निकाह हुआ तो किस्मत ने नया मोड़ लिया, नफ़रत ने मोहब्बत का हाथ थाम लिया। वो उसे अपना दुश्मन समझता रहा उम्रभर, और वो उसी के नाम से डरती रही उम्रभर। 🥀 Ch. 2

निकाह हुआ तो किस्मत ने नया मोड़ लिया, नफ़रत ने मोहब्बत का हाथ थाम लिया। वो उसे अपना दुश्मन समझता रहा उम्रभर, और वो उसी के नाम से डरती रही उम्रभर। 🥀 - Chapter 2

Posted by Kashish Kashish • Sep 26, 2026 11:46 AM

पूरा हॉल आज कुछ अलग ही नज़र आ रहा था...

चारों तरफ काले सूट पहने गार्ड्स खड़े थे। हर एक के हाथ में गन थी और उनकी नज़रें हॉल में मौजूद हर शख्स पर थीं। किसी की हिम्मत नहीं थी कि ज़रा-सी भी हलचल करे।

बीच में एक बड़ा-सा निकाह का इंतज़ाम किया गया था।

सफेद फूलों से सजा हुआ सोफा...

सामने काज़ी साहब बैठे थे और उनके पास निकाह के कागज़ रखे थे।

कुछ करीबी रिश्तेदार और मेहमान थोड़ी दूरी पर बैठे हुए थे, मगर सबके चेहरों पर एक अजीब-सी खामोशी थी।

क्योंकि इस पूरे माहौल के बीच बैठा था...

आरिज़।

काले शेरवानी में, चेहरे पर वही सख्त भाव लिए हुए।

उसकी आँखों में ऐसा रौब था कि सामने वाला चाहकर भी नज़रें उठाकर उसे देखने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।

और दूसरी तरफ...

ज़ारा।

लाल जोड़े में बैठी हुई।

चेहरे पर दुपट्टा था, मगर उसके नीचे छुपा उसका डर साफ दिखाई दे रहा था।

उसकी उंगलियाँ लगातार काँप रही थीं।

वो बार-बार अपने हाथों को आपस में भींच रही थी।

काज़ी साहब ने उसकी तरफ देखा।

“बेटी... घबराइए मत।”

ज़ारा ने धीरे से नज़र उठाई।

सामने आरिज़ बैठा था।

उसकी नज़र सीधे ज़ारा पर थी।

ज़ारा की धड़कन और तेज हो गई।

वो बहुत धीमी आवाज़ में बोली—

“मुझे... डर लग रहा है।”

आरिज़ की आँखें थोड़ी सिकुड़ीं।

“मुझसे?”

ज़ारा ने कुछ नहीं कहा।

बस अपनी नज़रें झुका लीं।

उसकी आँखों के कोने भीग चुके थे।

आरिज़ कुछ पल उसे देखता रहा।

फिर थोड़ा झुककर धीमी आवाज़ में बोला—

“ज़ारा... मेरी तरफ देखो।”

ज़ारा ने डरते-डरते उसकी तरफ देखा।

“मैं तुम्हें डराना नहीं चाहता।”

ज़ारा की आँखों से एक आँसू निकलकर गाल पर आ गया।

“लेकिन... आपके आसपास ये सारे गार्ड्स... हाथों में गन... और ये सब...”

उसकी आवाज़ काँप गई।

“मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी शादी में नहीं... किसी कैद में बैठी हूँ।”

हॉल में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

आरिज़ का चेहरा गंभीर हो गया।

उसने चारों तरफ खड़े गार्ड्स की तरफ देखा।

फिर वापस ज़ारा को देखते हुए बोला—

“ये लोग मेरी हिफाज़त के लिए हैं।”

ज़ारा ने धीमे से कहा—

“मुझे आपकी हिफाज़त नहीं चाहिए... मुझे बस ये चाहिए कि मैं आपसे डरूँ नहीं।”

आरिज़ कुछ पल बिल्कुल खामोश रहा।

फिर उसने अपनी आवाज़ धीमी कर ली।

“तो आज से कोशिश करूँगा कि तुम्हें मुझसे डरने की वजह न मिले।”

ज़ारा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

तभी काज़ी साहब ने अपना गला साफ किया।

“अगर आप दोनों तैयार हैं... तो निकाह शुरू करते हैं।”

आरिज़ ने बिना नज़र हटाए कहा—

“जी।”

काज़ी साहब ने निकाह की रस्म शुरू की।

कुछ सवाल आरिज़ से किए गए।

आरिज़ ने पूरे यक़ीन के साथ जवाब दिया।

“क़बूल है।”

एक बार...

