लड़की की आँखों से आँसू बहने लगे। "और अगर मैं ये शादी नहीं करना चाहती?" आरिज़ ने धीरे से उसकी तरफ देखा। उसकी आवाज़ इस बार पहले से भी ज्यादा ठंडी थी। "तुम्हें शादी करनी होगी।" "क्यों?" "क्योंकि फैसला हो चुका है।" "मेरी मर्ज़ी?" आरिज़ कुछ पल चुप रहा। फिर बोला— "तुम्हारी मर्ज़ी इस घर की दहलीज़ तक थी।" लड़की ने काँपते हुए अपना दुपट्टा ठीक किया। "मैं आपसे बहुत डरती हूँ।" आरिज़ ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा— "अच्छा है।" "क्यों?" "क्योंकि डर कभी-कभी इंसान को सच्चाई समझा देता है।" लड़की ने आँसू भरी आँखों से पूछा— "और आपकी सच्चाई क्या है?" आरिज़ की आँखों में नफ़रत उतर आई। "मेरी सच्चाई ये है..." वो एक कदम पीछे हुआ। "तुम मेरी बीवी बनने वाली हो।" लड़की की साँस जैसे वहीं अटक गई। आरिज़ ने आखिरी बार उसे देखा और कमरे से बाहर जाने लगा। दरवाज़े तक पहुँचकर वो रुका। बिना पीछे मुड़े बोला— "और याद रखना..." लड़की ने काँपती आवाज़ में पूछा— "क्या?" आरिज़ की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज गई— "आज से तुम्हारा रिश्ता मुझसे है। मोहब्बत हो या नफ़रत... आँसू हों या शिकायत... तुम्हें सब मेरे सामने ही कहना होगा।" दरवाज़ा खुला। वो बाहर चला गया। दरवाज़ा बंद होते ही लड़की वहीं खड़ी रह गई। उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। उसने अपने लाल जोड़े को देखा... फिर उस बंद दरवाज़े को। और बहुत धीमी आवाज़ में खुद से बोली— "कैसी शादी है ये..." उसने काँपते हुए अपने सीने पर हाथ रखा। "जहाँ दूल्हे के नाम से खुशी नहीं... सिर्फ डर महसूस हो रहा है।"
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Chapter 1
निकाह हुआ तो किस्मत ने नया मोड़ लिया, नफ़रत ने मोहब्बत का हाथ थाम लिया। वो उसे अपना दुश्मन समझता रहा उम्रभर, और वो उसी के नाम से डरती रही उम्रभर। 🥀 - Chapter 1 -
Chapter 2
निकाह हुआ तो किस्मत ने नया मोड़ लिया, नफ़रत ने मोहब्बत का हाथ थाम लिया। वो उसे अपना दुश्मन समझता रहा उम्रभर, और वो उसी के नाम से डरती रही उम्रभर। 🥀 - Chapter 2