निकाह हुआ तो किस्मत ने नया मोड़ लिया, नफ़रत ने मोहब्बत का हाथ थाम लिया। वो उसे अपना दुश्मन समझता रहा उम्रभर, और वो उसी के नाम से डरती रही उम्रभर। 🥀 Ch. 1

निकाह हुआ तो किस्मत ने नया मोड़ लिया, नफ़रत ने मोहब्बत का हाथ थाम लिया। वो उसे अपना दुश्मन समझता रहा उम्रभर, और वो उसी के नाम से डरती रही उम्रभर। 🥀 - Chapter 1

Posted by Kashish Kashish • Sep 25, 2026 10:31 PM

नफ़रत की रात

कमरे में एक अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी...

इतनी खामोशी कि दीवार पर लगी बड़ी-सी घड़ी की टिक-टिक भी किसी धमकी जैसी महसूस हो रही थी।

कमरे के बीचों-बीच लाल जोड़े में एक लड़की खड़ी थी।

सर पर लाल दुपट्टा था, जिसके किनारे पर सुनहरी कढ़ाई चमक रही थी। हाथों में भरी-भरी चूड़ियाँ थीं, पैरों में पायल... लेकिन उस खूबसूरत दुल्हन के चेहरे पर शादी की खुशी का नाम तक नहीं था।

उसकी उंगलियाँ लगातार काँप रही थीं।

वो बार-बार अपने दुपट्टे का कोना मुट्ठी में दबा रही थी।

सामने...

एक बेहद ऊँची कुर्सी के पास खड़ा वो आदमी उसे घूर रहा था।

काला सूट, चेहरे पर सख़्ती, आँखों में ऐसी ठंडक कि सामने वाला अपनी बात कहने से पहले ही डर जाए।

शहर की अंडरवर्ल्ड दुनिया में उसका नाम लेना भी लोग पसंद नहीं करते थे।

आरिज़ खान।

एक ऐसा नाम, जिसके आगे बड़े-बड़े लोग भी आवाज़ धीमी कर लेते थे।

उसने अपनी घड़ी पर नज़र डाली और फिर धीरे-धीरे लड़की की तरफ कदम बढ़ाने लगा।

लड़की ने उसे अपनी तरफ आते देखा तो अनजाने में एक कदम पीछे कर लिया।

आरिज़ वहीं रुक गया।

उसकी आँखें सिकुड़ गईं।

"पीछे क्यों हटी?"

लड़की ने कुछ नहीं कहा।

उसकी नजरें जमीन पर थीं।

आरिज़ ने दोबारा पूछा।

"मैंने कुछ पूछा है।"

लड़की के होंठ हल्के से काँपे।

"म... मुझे डर लग रहा है।"

आरिज़ के चेहरे पर कोई नरमी नहीं आई।

"डर?"

वो हल्का-सा हँसा।

लेकिन उस हँसी में मज़ाक नहीं था।

"तुम्हें अब डर लग रहा है?"

लड़की ने धीरे से सिर उठाया।

आँखों में आँसू जमा थे।

"मैंने... मैंने आपका कुछ नहीं बिगाड़ा। फिर आप मुझसे इतनी नफ़रत क्यों करते हैं?"

आरिज़ कुछ पल उसे देखता रहा।

फिर बहुत ठंडे लहजे में बोला—

"क्योंकि तुम उस इंसान के घर से आई हो, जिसने मेरी ज़िंदगी बर्बाद की थी।"

लड़की की आँखें फैल गईं।

"लेकिन मेरे अब्बू ने..."

"अपने अब्बू का नाम मत लेना मेरे सामने।"

उसकी आवाज़ अचानक इतनी सख़्त हुई कि लड़की सहमकर चुप हो गई।

आरिज़ उसके करीब आया।

"आज से तुम्हारी ज़िंदगी का हर फैसला मैं करूँगा।"

लड़की ने काँपती आवाज़ में पूछा—

"और... अगर मैं आपकी बात न मानूँ तो?"

आरिज़ कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।

फिर बोला—

"तो तुम सीख जाओगी कि आरिज़ खान की बात न मानने की कीमत क्या होती है।"

लड़की की आँखों से एक आँसू निकलकर गाल पर आ गया।

उसने जल्दी से उसे पोंछ लिया।

"आप मुझे इतना क्यों डरा रहे हैं?"

आरिज़ ने बेरुखी से कहा—

"क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तुम मुझसे हमेशा डरती रहो।"

"क्यों?"