“क़बूल है।”

दूसरी बार...

“क़बूल है।”

तीसरी बार उसकी आवाज़ और भी साफ थी—

“क़बूल है।”

अब काज़ी साहब ने ज़ारा की तरफ देखा।

“बेटी ज़ारा... क्या आपको आरिज़ से निकाह क़बूल है?”

ज़ारा का दिल जैसे रुक गया।

उसने आरिज़ की तरफ देखा।

आरिज़ इस बार बिल्कुल खामोश था।

उसकी आँखों में पहले जैसी सख्ती नहीं थी।

ज़ारा के होंठ काँपे।

“मुझे...”

उसकी आवाज़ निकलते-निकलते रुक गई।

काज़ी साहब ने नरमी से पूछा—

“बेटी?”

ज़ारा ने अपनी आँखें बंद कीं।

एक गहरी साँस ली।

और धीमे से बोली—

“क़बूल है...”

आरिज़ की नज़र उसके चेहरे पर टिक गई।

काज़ी साहब ने दोबारा पूछा—

“क़बूल है?”

ज़ारा की आँखों से एक और आँसू निकल पड़ा।

इस बार उसने थोड़ा मजबूत होकर कहा—

“क़बूल है।”

तीसरी बार सवाल हुआ।

ज़ारा ने आरिज़ को देखा।

डर अभी भी उसके अंदर था...

लेकिन उस डर के साथ एक अजीब-सी उम्मीद भी जन्म ले चुकी थी।

उसने धीमी मगर साफ आवाज़ में कहा—

“क़बूल है।”

काज़ी साहब ने मुस्कुराकर निकाह पूरा किया।

“मुबारक हो... आपका निकाह मुकम्मल हुआ।”

कुछ मेहमानों ने धीरे से “मुबारक हो” कहा।

हॉल में दुआओं की आवाज़ें गूँजने लगीं।

लेकिन ज़ारा अब भी चुप बैठी थी।

आरिज़ ने धीरे से उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

ज़ारा की नज़र उसके हाथ पर गई।

वो थोड़ा पीछे हुई।

आरिज़ रुक गया।

उसने अपना हाथ वापस कर लिया और शांत आवाज़ में कहा—

“जब तक तुम्हारा डर खत्म नहीं होता... मैं तुम्हें छूने की कोशिश भी नहीं करूँगा।”

ज़ारा ने उसकी तरफ देखा।

शायद पहली बार उसे आरिज़ की आवाज़ में हुक्म नहीं...

बल्कि एक वादा सुनाई दिया था।

उसने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया।

आरिज़ ने उसकी उंगलियाँ थाम लीं।

बहुत हल्के से।

ज़ारा की आँखों में फिर आँसू आ गए।

आरिज़ ने धीमे से पूछा—

“अब भी डर लग रहा है?”

ज़ारा ने हल्की-सी काँपती मुस्कान के साथ कहा—

“थोड़ा...”

आरिज़ ने उसकी तरफ देखा।

“तो थोड़ा वक्त मुझे दे दो।”

ज़ारा ने सिर झुका लिया।

और पहली बार उसके चेहरे पर डर के साथ-साथ एक छोटी-सी उम्मीद भी दिखाई दी।.........

निकाह की रस्म पूरी हो चुकी थी...

मेहमान धीरे-धीरे घर से जा चुके थे, लेकिन ज़ारा के दिल में मची हलचल अभी भी वैसी ही थी।

कुछ देर पहले तक उसके हाथों में मेहंदी थी, माथे पर सुहाग की निशानी और दिल में हजारों सवाल...

और अब वो आरिज़ के साथ उसकी गाड़ी में बैठी थी।

गाड़ी के शीशे से बाहर अंधेरी सड़कें पीछे छूटती जा रही थीं।

ज़ारा चुपचाप खिड़की से बाहर देख रही थी।

उसकी उंगलियाँ दुपट्टे के किनारे को बार-बार मसल रही थीं।

वो कभी आरिज़ की तरफ देखती...