"ताकि तुम्हें कभी ये गलतफहमी न हो कि तुम्हारे लिए मेरे दिल में कोई जगह है।"

लड़की ने अपने काँपते हाथों को आपस में कस लिया।

"तो फिर... ये शादी क्यों?"

कमरे में अचानक खामोशी छा गई।

आरिज़ की आँखों में एक पल के लिए अजीब-सी चमक आई।

वो लड़की के सामने आकर रुक गया।

"क्योंकि ये शादी मोहब्बत के लिए नहीं है।"

लड़की ने धीरे से पूछा—

"फिर किसलिए है?"

आरिज़ ने ठंडी आवाज़ में कहा—

"बदले के लिए।"

लड़की का चेहरा उतर गया।

"बदला... मुझसे?"

"हाँ।"

"लेकिन मैंने तो कुछ किया ही नहीं..."

"मुझे फर्क नहीं पड़ता।"

"पर मैं बेगुनाह हूँ।"

"मेरी दुनिया में बेगुनाही की कोई कीमत नहीं।"

लड़की ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

उसकी पलकों पर आँसू ठहर गए।

"मैं आपसे नफ़रत करने लगूँगी।"

आरिज़ के चेहरे पर कोई असर नहीं हुआ।

"कर लेना।"

लड़की ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

आरिज़ ने आगे कहा—

"मुझे तुम्हारी मोहब्बत नहीं चाहिए।"

"और अगर मैं कभी आपसे प्यार कर बैठी तो?"

आरिज़ की आँखें एक पल को उसके चेहरे पर ठहर गईं।

फिर उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

"तो वो तुम्हारी सबसे बड़ी गलती होगी।"

लड़की ने धीमे से कहा—

"आप बहुत बुरे हैं।"

आरिज़ वापस उसकी तरफ मुड़ा।

"ये बात याद रखना।"

"क्यों?"

"क्योंकि जिस दिन तुम्हें लगेगा कि मैं बदल गया हूँ..."

वो उसके पास से गुजरते हुए रुक गया।

फिर बिना उसकी तरफ देखे बोला—

"उस दिन खुद को समझा देना कि आरिज़ खान किसी के लिए नहीं बदलता।"

लड़की की आँखों से आँसू बहने लगे।

"और अगर मैं ये शादी नहीं करना चाहती?"

आरिज़ ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

उसकी आवाज़ इस बार पहले से भी ज्यादा ठंडी थी।

"तुम्हें शादी करनी होगी।"

"क्यों?"

"क्योंकि फैसला हो चुका है।"

"मेरी मर्ज़ी?"

आरिज़ कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

"तुम्हारी मर्ज़ी इस घर की दहलीज़ तक थी।"

लड़की ने काँपते हुए अपना दुपट्टा ठीक किया।

"मैं आपसे बहुत डरती हूँ।"

आरिज़ ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

"अच्छा है।"

"क्यों?"

"क्योंकि डर कभी-कभी इंसान को सच्चाई समझा देता है।"

लड़की ने आँसू भरी आँखों से पूछा—

"और आपकी सच्चाई क्या है?"

आरिज़ की आँखों में नफ़रत उतर आई।

"मेरी सच्चाई ये है..."

वो एक कदम पीछे हुआ।

"तुम मेरी बीवी बनने वाली हो।"

लड़की की साँस जैसे वहीं अटक गई।

आरिज़ ने आखिरी बार उसे देखा और कमरे से बाहर जाने लगा।

दरवाज़े तक पहुँचकर वो रुका।

बिना पीछे मुड़े बोला—

"और याद रखना..."

लड़की ने काँपती आवाज़ में पूछा—

"क्या?"

आरिज़ की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज गई—

"आज से तुम्हारा रिश्ता मुझसे है। मोहब्बत हो या नफ़रत... आँसू हों या शिकायत... तुम्हें सब मेरे सामने ही कहना होगा।"

दरवाज़ा खुला।

वो बाहर चला गया।

दरवाज़ा बंद होते ही लड़की वहीं खड़ी रह गई।

उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।

उसने अपने लाल जोड़े को देखा...

फिर उस बंद दरवाज़े को।

और बहुत धीमी आवाज़ में खुद से बोली—

"कैसी शादी है ये..."

उसने काँपते हुए अपने सीने पर हाथ रखा।

"जहाँ दूल्हे के नाम से खुशी नहीं... सिर्फ डर महसूस हो रहा है।"

लखनऊ की उस पुरानी हवेली में आज शादी थी...

लेकिन ये किसी आम लड़की की शादी नहीं थी।

हवेली के बाहर काली गाड़ियों की लंबी कतार लगी थी। हथियारबंद आदमी जगह-जगह खड़े थे और अंदर आने-जाने वाले हर शख्स पर कड़ी नजर रखी जा रही थी।

क्योंकि आज शादी थी...

आरिज़ खान की।

वही आरिज़ खान, जिसका नाम शहर की अंधेरी दुनिया में खौफ की तरह लिया जाता था।

और उसकी दुल्हन थी—

ज़ारा।

ज़ारा...

बाईस साल की एक शांत, मासूम-सी लड़की।

लेकिन आज उसके चेहरे पर मासूमियत से ज्यादा डर था।

लाल जोड़े में सजी ज़ारा आईने के सामने बैठी थी। माथे पर मांगटीका था, हाथों में मेहंदी थी और आँखों में आँसू।

उसने धीरे से अपनी माँ की पुरानी तस्वीर उठाई।

तस्वीर में उसकी माँ मुस्कुरा रही थी।

ज़ारा की उंगलियाँ तस्वीर के किनारे पर ठहर गईं।

"अम्मी..."

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

"काश... आप आज मेरे पास होतीं।"

ज़ारा का अतीत बहुत दर्दनाक था।

जब वो सिर्फ सात साल की थी, तब उसके पिता एक रात अचानक घर छोड़कर चले गए थे।

उस रात के बाद उसके घर में कभी पहले जैसी हँसी नहीं लौटी।

उसकी माँ ने उसे अकेले पाला।

लोग तरह-तरह की बातें करते थे।

कोई कहता था उसके पिता किसी बड़े जुर्म में शामिल थे।

कोई कहता था उन्होंने आरिज़ खान के परिवार के साथ धोखा किया था।

लेकिन ज़ारा को कभी पूरी सच्चाई नहीं बताई गई।

उसे बस इतना पता था कि उसके पिता के जाने के बाद उसकी माँ ने हमेशा एक ही बात कही थी—

"बेटी... अपने अब्बू के किए की सज़ा खुद को मत देना।"

और आज...

वही अतीत उसकी शादी बनकर उसके सामने खड़ा था।

दरवाज़ा अचानक खुला।

ज़ारा बुरी तरह चौंक गई।

उसने जल्दी से आँसू पोंछे।

दरवाज़े पर आरिज़ खड़ा था।

काले शेरवानी में...

बिल्कुल शांत।

उसकी निगाह सबसे पहले ज़ारा पर गई और फिर उसके हाथ में पकड़ी तस्वीर पर।

"ये किसकी तस्वीर है?"

ज़ारा ने तस्वीर अपने सीने से लगा ली।

"मेरी अम्मी की।"

आरिज़ कुछ पल चुप रहा।

फिर उसकी नजर तस्वीर से हटकर ज़ारा के चेहरे पर टिक गई।

"और तुम्हारे अब्बू की?"

ज़ारा का चेहरा अचानक उतर गया।

"मेरे अब्बू..."

वो रुक गई।

आरिज़ ने धीमे लेकिन सख़्त स्वर में कहा—

"नाम लो।"

ज़ारा ने काँपते हुए कहा—

"सलीम अंसारी।"

आरिज़ की आँखों में तुरंत नफ़रत उतर आई।

वो धीरे-धीरे उसके करीब आया।

"तो तुम जानती हो कि तुम्हारे बाप ने मेरे साथ क्या किया था?"

ज़ारा ने सिर झुका लिया।

"नहीं।"

"झूठ।"

"मैं सच कह रही हूँ।"

"तुम्हें कुछ नहीं बताया गया?"

ज़ारा ने धीरे से सिर हिलाया।

"नहीं।"

आरिज़ ने कुछ सेकंड तक उसे देखा।

"तुम्हारी माँ ने भी नहीं?"

ज़ारा की आँखों में फिर आँसू आ गए।

"अम्मी कहती थीं कि मेरे अब्बू ने जो किया... उसकी सज़ा मुझे नहीं मिलनी चाहिए।"

आरिज़ के चेहरे पर एक कड़वी मुस्कान आई।

"तुम्हारी माँ बहुत अच्छी थीं।"

ज़ारा ने पहली बार उसकी तरफ देखा।

"आप उन्हें जानते थे?"