फिर तुरंत नज़रें झुका लेती।

आरिज़ पूरे रास्ते खामोश था।

उसका चेहरा सख्त था और आँखों में ऐसी नफ़रत थी जिसे देखकर ज़ारा का डर हर पल बढ़ता जा रहा था।

कुछ देर बाद गाड़ी एक बहुत बड़े लोहे के गेट के सामने जाकर रुकी।

गेट खुला।

गाड़ी अंदर दाखिल हुई।

ज़ारा ने सामने देखा तो एक बहुत बड़ा आलीशान बंगला उसके सामने था।

ऊँची दीवारें...

बड़ा-सा लॉन...

चारों तरफ सिक्योरिटी...

और घर के बाहर खड़े कई गार्ड्स।

गाड़ी रुकते ही आरिज़ बिना कुछ कहे बाहर निकल गया।

ज़ारा कुछ पल अपनी जगह बैठी रही।

फिर उसने धीरे से दरवाज़ा खोला और बाहर उतर गई।

आरिज़ आगे बढ़ चुका था।

ज़ारा जल्दी से उसके पीछे चलने लगी।

जैसे ही वो घर के अंदर पहुँची, उसकी नज़र सामने लगी एक बड़ी-सी तस्वीर पर जाकर रुक गई।

एक बेहद खूबसूरत औरत की तस्वीर थी।

ज़ारा ने धीरे से पूछा—

“ये...?”

आरिज़ वहीं रुक गया।

उसकी आँखों का रंग अचानक बदल गया।

“मेरी माँ।”

ज़ारा ने तस्वीर को गौर से देखा।

“बहुत खूबसूरत हैं...”

आरिज़ ने कोई जवाब नहीं दिया।

बस कुछ सेकंड तस्वीर को देखता रहा।

फिर उसकी आवाज़ भारी हो गई।

“ज़िंदा हैं... लेकिन होश में नहीं।”

ज़ारा का चेहरा उतर गया।

“क्या मतलब?”

आरिज़ ने ठंडी आवाज़ में कहा—

“कई सालों से कोमा में हैं।”

ज़ारा कुछ बोल नहीं पाई।

तभी पीछे से एक औरत की आवाज़ आई—

“आरिज़...”

ज़ारा ने पलटकर देखा।

एक अधेड़ उम्र की औरत वहाँ खड़ी थी।

आरिज़ की चाची।

उन्होंने पहले आरिज़ को देखा, फिर ज़ारा को।

उनकी आँखों में भी अपनापन नहीं था।

बस एक ठंडी-सी नज़र थी।

आरिज़ ने ज़ारा की तरफ इशारा किया।

“ये है ज़ारा।”

चाची ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा—

“तो यही है वो लड़की...”

ज़ारा ने अदब से सिर झुका दिया।

“जी...”

लेकिन उसकी आवाज़ में डर साफ था।

चाची कुछ कहतीं उससे पहले आरिज़ ने सख्त आवाज़ में कहा—

“ऊपर जाने की जरूरत नहीं है।”

ज़ारा ने उसकी तरफ देखा।

“जी?”

आरिज़ सीढ़ियों से नीचे उतरकर उसके बिल्कुल सामने आ गया।

उसने कुछ पल तक ज़ारा को घूरकर देखा।

“आज से इस घर में तुम्हारा काम सिर्फ एक है।”

ज़ारा की धड़कन तेज हो गई।

“क्या?”

आरिज़ ने बिना किसी नरमी के कहा—

“इस घर का हर काम।”

ज़ारा चुप रही।

आरिज़ ने आगे कहा—

“सुबह घर की सफाई से लेकर खाना बनाने तक... कपड़े... कमरे... मेरी माँ का कमरा... घर में जो भी काम होगा, तुम करोगी।”

ज़ारा की आँखें फैल गईं।

“लेकिन...”

“लेकिन क्या?”

ज़ारा ने हिम्मत करके कहा—

“मैंने कभी इतने बड़े घर का काम नहीं किया।”

आरिज़ की आँखों में नफ़रत और गहरी हो गई।

“सीख जाओगी।”

“लेकिन मैं आपकी—”

आरिज़ ने उसकी बात बीच में ही काट दी।

“बीवी?”

उसके होंठों पर एक कड़वी मुस्कान आई।

“ये शब्द मेरे सामने मत बोलना।”

ज़ारा का चेहरा सफेद पड़ गया।

आरिज़ उसके बिल्कुल करीब आया और धीमी, मगर बेहद कठोर आवाज़ में बोला—

“आज से तुम मेरी बीवी नहीं हो।”

ज़ारा की आँखें भर आईं।

आरिज़ ने एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा—

“मेरी नौकर हो।”

ज़ारा के होंठ काँपने लगे।

“आरिज़...”