आरिज़ का चेहरा अचानक सख़्त हो गया।

"बहुत अच्छे से।"

"तो फिर..."

ज़ारा ने हिम्मत करके पूछा—

"आप मुझसे नफ़रत क्यों करते हैं?"

आरिज़ चुप रहा।

ज़ारा ने फिर पूछा—

"मैंने आपका क्या बिगाड़ा है?"

आरिज़ की आवाज़ भारी हो गई।

"तुमने कुछ नहीं बिगाड़ा।"

ज़ारा की आँखों में हैरानी थी।

"फिर?"

"लेकिन तुम्हारे बाप ने मेरी पूरी दुनिया उजाड़ दी थी।"

कमरे में खामोशी छा गई।

ज़ारा की आँखें फैल गईं।

"क्या किया था उन्होंने?"

आरिज़ ने उसकी तरफ देखा।

"उस रात..."

वो कुछ पल रुका।

"मेरे छोटे भाई की हत्या हुई थी।"

ज़ारा के हाथ से उसकी माँ की तस्वीर लगभग छूट गई।

"क्या?"

"और उस रात आखिरी बार तुम्हारे बाप को उसके साथ देखा गया था।"

ज़ारा ने तुरंत सिर हिलाया।

"नहीं... ये सच नहीं हो सकता।"

आरिज़ की आवाज़ और कठोर हो गई।

"मैंने अपनी आँखों से देखा था।"

"लेकिन..."

"लेकिन क्या?"

"मेरे अब्बू ऐसा नहीं कर सकते।"

आरिज़ उसकी तरफ झुककर बोला—

"तुम्हें अपने बाप पर बहुत भरोसा है?"

ज़ारा की आँखों में आँसू थे।

"वो मेरे अब्बू थे।"

"और मेरा भाई मेरा भाई था।"

ज़ारा चुप हो गई।

आरिज़ कुछ पल उसे देखता रहा।

फिर बोला—

"इसीलिए तुमसे शादी कर रहा हूँ।"

ज़ारा का चेहरा सफेद पड़ गया।

"बदला लेने के लिए?"

"हाँ।"

"लेकिन मैं तो बेगुनाह हूँ।"

"जानता हूँ।"

ज़ारा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

"फिर भी?"

आरिज़ ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

"फिर भी।"

ज़ारा के आँसू बह निकले।

"आपको पता है मैं कितनी डरी हुई हूँ?"

"पता है।"

"फिर भी आप मुझे छोड़ नहीं सकते?"

आरिज़ ने कोई जवाब नहीं दिया।

ज़ारा ने काँपती आवाज़ में कहा—

"मैंने बचपन से सिर्फ एक चीज़ माँगी थी..."

आरिज़ चुपचाप उसे देखता रहा।

"एक शांत जिंदगी।"

उसकी आवाज़ टूट गई।

"लेकिन अब मेरी शादी ऐसे आदमी से हो रही है जो मुझे मेरी गलती के बिना सज़ा देना चाहता है।"

आरिज़ की आँखों में कुछ पल के लिए हल्की-सी बेचैनी दिखाई दी।

लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभाल लिया।

"तुम्हें मुझसे नफ़रत करनी है तो करो।"

ज़ारा ने आँसू पोंछे।

"मैं आपसे नफ़रत नहीं करना चाहती।"

आरिज़ ने भौंहें सिकोड़ लीं।

"क्यों?"

ज़ारा ने धीरे से कहा—

"क्योंकि मेरी अम्मी ने सिखाया था कि किसी के दर्द को जाने बिना उससे नफ़रत नहीं करनी चाहिए।"

आरिज़ बिल्कुल स्थिर हो गया।

ज़ारा ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा।

"लेकिन अगर आपने मुझे मेरे अब्बू की सज़ा दी..."

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

"तो शायद एक दिन मैं सच में आपसे नफ़रत करने लगूँगी।"

आरिज़ ने कुछ नहीं कहा।

बस उसे देखता रहा।

क्योंकि पहली बार...

उस लड़की की आँखों में डर के साथ-साथ सवाल भी था।

और आरिज़ खान को सबसे ज्यादा डर...

शायद उसी सवाल से लगने लगा था।

क्योंकि अगर ज़ारा सच में बेगुनाह थी...

तो इतने सालों से जिस बदले को अपनी जिंदगी का मकसद समझकर जी रहा था...

वो बदला आखिर किससे था?

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