“मेरे नाम का सहारा लेकर इस घर में रानी बनने का ख्वाब मत देखना।”

उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

चाची दूर खड़ी सब देख रही थीं।

ज़ारा ने काँपती आवाज़ में कहा—

“मैंने आपका क्या बिगाड़ा है?”

आरिज़ कुछ पल चुप रहा।

उसकी मुट्ठियाँ कस गईं।

“तुमने?”

वो हल्का-सा हँसा, मगर उस हँसी में दर्द था।

“तुमने कुछ नहीं बिगाड़ा।”

ज़ारा ने उसकी तरफ देखा।

“फिर मुझसे इतनी नफ़रत क्यों?”

आरिज़ की आँखों में एक पल के लिए कुछ बदला।

मगर अगले ही पल उसने अपना चेहरा सख्त कर लिया।

“क्योंकि कुछ रिश्ते मजबूरी में बनते हैं, ज़ारा।”

“और मैं तुम्हें कभी अपनी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं मानूँगा।”

ज़ारा ने अपने आँसू पोंछने की कोशिश की।

चाची ने ठंडी आवाज़ में कहा—

“बहू हो तो बहू की तरह काम करना सीखो। इस घर में किसी को तुम्हारे आँसू देखने का वक्त नहीं है।”

ज़ारा ने उनकी तरफ देखा।

उनकी आवाज़ सुनकर उसका डर और बढ़ गया।

उसे महसूस हो रहा था कि इस घर में उसका अपना कोई नहीं है।

न आरिज़...

न चाची...

और जिस औरत को देखकर उसके मन में अपनापन आया था...

वो आरिज़ की माँ भी बेहोशी की हालत में थी।

आरिज़ ने नौकरों की तरफ देखा।

“आज से इसे कोई काम के लिए मदद नहीं करेगा।”

फिर ज़ारा की तरफ देखकर बोला—

“सब कुछ खुद करना।”

ज़ारा ने धीमे से पूछा—

“अगर मुझसे नहीं हुआ तो?”

आरिज़ की आँखें उस पर टिक गईं।

“तो कोशिश करती रहना।”

“और अगर मैं थक गई तो?”

“आराम करने से पहले काम खत्म करना।”

ज़ारा की आँखों से लगातार आँसू बहने लगे।

उसने अपने दुपट्टे से चेहरा ढक लिया।

आरिज़ ने उसे रोते हुए देखा...

एक पल के लिए उसके चेहरे पर बेचैनी आई।

जैसे दिल ने उसे रोकना चाहा हो।

मगर उसने उस एहसास को दबा दिया।

वो पलटकर सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।

फिर अचानक रुककर बोला—

“और हाँ...”

ज़ारा ने आँसू भरी आँखों से उसकी तरफ देखा।

“मेरे कमरे में बिना इजाज़त मत आना।”

आरिज़ ऊपर चला गया।

उसके कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे दूर होती गई।

ज़ारा वहीं खड़ी रह गई।

उसके सामने इतना बड़ा घर था...

लेकिन उसे पहली बार महसूस हुआ कि इतनी बड़ी दुनिया में भी इंसान कितना अकेला हो सकता है।

उसने अपनी हथेलियों को देखा।

मेहंदी अब भी लगी हुई थी।

कुछ घंटे पहले इन्हीं हाथों में आरिज़ के नाम की मेहंदी थी।

और आज वही हाथ उसके घर के सारे काम करने वाले थे।

ज़ारा ने अपनी आँखें बंद कीं।

एक आँसू उसके गाल से होते हुए मेहंदी लगे हाथ पर गिरा।

वो बहुत धीमी आवाज़ में खुद से बोली—

“या अल्लाह... मैंने तो सोचा था निकाह के बाद एक घर मिलेगा...”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“मुझे नहीं पता था... ये घर मेरी सबसे बड़ी आज़माइश बन जाएगा।”

ऊपर खड़ा आरिज़ सीढ़ियों के मोड़ से उसे देख रहा था।

ज़ारा उसे नहीं देख पाई।

उसकी आँखों में अब भी गुस्सा था...

नफ़रत थी...

लेकिन कहीं बहुत अंदर एक सवाल भी था—

अगर आरिज़ उससे इतनी नफ़रत करता है, तो उसकी आँखों में हर बार इतना दर्द क्यों उतर आता है?

आरिज़

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